सबद
vatsanurag.blogspot.com

कवि कह गया है : २ : बोर्हेस

12:51 pm


मैं अनिवार्यतः एक पाठक हूँ




मेरी समझ से काव्यशास्त्र कविता लिखने का एक औजार भर है। मैं मानता हूँ कि कविता लिखने के उतने गुण-धर्म या सिद्धांत भी हो सकते हैं जितने कि कवि।

मैं अपने आप को अनिवार्यतः एक पाठक मानता हूँ।...मैंने जो पढ़ा है वह मेरे लेखन से कहीं ज़्यादा महत्व का है। आप वही पढ़ते हैं जो आपको पसंद है -- लेकिन आप ठीक वही नहीं लिख पाते जो आप लिखना चाहते हैं। असल में आप उतना भर ही लिख पाते हैं जितना आपसे लिखा जाता है।

एक व्यक्ति का जीवन हजारों क्षणों और दिनों का योग होता है। इन मार-तमाम दिनों और इनमें घटित घटनाओं की महज एक क्षण में समाई हो सकती है : ऐन उस क्षण में जब व्यक्ति यह जान लेता है कि वह कौन है और अपने को आमने-सामने देखने लगता है।

एक महान किताब लिखने लिए, शायद एक ही मूल और सामान्य योग्यता की दरकार होती है : किताब के हर हिस्से में कुछ न कुछ ऐसा हो जो हमारी कल्पना को एक सुखद अहसास से भर दे।

मेरे लिए एक लेखक होने का क्या मतलब है ? इसका मतलब अपनी कल्पनाओं के प्रति निष्कपट होना है। जब मैं कुछ लिख रहा होता हूँ, मैं इसकी परवाह नहीं करता कि यह वस्तुतः कितना सच है। मसलन, मैं एक कहानी लिखता हूँ, इसलिए कि मुझे इसमें विश्वास है। पर वैसा विश्वास नहीं जैसा किसी को इतिहास में होता है, बल्कि उस तरह का विश्वास जो कोई अपने सपनों और ख़यालों पर करता है।

हमें चीजों को बदलना होगा। तब भी जब हमें ऐसा करना अप्रासंगिक जान पड़े। अगर हम ऐसा नहीं करते तो हमें ख़ुद को कलाकार नहीं, महज पत्रकार या इतिहासकार मानना चाहिए। गोकि मैं मानता हूँ कि सच्चे इतिहासकारों ने भी यह जान लिया है कि वे एक उपन्यासकार की तरह कल्पनाशील हो सकते हैं।

लेखकों को सलाह के नाम पर मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि वे अपने लिखे हुए में जितनी कम फेरबदल करें, उतना अच्छा। मुझे नहीं लगता कि लिखे हुए को और ज़्यादा सँवारने से उसमें निखार आता है।

जब मैं लिखता हूँ, मैं पाठक के बारे में नहीं सोचता ( क्योंकि पाठक एक काल्पनिक पात्र है )। सोचता तो मैं अपने बारे में भी नहीं हूँ ( शायद मैं भी पाठक की तरह ही काल्पनिक हूँ ) , पर मैं जो कहना चाहता हूँ उसके बारे में ज़रूर सोचता हूँ और मेरी हरचंद कोशिश रहती है कि मैं उसे ज़ाया न होने दूँ।

मैं अभिव्यक्ति में नहीं, सिर्फ़ संकेतों में विश्वास करता हूँ। आखिरकार शब्द क्या हैं ? शब्द साझा स्मृतियों के संकेत ही तो हैं। अगर मैं किसी शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, तो पढ़नेवाले को उस शब्द का कोई अर्थ पहले से पता होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो उस शब्द का उसके लिए कोई मानी नहीं। मेरे ख़याल में हम लेखक पाठकों के मन में उस शब्द विशेष के अर्थ की स्मृति जगाकर उसे कल्पनाशील ही बनाते हैं।
****

अनुवाद : अनुराग वत्स

( अर्जेंटीना के अप्रतिम कवि-गल्पकार जॉर्ज लुई बोर्हेस ने "दिस क्राफ्ट ऑफ़ वर्स '' नाम से प्रसिद्द द चार्ल्स एलियट नोर्टन लेक्चर सीरीज के तहत १९६७-६८ में पाँच व्याख्यान दिए थे। ये व्याख्यान कुछ वर्ष पहले ही पुस्तकाकार संकलित होकर आए हैं। मैंने इन्हें कुंवर नारायणजी के दुर्लभ पुस्तक संग्रह से लेकर पढ़ा। इस स्तंभ की दूसरी प्रस्तुति में बोर्हेस के आखिरी व्याख्यान, ''अ पोएट'स क्रीड'' से कुछ अनूदित अंश दिए जा रहे हैं। )
Read On 4 comments

कोठार से बीज : ५ : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

1:04 am
( हममें नए कवि-लेखकों के साथ-साथ पुरखों को पढ़ने-गुनने की सलाहियत बनी रहे, इसीलिए इस स्तंभ की शुरुआत की गई थी। इसके तहत अब तक आप शमशेर , त्रिलोचन , नागार्जुन और रघुवीर सहाय की रचनाएं पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कुछ कविताएं। सर्वेश्वर नई कविता के दौर में उभरे, पर वे उन कम कविओं में थे जो नई कविता का ज़ोर कम पड़ने पर भी अपने काव्य-गुण और प्रतिबद्धता की वजह से लंबे अर्से तक अच्छी कविताएं लिख सके। )

तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर महसूस हुआ है
कि दिशाएं पास आ गई हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन सी बन गई है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकांत नहीं
न बाहर, न भीतर।

हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गए हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुंह छिपा सकता हूँ।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुजर सकता है।

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएं अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।
****

कितना अच्छा होता है

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

शब्दों की खोज शुरू होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
ख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ ख़ुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना।
****

अंत में

अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ
एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।

अन्यथा
इससे पूर्व कि
मेरा हर कथन
हर मंथन
हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,
उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ
जो मृत्यु है।

'वह बिना कहे मर गया'
यह अधिक गौरवशाली है
यह कहे जाने से --
'कि वह मरने के पहले
कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।'
****

Read On 8 comments

डायरी : ३ : गीत चतुर्वेदी

7:56 pm

Véronique Brosset


26 अक्टूबर, २००८

कोई भी रीडर रिलीफ़ क्यों मांगता है ? जब हम फिल्म देखते हैं, तो उसमें रिलीफ़ खोजते हैं। शायद इसीलिए हिंदी फिल्मों में गाने ठूंसने की टुच्चई की जाती है। जैसे हर आदमी की पाठकीय मांग अलग होती है, वैसे ही हर आदमी की रिलीफ़ की मांग भी अलग होती है। 'गोमूत्र' के बारे में भी ऐसा है। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें रिलीफ़ नहीं है, लगातार एक तनाव है और पढ़ते-पढ़ते झल्लाहट हो उठती है। मैंने पूछा, फिर यह रिलीफ़ कैसे आ सकता था ? उन्होंने कहा, जैसे इसमें कोई प्रेमदृश्य हो सकता था, कुछ हल्की-फुल्की स्मृतियां हो सकती थीं, नैरेटर की पत्नी या उसकी बच्ची का एक समांतर जीवन हो सकता था और इन सबके साथ थोड़ी तरलता हो सकती थी।

क्यों हम तरलता की उम्मीद रखते हैं ? वह ऐसी कहानी नहीं थी, जिसमें तरलता की कोई गुंजाइश हो। एक मिडिल क्लास व्यक्ति, जो काइयां है, धूर्त है, मक्कार है, विरोधाभासी तरीक़े से भोला है, अपनी सुविधा के अनुसार ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही है, अभिनेता है, उसके जीवन में जितने लोग हैं, उनका अस्तित्व सिर्फ़ इसलिए है कि वे उसके जीवन में हैं। वह कभी यह नहीं सोचता कि जितनी देर मैं घर से बाहर हूं, उतनी देर घर में बाक़ी के दो प्राणी कैसे रहते होंगे ? वह उन्हें सिर्फ़ तभी देखता और पाता है, जब वे उसके सामने होते हैं। और उसके सामने उनकी उपस्थिति महज़ किसी वस्तु की तरह होती है।

वे दोनों किसी अपराध की सज़ा के तौर पर उसके परिवार के हिस्से हैं और उनका मूड-स्वभाव सिर्फ़ इसी नैरेटर के मूड-स्वभाव से संचालित होता है। एक मिडिल क्लास स्टीरियोटिपिकल पुरुष अपना स्पेस बढ़ाते हुए हमेशा दूसरों के ( ख़ासकर अपने परिजनों के ) स्पेस का अतिक्रमण करता है। सो, उस वस्तु जैसे जीवन में तरलता की जगह निकाल पाना मेरे लिए मुश्किल रहा। उसमें जो कुछ भी है, वह सिर्फ़ उसी मिडिल क्लास को दिखाता है। चूंकि वह फर्स्‍ट पर्सन में लिखी कहानी है, इसलिए हमारे यहां कई लोगों ने उसे नैरेटर की नहीं, राइटर की स्टोरी, आदतें और स्वभाव मान लिया।

११  नवंबर, २००८

आज प्रेम प्रकाश आए थे। पंजाबी के बड़े कथाकार हैं। कुछ बरस पहले साहित्य अकादमी मिला था। उनकी कहानियां मैंने पढ़ी कम, सुनी ज़्यादा हैं। मैं पंजाबी सुनकर पूरी तरह समझ लेता हूं, लेकिन पढ़ नहीं पाता। `डेड लाइन´ और `श्वेतांबर ने कहा था´ अद्भुत कहानियां हैं। सत्तर से ज़्यादा की उम्र में भी क्या सक्रिय हैं। पंजाबी के नए से नए लेखक की चीज़ें पढ़ी हुईं। यही नहीं, बाक़ायदा साहित्यिक शरारतों और ख़ुराफ़ातों में भी हिस्सेदारी। कभी किसी को चिमटी काट ली, किसी को गुदगुदा दिया।

मंटो की कहानियों पर बात शुरू हो गई। `बाबू गोपीनाथ´ चर्चा में आ गए। देर तक इसी कहानी पर बात होती रही। कहने लगे, इस कहानी में क्या-क्या है, क्या-क्या नहीं है, यह आज तक नहीं समझ आया। इसमें सब कुछ है, सब असाधारण है और सब ही कुछ साधारण, आसपास का है। मेरी कुर्सी के पीछे लगी निर्मल वर्मा की पेंटिंग को देर तक देखते रहे। फिर निर्मल जी पर बात शुरू। उसी की बग़ल में एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर वहीदा रहमान की है। फिर उस पर। ये पुराने ज़माने के लोग बात-बात में खो क्‍यों जाते हैं ?

बात करते-करते ही मैंने उनसे कहा, `हमारे यहां कहानी के दो ट्रेंड्स बहुत साफ़ दिखते हैं, हालांकि इसे किसी आलोचकीय शब्दावली में नहीं बांध सकता, बस, मेरा पाठकीय निरीक्षण है ये कि दो कि़स्म की कहानियां हैं। एक में कहानी के चरित्र आपके साथ-साथ चलने लगते हैं, दूसरे में कहानी का परिवेश और वातावरण। आप प्रेमचंद, मंटो, बेदी और श्रीलाल शुक्ल के चरित्र कभी नहीं भूल सकते और निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल आदि का परिवेश, माहौल। निर्मल जी की उदासी और अवसाद तुरंत याद आ जाते हैं, उनके चरित्रों के नाम नहीं। जबकि मंटो के कैरेक्टर्स हमेशा याद रहते हैं, उनके आसपास का माहौल नहीं।´

४ दिसंबर, २००८

पिछले दिनों दानियल मुईनुद्दीन के बारे में काफ़ी पढ़ने को मिला। पाकिस्तान का कहानीकार है, जिसकी परवरिश पाकिस्तान और अमेरिका में हुई है और इन दिनों पश्चिमी पंजाब में कहीं खेती-किसानी करता है। उसका कहानी संग्रह आया है। संग्रह के कारण ही उसकी चर्चा पढ़ने में आई। पिछले साल से उसकी कहानियां छप रही हैं। शायद इसी साल, उसके कहानी संग्रह की नीलामी हुई। उसने महज़ कुछ प्रकाशकों के आने की उम्मीद की थी, जबकि बेतहाशा आए। सात-आठ कहानियों के उसके संग्रह का प्रकाशन अधिकार एक लाख डॉलर में बिका। वह भी सिर्फ़ अमेरिका और कनाडा के लिए। फिर कुछ दिनों बाद लंदन में बोली लगी। वहां भी क़रीब 80 हज़ार डॉलर। सब ओर दानियल-दानियल हो गई। किसी समीक्षक ने उसे तुर्गनेव और फॉकनर जैसा लेखक बताया है। उसे पढ़ने की उत्सुकता जग गई।

उसके पास अच्छी कहानियां हैं, जो पश्चिम को, ख़ासकर, आकर्षित करेंगी। पिछले कुछ बरसों से पाकिस्तान दुनिया की दिलचस्पी में है भी। जैसे नज़ीब महफ़ूज़ को नोबेल मिलने से पहले कोई अरबी फिक्शन की तरफ़ ध्यान भी नहीं देता था, वैसे ही पिछले डेढ़-दो साल में पाकिस्तान के साथ हुआ लगता है। अनेक कारणों से वह चर्चा में है और इसीलिए वहां का नया साहित्य भी।

दानियल की ज़्यादातर कहानियां एक ज़मींदार के एस्टेट और वहां के लोगों पर हैं। ज़मींदारों के ठाठबाट, बहुत मोटे तौर पर उभरे हुए दो वर्ग, उसमें अपने होने को बनाए रखने का संघर्ष करती स्त्री। दो चीज़ें लगातार टकराती रहती हैं। एक कि़स्म का क्लीशे बार-बार आता है। कई जगहों पर उसमें एक ख़ास चमक है, पर उसे पढ़ते हुए मैं कई बार सोचता हूं कि इसके पास ऐसा क्या है, जो उर्दू के असद मुहम्मद ख़ां के पास नहीं है? `बसोड़े की मरियम´ दानियल के `इन अदर रूम्स, अदर वंडर्स´ के मुक़ाबले कहीं भारी है। लेकिन `बसोड़े की मरियम´ कभी एक लाख डॉलर में नहीं जाएगी या उसे एक लाख पाठक नहीं मिल सकते। मुहम्मद मंशा याद, ज़ाहिदा हिना, ये लोग नदीम क़ासमी के बाद के हैं और मुस्लिम समाज, आधुनिकता और बाज़ार के दबाव को इन्होंने बेहतर पकड़ा है। जो चीज़ें उर्दू में काफ़ी पहले लिखी जा चुकीं, उसे अब अंग्रेज़ी में लिखकर ये लोग नाम-दाम कमाएंगे। उर्दू वाली चीज़ अनुवाद होकर जाएगी नहीं और दुनिया पाकिस्तान के नाम पर इन्हीं लेखकों को जानेगी। (जैसे भारत के नाम पर वही अंग्रेज़ी लेखक।)

दानियल ही नहीं, इन दिनों पाकिस्तान के और भी युवा लेखक चर्चा में हैं। मोहसिन हामिद, कैमिला शम्सी, मोहम्मद हनीफ़ आदि। 'डायरी ऑफ अ सोशल बटरफ़्लाई' अभी नहीं मिली है। उसमें क्या होगा ? एक सॉलीट्यूड, एक टिन ड्रम यहां से निकल आएगा?ऐन हैदर की कहानियां या नॉवल उस मुस्लिम एलीट की सड़ांध को ज़्यादा अच्छे तरीक़े से दिखाती हैं। रामलाल के पास अद्भुत कहानियां हैं। नैय्यर मसऊद की कहानियां- वाह। 'ताऊस चमन की मैना' मेरी पसंदीदा है। हमारे यहां भी तो इससे अलग स्थिति नहीं है।
हिंदी के किसी लेखक को ढंग से बाहर नहीं जाना जाता। वहां लोगों का मानना ही यही है कि भारत में ज़्यादातर लेखक अंग्रेज़ी में लिखते हैं। किसी जर्मन साइट पर अलका सरावगी का परिचय पढ़ा। उसमें लिखा था कि भारत के ज़्यादातर लेखक अंग्रेज़ी में लिखते हैं, पर अलका ने अपनी मातृभाषा में लिखना पसंद किया। बाहर जितनों से बात होती है, वे अमिताभ घोष, अरुंधति राय, चेतन भगत को जानते हैं, पर हिंदी-उर्दू वालों को कोई नहीं जानता। अनुवादक ही नहीं हैं या यहां वालों के लिखने में ही दम नहीं? या इंटरनेशनल रीडर को किस तरह कैटर करना है, इन्हें नहीं आता?

ऐन हैदर तक को अपना काम ख़ुद ट्रांसलेट करना पड़ा। वह भी तीस-चालीस साल बाद। उन पर लिखे एक संस्मरण में पढ़ा, कि अस्सी के शुरू में `मिडनाइट्स चिल्ड्रन´ की दुनिया भर में हुई चर्चा के बाद उन्होंने लंदन में रहने वाले अपने किसी दोस्त लेखक से पूछा था कि अंग्रेज़ी में, वह भी लंदन और न्यूयॉर्क के प्रकाशकों से, कैसे प्रकाशित हुआ जा सकता है?शायद, रुश्दी को अचानक मिली कीर्ति से अपने लेखन के बारे में वह सशंकित हुई होंगी। `आग का दरिया´ के साथ `चिल्ड्रन´ की तुलना उन्होंने मन ही मन की होगी, और पता नहीं, शायद, भीतर कहीं बे-ज़ाहिर कि़स्म का अफ़सोस भी किया होगा कि क्यों उन्होंने अंग्रेज़ी में नहीं लिखा ? या न भी किया हो। पर वह ऐसी बात तो थी ही कि वह अंग्रेज़ी में छपने के लिए सोचने लगी हों। जैसा सवाल ऐन हैदर ने अपने इंगलिस्तानी दोस्त से पूछा, वैसा ही एक सवाल बलराज मैनरा ने कभी ऐन हैदर से पूछा था- कि आपा, आपके ज़माने में तो फिर भी उर्दू में पाठक थे, हम बताइए, किसके लिए लिखें ? हिंदी में तो जाना ही पड़ेगा।

आज उर्दू वाला ही नहीं, हिंदी, मराठी, पंजाबी, बंगाली, जितनी भाषा वालों से मेरी बात होती है, वे सब यही सवाल पूछते हैं कि अंग्रेज़ी में जाना ही होगा? पर कैसे? देसी भाषाओं के लेखकों में जिस क़दर फ्रस्ट्रेशन आ गया है, वैसा पहले कभी नहीं था। हालांकि इसका पाप भी कमोबेश इन्हीं देसी भाषा वालों को ही है। एक कुंठित भाषा का कुंठित हो रहा लेखक जो लिखेगा, वह कैसा होगा? बार-बार रिजेक्शन का शिकार होती भाषा? करोड़ों बोलने वाले, पर पढ़ने वाले कितने? पोलिश भली, कुछ लाख लोगों की भाषा, पर ऐसा गौरव बना रखा है कि कई नोबेल पा लिए, उसके लेखक ट्रेंड बनाते हैं और पूरी दुनिया का साहित्य उसके पीछे चलता है। और जब ऐन हैदर ने `आग का दरिया´ ख़ुद अनुवाद किया, तो उसे उन्होंने री-क्रिएट करना माना। पर पता नहीं, उसकी अंग्रेज़ी में कितनी चर्चा हुई। हमारे यहां तो ख़ैर बड़ा है ही वह, पर उसके बड़े होने पर भी सवाल उठे हैं। घोर अचरज की बात है कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने इसके बारे में लिखा था- शायद यह अच्छा उपन्यास हो सकता था।

बड़े लेखकों को उनके समय के बाद ही क्यों समझा जाता है? या यही बाद में समझ आने का फैक्टर ही उन्हें बड़ा बनाता है? मंटो को हज़ार गालियां दी गईं। उस समय की चीज़ें पढ़ो, तो लिस्ट ऐसे बनती थी- कृश्न चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी और मंटो। उसका नाम तीसरे नंबर पर लिखा जाता था। कई को उसे तीसरा नंबर देते भी संकोच होता था। पचास साल बाद लिस्ट बनती है- मंटो, मंटो और सिर्फ़ मंटो। कृश्न चंदर और बेदी ग़ायब। यानी उस समय मंटो के साथ अन्याय और आज बाक़ी के साथ। ईमानदारी दोनों बार नहीं। रचना में अतिशयोक्ति को एक अलंकार या व्यवहार मानने से इंकार करने वाले आलोचकों को आलोचना में अतिशयोक्ति अपनाने से कोई गुरेज़ नहीं होता।बार-बार कहा जाता है कि जो लेखक अपने से बाद का समय पकड़ रहे होते हैं, वे उतना ठुकराए भी जाते हैं। अपने से बाद का समय पकड़ने जैसी क्या बात हुई ? लेखन कोई टैरो कार्ड रीडिंग या प्रीमॉनिशंस तो है नहीं।

जब पंकज बिष्ट `लेकिन दरवाज़ा´ लिख रहे थे, तो वह भारतीय मध्य वर्ग की सारी लंपटई, स्वार्थ में पगी भावुकता, झूठ और मक्कारी पकड़ रहे थे। अस्सी के शुरू में ऐसा मध्य वर्ग बन भी रहा था। बल्कि उससे भी पहले, `एक साहित्यिक की डायरी´ के समय से ही। मुक्तिबोध और रघुवीर ने तो उसकी पूरी मैपिंग करके बता दिया था कि यह मध्य वर्ग ऐसा होगा कि भीतरी औ बाहरी पाट के बीच ट्रैजडी नीच होगी और ताक़त ही ताक़त होगी, पर कोई चीख़ न होगी। पंकज बिष्ट ने ज़्यादा सहज और सरल तरीक़े से फिक्शन में इसका रूप गढ़ दिया। वह कोई भविष्यवाणी तो नहीं थी, पर उनके आसपास ऐसा वर्ग बन चुका था। उन्होंने उसे बारीकी से देख लिया था।

बाक़ी लोग 90 के बाद देख पाए, जब वह मध्य वर्ग ज़्यादा मूर्त हो गया। उसकी टुच्चइयां खुल कर सामने आ गईं। ट्रेट्स दिखने लगे, बिना किसी कोड या साइन के। (जैसा फ्रेंच समाज के मिडिल क्लास को डेढ़ सदी पहले बालज़ाक ने और बीसवीं सदी के लैटिन अमेरिका में कोर्ताज़ार ने या ग्रेप्स में स्टाइनबैक ने देखा था। बालज़ाक के समय में वे प्रवृत्तियां बहुत बारीक थीं। फिर सदी बदलते-बदलते पेटी बुर्जआ कैसे मिडिल क्लास का नाम ओढ़कर टहलने लगा, पता ही है। ) तो पवन वर्मा और शशि थरूर उस मध्य वर्ग की चरित्र की थ्योरी बनाने में लग गए। पंकज बिष्ट के लिखने के पंद्रह साल बाद। पर `लेकिन दरवाज़ा´ को क्या स्थान मिला? हिंदी में ही? अंग्रेज़ी या दूसरी भाषाओं की तो बात ही छोड़ दें। `लेकिन दरवाज़ा´ के पास बहुत पाठक हैं, पर `चिल्ड्रन´ जितने नहीं। मुझे वह पिछले पचीस साल का सर्वश्रेष्ठ हिंदी उपन्यास दिखता है।

हिंदी-उर्दू और अंग्रेज़ी में बहुत फ़र्क़ है। अंग्रेज़ी में फिर भी पाठक बहुत कुछ तय कर देते हैं। हमारी भाषाओं में ऐसा नहीं होता। हमारे यहां आलोचक होते हैं तय करने वाले। टैरी ईगलटन ने नायपॉल की बड़ी आलोचना की थी, लेकिन नायपॉल के लेखक या क़द पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। आज भी स्पैनिश में कई बड़े आलोचक टाइप के जीव कहते हैं कि मारकेस को `कॉलरा´ से शुरुआती पचास पेज हटा लेने चाहिए थे, कि मारकेस में अनावश्यक विवरण हद से ज़्यादा है, कि मारकेस को एज़रा पाउंड जैसा कोई संपादक मिला होता, तो `सॉलीट्यूड´ और `कॉलरा´ सौ-सौ पेज में निपट जाते।

अनावश्यक विवरण, लाउड हो गए, अतिकथन कर डाला, बाज़ारवादी हो गए, किस्म की बातें हिंदी आलोचना के भी प्यारे इतान्यातान्योफेरास हैं। जब चाहो, तब दुहरा दो। किसी पर भी चेंप दो। यह भूल जाना हुआ कि ये सब भी प्रविधि का ही हिस्सा होते हैं।मुझे लगता है कि किसी भाषा में आलोचक नाम की सत्ता के सर्वशक्तिमान हो जाने का अर्थ ही यह होता है कि उस भाषा से पाठक नाम की सत्ता का विलोप हो रहा है। और जिस भाषा से पाठक विलुप्त हो रहा हो, वह भाषा पचास साल भी निकाल ले, तो बहुत है। बहुत हुआ, तो हमारी भाषा भी मरे-न मरे, पर उसकी हालत उस बुज़ुर्ग की तरह हो जाएगी, जो घर के किसी कोने-कोपचे में खटिया पर पड़ा है, कांख-कराह रहा है, वहीं सू-सू पॉटी कर दे रहा है और घर वाले हर सुबह यह सोचकर उसके पास जाते हैं कि आज तो बुड्ढा नक्कीच कलट लिया होगा।
***
( गीत चतुर्वेदी हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि, कथाकार और अनुवादक हैं। उन्होंने अपनी डायरी के ये टुकड़े बहुत आग्रह करने पर भेजे। गीत की डायरी के इन टुकड़ों से पहले सबद में आप कृष्ण बलदेव वैद और मंगलेश डबराल की डायरी के अंश पढ़ चुके हैं। )
****
Read On 10 comments

बही-खाता : ४ : प्रत्यक्षा

2:02 pm


लिखना साँस लेने जैसा ज़रूरी है...कई बार !

कोई
खदबदाहट होती है, लगातार होती है, पात्र रात बेरात कुसमय दरवाज़ा ठकठकाते, झाँकते, हुलकते हैं और आखिर में आजिज़ कर उनकी कहानी लिखी जाती है। ये प्रकिया लगातार अपने भीतर उतरते जाना होता है, भीड़ में भी अपनी दुनिया साथ पीठ पर रकसैक टाँगे घूमना होता है, क्या जाने कब घुमक्कड़ी पर निकल जायें किस अजाने कूल किनारे। कोई एक शब्द, एक बिम्ब चेतना में ऐसे घुसपैठ करे कि हम बेदम हो जायें, लिखवा कर ही छोड़े या फिर कुछ पकता रहे इतनी देर कि अंत में सारी काहिली भाप की तरह स्वत: स्फूर्त उड़ जाये। अंत में सबसे अंत में लिखने को किसी भी फॉर्मुले में बाँधना संभव नहीं। कब किसी कोलरिज़ की कुबला खान या गिंसबर्ग की सनफ्लॉवर सूत्रा सपने में ही पूरी लिखी जाये कौन जानता है।

लिखाई का हर नया शब्द किसी अनजानी यात्रा पर जाने जैसा है। निकले थे पता होता है पर कहाँ और कब पहुँचेंगे ये नहीं मालूम और इस नहीं जानने का सुख ही लिखने का सुख है। किसी जंगल में रास्ता बनाते खोजी हैं हम सब, नई दुनिया की खोज है, नये रास्तों की खोज है, नये शब्दों की खोज है। जब तक ऐसी यायावरी का जुनून है लिखी जायेंगी कहानियाँ, कवितायें। हर बार ज़रूरी नहीं संप्रेषण उतना ही हो, वैसा ही हो, जैसे दिमागी कल्पना में देखा था। परवाह नहीं। लिखे जायेंगे शब्द, अपने साथ उन समयों का भार लिये, उन दिनों का अर्थ लिये, जब ये गढ़े गये थे, और उसी सच्ची ईमानदारी से चमकेंगे, रेत पर पड़े चमकीले चिकने पत्थरों की तरह, कहानियों को बहने देंगे अपने साथ जैसे सफेद चिड़िया के पँख पर हवा की अनुभूति या फिर नदी के चाँदी पानी में मछली के पीठ पर बिछलती सूरज की किरण । ऐसी सहजता से कही जायेगी कहानी, कही जायेगी कविता।

जीवन में कहानियाँ वही वही हैं, उनको हम किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं, उसमें कितनी परतें खोलते हैं और कितनी फिर भी ढकी छुपी रहने देते हैं, कहानी कहना मेरे लिये यही खेल है, बच्चे के निर्बाध उत्साह और भोलेपन का खेल है, ऐसे जैसे ये खेल मैंने ही तलाशा है, इसके नियम मेरे हैं, जब चाहूँ उसकी विधा बदल दूँ, कोई उठापटक कर दूँ। मुझे नहीं लगता कि स्टेक्स मेरे लिये इतने ऊँचे हैं कि ऐसी उठापटक का जोखिम न ले सकूँ। जिस दिन इस अहसास से दबूँगी, उस दिन लिखना बोझिल हो जायेगा। फिर ये मज़ा चाहे कहानी लिखने में हो या ब्लॉग लिखने में ...जिस दिन आनंद खत्म होगा उस दिन लिखना खत्म होगा। तो बहुत गंभीरता से लिखती हूँ, ये नहीं कहूँगी, अभी नहीं कहूँगी। लेकिन कोई आंतरिक छटपटाहट, सुगबुगाहट है जो अकसर ठेलता है कि लैपटॉप उठाऊँ, तब पता नहीं होता कि क्या लिखना है। सिर्फ इतना भर कि लिखना है। कोई मायावी दुनिया बार बार अपने भीतर गप्प से खींच लेती है। इसका जादू फँसाता है, रोजमर्रा के काम के बीच फेंका ऐयार का कमंद है, अकुलाहट, बेचैनी है , ज़रूरत है, कई बार साँस लेने जैसा ज़रूरी।

और शायद अचेतन में अब तक, जब तक लिखा नहीं था, तब जहाँ-जहाँ से गुज़रे सब भीतर किसी बड़े गहरे कूँये में इकट्ठा होता रहा ... समय , अनुभूति , लोग , दुख। सब स्मृति में अटका रहा कील। जीभ की नोक पर कौन भूला स्वाद कब तृप्त कर दे, किस बंसी पर कौन सी स्मृति फँस कर निकल जाये, किस कहानी की घटना बन जाये ये मालूम नहीं लेकिन देखा, भोगा, काल्पनिक, वास्तविक ...सब किसी तरतीब में जुट जाये, कोई रहस्यमय जादू का खेला हो जाये, बस इसी की तलाश है। लिखना मेरे लिये चतुराई नहीं। कथ्य और शिल्प का चौकन्ना खेल नहीं है। कुछ नया अजूबा कर दूँ का सजग शातिरपना नहीं है, इसिलिये जब किसी कहानी पर ये सुनाई पड़ता है कि चीज़ें साफ नहीं तब सहजता से सोचती हूँ कि सब जवाब लिख दूँ, सब चीज़ें पहले से अगृदृष्टि रख कर कवर कर लूँ। ऐसा सोच कर तो लिखा नहीं था। इसलिये भी कि अब तक की लिखाई , सोची समझी लिखाई नहीं है , आलोचकों को चुप करा दूँ , सारे फ्लैंक्स कवर कर लूँ वाली चालाकी नहीं है। कहानियाँ एक बार में लिखी गई हैं। उनपर कुछ "काम" नहीं किया गया है। यहाँ तक कि जो शब्द पहली बार में ज़ेहन में आये उन्हें परिष्क़ृत नहीं किया गया है। हो सकता है ये "तरीका" गलत हो लेकिन जंगल की उन्मत्त सुन्दरता किसी तरतीबवार बगीचे से ज़्यादा आकर्षित करता है।

जहाँ तक भाषा का सवाल है, पात्र जिस परिवेश के हैं, वही भाषा बोलेंगे। अगर पेरिस और हाईडेलबर्ग जायेंगे तो शायद पार्ले वू फ्रांसे या वी हाईस्त दू कहेंगे। आज के समय में जब रेस्तरां के वेटर्स और दुकानों में सेल्समैन तक अंग्रेज़ी बोलते हैं, वहाँ हमारी कहानियों के पात्र कैसी भाषा बोलेंगे, वही जो आज के समय की देन है। जैसे पहले संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फिर फारसी उर्दू के रास्ते चलती हिंदुस्तानी यहाँ तक पहुँची है। हम आम बोलचाल में चार वाक्य में कमसे कम पाँच शब्द अंग्रेज़ी के बोलते हैं, बहुत गर्व की बात नहीं, लेकिन यही इस समय की त्रासद सच्चाई है, वैश्विकरण का एक साईडईफेक्ट है, बाज़ार की, अर्थव्यवस्था और विज्ञान कम्प्यूटर की भाषा को इस्तेमाल करने की मज़बूरी है। इस बोलचाल की दुनिया से कट कर लेखक कहाँ, किधर जायेगा, किस कृत्रिम दुनिया के पात्र रचेगा ?

मैं जब लिखती हूँ तब शब्द मेरे लिये नदी के किनारे, रेत में चमकते पत्थर होते हैं, उनका अनगढ़पना, उनकी रंगत, उनकी छुअन मेरे लिये कई कई पगडंडियाँ बनाती हैं, उन सुदूर पहाड़ों से पहचान कराती हैं जहाँ से किसी कठिन सफर के बाद वो मुझ तक पहुँची हैं। चाहे वो ठेठ देशज शब्द हों, जैसे 'जंगल का जादू तिल तिल' या 'फुलवरिया मिसराईन' में या फिर 'दिलनवाज़ तुम बहुत अच्छी हो' में अंग्रेज़ी या तेलुगु का इस्तेमाल हो। मुझे ज़रूरत पड़ेगी तो मैं सिर्फ अंगेज़ी क्यों तमिल, बंगला, फ्रेंच, जर्मन या कोई भी दूसरी भाषा के शब्द भी इस्तेमाल करूंगी, किया है, अगर मेरे उस भाव को सिर्फ वही शब्द सही और पूरे समग्र भाव से पकड़ रहे हैं, डिफाईन कर रहे हैं। ऐसा करते मैं बेहद सहज हूँ, ईमानदार हूँ। बाकी पाठक उस को शुद्धतावादी तर्क से न जोड़ कर देखें, क्योंकि भाषा एक बहती हुई नदी है, जबतक और छोटी नदियाँ जुड़ती रहेंगी, सहज प्रवाह रहेगा, भाषा जीवित रहेगी।

भाषा सिर्फ किसी एक समय के संदर्भ में शुद्ध होती हैं। जिन्हें आज हम परिमार्जित समझते हैं वो कल अपभ्रंश था और जो आज अशुद्ध है शायद वही भविष्य में शास्त्रीय समझा जायेगा। जिस तरीके से हम अपना अंतरलोक संप्रेषित कर पाते हैं, पूरी सच्चाई और ईमानदारी से, वही सच है, वही रचना की प्रक्रिया है। लेखक को सबसे पहले और सबसे अंत में खुद के साथ सच्चा होना पड़ता है। मेरे लिये लिखना अपने साथ सतत संवाद कायम करने की प्रक्रिया है।


( प्रत्यक्षा युवा कहानीकार हैं। कवितायें और ब्लॉग भी लिखती हैं। फोटोग्राफी से लेकर संगीत तक में उनकी गहरी रूचि है। उनकी कहानियों का एक संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ ने जंगल का जादू तिल-तिल नाम से प्रकाशित किया है। प्रत्यक्षा की कहानियाँ कहानी होने न होने से लेकर भाषा के स्वछंद व्यवहार के लिए भी विवादित-प्रशंसित हुई हैं। यहाँ उन्होंने इस ओर भी रोशनी डाली है। इससे पहले बही-खाता स्तंभ में आप संजय खाती, पंकज मित्र और कुमार अम्बुज को पढ़ चुके हैं। )

Read On 5 comments

सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी