Sunday, December 20, 2009

सबद विशेष : ९ : मिक्लोश रादनोती

( मिक्लोश रादनोती हंगरी के किसी कवि का नाम है और उनकी कवितायें हिंदी में उपलब्ध हैं और यह सिवाय उन कविताओं के अनुवादक के किसी को ध्यान तक नहीं कि कवि का यह जन्म शताब्दी वर्ष है! इन्हीं तथ्यों से प्रेरित है सबद की यह विशेष पोस्ट. विष्णु खरे कविता और आलोचना लिखने के बाद जिस काम को बहुत श्रम और सुरुचि से अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं उनमें अनुवाद भी है. और हमें उनका ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने हिंदी में विश्व की अनेक भाषाओं से इतने विपुल अनुवाद किये हैं. रादनोती के ये अनुवाद और उन पर लेख छब्बीस बरस पहले उन्होंने पुस्तकाकार किये/लिखे थे. बत्तीस पृष्ठों की वह पुस्तक एक लम्बे अरसे से अप्राप्य है. मुझे संयोग से उसकी एक प्रति विष्णुजी की स्टडी में मिल गई थी और कवितायें पढने के फ़ौरन बाद मैं उसे ले उड़ा. क्यों,यह आप आगे पढ़कर जानिए. विष्णुजी का सहयोग के लिए आभार. )

खंड : क : कवितायें

यहाँ इतनी कारें

बहन, तुम देखती हो कितने सारे भिखारी
और अभागे, और कितने सारे भलेमानस चीथड़े बीनने वाले
सिर्फ़ हम दो हैं : मुट्ठी बंधे भिखारी
और गूंगे अभागे

बहन, अपना हाथ मुझे पकडाओ, यहाँ इतनी कारें
और इतने सारे बड़े लोग चलते हैं कि हमें होशियार रहना होगा
अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो अंधे गलियारे तुम्हें ले जायेंगे

बहन, देखो, हम दो हैं : एक पिता के सपने
और दो मांओं की तकलीफें हम में चीखती हैं
दो सुन्दर आलिंगनों की निशानियों की तरह, देखो,
हम बचे हैं, दो महान स्वप्न-स्मृतियाँ, और हमारे ख्वाब
सुबहों में धीरे-धीरे सरकते हैं, दिन के डंठलों के खेतों पर
हम सपने देखते हैं
और जब घूमने जाते हैं तो एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहते हैं.

(१२ अक्टूबर १९२८)
****
मद्धिम पंक्तियाँ, सिर झुकाए हुए
(अन्ताल फोर्गाच के लिए)

आधी रात के करीब मेरी मां ने मुझे जन्म दिया
सुबह तक वह मर चुकी थी ; बुखार उसे ले गया
और मैं खलिहानों में अलंकृत शब्दों में
प्रसव और ताकतवर माताओं के बारे में सोचता हूँ

एक बार, आधी रात को, फिकर मेरे पिता को
अस्पताल के बिस्तर से, मुंह बाए
डॉक्टरों के बीच में से ले गई; मैंने तब
उन लाल आँखों वाले लोगों को वहीं पीछे छोड़ दिया
और अकेला रहा हूँ, बहुत अरसे से
घरों के बाहर रह रहा हूँ.

अपने पूर्वजों को मैं भूल गया
मेरे कोई वारिस नहीं होंगे क्योंकि मैं कोई चाहता नहीं
मैं अपनी प्रियतमा की निष्फल गोद
पीले चांद के तले अपनी बाँहों में ले लेता हूँ
और यकीन नहीं कर सकता कि वह मुझे चाहती है,

कभी-कभी, चुम्बनों के बीच, मैं सोचता हूँ
कि वह ख़राब है, लेकिन वह सिर्फ़ बाँझ है और उदास
लेकिन मैं खुद भी उदास हूँ

और जब दिन उगने के वक़्त सितारे बुलाते हैं
तो सब कुछ के बावजूद
आलिंगन करते हुए हम साथ रवाना होते हैं, हम दोनों,
सूरज के उजाले की तरफ़

( २८ सितम्बर १९२९)

****
लोर्का

क्योंकि स्पेन को तुम से प्रेम था
और प्रेम करने वाले तुम्हारी कविताएं पढ़ते थे--
इसलिए जब वे आये तो सिवा इसके और क्या कर सकते थे--
तुम कवि थे इसलिए उन्होंने तुम्हें मार डाला
अब लोग लड़ रहे हैं तुम्हारे बगैर--
फेदरिको गार्सिया लोर्का

( १९३७)
****
सो जाओ

वे हमेशा कहीं न कहीं हत्या करते हैं
घाटी की गोद में, जिसकी पलकें मुंदी रहती हैं,
या खोजती हुई पर्वतों की चोटियों पर,
कहीं भी, और मुझे यह कह कर धधास बंधाने का
कोई मतलब नहीं है कि वह सब मुझसे बहुत दूर हो रहा है.
शंघाई या गुएर्निका
मेरे दिल के ठीक उतने ही पास हैं
जितना तुम्हारा थरथराता हाथ
या वहां ऊपर आकाश में कहीं बृहस्पति.
अभी आकाश की तरफ़ मत देखो.
और धरती की तरफ़ भी नहीं--सिर्फ़ सोओ.
मौत अभी चिंगारी फेंकती हुई आकाशगंगा
की धूल में दौड़ रही है और
गिरते हुए बदहवास सायों को
अपने रुपहली छिडकाव से भिगो रही है.

( २ नवम्बर १९३७ )
****
शांति, आतंक

जब मैं फाटक से बहार आया तो दस बजे थे
एक डबलरोटी वाला अपनी चमकती हुई साइकल पर गता चला गया
ऊपर एक हवाई जहाज घरघरा रहा था, सूरज चमक रहा था, दस बजे थे,
मेरी बहन जो मर चुकी थी याद आई और वे सारी आत्माएं
जिन्हें मैंने चाहा था, जो अब नहीं थीं, ऊपर मंडराने लगी
मरे हुए मौन लोगों का एक अँधियारा दल ऊपर से गुजर गया
और अचानक दिवार पर एक साया गिरा,
चुप्पी में सुबह सहम गई, दस बजे थे
सड़क पर शांति थी, आतंक की छुअन भी थी.

( १९३८)
****
एक बेचैन घडी में

मैं हवा में ऊँचाइयों पर रहताथा, हवा में, जहाँ सूरज था
हंगरी, अब तुम अपने टूटे हुए बेटे को वादियों में बंद करते हो!
तुम मुझे सायों में लपेटते हो और शाम के दृश्य में
सूर्यास्त की तपिश मुझे आराम नहीं देती

मेरे ऊपर चट्टानें हैं, दमकता आकाश दूर है
मैं गूंगे पत्थरों के बीच गड्ढों में रहता हूँ
शायद मुझे भी चुप हो जाना चाहिए. वह क्या चीज़ है
जो आज मुझसे कविताएं लिखवा रही है? क्या वह मौत है? कौन पूछता है?

ज़िन्दगी को कौन पूछता है,
और इस कविता को--इन चिंधियों को?
जान लो कि एक आवाज़ तक नहीं होगी
कि वे तुम्हें दफनायेंगे भी नहीं, कि घाटी तुम्हें रोक नहीं पायेगी

हवा तुम्हें बिखेर देगी, लेकिन कुछ अरसे के बाद
एक पत्थर से वह गूंजेगा
जो मैं आज कहता हूँ, और बेटे और बेटियां
जब बड़े होंगे तो उसे समझ लेंगे.

( १० जवारी १९३९)
****
अपने संकलन की एक प्रति पर

मैं एक कवि हूँ और किसी को मेरी ज़रूरत नहीं है
जब मैं बिना शब्दों के गुनगुनाता हूं हुं हूं हुं हूं
तब भी नहीं. मेरा गीत बदतमीज शैतानों ने
छीन लिया है.

भरोसा करो, यकीन करो मुझ पर कि मेरे पास इस बात की
अच्छी वजह है कि शक मुझे ज़िन्दा रखे हुए है.
मैं एक कवि हूं जो इसी लायक है कि जला दिया जाये
क्योंकि वह सच्चाई का गवाह है.

मैं वह हूं जो जानता है कि बर्फ सफ़ेद है
खून लाल है और पोस्त भी लाल है
और उसका रोएंदार डंठल खेत की तरह हरा है.
मैं वह हूं जिसे आख़िरकार वे मार देंगे
क्योंकि मैंने खुद को कभी नहीं मारा.

( १ जून १९३९)
****
गीत

दुःख के कोड़े खाता हुआ
मैं रोज चलता हूं
अपने ही देश में ज़लावतन

और इसका शायद ही कोई मतलब है कि कब तक और कहाँ
मैं आता हूं, जाता हूं, बैठता हूं
और आकाश का हर एक तारा
मेरे ख़िलाफ़ है

आकाश के तारे भी
बादलों के पीछे छिपते हैं
और अँधेरे में ठोकरें खाता हुआ
मैं नदी और उसमें झुकी हुई घास तक पहुँचता हूं

जहाँ सरकंडे उग रहे हैं
अब मेरे साथ कोई नहीं है
और लम्बे अरसे से
मैंने वाकई नाचना नहीं चाहा है

लम्बे अरसे से ठंडी नाक वाले हिरन ने
मेरा पीछा नहीं किया है
मैं दलदल में से हाथ पैर मारता निकलता हूं
और उसकी सतह से भाफ़ उठती है
उसकी सतह से भाफ़ उठती है
और मैं डूबता हूं, डूबता हूं
मेरे ऊपर गिले लत्तों की तरह
दो बाज़ मंडरा रहे हैं.

( ७ जून १९३९)
****
अपने सर के नीचे तुम्हारा दायां हाथ

अपने सर के नीचे तुम्हारा दायां हाथ रखकर रात मैं लेता रहा.
दिन का दुःख अभी बाकी था. मैंने तुम्हें उसे न हटाने को कहा
मैं तुम्हारी नब्ज़ में चलते हुए खून को सुनता रहा.

करीब बारह बजे होंगे जब नींद मुझपर बाढ़ जैसी आई
उसी तरह अचानक जैसे बहुत पहले पंख-भरे उनींदे बचपन में
आई थी और उसी तरह धीरे-धीरे मुझे झुलाने लगी.

तुम मुझे बता रही हो कि तीन भी नहीं बजे थे
कि मैं चौंककर उठ बैठा, डरा हुआ
बुदबुदाने लगा, कवितायें पढ़ने लगा, अनर्गल चिल्लाने लगा.

डरी हुई चिड़िया की तरह मैंने अपने हाथ फैला लिए
जो बगीचे में किसी परछाईं को देखकर अपने पंख फड़फड़ाने लगती है
मैं कहाँ जा रहा था? किस तरह की मौत मुझे डरा रही थी?

मेरी अपनी, तुमने मुझे चुप किया और बैठकर आँखें मूंदे मैं तुमसे चुप होता रहा
मैं चुपचाप लेट गया, आतंकों की राह इंतजार करती रही.
और मैं सपने देखता रहा. शायद किसी और तरह की मौत के.

( ८ अप्रैल १९४१)
****
तुम्हारी बांहों में

तुम्हारी बांहों में झूल रहा हूं मैं
चुपचाप
मेरी बांहों में झूल रही हो तुम
चुपचाप
तुम्हारी बांहों में मैं एक बच्चा हूं
जो चुप है
मेरी बांहों में तुम एक बच्चा हो.
मैं तुम्हें सुनता हूं
तुम मुझे अपनी बांहों में लेती हो
जब मैं डरता हूं
तो तुम्हें अपनी बांहों में लेता हूं
और मैं डरा हुआ नहीं हूं
मौत का गहरा सन्नाटा भी तुम्हारी बांहों में
मुझे डरा नहीं सकता
तुम्हारी बांहों में मैं
मौत से उबर आऊंगा.
एक सपने की तरह.

( २० अप्रैल १९४१)
****
अचानक

अचानक एक रात दीवार चलती है
सन्नाटा दिल में बिगुल की तरह गूंजता है और एक कराह फड़फड़ाकर उड़ती है
दर्द पसलियों में चाकू भोंकता है--उनके पीछे वह धड़कन भी चुप हो जाती है
जो तकलीफ देती थी
सिर्फ दिवार चीखती है, शरीर उठता है, गूंगा और बहरा.
और दिल, हाथ और मुंह जानते हैं--हाँ, यह मौत है, यह मौत है.

जैसे जब जेल में बिजली झपकती है
तो अदंर सारे कैदी और बाहर पहरा देते सारे संतरी
जानते हैं कि कैसे उस वक़्त एक ही आदमी के शरीर में सारी बिजली एक साथ दौड़ रही है
बल्ब को चुप ही रहना है, कोठरी से एक साया गुजरता है
और अब संतरी, कैदी और कीड़े जानते हैं कि जिसे वह सूंघ रहे हैं
वह जले हुए आदमी का मांस है.

( २० अप्रैल १९४२)
****
मैं जान नहीं सकता

मैं जान नहीं सकता कि किसी और को यह देश कैसा लगेगा, यह छोटा-सा मुल्क
आग से घिरा हुआ, मेरे लिए यह एक घर है जिसमें दूर मेरे बचपन की दुनिया
झूल रही है, जैसे तने से एक कोमल डाल फूटती है उसमें से मैं उगा
और उम्मीद करता हूं कि एक दिन मेरा शरीर इसी की ज़मीन में मिल जायेगा.
यहाँ कहीं भी रहूँ हमेशा अपने घर में हूं और जब कोई झाड़ी

मेरे पैरों पर झुकती है तो मैं उसका नाम जानता हूं और उसके फूल का नाम भी
बता सकता हूं. मैं लोगों को जानता हूं और जानता हूं इस वक़्त
वे कहाँ जा रहे हैं. और जानता हूं गर्मी के सूर्यास्त में
इसका क्या मतलब हो सकता है कि दीवारों से लाल-सा दर्द टपके.
जो हवाबाज़ ऊपर उड़ता है उसके लिए यह देश सिर्फ एक नक्शा है.
वह नहीं जानता कि कवि वोएरोशमार्ती कहाँ रहता था.
उसके लिए इस नक्शे में कारखाने और नाराज़ बैरकें छिपी हुई हैं
मेरे लिए टिड्डे, बैल, गिरजाघरों के कंगूरे, भले मुलायम खेत.
वह दूरबीन के जरिये कारखाने और जुते खेत देखता है

मैं कांपते हुए मजदूर देखता हूं जिसे अपने काम का डर है
मैं जंगल देखता हूं, गीतों से भरे बागान, अंगूर के खेत, कब्रस्तान
और एक छोटी बहुत बूढी औरत जो कब्रों के बीच रोती जा रही है.

और ऊपर से जो रेल की पटरियां दिखती हैं या मशीनघर जिन्हें मिटा देना है
वह नीचे एक लाइनमैन की झोपड़ी है जिसके सामने वह खड़ा हुआ है
लाल झंडी दिखता हुआ और बच्चे उसे घेरे हुए हैं
मशीनघर के बाड़े में एक कुत्ता लोटपोट होता हुआ खेल रहा है
और वहां पार्क में मेरी पुरानी प्रेमिकाओं के कदम अब भी बने हुए हैं
उनके मीठे चुम्बन अब भी मेरे होठों पर हैं, शहद की तरह साफ.
और एक बार स्कूल जाते वक़्त सड़क के किनारे मैं एक पत्थर पर
बैठ गया था कि उस दिन इम्तहान से बच जाऊँ--
यह रहा वह पत्थर --क्या उतनी ऊँचाई से उसे देख पाते हो?
कितनी भी कोशिश करो नहीं देख सकते उसे
उसकी सारी बारीकियों के साथ--ऐसा कोई यंत्र अभी नहीं बना है.

हम गुनाहगार हैं बेशक, जैसे दूसरे देश भी हैं
हम जानते हैं कि हमने कैसे हदें तोड़ी हैं, कब कहाँ और किस तरह
लेकीन यहाँ बेगुनाह कामगार भी रहते हैं और कवि भी
और दूध पीते बच्चे जिनमें चेतना अभी जाग रही है
और उनमें दमकती है; वे उसे बचा रहे हैं, अँधेरे तलघरों में छिपे हुए
जब तक कि शांति अपनी उंगुली से इस देश को फिर से उकेर न दे
और तब वे हमारे घुटे हुए शब्दों को साफ और ऊंचे शब्दों में कहेंगे.

रात के रखवाले बदल, हम पर अपना विराट पंख फैला ले.

( १७ जनवरी १९४४)
****
न याद न जादू

अब तक मेरे दिल में सारा गुस्सा इस तरह छिपा रहता था
जैसे सेब के बीचोबीच गहरे भूरे रंग के बीज छिपे रहते हैं.
और मैं जानता था कि मेरे पीछे-पीछे हाथ में तलवार लिए एक फ़रिश्ता चलता है
जो मुसीबत के वक़्त मेरी हिफाज़त करता है, मुझे बचाता है.
लेकिन किसी बीहड़ दिन तुम सुबह उठो और पाओ
कि सब कुछ बर्बाद हो चूका है और तुम भूत की तरह निकल जाते हो
अपनी जो थोड़ी बहुत चीजें थीं उन्हें छोड़कर, करीब-करीब नंगे,
तो तुम्हारे खूबसूरत दिल में, जो अब हल्का हो चूका है,
एक वयस्क नम्रता जागने लगती है, संजीदा, संकोची
और अगर तब तुम कहोगे विद्रोह तो दूसरों के लिए कहोगे और वैसा निःस्वार्थ करोगे

और यह एक ऐसे मुक्त भविष्य की आशा में कहोगे जो दूर से ही दमक रहा है.
मेरे पास कभी कुछ नहीं था और न आगे कभी होगा
जाओ और जरा एक लम्हे के लिए मेरी ज़िन्दगी की इस दौलत पर विचार करो

मेरे दिल में कोई गुस्सा नहीं है, बदले की मुझे परवाह नहीं
यह दुनिया फिर से बनाई जाएगी--मेरी कविताओं पर रोक लगने दो
मेरी आवाज़ हर नई दीवार की नींव के पास सुनी जाएगी
अपने में मैं वह सब कुछ जी रहा हूँ जो बाकी दिनों में मुझ पर होगा
मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं किसी भी तरह नहीं बचता
न मुझे कोई याद बचाएगी न कोई जादू--मेरे ऊपर का आसमान मनहूस है
अगर तुम मुझे कहीं देखो दोस्त तो कंधे झटक देना और मुद जाना
जहाँ पहले तलवार के लिए एक फ़रिश्ता था
वहां शायद अब कोई नहीं है.

( ३० अप्रैल १९४४)
****
अंश

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब आदमी इतना गिर गया था
कि वह अपनी मर्ज़ी से दूसरों की जान लेता था, मज़े के लिए, किसी के हुक्म से नहीं
उसकी ज़िन्दगी पागल इरादों से बनी थी
वह झूठे खुदाओं में यकीन करता था, बदगुमान, उसके मुंह से फेन गिरता था.

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब विश्वासघात और हत्या का आदर होता था
खूनी, गद्दार और चोर हीरो थे
और जो चुप रहता था और ताली नहीं बजाता था
उससे ऐसी नफ़रत की जाती थी जैसे उसे कोढ़ हो.

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब अगर एक आदमी साफ़-साफ़ कह देता था तो उसे छिपाना पड़ता था
और शर्म से अपनी मुट्ठियाँ चबनी पड़ती थीं
मुल्क पागल हो गया था--खून और गलाज़त में धुत
अपने भयानक अंजाम पर खुश होता था

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब मां अपने ही बच्चे पर एक लानत थी
औरतें अपने हमल गिराकर खुश होती थीं
टेबिल पर रखे गाढ़े ज़हर के प्याले से झाग उठता था
और जिंदा थे वे ताबूत में कैद सड़ते हुए मुर्दों से रश्क करते थे

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब कवि भी चुप थे
और इसाइया की प्रतीक्षा कर रहे थे--
भयानक शब्दों के जानकार उस पैग़म्बर की--
क्योंकि सिर्फ़ वही एक सही शाप दे सकता था.

( १९ मई १९४४)
****
जड़

जड़ में ताक़त लहकती है
वह बारिश पीती है, तले की ज़मीन उसका खाना है
और उसके सपने बर्फ की तरह सफ़ेद हैं

धरती के नीचे से वह ऊपर फूटती है
ऊपर बढती है, चालाक है यह जड़
इसका हाथ ठीक रस्सी की तरह है,

जड़ के हाथ पर कीड़ा सोया हुआ है
जड़ के पैर पर कीड़ा चिपका हुआ है
सारी दुनिया कीड़ों से सड़ रही है

लेकिन अन्दर जड़ जिंदा है
उसे दुनिया की कोई चिंता नहीं है
सिर्फ़ उस डाल की है जिसे अब पत्तों ने ढक लिया है,

उस डाल से ही वह प्यार करती है और उसे ही पोसती है
उस तक बढ़िया स्वाद भेजती है
अच्छे, मीठे, आकाश-पके स्वाद

अब मैं खुद एक जड़ हूं
मेरा घर कीड़ों में है
वहीं मैं यह कविता बना रहा हूं
कभी एक फूल था अब मैं जड़ हो गया हूं
भारी और काली ज़मीन मेरे हाथ और पैर पर है
मेरी किस्मत ऐसी ही लिखी थी
और अब मेरे माथे पर आरे की आवाज़ है

( ८ अगस्त १९४४)
****
जबरन कूच

वह आदमी पागल है जो गिरने के बाद उठे और चलने लगे
घुटनों और टखनों को फिर जगाये, अकेला, भटकते हुए दर्द की तरह
फिर राह पकड़े जैसे उसे पंख उड़ाए लिए जा रहे हों
खंदक बेकार ही उसे आवाज़ देती है, उसमें रुकने की हिम्मत नहीं है
और अगर तुम पूछोगे कि क्यों नहीं है तो शायद वह मुड़कर कहेगा
उसकी पत्नी उसका इंतजार कर रही है और एक ज्यादा सांगत, सुन्दर मौत.
बेवक़ूफ़ अभागा! पिछले लम्बे अरसे से उन घरों पर
सिर्फ़ एक झुलसती हुई हवा बही है
उसके घर की दीवार ढह गई है, बेर का पेड़ टूट चुका है
और घर की साडी रातें दर से चीखती हैं
ओह, बस अगर मैं मान पाता कि जो कुछ भी सहेजने लायक है
वह सिर्फ़ मेरे दिल में ही नहीं है--कि धरती पर अब भी मेरा घर है
काश कि ऐसा है! पहले ही की तरह बेरों का ताज़ा मुरब्बा
पुराने बरामदे में ठंढा होता हुआ, चुप्पी में गुनगुनाती हुई मधुमक्खियां
गर्मियों के अंत की चुप्पी, उनींदी, धुप सेंकती,
वृक्षों पर पत्तियों के बीच झूलते हुए नंगे फल
और सुनहरे बालों वाली मेरी पत्नी मेरा इंतजार कर रही है कत्थई हाते की बाड़ी के पास
जहाँ सुबह धीरे-धीरे छाया पर छाया लिखती है
क्या यह सब हो सकता है ? देखो, आकाश में आज पूरा चंद है
मुझे छोड़कर न गुजर जाओ दोस्त, पुकारो, और मैं फिर उठ चलूंगा.

( १५ सितम्बर १९४४)
****
पिक्चर पोस्टकार्ड

बुल्गारिया से भारी, बेकाबू तोपों की धमक.
वह पहाड़ की रीढ़ से टकराती है, हिचकिचाती है और गिरती है.
आदमी, जानवर, गाडियां और ख़यालों का एक बढ़ता हुआ ढेर.
हिनहिनाकर सड़क अपने पिछले पैरों पर खड़ी होती है
आसमान अपनी अयाल लिए भाग रहा है. चलाचली के इस भूचाल में
तुम मुझमें हो, हमेशा के लिए
मेरे वजूद में तुम दमकती हो, चुप और अचल,
मौत के सामने गूंगे फ़रिश्ते की तरह या
एक सड़े हुए पेड़ के गढ़े में अपने को गड़ाते हुए कीड़े की तरह.

( ३० अगस्त १९४४)


ज्यादा नहीं यहाँ से नौ किलोमीटर दूर
खलिहान और घर जल रहे हैं
खेत की मेड़ पर बैठे हुए डेरे और गूंगे ग़रीब
तमाखू पी रहे हैं
भेड़ चराने वाली एक छोटी लड़की झील में उतारकर
पानी को थरथराती है
और थरथराती हुई भेड़ें पानी में इकठ्ठा होती हुईं
झुककर बादलों से पानी पीती हैं.

( ६ अक्टूबर १९४४)


बैलों के थूथन से खूनी फेचकुर लटक रहा है
हर आदमी खून की पेशाब कर रहा है
गारद जंगली गठानों जैसी खड़ी है गंधाती
और ऊपर घिनौनी मौत मंडराती.

(२४ अक्टूबर १९४४)


मैं उसके बाजू में गिर पड़ा, उसकी लाश उलट गई
जो अभी से ही उस रस्सी की तरह तन गई थी जो टूटने वाली हो.
उसकी गर्दन में पीछे से गोली मारी गई थी, 'तुम भी इसी तरह ख़त्म होगे'
मैंने फुसफुसाकर अपने से कहा : 'बस अब चुपचाप पड़े रहो'
धीरज अब मौत में फूलने वाला है
डेअर श्प्रिंगट नोख आउफ़ : ये सभी चल सकता है :
मेरे ऊपर एक आवाज़ ने कहा
मेरे कान पर कीचड-सना खून सूखने लगा.

( ३१ अक्टूबर १९४४)
****

खंड : ख : रदनोती पर विष्णु खरे

नवम्बर १९४४ को एक फ़ौजी दस्ते ने मिक्लोश रादनोती को गोली मार दी. रादनोती तब ३५ वर्ष के थे. नात्सी जर्मनी की फ़ौज की निगरानी में वे बेगार करने वाले कैदी मजदूरों की एक बटालियन में थे और उस समय सर्बिया में काम कर रहे थे, लेकिन जब पूर्वी मोर्चे से धुरी शक्तियों की सेनाओं ने पीछे हटना शुरू किया तो वे अपने साथ कम करने वाले इन बंदी मजदूरों को भी हंगरी से होते हुए पश्चिम में खदेड़ कर ले जाने लगीं. उत्तर पश्चिम में अब्दा नामक गाँव के पास जो मजदूर कैदी इतने कमज़ोर हो गए थे कि जर्मनी नहीं जा सकते थे, उनके पहरेदारों ने उनकी हत्या कर दी और एक सामूहिक कब्र में उन सबको दफना दिया. जब विश्व युद्ध समाप्त हो गया और अगले साल वे सारी लाशें खोदकर निकाली गईं तो रादनोती की बरसाती में एक नोटबुक मिली जिसमें कवितायें लिखी हुई थीं--कुछ तो उनकी मौत से कुछ ही दिनों पहले लिखी गई थीं. यह कवितायें मानो एक कठोर क्लासिकी नियंत्रण में लिखी गई कवितायें हैं, नपे-तुले शब्दों वाली, अपने शिल्प में लगभग सम्पूर्ण--ये कवितायें हैं जिन पर युद्ध की भयावह छाया है और जो कवि के इस अहसास से संपृक्त हैं कि उसकी मृत्यु समय से पहले होनी तय है. लेकिन फिर भी ये कवितायें उन मानवीय भावनाओं और मूल्यों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं जिन्हें मानव सभ्यता ने पोसा है. दरअसल इन अन्तिम कविताओं की ''रूपवादिता'' और सूक्ष्मता ही उन भावनाओं और मूल्यों की अभ्व्यक्ति है और कवि की प्रतिबद्धता की घोषणा करती है. करीब दस वर्षों से मिक्लोश रादनोती स्वयं को ऐसी मृत्यु के लिए तैयार कर रहे थे. उनकी कविताओं को उनके कालक्रम में पढ़ना उस प्रक्रिया को थोड़ा-बहुत समझना है जिसमें एक व्यक्तिगत प्रतिभा ऐतिहासिक घटनाओं से विकसित होती है--साथ ही यह भी जानना है कि प्रतिभा अपने समय के इतिहास में किस तरह एक अर्थ देख लेती है. 

रादनोती का जन्म बुदापेश्त में १९०९ में हुआ था. वे यहूदी थे किंतु ऐसा लगता है कि उन्हें अपने धर्म या जाती से कोई विशेष लगाव नहीं था--यद्दपि ऐसा कहा जा सकता है कि शायद अनजाने ही उनकी कविता पर उनके धर्म ने प्रभाव डाला है. बचपन में उन्हें किसी तरह का स्नेह या सुरक्षा नहीं मिले. उनकी माँ तथा एक जुड़वां भाई की मृत्यु प्रसव के समय ही हो गई थी और पिता भी उसके बाद बहुत ज़्यादा समय तक जीवित नहीं रहे. जिन धनवान चाचा ने मिक्लोश को पाला उनके प्रति मिक्लोश की भावनाएं न बहुत अच्छी थीं और न बुरी, हालाँकि चाचा ने उनके साथ कोई दुर्वयवहार नहीं किया और उचित ढंग से पला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया. 

इस शताब्दी के तीसरे दशक में मध्य यूरोप के प्रायः सरे देशों में राजनेतिक स्थिति बदतर हो काहली थी और मिक्लोश रादनोती को भी अपनी असुरक्षा का अहसास होने लगा. १९२० से १९२४ तक हंगरी पर एडमिरल होर्थी का छद्म-संसदीय शासन था. होर्थी एक अति -प्रतिक्रियावादी, सतर्क तानाशाहनुमा शासक था जिसने हर प्रकार के राजनीतिक विरोध या प्रतिवाद को कुचलने की कोशिश की. अपनी अवसरवादी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर उसने हंगरी को हिटलर के सुपुर्द कर दिया. समाजवादी तथा बुद्धिजीवी रादनोती के लिए होर्थी सरकार घृणित थी.

१९३४ में जब रादनोती ने सेगेद विश्वविद्यालय से हंगारी और फ्रेंच भाषाओं में विशेष योग्यता के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त की तब उनके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे. उनकी प्रारंभिक कविताओं पर तीन प्रमुख प्रमुख प्रभाव थे--फ्रांसीसी अवां-गार्द, जर्मन अभिव्यक्तिवाद तथा रचनावाद का वह हंगारी संस्करण जिसे प्रसिद्द हंगारी समाजवादी कवि तथा सिद्धांतकार लायोश कस्साक के साथ जोड़ा जाता है. रादनोती की पहली किताब, ''एक मूर्तिपूजक का स्वागत'' ( पोगानी कोसोंतो) अधिकतर भावुकतापूर्ण, वाल्ट विटमैन जैसी जीवन, प्रकृति और शारीरिक प्रेम की कविताओं की है. लेकिन आगामी, वयस्क रादनोती की झलक भी कुछ पंक्तियों में मिल जाती है जिनमें एक अलग ही ऊष्मा, विषाद और इसाई प्रतीकवाद के स्पर्श मिलते हैं. १९३२ के आसपास मिक्लोश रादनोती अपने दिशाहीन, वायवीय विद्रोह से मुक्त हुए और एक ज्यादा ठोस अभिव्यक्ति की ओर मुड़े--राजनीतिक प्रतिवाद उनकी कविता का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया. इस दौर में रादनोती पर मार्क्सवाद का प्रभाव पड़ा पर उनमें कठमुल्लापन नहीं था. इसी बीच उन पर कैथलिक कवि-धर्मगुरु शान्दोर शिक का प्रभाव भी पड़ा. धीरे-धीरे रादनोती केवल,''सर्वहारा कवि'' ही नहीं रहे, बल्कि देशी-विदेशी राजनितिक घटनाओं में उनकी दिलचस्पी और उन्हें लेकर उनकी चिंताएं और गहराने लगीं. वे मानो एक भूकंप सूचक यंत्र बन रहे थे--एक ऐसा संवेदनशील औजार जो विस्फोट को होने से बहत पहले महसूस कर लेता है.

हिटलर सरीखी भयावह शक्तियों के उदय को रादनोती जैसे एकदम पहचान गए थे. सितम्बर १९३४ में लिखी एक कविता में वे कहते हैं :

उसे बचाने के लिए उसे तुम अपनी बाहों में लेते हो
जबकि तुम्हारे आसपास दुनिया तुम्हारी टाक में छिपी है
आखिरकार अपने लम्बे चाकुओं से तुम्हे ख़त्म कर देने के लिए

इसमें कोई शक नहीं कि संकेत नात्सी बर्बरता की और है. इसके बाद से रादनोती ने स्वयं को एक अभिशप्त आदमी समझा. उस समय जर्मनी जैसा नात्सीवाद हंगरी से दूर था लेकिन रादनोती एक भयावह भविष्य को देख प् रहे थे. सारे यूरोप में मानव-विरोधी नृशंस शक्तियां सिर उठा रही थीं और रादनोती के मस्तिष्क में अपनी स्वयं की नियति तथा पहले से ही पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति मानो एकाकार हो गए. स्पेनी गृह युद्ध से पहले वर्ष में प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह का शीर्षक इसका गवाह है : 'चलते रहो, तुम मृत्यु-अभिशप्त' ( १९३६). रादनोती ने समस्या का हल खोज निकला था. उनके लिए सवाल यह नहीं था कि 'क्या मैं मरूँगा?' या 'क्या मैं मर सकता हूँ', बल्कि सवाल था, 'मैं कैसे मरूँगा?' एक कविता में वे पूछते हैं, 'और जहाँ तक तुम्हारा सवाल है, नौजवान, किस तरह की मौत तुम्हारी राह देख रही है?' अपनी उम्र के बचे हुए आठ वर्षों में यह 'मृत्यु-शैली' ही उनकी केन्द्रीय चिंता थी.

रादनोती के वयस्क कृतित्व में अपनी क्रूर मृत्यु का यह निर्विकार चिंतन लगभग एक रुग्न ग्रंथि की तरह मौजूद है. इसका कारन क्या है? कुछ मनोविज्ञानंवादी आलोचकों ने इसकी जड़ें एक अपराध-भाव में खोजी हैं--रादनोती को जन्म देते समय ही उनकी मान तथा उनके साथ पैदा होने वाले जुड़वां भाई की मृत्यु हो गई थी. रादनोती इसे कभी भुला नहीं सके और स्वयं को दोषी समझते रहे. कुछ कविताओं में यह अपराध-भाव उपस्थित भी है किन्तु रादनोती की कविताओं में मृत्यु की रुग्न इच्छा अथवा उसका रुग्न वरण कहीं नहीं है. यदि कुछ है तो यह कि उनकी कविता मृत्यु के अहसास में डूबी हुई है. इस अहसास को जिन तत्वों ने गहराया वे हैं उनका यहूदी होना, बलिदान की ईसाई अधर्ना में उनकी दिलचस्पी ( युद्ध के दौरान वे रोमन कैथलिक हो गए थे) और यूरोप के तत्कालीन विनाशकारी संकट के बीच मानवतावादी परंपरा के भविष्य की चिंता.

इस बिंदु पर लोर्का का एक महान प्रतीकात्मक महत्व के व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होते हैं. अन्य कई लोगों की तरह जिनकी सहानुभूति स्पेनी गणतंत्र से थी, रादनोती को भी विश्वास था कि लोर्का की हत्या राष्ट्रवादियों ने की थी. यदि ऐसा था तो यह भी स्पष्ट था कि लोर्का को उनकी जाती अथवा क्रन्तिकारी आस्था के कारन नहीं मारा गया था. रादनोती की व्याख्या यह थी कि लोर्का को मरना ही था, क्योंकि जनता उन्हें चाहती थी और साफ़ बात तो यह थी कि वे कवि थे--जीवन-शक्तियों के प्रवक्ता थे. उनकी मृत्यु के पीछे एक सदा-सा समीकरण था : फ़ासीवाद यानी युद्ध यानी मृत्यु. फ़ासीवाद कवियों को सिर्फ इसलिए मार डालता है कि वे कवि होते हैं.

जब रादनोती ने इसे समझ लिया और उसे अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया तो भौतिक विश्व के बारे में उनकी पूरी धरना बदल गई. 'एक मूर्तिपूजक स्वागत' के मनोहर प्रकृति-चित्र तिरोहित हो गए. वे बादलों में अपशकुन देखने लगे, शांत बगीचों में विचित्र चीत्कार और सिसकियाँ सुनने लगे और पतझड़ के सौन्दर्य को एक ऐसे व्यक्ति की आँखों से देखने लगे जिसके दिन गिने हुए हैं. ऐसा नहीं था कि उनकी कविताओं से उल्लास चला गया लेकिन वह उनमें एक चिंता के रूप में आया. रादनोती अपने भविष्य के प्रति कभी भी आश्वस्त नहीं हुए किन्तु उन्हें कुछ पारिवारिक सुख अवश्य मिला. १९३५ में उन्होंने अपनी प्रियतमा फान्नी दयारमाती से विवाह किया जिनके प्रेम ने उन्हें आगामी वर्षों की तकलीफों को बर्दाश्त करने की शक्ति दी. रादनोती की अंतिम कविताओं में भी उनमें फान्नी की अदम्य आस्था और अडिग प्रेम प्रतिबिंबित होते हैं.

जब दूसरा विश्व-युद्ध मंडराने लगा तब हंगरी धीरे-धीरे धुरी शक्तियों के शिविर में शामिल हो गया. जब सरकार ने १९३८ और १९३९ में यहूदी-विरोधी कानून लागू किये तो रादनोती की साडी आशंकाएं सच साबित हुईं. १९४१ में जर्मन फौजों को हंगरी से होकर युगोस्लाविया पर हमला करने की अनुमति दी गई और युगोस्लाविया का जीता हुआ एक हिस्सा हंगरी ने हथिया लिया. इसी वर्ष होर्थी सरकार ने सोवियत रूस से युद्ध की घोषणा कर दी और इस तरह वह खुल्लमखुल्ला धुरी शक्तियों में शामिल हो गई. मार्च १९४४ में जर्मन फौजों का आधिपत्य हो गया और होर्थी को गर्मन राजदूत द्वारा नामजद सरकार को स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा.

इन घटनाओं के बीच रादनोती को जिस भयावह व्यक्तिगत नियति की प्रतीक्षा थी वह धीरे-धीरे पूरी हुई. १९४० के बाद उन्हें कई बलात बनाये गए मजदूरों की बटालियनों में भारती किया गया. बुदापेस्त पर नात्सी कब्जे के फ़ौरन बाद उन्हें युगोस्लाविया में बोर नमक स्थान कि जर्मन-संचालित तांम्बे की खान में भेजा गया. वहां उन्होंने बोर और बोग्रद के बीच रेल-पटरी बिछाने का काम किया. वहीँ उन्होंने अपनी कुछ सर्वश्रेष्ठ कवितायेँ भी लिखीं और जब १९४४ की पतझड़ में बोर का कैदी-शिविर खली किया गया तो रादनोती और उनके मजदूर-साथियों का वह जबरन कूच शुरू हुआ जिसकी परिणति उनकी हत्या में हुई.

अंतिम कविताओं में रादनोती को जीवित रहने की चिंता कम ही सता रही थी--वे इतिहास के महान मुक़दमे में एक गवाह बन गए थे. अपने जीवन के अंतिम दशक में वे वह उपलब्ध करने का यत्न कर रहे थे जिसे उनके समकालीन, एक और महान हंगारी कवि, अतिला योझेफ़ ने 'हीरक चेतना' कहा है --अपने सरे आध्यात्मिक तथा बौधिक साधनों को काव्यात्मक ऊर्जा की एक्सशाक्त किरण में परिणत कर देना. एक ओर उनकी कविता में यहूदी-ईसाई परम्परा दिखाई देती है तो दूसरी ओर इसे सम्पूर्ण बनती हुई समाजवादी जीवन-दृष्टि. चौथे दशक के अंतिम वर्षों के राद्नोती और १९४४ के राद्नोती में एक मौलिक अंतर है--पहले जहाँ ऐसा लगता था कि कवियों का (लोर्का की तरह) रहस्यमय ढंग से लापता हो जाना अपरिहार्य है, वहां बाद में अपनी मृत्यु के समीप आते-आते रादनोती ने समझ लिया था कि कविता में सत्य का पक्ष लेना चुनौती या आत्म-रक्षा नहीं है बल्कि खतरे में पड़े मूल्यों के साथ एकात्म होना और इस तरह उन्हें जीवित रखना है. कवि के रूप में रादनोती ज्यों-ज्यों वयस्क होते गए--लगता है कि उन पर विपत्ति जितनी बढती गई उनकी प्रतिभा उतनी ही निखरती चली गई--उनकी कविता छंद, मात्रा और लय की एक क्लासिकी शुद्धता की ओर पहुँचती चली गई. सत्य और रूपाकार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता चरम सीमा की थी. उनके 'पिक्चर-पोस्टकार्ड', जो मृत्यु की कूच करते हुए लिखे गए हैं, मनो नरक से भेजे हुए छोटे-छोटे सन्देश हैं. युद्ध की विभीषिका के आकलन में वे निर्भीकता से वास्तविकतावादी हैं लेकिन एक बेहतर ज़िन्दगी की सम्भावना का स्वप्न देखना वे कभी नहीं भूलते. युद्ध की आग में गाँव जल रहे हैं लेकिन एक गडडडिया लड़की अभी भी अपनी मामूली ज़िन्दगी के रोजमर्रा काम में लगी हुई है और अपनी अंतिम कविता में, मृत्यु के कुछ दिन पहले, अपनी मौत को बगैर घबराये हुए ठीक-ठीक देख लेते हैं :

उसकी गर्दन में गोली मरी गई, 'तुम भी इसी तरह ख़त्म होगे'
मैंने खुद से फुसफुसाकर कहा : बस चुपचाप पड़े रहो.
धीरज अब मौत में फूलता है.

रादनोती को 'कैदी मजदूरों का' फ़ासीवाद विरोधी' कवि कहा गया है. लेकिन उन्हें सिर्फ इतना ही कहना उनके साथ अन्याय करना है. इसमें संदेह नहीं कि यह जानना अनिवार्य है कि रादनोती की कवितायेँ समसामयिक इतिहास के एक जघन्यतम दौर के निजी अनुभवों की कवितायेँ हैं. लेकिन अधिक महत्व इस बात का है कि रादनोती सरीखा महान कवि ही ऐसे अनुभवों से कवितायेँ बना सकता है और इसके लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है वह रादनोती की सर्जनात्मक प्रतिभा का अविभाज्य हिस्सा था. रादनोती की महानतम उपलब्धि यह है कि वे अपने युग की विभीषिकाओं को लेकर मुखर रहे और उन्हें विलक्षण और शांत कविताओं में परिणत कर सके. रादनोती के मित्र तथा प्रसिद्द हंगारी कवि इश्त्वान वाश ने ठीक ही कहा है कि रादनोती के कृतित्व की नैतिक और कलात्मक पूर्णता को, उसके सत्य को, और सौन्दर्य को, अलग-अलग देखना असंभव है. इश्त्वान वाश कहते हैं, '' ( मिक्लोश रादनोती की कवितायें ) उन विरली उत्कृष्ट कृतियों में हैं जिनमें कलात्मक और नैतिक पूर्णता दोनों होती हैं...वे सिर्फ़ रोमांचक कृतियाँ नहीं हैं, सिर्फ़ वाकई महान कविताएं नहीं हैं, बल्कि मानवीय और कलात्मक निष्ठा का एक ऐसा उदाहरण हैं जो जितना विचित्र और संकोच में डालनेवाला है उतना अनिवार्य भी है.''
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10 comments:

shraddha said...

मैं एक कवि हूँ और किसी को मेरी ज़रूरत नहीं है
kavi itihas aur bhavishya ko ek saath vartaman me dekh sakta hai isliye uski jarurat shayaa koi khatm nahi kar sakta, Hitler bhi nahi kar saka. Miklos Radnoti aaj bhi prasangik kahe ja sakte hai.unki nimn panktiya tab bhi utni hi satya thi aur aaj bhi utni hi satik-

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब विश्वासघात और हत्या का आदर होता था
खूनी, गद्दार और चोर हीरो थे

गिरिराज किराड़ू said...

तथ्य यह भी है कि 'प्रदर्शनप्रियता के प्रेरक और गंभीर अपवाद' गिरधर राठी के (हंगारी अध्येता मार्गित कौवेश -http://pratilipi.in/margit-koves/- के सहयोग से किये गये) मिक्लोश राद्ननोती व 9 अन्य हंगारी कवियों -शांदोर वारोश, यानोश पिलिंस्की, आग्नैश नैमैश नॉज, लास्लो नॉज, फ़ैरेन्त्स युहास, शान्दोर कान्यादी, ग़िजैल्लॉ हैरवाई, ऑलॉदार लास्लोफ़्फ़ी और एवॉ तोथ - के कुछ अनुवाद ऑनलाईन यहाँ http://pratilipi.in/2009/07/10-hungarian-poets/1/ प्रकाशित किये गये इसी वर्ष। ये अनुवाद पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुए हैं वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर से।

vyomesh said...

यह अद्भुत पोस्ट है. कविता में एक साथ, एक ही समय में अपनी शक्ति और सीमा का अभिज्ञान है. यह आत्मसजगता एक अनिवार्य पदार्थ है लेकिन हिंदीसाहित्यसंसार में कुछ भी अनिवार्य नहीं है. सब कुछ ऐच्छिक है. यह बुराई नहीं आत्मभर्त्सना है. कविता युद्ध के बीच में है लेकिन अपनी विडम्बनाओं पर किस तरह हंसती हुई-सी, इस बात पर कि आखिर 'ज़िन्दगी को कौन पूछता है, और इस कविता को'.

शुक्रिया अनुराग जी.

धर्मेंद्र सुशांत said...

anurag bhai,
radnoti ki kavitayen padhna behad marmik anubhav hai. vishnuji ke anuvad wali kitab mere paas patna men thi;wahan abhi bhi ho shayad. vishnuji ne isi tarah atila yojef ki kavitaon ka anuvad kiya hai- yah chakoo samay. vani se chhapa tha. aajkal milta nahin hai.
radnoti ki kavita bayanak nirasha ke daur me ummidon ki abhivyakti hain. kavita kaise kaise aur kahan kahan apna kaam karti hai!
dharmendra sushant

Geet Chaturvedi said...

my comment part 1
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पहले दिन इस पोस्ट की कविताओं को पढ़ते समय मुझे लगा भी नहीं था कि मैंने मिक्लोश रादनोती की कोई कविता पहले कहीं पढ़ रखी होंगी, पर जब गिरिराज ने लिंक दिया और मैं वहां गया, तो ख़्याल आया कि वहां दिए दस हंगारी कवियों को वहीं पर पढ़ा था. उनमें से एक रादनोती भी था, यह याद नहीं रहा.

अत्तिला योसेफ़ और फेरेन्‍त्‍स यूहात्स जैसे कवियों के बारे में पढ़ते हुए और कुछेक बार विष्णु जी के परिचय से गुज़रते हुए मिक्लोश रादनोती का नाम आ जाता था, लेकिन यहां एक साथ उसकी इतनी कविताएं पढ़ने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि यह कवि और उसकी कविताएं मेरे लिए इस साल की डिस्‍कवरी की तरह है, ये इस साल पढ़ी मेरी सर्वश्रेष्‍ठ कविताओं में से हैं. इन्हें पढ़ते हुए कुछ पहली छापें जो दिमाग़ पर बनती हैं कि ये कितनी शांत कविताएं हैं, नीरवता में, मरघट में या तमाम चीख़ों से निराश हो चुके मसान की शांति या महाभारत से बची हुई कृत्याओं की, जो वाणी का साथ खो चुकी हैं और किसी क़रीबी टीले पर बैठकर लाशों से पटे मैदान को देख रही हैं, दृश्य में यक़ीन की उसांसों को सावधानी से गिनते हुए. ये साठ से अस्सी साल पहले की कविताएं हैं, और उसके बाद भी इनकी समकालीनता हैरत में डालने वाली हैं. और इन कविताओं के भीतर का जो संसार है, अपनी समकालीनता में भी, कितना भयावह है.

जब 'शांति, आतंक' में यह कवि देखता है कि डबलरोटी वाला सायकल पर गाता जा रहा है, ऊपर हवाई जहाज़ घरघरा रहा है, मरी हुई बहन याद आ रही है, तभी अचानक दीवार पर एक साया गिरता है, सड़क पर शांति है, आतंक की छुअन भी--- तो यह दृश्य 1938 का नहीं लगता, बल्कि 2009 का ही लगता है, और वह जगह कोई भी हो सकती है. गज़ा से लेकर बसरा तक, अंधेरी रेलवे स्‍टेशन से लेकर श्रीनगर के चौक तक, जहां शांति और आतंक में विरोधाभासी सह-अस्तित्व दिखता है, जहां डर के बावजूद कार्य-व्यवहारों को चलाते रहने की विवशता दिखती है, जहां मातम तक के लिए अवकाश नहीं और जहां मरे हुए लोगों का अंधियारा दल, लगभग उपेक्षित-सा, ऊपर से गुज़र जाता है.

कहीं कोई रेफ़रेंस ऐसा नहीं आता कि ये सिर्फ 30 और 40 के दशक की कविताएं लगें.

Geet Chaturvedi said...

my comment part 2
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30 और 40 के दशक संकट के दशक थे, जिन्होंने बीसवीं सदी को महान परिवर्तनकारी घटनाएं दीं. महामंदी का दशक, नात्सीवाद-फासीवाद के उन्माद के दशक, अभूतपूर्व दमन और अभिव्यक्ति की छटपटाहट के दशक, लगातार अकेले होते जाने के दशक. यही वह समय था, जब पिकासो ‘गुएर्निका’ बना रहा था, मृत्‍यु के बाद काफ़्का की रचनाएं बाहर आ रही थीं, लोर्का उस दमन की बलि चढ़ चुका था, चैपलिन ‘मॉडर्न टाइम्स’, फिर ‘ग्रेट डिक्टेटर’ बना रहा था, बुन्‍युअल हर बंधन से स्‍वतंत्रता की गांठ खोल रहा था, डाली मानवीय वीरानियत की सर्रियल तस्वी़रें रंग रहा था ‘पर्सिस्टेंरस ऑफ मेमरी’ में निचुड़े हुए लत्तों के माफि़क़ घडि़यां पेड़ पर टंगी सूख रही थीं और खिड़की पर खड़ी महिला, जिसकी सिर्फ़ पीठ ही हमें दिखती है, बाहर झांकते हुए किसी का इंतज़ार कर रही थी, सार्त्र की थ्योरी आकार ले रही थी, दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही थी और छल-छलावों से भरे कोल्ड वार की बुनियादी इबारतें लिखी जा रही थीं-- (और इन सबके बीच गांधी, आज़ादी की आहट को क़रीब जान कांग्रेसियों-पूर्व कांग्रेसियों के दिलों में दिन-ब-दिन हरे होते खोट के बूटों पर, बेबस फि़क्रमंद हो रहे थे) – इन सबमें, यही वह समय था, जब युद्ध-यंत्रणाओं-यातनाओं, घिरी हुई मनुष्यता के बीच अकेलेपन की किसी खोह में बैठा इकलौता होता व्येक्ति था, जो न चीख़ पा रहा था, न जज़्ब कर पा रहा था, बल्कि लगातार बढ़ते अपने सिकुड़न में कराहता-बिलापता गतिहीन चुप्पी में था. फिर भी ये दशक ऐसे थे, जब जलती हुई झोपड़ी को उम्मीद की निगाह से देखा जा रहा था, जब ‘लाइफ़ इज़ ब्यूटीफ़ुल’ की तरह पिता अपने बच्चे को, कैंप के भीतर ही होलोकास्ट की कटुताओं से, बचा लेना चाहता था.

यही वह समय था, जब यह अंदाज़ा हो गया था कि सदी के आने वाले बरसों में युद्ध इस तरह नहीं होंगे, वे भले छिटपुट होंगे, लेकिन संचार और सूचना युद्ध के रूपों की भयावहता को इस क़दर घर-घर पहुंचा देंगे कि बिना अधिक प्रयास युद्ध्‍ा के उद्देश्यों को प्राप्त कर लिया जाएगा. यह कहने की बेवक़ूफ़ी नहीं कि युद्ध अप्रासंगिक हो गए, बल्कि यह कि उनका रूप बदल गया. हार्वड की एक स्टडी बताती है कि जितनी हिंसा विश्व युद्ध्‍ा में नहीं हुई, उससे कहीं ज़्यादा कोल्ड वार में हुई थी. यही दशक बीसवीं सदी के अवसाद और ह्यूमर को दिशा देते हैं. नई सदी के पहले दस बरसों के असंवाद, अकेलेपन और अवसाद की उत्पत्ति सत्तर साल पहले के उन कारणों से भले न हुई हो, अपने चरित्र में ये तीनों गुण वैसे ही, बल्कि उससे ज़्यादा भयावह होते जाएंगे, यह दिख रहा है.

तो कैसे एक कवि, जो बिल्कुलल युद्ध्‍ा के बीच खड़ा था, जो उस समय के शोर, आतंक, भय, आशंकाओं, अनिश्चितताओं और भावी आक्रमणों से बिल्कुल अनभिज्ञ नहीं था, वह कैसे ऐसी शांत कविताएं लिख लेता है ? ख़ुद विष्णु जी ने भी बहुत अच्छी् तरह मार्क किया है कि यह शांति इस कवि की ख़ूबी है. उस स्थिति-मन:स्थिति में भी कलात्‍मक कौशल को साध लेना काव्‍य-कला में अक्षुण्‍ण यक़ीन का बोध देता है. विडंबना, विश्वास और विश्लेषण के संकेतों में डूबा हुआ. व्‍यक्ति के स्तर पर यह कवि अपनी कविता में बचा रहना चाहता था और कविता को बचाए रखना भी. ‘मत्यु के बाद उसकी क़ब्र से बरसाती या ओवरकोट की जेब से उसकी कविताओं की डायरी मिली.’ एक मासूम बयान में यह कहा जा सकता है कि यह घटना एक ऐलीगरी है कविता के बचे रहने की, कि वह क़ब्र में जाकर भी नहीं मरती, यहां तक कि वे काग़ज़ भी कविता के कारण सड़ने-गलने से बच जाते हैं. यह जीसस ऑफ नाज़रेथ की तरह लौट आना हुआ? जीसस का लौट आना इस धरती पर विश्वास की सबसे ताक़तवर कहानी है. यह सोचा जा सकता है कि क्या यह कविता की आफ़्टरलाइफ़ की ऐलीगरी है?

Geet Chaturvedi said...

my comment part 3
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जबकि यह नहीं दिखता कि कवि अपनी आफ़्टरलाइफ़ के बारे में सोच रहा हो, (कविता की आफ़्टरलाइफ़ के बारे में उसके संकेत ज़रूर मुझे दिखते हैं), लेकिन वह लगातार मृत्यु के अहसास में रहता है. और यह अहसास किसी मिथॉलॉजिकल कैरेक्टर, या एक अर्थों में हिंदू-जुडैज़्म–जेंटाइल मृत्युबोध की तरह नहीं आता. यह बिल्कुल बीसवीं सदी के उन बरसों के उस मनुष्य की तरह आता है, जो अपनी मृत्यु के साथ अपने क़रीबियों, परिचितों, यहां तक कि अपरिचितों की मृत्यु की भी प्रोफ़ेसाइ कर रहा है. बड़े कवियों और बड़ी कविता का यह गुण मुझे हमेशा आकर्षित करता है- वहां कवि प्रोफ़ेसाइ करता है, आने वाले समय को लेकर. चाहे कविता की शक्‍ल में लिखे धार्मिक महाग्रंथ हों या हमारे आगे के महाकवि, इन सबमें यह गुण दिखता है और रादनोती इसका बख़ूबी प्रयोग करता है. यहां इसे किसी डिवाइन इन्फ़्लुएंस की तरह न लिया जाए, क्योंकि यह किसी कोह-खोह में नाजि़ल नहीं होती, किसी म्यूज़ की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि समय, समाज, मन और मोहन से कवि का गहरा संबंध उसे वह दृष्टि देता है, जो देवतागण ओरैकल्स और रब्बाइ को दिया करते हैं. यहीं पर कवि की निर्मिति को देखा जाना चाहिए— पहले रोमानी कविताएं, फिर कैथलिक पोएट्री, फिर मार्क्सवाद... क्या यह मिश्रण कवि को एक मौलिक अभिव्यक्ति देता है? प्रतिरोध की कविता भी अनिवार्य रूप से मिस्टीक होती है. तभी वह मनुष्य के अधि-जगत को सूक्ष्मता से टिटिलेट करती है. ये और आगे की बातों से मेरा इशारा हिंदी में प्रतिरोध की काव्य-संस्कृति की तरफ़ भी है, जहां मनुष्य के अंतर्तम के संजालों से जूझे बिना ऊपरी स्तर पर दोहराया जाने वाला एक नारा दे दिया जाता है. युद्ध तो दूर की बात है, युद्ध जैसी स्थिति भी न होने पर (इसके बाय-प्रोडक्ट्स संत्रास, अकेलेपन आदि को तो देखे बिना ही) आक्रामक और उग्र मुट्ठी तान दी जाती है. कई बार ऐतिहासिक उदाहरण कविता की संरचना को गढ़ने-पकड़ने में मददगार होते हैं— इसी रोशनी में मैं यह कहना चाहता हूं कि इतिहास के सबसे बड़े प्रतिरोधी व्यक्तित्वों ने भी, प्रतिरोध की अपनी मुहिम के दौरान मनुष्य के मेटाकॉन्शसनेस को लगातार एड्रेस करते रहना कभी नहीं छोड़ा था. यलगार कहने से पहले की एक लंबी प्रक्रिया होती है, बल्कि ठीक यह शब्‍द उच्चा्रते समय भी यह ज़रूरी होता है— जैसा 'सेवन समुराई' में काम्बेई आखि़री मुक़ाबले से पहले अपनी टोली के साथ करता है.

विष्णु जी ने भी लिखा है कि कवि की चिंता ‘क्या मैं मरूंगा’ नहीं, ‘मैं कैसे मरूंगा’ है. ‘मैं कैसे मरूंगा’ या ‘हम कैसे मरेंगे’ एक जायज़ सवाल है. ‘मैं कैसे मरूंगा’ दरअसल अपनी मृत्यु को चुनने का उपक्रम है. और मृत्यु मांगने का भी. दी हुई मृत्यु को स्वीकार कर लेना एक सविनय प्रतिरोध है. इसे स्वीकृति की एंबीग्विटी में न देखा जाए. मसाद के कि़ले में रोमनों से लड़ते यहूदियों की सामूहिक आत्महत्या् से लेकर जीसस के क्रूसीफि़केशन और गांधी के आंदोलनों तक इसके अनगिनत उदाहरण हैं. प्रतिरोध बहुत जल्द रूढ़ और स्थूल हो जाने वाली क्रिया है. प्रतिरोध की अभिव्योक्ति हमेशा नवीनीकरण और आउट ऑफ़ बॉक्‍स होने की मांग करती है. दमन के समय में सबसे ज़्यादा रचनात्मक सांकेतिकता की दरकार होती है. लोर्का, नेरूदा से लेकर निज़ार क़ब्बानी तक यह नवीनता दिखती है. और रादनोती में भी. वह मुंडेन दृश्यों के चित्रण से यह सांकेतिकता प्राप्त करता है, जिसे आज डिसाइफ़र करें, तो आज के सूत्र मिलते हैं.

Geet Chaturvedi said...

my comment part 4
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आज जब ग्लोबल ऑर्डर बदल रहा है, ठीक उसी तरह, जैसा तीस और चालीस के दशक में हुआ था, जिसे 'न्यूजवीक' वाले फ़रीद ज़कारिया अपनी किताब 'पोस्ट-अमेरिकन वर्ल्ड' में 'द राइज़ ऑफ़ द रेस्ट' कहते हैं. कोल्ड वार के बाद की एक-ध्रुवीय दुनिया की अवधारणा संदिग्ध हो रही है, वर्ल्ड वार और कोल्ड वार के दौर के मुक़ाबले हिंसा कम हो गई हो, लेकिन उसका अपेक्षाकृत अधिक क्रूर, हिंसक और अमानवीय प्रदर्शन (जो चौबीसों घंटे टीवी, इंटरनेट और अख़बारों के ज़रिए हम तक आ रहा है) हमें यह अहसास करा रहा हो कि हम सबसे हिंसक समय में जी रहे हैं, हज़ारों किलोमीटर दूर तालिबान या अबू ग़रेब में फ़ौजी क्रूरता यहां हमारा दिल दहला देती है, रादनोती की कविता में ये पंक्तियां--

कि कोई मतलब नहीं कि वह सब मुझसे बहुत दूर हो रहा है
शंघाई या गुएर्निका
मेरे दिल के ठीक उतने ही पास हैं
जितना तुम्हारा थरथराता हाथ
या ऊपर आकाश में कहीं बृहस्पति.

कितनी मानीख़ेज़ हो जाती हैं. इस ग्लोबल दुनिया की विडंबनाओं को किस क़दर दिखा देती हैं, इतने बरस पहले. जब सूचना और संचार के इतने माध्यैमों के बाद भी असंवाद और अकेलापन इस तरह आया है कि नज़दीकी अतीत में तुलनात्मक उदाहरण तक नहीं मिलता, ये कविताएं कितना आज-की लगती हैं. (और यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं कि इन कविताओं के अनुवादक विष्णु खरे, जो ख़ुद समर्थ आलोचक हैं, की अन्यत्र दी हुई, अब तक अनडिफ़ाइन्ड, थ्योरी ‘प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वचेतना’ का क्या तो ख़ूबसूरत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं.)

यह टिप्‍पणी बहुत ज़्यादा लंबी हो गई, (इतनी कि ब्‍लॉगर ससुरा इसे एक बार में ले ही नहीं रहा, सो चार हिस्‍सों में पोस्‍ट की है) ऐसा न चाहते हुए ही हुआ है, पर ये बेचैन, चिंतित कर देने वाली कविताएं हैं, और प्रेरक भी, जिनमें उम्मीद और अवसाद का ऐसा मिला-जुला पाठ है, जिस पर इन बरसों में और ज़्यादा, और ज़्यादा बात की जानी चाहिए. इस कवि की और कविताओं को खोजते-पढ़ते हुए.

vyomesh said...

अगर कविता भविष्यकथन है तो समकालीन नहीं है और अगर कविता भविष्यकथन 'भी' है, तो भी, 'सिर्फ़' समकालीन नहीं है. गीत सही कहते हैं कि बड़ा कवि अपने समकाल का क़ैदी नहीं होता, वैसे क़ैदी तो वह किसी भी काल का नहीं होता, जैसे शमशेर ने कहा था - '' कवि घंघोल देता है व्यक्तियों के जल ''. इस वाक्य में व्यक्तियों को समयों से विस्थापित करके देखिये, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि, बकौल गीत, शमशेर ने भी हमारे ''मेटाकॉन्शसनेस को लगातार एड्रेस करते रहने'' का अनिवार्य कार्यभार कभी नहीं छोड़ा था. हालाँकि कोई भी कवि किसी भी धारणा का उदाहरण नहीं है, फिर भी, शमशेर, रादनोती की ही तरह, यहाँ उदाहरण हैं. यह बोध कितना उत्तेजक है कि कोई कविता जैसे किसी भविष्य में, भविष्य से भी दूरतर किसी भविष्य में चरितार्थ होती है, वैसे ही कोई कविता किसी अतीत में, अतीत से भी दूर के किसी अतीत में चरितार्थ होती होगी.

प्रोफ़ेसाइ वाला आबज़रवेशन इतना शक्तिसंपन्न है कि लोर्का वाली कविता में लोर्का की जगह रादनोती का नाम रख भर देना है, फिर वह कविता साथ-साथ, भविष्य और अतीत दोनों की हो जायेगी.

rajeev matwala said...

आपके ब्लॉग पर आकर प्रफुलित हुआ...एक बेहतरीन पोस्ट है...होना चाहिए जो आपने कर दिखाया है...मेरी हार्दिक शुभकामनाये इसलिए कि कुछ लोग ही है जो क्रियाशील है...और इस क्रियाशील मन की प्रणाम करता हूँ.....