Sunday, December 13, 2009

निधन : दिलीप चित्रे


ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा


दिलीप चित्रे कैंसर से पीड़ित थे. लेकिन इतने जिंदादिल कि आप उनसे मुखातिब होकर यह अंदाज़ तक नहीं लगा सकते थे. वो आपसे प्रसन्न गप्प लगाते थे. वो कविताओं के बारे में बात करते थे. राजनीति पर भी. जब राज ठाकरे ने अपनी बदमाशियां शुरू की थी, खासकर हिंदी पट्टी के लोगों को मुंबई में अपनी गुंडई से परेशान करना शुरू किया था, दिलीप ने मेरे आग्रह पर नवभारत टाइम्स में ''राज-नीति'' का प्रतिवाद करते हुए एक बड़ा लेख लिखा था. दिलीप छोटों को मान देना जानते थे. उससे पहले उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं दी थी, जिसे युवा कवि तुषार धवल ने अनूदित किया था. हालाँकि दिलीप की कविताओं से मेरा परिचय उस दुबली-सी कविता-पुस्तक से हुआ था, जिसे चंद्रकांत देवताले ने मराठी से अनूदित किया था. कविताओं के अनुवाद में राजेंद्र धोड़पकर ने भी सहयोग किया था जिनसे बाद में उनकी कविता पर बात करने के अनेक अवसर आए. दिलीप अंग्रेजी और मराठी में लिखते हुए भी हिंदी के लिए अजाने नहीं थे. हिंदी में उन्हें पसंद करनेवाले, उनसे निकटता महसूस करनेवालों का एक बड़ा जागरूक समाज है, और इस समाज को अब उनका न होना बेतरह सालता है.

दिलीप की कविताओं के लाउड, लोडेड और एब्सर्ड टेम्परामेंट की ओर लोगों का ध्यान अक्सर गया है, पर इसके भीतर मराठी संत-कवियों ज्ञानदेव, नामदेव और तुकाराम के ज़ज्ब होने की बात लगभग अलक्षित गई है. उन्होंने अपनी कविताओं के बारे में कभी लिखा था : '' मेरी कविता-- चाहे वह मराठी में लिखी गई हो चाहे अंग्रेजी में, मराठी सांस्कृतिक परम्पराओं की गहराइयों से उपजी है...और इसीलिए वह मेरी भारतीयता का विश्वमुखी आविष्कार भी है.'' मेरे ख़याल में दिलीप को पढ़ते हुए दूसरी कई बातों के साथ इसका भी ध्यान रखना चाहिए. उन्होंने कविता को अपने लिए ''ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा तथा न्यास'' कहा था. उन्होंने अंत तक यह साहस बरकरार रखा. इस चंचल समय में दिलीप चित्रे की यह दृढ़ता याद आएगी, कइयों को यह निश्चय ही अनुकरणीय भी जान पड़ेगी.

( १० दिसम्बर, २००९ की सुबह दिलीप चित्रे का निधन हो गया. वे ७१ वर्ष के थे. )

5 comments:

डॉ .अनुराग said...

वाकई.......

jagadishwar chaturvedi said...

मराटी काव्य की आधुनिक संवदना के विरल कवि को श्रध्दांजलि।

anita said...

chitre ji mere e-friend the.....kafi dino se soch rahi the unhe ek lamba mail likhunge....par us din pata chala k ab humare beech nahi hai to sadma sa laga ke kyon sochti reh gai ..time nahi nikal pai...feeling v. bad....unpar lekh padhkar mujhe acha lag raha hai..mai unhe ab aur jyada padhna chati hun...pata nahi jab koi humare beech nahi hota hai tab wo aur jyada kyon ho jata hai......

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग आपने दिलीप जी को एक विचारवान श्रद्धांजलि दी है. उनके फोलोअर्स हिंदी में भी पर्याप्त हैं. उन्हें हम सबका सलाम.

Dr Shaleen Kumar Singh said...

Ek baar Dilip se baat hui thee phone par, yaad karta hu jab unhone apne links diye the or kaha tha kuch likho Dhasal par....