सबद
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सबद विशेष : ८ : व्योमेश शुक्ल की लम्बी कविता


(अपने पहले संग्रह की सत्तावन कविताओं के बाद व्योमेश किस तरफ रुख करते हैं, इसका हम कविता-प्रेमी पाठकों को बेसब्री से इंतजार था. उनकी इस ५८ वीं कविता से, जो सबद के साथ-साथ रंग-प्रसंग के नवीनतम अंक की भी शोभा है, यह बात पुष्ट होती है कि वे अपनी कविता का एक सफल चक्र पूरा कर उसे दुहराने की बजाए अभी कुछ और पाने का दुर्लभ यत्न कर रहे हैं और उनकी अब तक की प्राप्ति को उनके रहबर चंद दूसरे कवियों की कविताओं के साथ मिलाकर देखें तो इधर की कविता पर इतरा लेने की पर्याप्त वजहें हमें आसानी से मिल जायेंगीं. व्योमेश के यहाँ शिल्प, भाषा और कथ्य के स्तर पर निरंतर सजगता बरती गई है और यह सजगता ही 'लीलामय' जैसी कविता संभव करती है. इसका विन्यास धोखेबाज़ है. विस्तार हैरत में डालनेवाला. आज और आज से पहले व्योमेश की अन्य कविताओं की तरह यहाँ भी अनिवार्य सन्दर्भ-बिंदु हैं और इनके '' बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे दूर रहकर भी''.कविता इन लीलाओं को दर्ज करती है और हम जो पढ़ते हुए कविता में ऐसी लीलाओं के अभ्यस्त नहीं हैं, उन्हें भी विचित्र ढंग से लीला में लपेटती है. सबद विशेष की इस आठवीं पेशकश में व्योमेश शुक्ल की यह पहली लम्बी कविता. दिया गया चित्र एक इंडोनेशियाई कलाकार का है. )


लीलामय
1
पानी में पांच बत्तख तैर रहे थे। तट पर खड़ा आदमी मछली को खाना खिला रहा था। निषादराज भगवान कीं आरती कर रहे थे। भगवानजी उस पार जाना चाह रहे थे। बच्चे मुहल्लेवाले प्रजा लग रहे थे। कविता गाई जा रही थी। एक आदमी गाय को सानी-पानी दे रहा था। मेला लगा हुआ था। बच्चे को पानी-भगवानजी-मेले-बत्तख-मछलियों-गायों में से हरेक बहुत अच्छा लग रहा था। उसे मालूम नहीं होगा या जो भी हो, वह उस पानी को नदी कहना चाहता था। मैं उससे कहना चाहता था कि ‘नहीं’ तो वह ‘नहीं’ सुनना नहीं चाहता था। वह पानी के बारे में कुछ पुराना सुनना चाहता था। मैं पानी के भविष्य को लेकर परेशान होना चाहता था। वह मुझी को लेकर परेशान होना चाहता था। यह कहने में कि ‘भविष्य में पानी ख़त्म हो जायेगा’, पानी की बड़ी बर्बादी थी। पानी के ख़त्म होने से पहले ही पानी के ख़त्म होने की उदासी में मैं एक अतीत था। पानी के पुराने को जानने में बच्चे की दिलचस्पी पानी का भविष्य थी। कभी-कभी चीज़ें उल्टी दिखाई देती हैं। मैंने पानी को उल्टा करके देखा तो पानी सीधा था । नदी को उल्टा बहा देने से प्रदूषण की समस्या का क्या होगा सोचता हुआ मैं उल्टी गंगा बहाने वाला मुहावरा हो गया था। शहर भर के सीवेज को उल्टा बहा देने से क्या होगा? निपटना दूभर हो जायेगा और क्या? जिन शहरों के किनारे नदियाँ नहीं होतीं, जैसे बंगलोर, वहाँ के लोग क्या टट्टी-पेशाब नहीं करते? आप मान लीजिए कि आपके शहर से होकर कोई नदी नहीं गुज़रती, बस, उसमें मत विसर्जित कीजिए अपनी अशुचि। यह मानते ही कि बनारस के किनारे से नहीं बहती गंगा, गंगा बनारस के किनारे बहने लगेगी। उसकी अनुपस्थिति का यक़ीन ही उसकी उपस्थिति की उम्मीद है। मैं स्मृति की गंगा में नहाकर मुमुक्षु हो जाता हूँ । तुम एक शब्द लिखो साफ़ काग़ज़ पर गंगा। सुबह पाओगे कि वह काग़ज़ फिर से पेड़ हुआ जाता है।

2
लीला शुरू हो गई है। राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के लिए जा रहे हैं। राजस्व सूखा पत्ता है। अब गिरा कि तब गिरा। अब श्रृंगवेरपुर दूर नहीं और नन्दीग्रामों की ऋतु क़रीब है। निकलने से ठीक पहले भगवान व्यासजी की ओर देखकर मुस्कराते हैं। व्यासजी भी।

वाक़ई लीला शुरू हो गई है।

3
रामचन्द्र शुक्ल ने पता नहीं रामलीला का केवट प्रसंग देखा था कि नहीं। नहीं तो उनसे पूछा जाता कि भगवान को नाव पर बिठाने से पहले वह कबीर का भजन क्यों गाता था?

4
मैं पेड़ का अभिनय करना चाहता रहा हूँ। पेड़ की तरह दिखना चाहना भी है मुझमें। लेकिन इतने थोड़े से समय में मैं किस-किस का अभिनय करता फिरूँ? ख़ुद का, नागरिक या दो बच्चों के पिता का, बेटे या दोस्त का। मैं एक लड़की के फूटे हुए माथे का अभिनय करता हूँ जिसकी वजह से उसकी शादी में दिक्क़त आयेगी। एक टीबी-ग्रस्त फेफड़े का भी अभिनय किया है कुछ दिनों तक। उसमें साँस फूलने लगती है।

5
लीला में अभिनय नहीं है। अभिनय है टीवी सीरियलों में। यहाँ भगवान की, स्वरूपों की झाँकी है। रामलीला का तर्क यह है कि जो होते हैं वे अभिनय नहीं करते।

6
भरत बड़े भाई को मनाने आते हैं तो चौदह बरस के वियोग के बाद होने वाले भरतमिलाप के पहले एक बार और भरतमिलाप हो रहा है। अब दो भाई चौदह बरस बाद गले मिलेंगे याने वन जाते ही मिलने का मुहूर्त चौदह वर्षों के लिये स्थगित।

7
ये भविष्य में होना था कि नहीं होना था। अभी तो होना था। उनकी चोटों और अपने सीने के साथ। लगातार और बेसबब। आदमी होने की ऊब थी। यानी आदमी पुनः अपने होने से ऊब गया।

8
लेकिन तुम्हारे सवाल किसी को बेगाने बनाते हुए न हों, जैसे वे अक्सर होते हैं। और अभी कोई ऐसा सवाल मत पूछना जिससे पता लगे कि तुम शामिल नहीं थे या उपस्थित नहीं थे। शामिल न होने का पश्चाताप मौन में है और कहीं से भी, किसी भी छूटे हुए बिन्दु से शामिल हो जाओ, तुम्हारे जवाब अपने आप, कभी न कभी, तुम पर छा जायेंगे और बरस कर तुम्हें भिगो देंगे। तुम्हारे ऊपर ज़ाहिर हो जायेंगे।

सच कहने में इतनी बाधाएँ थी कि बाधाओं के बारे में बताना ही सच बताना हो गया था।

9
एक सज्जन हैं। अतिवृद्ध। रामलीला के दौरान उनके कंधे पर मृदंग टॅंगा रहता है जिसे वह ख़ुद नहीं बजाते। उन्हें मृदंग बजाना आता भी नहीं। मृदंग के लिये उनका कंधा ही प्रासंगिक है, हथेली और उंगलियाँ नहीं। जो लीलाएँ एक से अधिक जगहों पर या दो जगहों के दरम्यान चलते-चलते होती हैं वहाँ उनका कंधा काम आता है। तब मृदंग उनके कंधों पर टंगा रहता है और दूसरा आदमी उसे बजाता है। तब वह कंधा एक चरित्र बन जाता है - एक मूर्तिमान स्वरूप। उसकी वजह से ध्वनि होती है। उसकी मेहनत से संगत संभव होती है। मानस की पंक्तियों के गान में उस कंधे का आकार है। मैं उन सज्जन को करीब बीस साल से जानता हूँ, लेकिन उनके कंधे को कितना जानता हूँ ? कोई भी उस कंधे को कितना जानता है? रामलीला के सुदूर विराट अतीत में उस कंधे को हम कहाँ रखते हैं? और इन कंधों के बग़ैर रामलीला का गुणगान कितना वाजिब होगा?

परम्परा अक्सर ऐसी ही मुश्किल है।

10
लीला समय के ठीक बीच में घटती घटनाओं में नहीं, उनकी बग़ल में सम्पन्न होती रही है। इस तरह अनुमान लगाना आज कुछ विचित्र, कुछ काव्यात्मक लगता है कि कम से कम साढ़े चार सौ साल पुरानी यह लीला इतिहास के ज़रूरी मौक़ों पर, ख़ास जगहों पर क्या करती होगी? अंग्रेज़ों के बनारस समेत पूरे देश पर कब्ज़ा करते समय भी राम सूपर्णखा की नाक काट रहे होंगे, चन्द्रशेखर आज़ाद जब महात्मा गाँधी की जय-जयकार करते हुए अपनी पीठ पर कोड़े खा रहे थे, तब भी रावण सीता का अपहरण कर रहा होगा। 1942 के भारत छोड़ों के वक़्त भी राम अयोध्या छोड़कर जा रहे होंगे। इसी तरह आज़ाद भारत की प्रमुख घटनाओं के मद्देनज़र भी लीला को सोचा जा सकता है। इस बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे दूर रहकर भी। जैसे इतिहास के यन्त्र से अलग एक छोटा, फालतू-सा लेकिन लगातार चलता पुर्जा। एक कुटीर उद्योग। धाराप्रवाह के बरअक्स एक मौन तटस्थता।

11
रामलीला ने स्वयं को वस्तुओं पर कम से कम निर्भर किया है। जो वस्तुएँ वहाँ हैं, ठोस और पारंपरिक हैं। वे अनिवार्य भी हैं। उन्हें किसी दूसरी वस्तु या युक्ति से ‘रिप्लेस’ नहीं किया जा सकता। उन वस्तुओं की जड़ें लीला के समस्त सन्दर्भों, लीला से जुड़े लोगों, लीला से जुड़े मृतकों, लीला की स्मृति और समाज में लीला के व्यापक विस्मरण तक फैल गई हैं। उन ‘कम’ वस्तुओं का, लीला की ही तरह, व्यक्तित्व है। ये वही वस्तुएँ हैं जो थीं और हमेशा, लगभग हमेशा से हैं। ये वे वस्तुएँ नहीं हैं जो पहले नहीं थीं और अब हो गई हैं। मसलन, लीला में बैकड्राप नहीं है। एक बार किसी आधुनिक नाट्यविद ने इस लीला के संयोजकों से पूछा कि अगर आप लीला में पर्दों का इस्तेमाल नहीं करते तो एक दृश्य को दूसरे दृश्य से अलग कैसे करते हैं और रंगक्षेत्र (थियेट्रिकल स्पेस) को दूसरे आमफ़हम स्पेसेज़ से अलग कैसे करते हैं? जवाब में लीला संयोजकों ने अपने कामकाज जैसी सरल और बुनियादी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि हमारी लीला में पर्दा तो है, बस थोड़ा बड़ा और थोड़ा दूर है। वह पर्दा दरअसल आकाश का पर्दा है और हमारा अलग से कोई स्पेस नहीं है जो ज़्यादा नैतिक या ज़्यादा पवित्र हो। समूची सृष्टि ही हमारे भगवान जी की लीला स्थली है- उनका अपना स्पेस। इसलिए हम स्पेस को स्याह-सफ़ेद में विभाजित करके देख नहीं पाते हैं। हम स्पेस को संक्षिप्त और विशिष्ट भी बना नहीं पाते।

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यह आश्चर्य है कि आधुनिक रंगप्रयत्नों ने रामलीला की पारंपरीणता से कुछ ख़ास नहीं सीखा, बल्कि कुछ नहीं सीखा। यह दुर्भाग्य भारतेन्दु की उपस्थिति के बावजूद घटित हुआ और बनारस में घटित हुआ। अगर महाकाव्यात्मकता के मंचन की रामलीला जैसी उदार, भगीरथ कोशिश के साथ आधुनिकता की स्वस्थ अंतर्क्रिया सम्भव हुई होती तो जयशंकर ‘प्रसाद’ के नाटकों को अनभिनेय इत्यादि बताकर टालने का पलायन भी न हुआ होता। तब आधुनिक रंगमंच इतना ‘यथार्थवादी’, इतना अभिनय-निर्भर, इतना पूर्वनियोजित, इतना पूर्वानुमेय न हुआ होता। तब रंगमंच में जादू, रहस्य, कल्पना और अप्रत्याशित के लिए ज़्यादा जगह होती। तब ‘मानस’ की तरह दूसरी कविताओं को भी नाटक माना जा सकता। तब नाटक में ‘टेक्स्ट’ की ज़रूरत कुछ कम होती। अगर हिन्दी आधुनिकताएँ रामलीला से सीख पातीं तो आज की कविता कुछ ज़्यादा नाटक होती। और कुछ कम कविता।

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नयी जिज्ञासाएँ पूछती हैं कि आधुनिक थियेटर की तरह लीला एक ही जगह पर क्यों नहीं होती? वह इधर-उधर घूम-घूमकर, एक से दूसरी जगह जाकर, दो जगहों के बीच के सफ़र में भीड़, ट्रैफिक, शोर, साधारणता और अन्य दिक्कतों के धक्के खाकर क्यों होती है? इसका एक जवाब यह है कि मुगल काल और अंग्रेज़ों के ज़माने में औरतों पर जिस तरह की बन्दिशें थीं उनके भीतर रहकर वे किसी सार्वजनिक स्थल पर जाकर मेला-तमाशा नहीं देख सकती थीं। उनके लिए ही, उनके मनोरंजन की ख़ातिर ही ये लीलाएं अपने स्थायित्व, अपनी रिहाइश में से किसी जुलूस की तरह, किसी प्रभातफेरी की तरह या बंजारों के किसी समूह की तरह निकलकर भटकने लगी होंगी। इसके बाद औरतें घरों, छतों, मुंडेरों और बरामदों से लीला के कुछ हिस्से, लीला की झाँकी देख सकती थीं। अपने घर अर्थात् मंच से लीला के निर्वासन का तर्क स्त्री की कैद को कुछ कम करने की कोशिश में भी है।

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सूपर्णखा की नाक काटने का प्रसंग सभी लीलाओं में जोर-शोर से मनाया जाता है। सूपर्णखा की भूमिका हिजड़ा निभाता है। एक कटोरी में हिजड़ा औरतों के पाँव में लगने वाला महावर लिये खड़ा रहता है। जैसे ही लक्ष्मण अपने तीर का स्पर्श (स्पर्श भर) उसकी नाक से कराते हैं, नाक कट जाती है और कटोरी में रखा महावर खून हो जाता है और सूपर्णखा उसे चीख-पुकार, रोष और विलाप के साथ मिलाकर चारों ओर फेकनें लगती है। फिर बड़ा भारी जुलूस निकलता है - गाजेबाजे और तामझाम के साथ। यह जुलूस कई किलोमीटर लम्बा होता है। बहुत से हाथी, ऊँट, घोड़े, रथ और काली का मुखौटा पहने तलवारबाज़ आगे-आगे चलते हैं। इनके भी आगे खर और दूषण के दैत्याकार पुतले। पीछे बैलगाड़ियों, ट्रालियों, ट्रेक्टरों और ट्रकों पर मिथकों, किंवदंतियों, पुराकथाओं और समकालीन जीवन-समस्याओं पर आधारित झाँकियाँ। ये सैकड़ों होती हैं। अधिकतर झाँकियों में बच्चे ही भूमिकाओं में होते हैं। यह लीला आधी रात से शुरू होती है और सुबह तक चलती है। यह रतजगे की लीला है। लीला-क्षेत्र में पड़ने वाले घर इस रात मित्रों, रिश्तेदारों, ससुराल से पधारी बहनों, बेटियों और उनके बच्चों का उपनिवेश बन जाते हैं। कुछ लोग खिड़कियों और मुंडेरों की सोहबत में नक्कटैया देखना पसंद करते हैं और कुछ मेले में पैदल भटकते हुए। अरसे तक यह त्योहार प्रेमी-प्रेमिकाओं की आदर्श स्थली बना रहा। बाद में कुछ ज़्यादा ही उद्दाम और उत्तेजक अवसर प्रेम के पैदा हो गये तो इस मोर्चे पर भी नक्कटैया पीछे छूट गई। जुलूस में शामिल झाँकियों में हास्य और व्यंग्य की केन्द्रीयता होती है। कुछ जानकार लोगों का कहना है कि पराधीनता के दौर में ब्रिटिश राज के अन्यायों की हॅंसी उड़ाने के लिए इन झाँकियों को लीला में जोड़ा गया। लीला के विराट में ये आधुनिक और विद्रोही प्रयत्न बहुत सहजता से खप गये हैं। इनकी वजह से लीला का एक भिन्न पाठ भी तैयार होता है।

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मित्र साथ था और भरतमिलाप की लीला हो रही थी। बनारस की सभ्यता की लोकप्रियता का स्मारक लक्खी मेला। जिन मेलों में अनिवार्यतः लाखों लोग आते हैं, स्थानीय परम्परा में उन्हें लक्खी मेला कहा जाता है। पन्द्रह मिनट की लीला स्थानीय पुलिस और प्रशासन की तैयारियों की परीक्षा लेती हुई सम्भव होती है। चौदह वर्ष के वियोग को पार कर भाई गले मिले। लोगों ने ‘बोल दे राजा रामचन्द्र की जय’ और ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष किया। लोगों ने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष नहीं किया। हज़ारों यादवों के कंधे पर आरूढ़ होकर पुष्पक विमान नन्दीग्राम से अयोध्या की ओर उड़ता हुआ-सा चला। मित्र ने गर्वोक्ति के से लहज़े में कहा : ''ओसामा बिन लादेन ने 2015 तक पूरी दुनिया को मुसलमान बनाने की चुनौती दी है। क्या यह मुमकिन है?'' सवाल वाहियात था और मज़ाक या डांट में ही उत्तर दिया जा सकता था। मैंने मज़ाक किया - '‘हम सब लोग तो पहले से ही मुसलमान हैं। हमें कोई क्या बनायेगा?'' बहरहाल, हम विमान के पीछे की विराट भीड़ का हिस्सा होकर आगे चले और मित्र के सवाल का उत्तर सामने आ गया। मुसलमानों की विपुल संख्या मेला देखकर निकल रही थी। चारों ओर टोपियाँ और लुंगियां। मित्र झेंपते हुए मुस्करा रहे थे। उनकी चिढ़ इस हिस्सेदारी के आगे झूठ हो रही थी।

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लीला और प्रकारान्तर से मानस के क़रीब होने में अद्वैत का आकर्षण है। अगुण और सगुण के बीच, ज्ञान और भक्ति के बीच, शंकर और राम के बीच, होने और होने के अभिनय के बीच।

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जानकारों को मानस-गान बेसुरा लग सकता है। वहाँ पर्याप्त रफनेस और पराक्रम है भी। कुछ चीखना, कुछ बहरों को सुना डालने की कशिश। तर्क के धरातल पर एक बेसुरापन कभी-भी उसमें साबित किया जा सकता है। लेकिन अगर कानों में थोड़ी बहक हो और कुछ तर्कातीत सुनने का हुनर हो तो वहाँ खजाना है। वहाँ निरे-वर्तमानकालिक सुरीलेपन के फासिल्स हैं। एक आदिम आर्केस्ट्रा के जीवाश्म। और इस प्रकार बेसुरे होते जाने की प्रक्रियाएँ। बीच की धूल। रास्ते का शोर। दुर्घटनाएँ। इस संगीत से इश्क करना आसान नहीं है। यह किसी शुद्ध संगीत का अपभ्रंश है। उसे सुनना और सराहना मूल को खोजने की मेहनत है।

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लीला के संचालन में आने वाली दिक्कतें विचित्र हैं। पैसे और संसाधन इकट्ठा करना एक चैलेंज है। हिन्दू उच्च वर्गों में रामलीला के प्रति उपेक्षाभाव है। इसी समय होने वाली दुर्गापूजाएँ ज़्यादा चमकीली और उत्तेजक हैं। वे परम फैशनेबल हैं और वक्त के साथ चलने में माहिर। सत्ता-राजनीति और कारपोरेट सेक्टर ने उनके भीतर अपने अभेद्य लालची ठिकाने बना लिये हैं। उनके संगठन में माफिया का बोलबाला है। लोग उनसे डरते हैं और यह वक़्त ऐसा है जिसमें लोग जिस चीज़ से डरते हैं उसी को पसंद करते घूमते हैं। दुर्गापूजाएँ, अजीब ट्रेजिडी है, कि बदनाम होकर प्रतिष्ठित हैं। रामलीला से उनका कोई प्रत्यक्ष टकराव नहीं है, लेकिन टकराव प्रत्यक्ष कहाँ होते हैं? लीलासमितियाँ प्राचीन हैं। उन्हें राजाओं, रईसों और महाजनों से लीला करने के लिए भूखण्ड मिले हैं। उन्हें छीन लेने और उन पर कब्जा कर लेने के षडयंत्र लगातार होते रहे हैं। लेकिन लीलाएँ खुद को बचाना और बढ़ाना जानती हैं। सबसे प्राचीन और समृद्ध रामलीला समिति ने नगर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित वकील को अपना सचिव बना लिया है।

यह भी एक लीला है।

19
रामकथा में एक बद्तमीज पक्षी है, जयन्त। राम उसकी आँखें फोड़ देते हैं। तुलसी के ‘मर्यादित’ टेक्स्ट में यह प्रसंग कुछ ऐसे घटित होता है कि वह पक्षी सीताजी के चरणों को अपनी चोंच के प्रहार से घायल कर देता है। वाल्मिकी के यहाँ पक्षी ज़्यादा उद्धत है। वह सीता के स्तनों को छलनी करता है। बहरहाल, यह लीला उस पक्षी की चंचलता की तरह घटित होती है। ढलती दोपहर में एक बड़े मैदान में लोग ख़ासकर नौजवान और किशोर - हाथों में पत्थर लेकर नेत्र-भंग की लीला होने का इंतज़ार करते हैं। राम जयन्त के मुखौटे की आँखों में जैसे ही तीर का स्पर्श (स्पर्श-मात्र) कराते हैं, जनसमूह उस बदमाश पक्षी पर पत्थरों की बारिश करने लगता है। जयन्त का मुखौटा पहना आदमी अक्सर लहूलुहान हो जाता है। कई बार वह जान बचाने के लिए भागता हुआ पुलिस थाने में छिप जाता है।

इसी बीच वह पक्षी हेल्मेट पहनकर लीला में आने लगा है।

20
प्रयोग ‘एब्सोल्यूट’ नहीं है। वह हमेशा परम्परा की सापेक्षिकता में घटित होता है। प्रयोग से जिस चीज़ पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है उसका भी नाम परंपरा है। रामलीला के भीतर न जाने कितने प्रयोग उपस्थित हैं और उतने ही ज़्यादा प्रयोगों की संभावनाएँ। हरेक आगामी स्पंदन की जगह वहाँ है और उसके परिसर में पर्याप्त बड़प्पन है। वहाँ भीड़-भड़क्के और शोरगुल का आलम है और नए का स्वागत करने की वत्सल ललक। वह छोटे से छोटे नवाचार से आपादमस्तक थरथरा जाती है और झूमते हुए उसे ख़ुद में शामिल कर लेती है। उसके प्रकांड अतीत के तथ्य देखकर लग सकता है कि वह कोई स्थिर और बंद चीज़ है। लेकिन रामलीला के साक्ष्य से साबित होता है कि ऐसा है नहीं। ‘इम्प्रोवाइजेशन’ के लिए लीला के भीतर मनमानी जगहें हैं।

मसलन्, एक शाम एक पिता अपनी दो साल की बच्ची के साथ लीला में पहुँचे। रावण का दरबार लगा हुआ था और कुछ ही देर में अंगद अपने पाँव जमाकर उसे हिला-भर देने की चुनौती वहाँ उपस्थित राक्षसों को देने वाला था। यह लीला उसी मैदान में होती है जहाँ राम-रावण युद्ध होता है। बगल में युद्धस्थल निर्माण चल रहा था। मूँगफली, गुब्बारों और गरीब खिलौनों की दुकानें लगी हुईं थी। थोड़े सयाने बच्चों का मन इस ठहरी हुई दरबारी लीला में नहीं लग रहा होगा इसलिए वे दौड़धूप के खेल खेल रहे थे। रामायणियों का दल मानस की प्रसंगानुकूल पंक्तियाँ गा रहा था। पिता गोद की बच्ची के साथ रावण-दरबार के करीब पहुँचते गये। एक ही आसन पर तीन राक्षस विराजमान थे। बीच वाला भव्य है इसलिए वही रावण है।

तो सिर से कमर तक कपड़े का शानदार चेहरा पहने रावण की निगाहें बच्ची से मिलीं। छोटी बच्ची रावण की आँखों की चंचल बदमाशी को समझ नहीं सकी होगी। इसलिए उस पर कोई असर नहीं दिखा। वह डिजिटल ज़माने की बच्ची - तमाम कार्टून चैनल्स पर इस गरीबतर रावण से न जाने कितने गुना वीभत्स डरावने आकार देखने की अभ्यस्त। लीला के रावण का किंचित अपमान हुआ। वह धीरे से उठा। यह बड़ा एकान्त उठाना था। जैसे सृष्टि में कहीं भी इसे नोटिस न किया गया हो। एक सर्वथा अलक्षित मानवीय क्रिया। सिर्फ़ एक पिता और एक बच्ची सरीखे दो ग़ैर ज़रूरी दर्शकों के सामने घटित होता रंगकर्म। मूल कथा से दूर, मूल कथा से भिन्न, कहानी की वयस्क केन्द्रीयता के विरूद्ध ‘अनाख्यान’ के पक्ष में एक किशोर उत्पात। बहरहाल, तलवारधारी रावण ने गोद की बच्ची को दौड़ा लिया। और इस बार बच्ची डर गई। यह संवेदना का ‘वर्चुअल टूर’ नहीं था, जीवन-वास्तव था। यह कला-वास्तव थी।

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धर्म के विभिन्न मतांतर, परस्पर विरोधी जीवनदृष्टियाँ और भाँति-भाँति के पक्ष-प्रतिपक्ष रामलीला नामक सांस्कृतिक अभियान में साथ-साथ सक्रिय हैं। यह महान तथ्य सुस्थापित है लेकिन इसे अभिनव उदाहरणों के साथ बार-बार दुहराने की ज़रूरत है। मौनीबाबा की रामलीला में मेघनाथ की भूमिका पाँचों वक़्त का नमाज़ी एक मुसलमान अदा करता है। साल भर ‘राधे-राधे’ जपने वाले बल्लभाचार्य संप्रदाय के अनुयायी, गोपाल जी के भक्त, नित्यप्रति गोपाल मंदिर की परिक्रमा करने वाले और सम्भवतः वर्ष में एक बार भी विश्वनाथ जी की ओर रुख़ न करने वाले कट्टर पुष्टिमार्गी बाईस दिनों के लिये राम के हो जाते हैं। यों, ऐसे सारे परस्पर उलझे हुए संदर्भ रामलीला के साथ रहकर, लेकिन उसके समानान्तर, एक और लीलामय जीवनलीला सम्भव करते हैं।
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17 comments:

किसी भी समय में किसी भी कवि के लिए इतराने के लिए कोई गुंजाइश कभी नहीं होती. इस मायने में अनुराग आपकी प्रस्तुति टिप्पणी अच्छी नहीं है, वो भी तब जबकि आपकी साहित्यदृष्टि भी हर तरह से अद्भुत है.

हाँ ये कविता (जी हाँ...मैं इसे अनिवार्य रूप से कविता ही कहना चाहूँगा) शानदार है और व्योमेश के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है. ये बताती है जीवन के किस किस कोने में कविता संभव है और व्योमेश जैसा कवि ही उसे इस तरह और इस क़दर संभव कर सकता है. व्योमेश की संभावना सिर्फ़ युवा पीढ़ी की नहीं, समूची समकालीन हिंदी कविता की है. उसके संग्रह पर मुझे गर्व है, जो कविता से जुड़े हर व्यक्ति को होना चाहिए....हालांकि उस संग्रह पर लदे विद्वानों के बोझ से मुझे शिकायत भी रही है और मैंने साफ़ तौर पर कवि को इस शिकायत से अवगत करा दिया है. मैं दुआ करता हूँ कि इस कविता पर उतनी बहस हो, जितने की यह हक़दार है. अनुराग आपको शुक्रिया कि आपने इसे सबद पर लगाया. सबद अब पसंद से आगे बढ़ कर हमारी रचनात्मक दुनिया की अनिवार्यता बन चुका है. आपको भी शुभकामनाएं.


रंग प्रसंग में यह 'नॉन फिक्शन' की तरह प्रकाशित है। क्या यह 'संस्करण' कुछ फर्क है?


shireeshji, maine idhar ki kavita par itrane ki baat kahi thi, jismen anya kaviyon ki kavitayen bhi shamil hain, akele vyomesh ki nahin...mujhe khushi hai ki apne tarkon se aap bhi vyomesh ko, aur unki is kavita vishesh (jise giriraj rang-prasang ka sandarbh dekar kathetar-gadya kah rahe hain) ko umda maante hain...prastuti tipanni ke liye ranch matr ka khed nahin mujhe...


ऐसा लगता है जैसे व्योमेश की कविता पर बात करते हुए रहबरों/रहजनों,युवतरों/कमतरों आदि का ज़िक्र करना अनिवार्य हो गया है.
इस रचना-विशेष को कविता मानने या न मानने की अंतहीन बहस में न पड़ते हुए इसके कथ्य के विशाल स्पेक्ट्रम की दाद देनी होगी. चलते-चलते,इसी रचना के शब्दों को उद्धृत करते हुए इतना ही कि 'प्रयोग एब्सोल्यूट नहीं है; वह हमेशा परम्परा की सापेक्षता में घटित होता है'.


@ bharatbhushanji : aur yah kavita bhi parampar-sapeksh hi hai...swayam hindi me is shilp me kavita sambhav hui hai...yahan uski utkrishtta aur kathya ke sath bhashik antarkriya ko hi visheshtath rekhankit kiya gaya hai...zahir hai vyomesh par baat karte hue ( parampar-saapekshata ki wajah se hi ) ab logon ko poorv ke kai kaviyon ki kavitaon ka dhyan rakhna hoga...kamtar/behtar se achha unhen rahbar kahna hai...


अनुराग मेरा मकसद हरगिज़ ये नहीं है कि आपको या किसी को भी कोई खेद हो. मेरे कहे को समझने की कोशिश कीजिये और कुछ न हो तो फिर छोड़ दीजिये- वो मेरे कहे की सीमा भी हो सकती है. व्योमेश की कविता को मैं अच्छा समझता हूँ इस पर ख़ुश होने की भी शायद ज़रुरत नहीं. क्योंकि मेरा कहा हर तरह से मेरा कहा है. मेरे अपने तर्क हैं जो अपनी क्षीण साहित्यिक चेतना के बावजूद सिर्फ़ मेरे तर्क हैं. साथ ही यह भी कि शायद मैं एक बहुत ही फूहड़ और ज़िद्दी आदमी भी हूँ - यह बात आपसे से नहीं व्योमेश से कहना चाहता हूँ, चूंकि बात इस पोस्ट पर छिड़ी इसलिए यहीं से उस तक पहुंचा रहा हूँ.


कोई कविता सिर्फ़ आकार से बड़ी नहीं बनती. उसमें दर्ज़ जीवनानुभव उसे बड़ा बना देते हैं, जिनके कुछ विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक आशय होना भी मेरे लिए अनिवार्य है. व्योमेश की इस कविता को उदाहरण बनाया जा सकता है. ये लीला अद्भुत ढंग से लाक्षणिक है. विदग्ध और चुटीले शिल्प मे, जहाँ एक संसार अपनी तरह से बनाया- बसाया जा सके. समूचे समाज की लीला जो उसके कई कई आवरण उघाडती चलती है. यहाँ कवि का सामर्थ्य इसमें है कि वह ख़ुद किसी लीला में नहीं फंसता. कविता बताती है कि उसकी राजनीति क्या है और वह उसके लिए कितनी समर्पित है. चार सौ साल की परंपरा के आख़िर क्या समकालीन अभिप्राय हैं. हमें चीज़ों कहाँ से पकड़ना चाहिए, इस तमीज को सीखने का यह एक दुर्लभ अवसर हो सकता है. दरअसल यह शिल्प इतना सजग नहीं, जितना एक कोण के सरलीकरण में दीखता है. इसके लिए तो एक तरह का फक्कड़पन चाहिए, जिसका मुश्किल किन्तु सफल संधान यहाँ दिखाई दे रहा है. सांस कहीं नहीं टूटती, कुछ टूटता है तो हमारा भरम. ये जो नया पहलू जीवन और कविता का व्योमेश ने किसी उस्ताद की तरह पकड़ा है, उस पर कुर्बान जाने को मन करता है. व्योमेश पर कई कई बार कुछ लिखने की कोशिश की पर हर बार मेरी ख़ुद की सांस टूट गई. आगे कभी लम्बी सांस खींच कर फिर जुटूंगा ... उसका संग्रह लगातार चुनौती दे रहा है मुझे !!!!


@अनुरागः इसे कथेत्तर गद्य मैंने नहीं, रंग प्रसंग ने कहा है, या खुद लेखक ने। मुझे लगा यहाँ प्रकाशित पाठ उससे कुछ भिन्न होगा। ऐसा है कि नहीं, यही पूछा था मैंने। या तो प्रयागजी ने कविता को नॉन फिक्शन की तरह छापा है या आपने नॉन फिक्शन को कविता की तरह। खुद लेखक का क्या कहना है, यह जानना दिलचस्प होगा। उसने क्या एक पाठ को एक जगह नॉन फिक्शन की तरह और दूसरी जगह कविता की तरह छपवाया है? या सम्पादकों को यह कह कर भेजा कि 'कुछ' भेज रहा हूँ पता नहीं कविता है या नॉन फिक्शन। जो कि हो सकता है।

@ शिरीषः तुम्हारे दोस्ती के अंदाज भी उतने ही अटपटे और अप्रत्याशित हैं। बलिहारी हो!


@अनुराग जी- परम्परा-सापेक्षता की बात आपके प्राक्कथन से स्पष्ट नहीं होती; या अगर मैं ही इसे ग्रहण नहीं कर पाया तो क्षमा करें.विस्तार से बताने हेतु धन्यवाद.
रचना की उत्कृष्टता से और भाषिक अंतर्क्रिया से इनकार नहीं है. पर चूंकि बात चली है तो इतना कह दूँ कि मेरे विचार में यह रचना आधे रास्ते तक ही कविता बनी रहती है.
उसके बाद रचनाकार कथ्य के विशाल स्पेक्ट्रम के आगे समर्पण कर देता है.और इसी रचनाकार-आलोचक के अंदाज़ में बयां किया जाये तो-'यही समर्पण इसका हासिल है,यही सार्वजनिकता है जो खुद लिखी जाकर सर्जक और पाठक को भी बनाती बढ़ाती चलती है.'


@ girarajji : yh mujh tak 'kuch' bhej raha hun kah kar hi aai thi aur ise kavita se itar bhala main kya manta? yah kavita hai, ise batane k liye sanket kiye gaye hain, aur aapka aisi kavitaon se aprichay hoga, yh maanna kathin hai...prayagji ne rang-prasang me ise prakashit krte hue sambhav hai aalekh kaha ho, iske kawyatmak gunon ko ginana ve bhool gaye hon, aisa mujhe nahin lagta...behtar hota yadi aap swayam bhi iske kavita hone-na-hone ke tarkon ke sath samne aate...aap usse piche ki baten karke hi santosh-laabh karna chahte hain, tab to koi baat hi nahin...


@ गिरिराज - यार मैं अपने ही शब्दों में कहूँ तो "मैं ऐसे बोलता हूँ जैसे कोई सुनता हो मुझे!"


प्रिय अनुराग जी और दोस्तो

कुछ बातें हैं. ये अनिवार्य नहीं हैं लेकिन आती-जाती रही हैं. आपका अक्सर आग्रह रहा है कि कवियों की रचना-प्रक्रिया सामने हो और उस पर बात हो सके. यह विचार हमेशा ज़रूरी है. यह अलग बात है कि मैं ही कभी ऐसा लिख न सका. अब भी जो कह रहा हूँ उसे रचना-प्रक्रिया न मानिएगा. क्या तो रचना और क्या रचना-प्रक्रिया. बस, लीलामय के सिलसिले में जो बहुत आस-पास थीं, ये वही बातें हैं.

रामलीला से पुराना परिचय है. कविता से भी पुराना. यह लीला तरह-तरह से आकर्षित-विकर्षित करती रही है. लगातार. इस बीच वह कई बार बर्बाद हो रही चीज़ों के 'सिम्बल' की तरह लौटती रही. इसी तरह के कुछ ख़याल और थे, बल्कि कई ख़याल. दृश्य और अनुभव. वे अपार थे. असिद्ध, अप्रमेय, अमूर्त. मैं उन्हें सोचना चाहता था. कविता की शर्तों पर उन्हें पाना चाहता था. यह रचना उसी की कोशिश है. मैं चाहता था यह 'कविता' हो. यह कविता लिखने की चाहत है या कविता का प्रस्ताव. और अगर कोई पूछेगा कि 'यह तुमने क्या चीज़ लिखी है', तो मैं नहीं कह पाऊंगा कि 'कविता'. और अगर यह कविता नहीं है तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता. 'लीला' यह नहीं है कि 'वह कविता है या नहीं'. वह बस है. जैसे रामलीला है.

कुछ आत्मप्रशंसा हुई हो तो नज़रंदाज़ कीजिएगा.


bachpan me dekhi hui ramlila ki tamam drisye bilkul aise hi the. ramlila se apna parichaye isi tarah hua tha sayed. एक सर्वथा अलक्षित मानवीय क्रिया। सिर्फ़ एक पिता और एक बच्ची सरीखे दो ग़ैर ज़रूरी दर्शकों के सामने घटित होता रंगकर्म। मूल कथा से दूर, मूल कथा से भिन्न, कहानी की वयस्क केन्द्रीयता के विरूद्ध ‘अनाख्यान’ के पक्ष में एक किशोर उत्पात। bahut- bahut badhai.


is kavy leelaa men sampaadan kee kaafee gunjaish hai.antim do tukde hee bahut the.is par sochanaa vyomeash.


vyomeshji ka khilandarapan mujhe bahut achha lagta hai.


मित्रवर !
मैंने कविता पढ़ी ..
शिल्प पर जिसको बहसियाना हो सो बहसियाये ,
हम तो अपनी बात ' कंटेंट ' के हिसाब से कहेंगे ..
आप तौ मुक्तिबोध को घोट चुके होइहौ , यहिकारण
कम म कहै के लिए उनही कै सहायता लियब ..
'' कविता एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है ''
मैं कह रहा हूँ चूंकि यहाँ '' सांस्कृतिक प्रक्रिया '' ख़ूबसूरत ढंग से
आकार ले रही है , इसलिए यहाँ '' कविता '' है और वह भी सशक्त !


abhi iss vaqt padhaker mugdh hoon ki ek leela mere man me ghatit hui hai!


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