Monday, November 30, 2009

विचारार्थ : २ : इस पुरस्कार के प्रायोजक हैं...

गुरुदेव की आड़ में अकादेमी का 'सामसुंग' साहित्य प्रायोजन

विष्णु खरे
संसार भर के लेखक और बुद्धिजीवी, वे वामपंथी हों या न हों, कथित 'खुलापन', 'उदारवाद', 'बाजारवाद', 'उपभोक्तावाद', 'विज्ञापनवाद', 'प्रयोजन्वाद' तथा बहुराष्ट्रीय व्यापार निगमों के विरुद्ध हैं। सामान्यतः राष्ट्रवाद और विशेषतः वामपंथ के कारण, भारतीय साहित्यकार, और उसमें भी हिन्दी के कवि-कथाकार-आलोचक, जो अधिकांशतः 'प्रतिबद्ध' विचारधारा में यकीन करते हैं, वर्तमान नव-पूंजीवाद के ख़िलाफ़ हैं। यहाँ तक कि वे कथित 'नक्सलवाद' की दिग्भ्रमित हिंसा का विरोध तो करते हैं लेकिन उसकी आधारभूत भावना के नैतिक-सैद्धांतिक समर्थक हैं। आज हिन्दी का शायद ही कोई आत्मसम्मानी लेखक हो जो आर्थिक और राजनीतिक नव-साम्राज्यवाद का विरोध अपनी विधा में न कर रहा हो- वह ईमानदारी और कला की शर्तों पर कितना खरा उतर रहा है, उसके पाठक उसे समझदारी और गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं, यह अलग बहसों के विषय हैं। लेकिन ऐसी आशंका है कि भारत सरकार और उसके साहित्यिक प्रतिष्ठान या तो भारतीय लेखकों के इन रुझानों को जानते-समझते नहीं, या हैं भी तो उनकी परवाह नहीं करते, या यह जानने के लिए कि अपनी प्रतिबद्धता में साहित्यकार कहाँ तक जा सकते हैं, वे उन्हें उकसाने के लिए कोई अतिवादी हरकत कर बैठते हैं।

पिछले लगभग २५ वर्षों से साहित्य अकादेमी अपने उत्तरोत्तर पतन के कारण पर्याप्त कुख्याति अर्जित करती आ रही है और इस प्रक्रिया में उसने हिन्दी तथा शेष भारतीय साहित्यों और लेखकों को भी भ्रष्ट किया ही है, किंतु यदि उसने अपना ताज़ातरीन कारनामा अंजाम न दिया होता तो वह कल्पनातीत ही समझा जाता। साहित्य अकादेमी ने पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय व्यापार निगम 'सामसुंग' के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए हैं जिसके तहत वह चौबीस नए साहित्यिक पुरस्कार स्थापित करेगी जो यद्यपि 'रवींद्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' के नाम से जाने जायेंगे, किंतु उनकी रकम और पुरस्कार-निर्णय-प्रक्रिया का खर्च 'सामसुंग' देगी।

हालाँकि अपने मोबाइल फ़ोनों, प्लाज्मा टेलीविज़नों, फ्रिजों और अन्य उपभोक्ता उत्पादों के कारण और उनकी बिक्री के लिए करोड़ों रुपयों के अपने विज्ञापनों के ज़रिये 'सामसुंग' अब 'शाइनिंग' और 'इन्क्रेडिबल इंडिया' के लिए कोई अपरिचित छाप-नाम (ब्रांड नेम) नहीं रहा, फिर भी उसके संबंध में कुछ तथ्य शायद उपयोगी हों। कोरियाई भाषा में उसके नाम का हिन्दी अर्थ 'त्रिनक्षत्र ' ( अंग्रेज़ी में 'थ्री-स्टार्स' ) होगा और ये तीन सितारे हैं, 'सामसुंग इलेक्ट्रानिक्स', 'सामसुंग हैवी इंडस्ट्रीज' तथा निर्माण कंपनी 'सैमसंग सी एंड टी'। पिछले वर्ष तक 'सामसुंग' की सकल संपत्ति २५ खरब, 2५ अरब अमेरिकी डॉलर थी, उसका मुनाफा एक खरब सात अरब डॉलर था। आज डॉलर का भाव करीब ४७ रुपये है। 'सामसुंग' दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी कंपनी है, अपने देश का २० प्रतिशत निर्यात करती है, संसार की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक है, 'सोनी' से भी बड़ी, और विश्व की सभी किस्म की कंपनियों में उसका स्थान १९ वां है। दक्षिण कोरिया को परिहास में 'सामसुंग गणराज्य' कहा जाता है और और स्वयं 'सामसुंग' को 'औपनिवेशिक साम्राज्य' और 'भूखा डायनासोर' कहकर पुकारा जाता है। जब वह ईमानदार राष्ट्रों में ही सरकारों को प्रभावित कर सकता है तो संसार के भ्रष्टतम देशों में वह किन व्यक्तियों और संस्थानों को नहीं खरीद सकता।

'सामसुंग' का दुस्साहस इतना बढ़ा हुआ है कि उसने चार वर्ष पहले अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ' डायनैमिक रैंडम एक्सैस मेमोरी' की कीमतों में हेराफेरी के ज़रिये कई बड़ी अमरीकी कंपनियों को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश की लेकिन कानून के शिकंजे में आ गई। अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने उस पर ३० करोड़ डॉलर का फौजदारी जुर्माना किया जो अमेरिका में इस तरह के अपराधों के लिए दूसरा सबसे बड़ा दंड है। 'सामसुंग' के तीन अधिकारीयों को, भले ही कुछ महीनों के लिए, लेकिन जेल जाना पड़ा।

दक्षिण कोरिया में तो 'सामसुंग' के स्वामी और प्रमुख ली कुन-ही स्वयं को देश का मालिक ही समझते थे लेकिन पिछले वर्ष उन्हें अप्रत्याशित सदमा तब पहुँचा जब टैक्स-चोरी और अन्य अपराधों के लिए सरकार ने उन पर ११ करोड़ ३० लाख डॉलर का जुर्माना किया। वे हवालात भी जा सकते थे लेकिन उससे कोरिआई अर्थव्यवस्था और स्वयं 'सामसुंग' कंपनी डांवाडोल हो जाती, इसलिए उनसे अपने पद से इस्तीफा देने को कहा गया। उनके उपाध्यक्ष ली हाक-सू और ख़ुद उनके बेटे ली जाए-योंग को भी त्यागपत्र देने पड़े। 'सामसुंग' के साथ एक ही हादसा हुआ है, जब पिछले दिनों दिल्ली के समीप नॉएडा में स्थित उसकी वाशिंग मशीन उत्पादन इकाई में जहरीली गैस रिसने से ५० से अधिक कर्मचारी भोपाल के यूनियन कार्बाइड कांड जैसी बीमारी के शिकार हो गए थे, उन्हें अस्पताल ले जन पड़ा था, लेकिन जिन छः लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही थी उनका क्या हुआ यह अब तक साफ़ नहीं हुआ है।

संभव है भारत सरकार और साहित्य अकादेमी को 'सामसुंग' के इस हाल के इतिहास और रिकॉर्ड का कुछ पता न हो, हालाँकि आश्चर्य यह है कि किसी अज्ञात करणवश स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आजकल संस्कृति मंत्रालय का प्रभार भी संभाले हुए हैं और उनके पास उनका एक जागरूक मीडिया विभाग भी होगा ही। इतना तो मानकर ही चलना चाहिए कि साहित्य अकादेमी ने 'सामसुंग' के साथ यह करार यदि प्रधानमंत्री कि सहमति से नहीं तो उनके संज्ञान में तो किया ही होगा। वैसे हम जानते ही हैं कि भारत को नई विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने का सेहरा हमारे प्रधानमंत्री के सर पर ही जाता है जब वे नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे और इस तरह यदि साहित्य अकादेमी ने संसार की एक सर्वाधिक ताक़तवर कंपनी से जुड़ने का फ़ैसला किया है तो संस्कृति मंत्रालय ने उसका सहर्ष अनुमोदन किया होगा।

लेकिन साहित्य अकादेमी के कुछ सूत्रों के से विचित्र बातें सुनाई दे रही हैं। कहते हैं कि अकादेमी की सर्वशक्तिमान कार्यकारिणी पर पिछले कुछ वर्षों से दबाव था कि वह अपने पुरस्कारों को बड़ी निजी कंपनियों से प्रायोजित करवाए लेकिन उसने ऐसे प्रयासों को ठुकरा दिया। यह मालूम नहीं पड़ रहा है कि यह दबाव संस्कृति मंत्रालय से आया और क्या यह सामान्य सैद्धांतिक दबाव था या एकमात्र 'सामसुंग' के लिए था? अब यह बताया जा रहा है कि दबाव असह्य और अपरिहार्य हो गया और अकादेमी को, जो ख़ुद को लगातार स्वायत्त कहते रही है, अपने पुरस्कारों को 'सैमसंग' को सौंपना पड़ा।

अकादेमी ने अपने संविधान और पुरस्कार-नियमों की हत्या करके ही यह निर्णय लिया है। उसका एक-एक रूपया केन्द्र सरकार से आता है और अब तक उसके नियमों में बाहरी पैसा लेने का कोई प्रावधान नहीं है। फिर उसके जो नियमित २४ पुरस्कार हैं वे ही 'अकादेमी पुरस्कार' के नाम से जाने जाते हैं और उनके दिए जाने की एक लिखित प्रक्रिया और नियमावली है। अनुवाद के लिए दिए जानेवाले पुरस्कारों का स्थान और प्रक्रिया अलग हैं। लेकिन अकादेमी साहित्य के लिए ही दूसरे पुरस्कार दे और उन्हें 'रवीन्द्र पुरस्कार' या 'टैगोर प्राइज़' कहे, यह न संविधानसम्मत है और न तर्कसम्मत।

अकादेमी अपनी मतिमंद्ता के जाल में फंसती जा रही है। वह कह रही है कि अपने द्वारा मान्य २४ भाषाओँ के नियमित, वार्षिक पुरस्कार तो वह देगी ही, उनमें से ८ भाषाओँ को प्रतिवर्ष वह 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ पुरस्कार' भी देगी। पहले खेप की आठ भाषाएँ होंगी : बांग्ला, हिन्दी, गुजरती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और बोडो। इनके बाद अगले वर्ष आठ और तीसरे वर्ष फिर आठ। चौथा वर्ष फिर भाषाओँ की पहली किश्त से शुरू होगा। 'सामसुंग' का नाम नहीं जाएगा, रवीन्द्रनाथ का जाएगा। गुरुदेव को जोतकर अकादेमी ने बांग्ला साहित्यकारों का तो मुंह शायद बंद कर दिया, ज़ाहिर है कि इसमें अकादेमी के उपाध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने भी अपना कहावती 'पाउंड -भर मांस' वसूला होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्य भारतीय भाषाओँ में महान साहित्यकार हैं ही नहीं कि सिर्फ़ नोबेल पुरस्कार के कारण भारतीय साहित्यों को चिरकाल तक मात्र रवीन्द्र-संगीत गाना पड़े? अकादेमी यह भी कह रही है कि इन 'सामसुंग पुरस्कारों' की रकम उसके नियमित पुरस्कारों से कम होगी। क्यों? क्या इसलिए कि वह इन पुरस्कारों को अभी से दोयम दर्जे का समझती है? या इसलिए कि उसे निर्धन 'सामसुंग' कंपनी को ज़्यादा आर्थिक संघात नहीं पहुँचाना है?

'सामसुंग' की तो यह घोषित नीति है कि वह अपने छाप-नाम के प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए प्रायोजन करेगी। वह कई फुटबाल क्लबों, कर-रेसिंग प्रतियोगिताओं, शीत-ओलंपिकों और नियमित ओलंपिकों की प्रायोजक है। वह भारत की क्रिकेट प्रतियोगिता में भी प्रवेश करनेवाली है। शिक्षा, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी उसकी गहरी घुसपैठ है। इसके लिए अरबों डॉलर नियोजित कर देना उसके लिए सुबह के नाश्ते के बराबर है। भारत सर्कार, संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादेमी ने तो अपनी बौद्धिक का परिचय दिया है कि उसे इतने सस्ते में भारतीय साहित्य और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को बेच दिया।

शायद 'सामसुंग', उसके लिए साहित्य अकादेमी पर कथित दबाव डालने वाले अधिकारी और मंत्रालय, तथा स्वयं साहित्य अकादेमी का वर्तमान तंत्र यह जानते हों कि विश्वव्यापी नई अर्थव्यवस्था तथा बहुराष्ट्रीय व्यापारिक निगमों का जैसा-जितना भी प्रतिरोध कर रहे हैं वे प्रबुद्ध भारतीय लेखक ही हैं। साहित्य अकादेमी की साधारण सभा में विभिन्न साहित्यों के सौ के करीब प्रतिनिधि होते हैं जिनमें वरिष्ट सरकारी अधिकारी भी पड़ें नामित किये जाते हैं। उनमें से कार्यकारणी चुनी जाती है। अब ये सब 'सामसुंग' के समर्थक हो ही चुके और उनके माध्यम से सैंकड़ों अन्य लेखक, जिसमें भावी 'सामसुंग' विजेता भी होंगे, खुलेपन, उदारता, उपभोक्तावाद, बहुराष्ट्रीय निगमों के लाभ भी देख पाएंगे। ज़ाहिर है कि उनका वामपंथ और नाक्सालवाद आदि से मोहभंग हो सकगा। बहुत सस्ते में बहुत बड़ा काम हो जायेगा।

'सामसुंग' प्रयोजन के दूरगामी प्रभाव होंगे। ललित कला अकादेमी और संगीत नाटक अकादेमी, जिनका बाज़ार से सामीप्य साहित्य से कई गुना ज्यादा है, अब अपने पुरस्कार, आयोजन, प्रदर्शनियां आदि देशी-विदेशी महकम्पनियों से प्रायोजित करवाने को स्वतंत्र हैं। चित्रकारों, नर्तकों और गायकों-वादकों की अब और बन आएगी। उनकी इन संस्थाओं को सदेबी, कृष्टि, निजी गैलरियां, विदेशी कम्पनियाँ खुलकर प्रायोजित कर सकेंगी। राज्यों की बीसियों ऐसी अकदेमियां और उनके पुरस्कार, स्वयं सरोकारों द्वारा सीधे दिए जानेवालों पुरस्कार, कंपनियों द्वारा 'फंड' किये जायेंगे। जितनी ज्यादा विदेशी कम्पनियाँ दाखिल होंगी उतने ही अधिक विदेशी लाभ होंगे। अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी, शोषण, अपराध, भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ बोलना उतना ही कम होता जायेगा। जनवादी संघर्षों के लिए समर्थन लुप्त होने लगेगा. एक राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक सलवा जुडूम तैयार होगा।

एक ज़माना था जब वामपंथी, जनवादी, प्रगतिवादी ही नहीं, सामान्य प्रबुद्ध लेखक भी 'कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम' के खिलाफ सच्चे-झूठे खड़े होते थे। फिर एक दौर 'सी.आई.ए.' के छिपे हाथ का आया। अब कभी-कभार इस बात का विरोध होता है कि कोई लेखक किसी फासिस्ट महंत के मंच पर कैसे पहुँच गया, किसी ने भाजपा सरकारों के विज्ञापन क्यों ले लिए या कोई युवा कवि क्योंकर ताक़तवर पत्रिकाओं को अपनी किसी जेबी संस्था के माध्यम से फोर्ड फाउंडेशन की रिश्वतें देता पकड़ा गया। 'सोवियत लैंड नेहरु साहित्य पुरस्कारों' के ज़रिये शायद सोवियत संघ की 'केजीबी' ने भी कुछ किया होगा। उनमें तो मुफ्त रूस-यात्रा भी होती थी। लेकिन इस क्षेत्र में 'सामसुंग' की आमद, वह भी सरकारी रूप से, खुल्लमखुल्ला, एक बिलकुल अनूठे युग की शुरुआत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रगतिशील, जनवादी तथा जन संस्कृति मोर्चा लेखक संगठनों के हमारे मित्र जिनमें सर्वश्री ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल तथा मंगलेश डबराल जैसे मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधी हैं, जो उनके काव्य और गद्य तथा सक्रियता में स्पष्ट दीखता है, उस साहित्य अकादेमी के इस प्रायोज्य 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ साहित्य पुरस्कार' के बारे में क्या सोचेंगे जिसने उन्हें अपने नियमित पुरस्कार से कभी सम्मानित किया था।
****
( विचारार्थ स्तंभ की यह दूसरी कड़ी है. यह महत्वपूर्ण लेख जनसत्ता में छपने के साथ-साथ सबद के लिए विष्णुजी के मार्फ़त मिला था. उनका अत्यंत आभार! )

15 comments:

रूपसिंह चन्देल said...

प्रिय वत्स जी
कल यह आलेख जनसत्ता में पढ़ चुका था लेकिन अपने ब्लॉग में डालकर आप इसे सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए उपलब्ध करवा रहे हैं इसके लिए आपको बधाई.

रूपसिंह चन्देल

prabhat ranjan said...

aapne uplabdh karwake bara achha kaam kiya hai.

कुमार अम्‍बुज said...

यह एक गंभीर और खतरनाक खबर है। इसके संभव आयामों पर विष्‍णु जी ने विस्‍तार से प्रकाश डाल दिया है। साहित्‍य अकादमी या कहें कि भारत सरकार के संस्‍क्रति विभाग के इस घोर आपत्तिजनक निर्णय पर कैसे प्रतिरोध संभव किया जाए, इस पर एक समावेशी योजना बनाई जानी चाहिए। मामला केवल निंदा का नहीं है बल्कि इसके निरोध का है।

nilm said...

what I feel vets ji....that certain things at least we must keep without tags...and sooner we realize it the better...

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह ख़बर काफ़ी ख़तरनाक है तो लेकिन एक और चीज़ यहां मुझे बेहद महत्वपूर्ण लगती है। इस तरह बाज़ार के सीधे और प्रत्यक्ष प्रवेश से एक विभाजन रेखा भी खिंचेगी। एक तरफ़ होंगे इसके समर्थक जो सामसुंग और एल जी पुरस्कारों को मेडल की तरह धारण करेंगे तो दूसरी तरफ़ इनके विरोधी।

एक और बात यह कि हिन्दी साहित्य उतना अलोकप्रिय नहीं जितना इसे बताया जाता रहा है…बाज़ार यूं ही किसी के पास नहीं आता।

हां विष्णु जी को शत शत बधाई…यह सर्वश्रेष्ठ गद्य का अद्भुत उदाहरण है और एक वरिष्ठ कवि की जेनुईन चिन्ता का स्पष्ट परिचायक। प्रणाम स्वीकार करें।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

और हां इसने मेरे उस संकल्प को और पुष्ट किया है कि कम से कम प्रतिबद्ध कहे जाने वाले लोगों को तो किसी प्रकार के सरकारी और व्यापारिक संस्थाओं द्वारा दिये जा रहे समस्त पुरस्कारों का बहिष्कार कर देना चाहिये।

Geet Chaturvedi said...

हैरत है.
बहुत अजीब और ख़तरनाक.

Pankaj Parashar said...

बेहद जरूरी मुद्दा खरे साहब ने उठाया है. बकौल अंबुज जी, मामला केवल निंदा का नहीं है बल्कि इसके निरोध का है। इस जमकर विरोध होना चाहिए और इस बात के लिए सरकार से पक्का आश्वासन चाहिए कि इस तरह की कोशिश अकादेमी दोबारा न करे।
पता नहीं क्यों सैमसंग को विष्णु खरे ने सामसुंग क्यों लिखा है? मसलन वे नोएडा को नोइडा लिखने के पक्षधर हैं, ज्विग को त्स्वाइग लिखने के।

om nishchal said...

yah aalekh sahityakaaron ke liye chetawani hai.
kintu puraskaaron ki havas ke aage aise naitik mudde kab tak astitwa me rahenge. aaj kaun aisa sant sahityakaar bacha hai, jiski mahatwakanchha puraskaar ke sapne na dekhti ho.--om nishchal

शिरीष कुमार मौर्य said...

सचमुच...सचमुच ...सोचने की बात. भारतीय साहित्य के नाम पर लगातार बजते रहे "रवींद्र संगीत" के बारे में मैं भी कई बार सोचता रहा हूँ. आज साहित्य और कविता के एक बड़े विचारक को भी वही सोचते देख रहा हूँ तो अपने प्रति भी विश्वास जाग रहा है. इस ज़रूरी हस्तक्षेप के लिए आदरणीय खरे जी को शुक्रिया. इस तरह का विरोध दरअसल साहित्य से आगे पूरी मनुष्यता के पक्ष में जाता है.

Dhiresh said...

क्या आफत आ गई. अचानक तो कुछ हो नहीं गया. हर कोई जानता है कि लेखकों के लिए
अकादमियां, पुरस्कार और नियुक्ति कितनी बड़ी चीज होते हैं. अकादमी में क्या कुछ चल रहा है, लम्बे समय से और कितना विरोध हो पाया है? कई दिग्गज तो पेंडुलम की तरह इस खाने से उस खाने तक झूलते रहते हैं. पिछले कई हादसों पर कोई सामूहिक विरोध का स्वर दिखाई, सुनायी नहीं दिया. कई तो पहले विरोध करते है और फिर सौदा पट जाने पर तलुए चाटने पहुँच जाते हैं. अब क्या होगा देखते हैं? ऐसे निर्ल्लज लेखक समाज को सरकार, समसंग या कोई भी गांगुली कभी भी औकात बता सकता है.

Pradeep Jilwane said...

मैंने एक दो जगह इधर-उधर इस संबंध में पढ़-सुन रखा था. आपने इसे यहां उपलब्‍ध कराकर मेरी और अन्‍य कईं साथियों की मुश्किल हल कर दी. विष्‍णुजी को लेख और आपको प्रस्‍तुति के लिए बधाई...

शरद कोकास said...

सम्भावना 1 इससे भारतीय साहित्य जिसमे हिन्दी और बंगला साहित्य दोनो ही आता है की लोकप्रियता जैसी कोई बात नहीं पता नहीं सैमसंग ने विश्व की अन्य भाषाओ के साहित्य के लिये भी ऐसी पेशकश की हो .बाज़ार में उसे अपना माल बेचना है । निश्चित ही इससे लेखक दो वर्ग मे बटेंगे ।
सम्भावना 2 साहित्य अकादमी आज प्रसन्न ह लेकिन उसका मान कम हो भविष्य मे ।
सम्भावना 3 यह तो विष्णु जी ने कहा ही है कि संघर्ष की धार भोथरी हो जायेगी ।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

इस बारे में मुझे एक माह पहले कुछ खबर मिली थी, जिसके अनुसार रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर दक्षिण कोरिया सरकार एक पुरस्‍कार देना चाहती है। साहित्‍य अकादमी के एक सदस्‍य ने बताया था कि इसमें दक्षिण कोरिया सरकार का प्रतीक चिन्‍ह और टैगोर का नाम भर होना था, सैमसंग या किसी कंपनी का कहीं कोई जिक्र नहीं था। अब जैसा कि विष्‍णु जी बता रहे हैं तो यह बहुत खतरनाक बात है। आज जैसा वैश्विक कार्पोरेट माहौल है, उसमें सैमसंग ही क्‍या कोई भी बड़ा कार्पोरेट हाउस सरकारों को खरीदने की ताकत रखता है। खेलों में यह पहले से ही चल रहा है, संस्‍कृति में नाटक और संगीत के अनेकानेक कार्यक्रमों में कार्पोरेट पूंजी की घुसपैठ मुंबई-दिल्‍ली में काफी समय से चल रही है। साहित्‍य बचा था, अब वो भी पूंजी की जकड़ में आने वाला है। वैसे एक बात पर गौर किया जाना चाहिए कि सरकारी सम्‍मान-पुरस्‍कारों के अलावा साहित्‍य में जितने भी पुरस्‍कार हैं, खास तौर पर बड़े पुरस्‍कार, वे सबके सब पूंजीपति घरानों के हैं, के.के. बिडला फाउण्‍डेशन के पुरस्‍कार हों या दयावती मोदी, मूर्तिदेवी, लखोटिया, गोयनका, आदि आदि। इसी तरह कई नगर, प्रांतों में कई धन्‍ना सेठ साहित्‍य के पुरस्‍कार देते हैं। इन पुरस्‍कारों को लेकर ही कोई सामूहिक निर्णय आज तक नहीं हुआ, फिर दक्षिण कोरिया सरकार या सैमसंग के पुरस्‍कार को लेकर कैसे होगा। बहस इतनी लंबी है कि लेखक चुपचाप पुरस्‍कार लेकर चले आते हैं और किसी बहस में नहीं पड़ना चाहते। बहरहाल इस भयावह पूंजीवादी और कार्पोरेट सत्‍तावादी माहौल में अभी दक्षिण कोरिया सरकार के माध्‍यम से सैमसंग आ रहा है, जल्‍द ही अमेरिका के माध्‍यम से और कई कंपनियां साहित्‍य सेवा के लिए आएंगी, तब हम कितना विरोध कर सकेंगे, इस पर विचार शुरु कर देना चाहिए।

pallav said...

yah bhi hona tha.