Saturday, November 28, 2009

विचारार्थ : १ : इयुजेनियो मोन्ताले


वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है

नया मनुष्य बहुत बूढा पैदा हुआ है. वह नई दुनिया को झेल नहीं सकता.जीवन की मौजूदा स्थितियों ने अब तक अतीत के चिह्नों को मिटाया नहीं है. हम बहुत तेजी से दौड़ते हैं, पर फिर भी कहीं पहुँचते नहीं. दुसरे शब्दों में, नया मनुष्य एक प्रयोगात्मक अवस्था में है. वह देखता है पर विचार करने में असमर्थ है.
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सड़क पर चलते आदमी को भी विशिष्ट होने का अधिकार है. वह भी अपने बारे में यह भ्रम रख सकता है कि सच्चाई को जिस तरह वह जानता है, वह तमाम बुद्धिजीवियों की उपलब्धियों से ज्यादा मौलिक है. पर भीड़ का मनुष्य भीड़ की तमाम बुराइयों का शिकार है. हममें से कोई इससे बचा नहीं है.
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कलाकार का अलग-थलग पड़ जाना ( अक्सर यह स्थिति प्रचार पाने की एक बेहया प्रदर्शनप्रियता में भी बदल जाती है ) एक ऐसे समय में लाजमी है जब कर्म और ज्ञान दो विपरीत दिशाओं के यात्री हैं और कभी-कभार केवल संयोग से ही मिलते हैं.

{ एक उदाहरण : Just 24 hrs. left to return to my beloved country...but I'm sad inside...scared of those power-centers who might have planned something again to put my life in a state of unwelcome nomad.... Can't there be an end to such 'games' by just a few ? Can I only see a bird singing a welcome song for an author who simply needed a sleep, peace and love....in my land..?
यह उक्ति उदय प्रकाश जी की है जो उन्होंने २४ नवम्बर को अपने
फेसबुक वाल पर लिख छोड़ा है. प्रदर्शनप्रियता के किसी और बेहतर उदाहरण के अभाव में ही उदय जी की उक्ति वहां से साभार ली गई है. बहरहाल!}
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एक जीवंत काव्य-रचना के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है, और न ही वह स्वयं में कोई नकारात्मक स्थिति है. हर सच्चे कवि की अपने तरीके से एक प्रतिबद्धता होती है...हाँ, यह स्वाभाविक है कि पेशेवर कवियों ने अक्सर अपने संरक्षकों, युवराजों और अभयदाताओं के प्रति अपने उदगार व्यक्त किये हैं, पर फिर भी कविता का इतिहास ऐसी महान रचनाओं का इतिहास भी है जिन्होंने किसी भी किस्म की निरंकुशता को स्वीकार नहीं किया है. कोई भी कविता अपने समय में प्रचलित प्रतिबद्धता के अर्थ को पूरा करे या न करे पर वह अपने समय का प्रत्युत्तर ज़रूर होती है.
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कविता आज की कला में बखूबी अंट सकती है पर आज के समाज में कवियों की स्थिति? सामान्यतया वह बहुत अच्छी नहीं है. कुछ कवि भूखे मर जाते हैं, कुछ जो दूसरा कुछ काम करते रहते हैं, वे बेहतर जीवन यापन कर लेते हैं. कुछ कवि निर्वासन में चले जाते हैं, कुछ अपने पीछे बिना कोई निशानी छोड़े अदृश्य हो जाते हैं. बाबेल और मान्देल्स्ताम कहाँ चले गए? ब्लाक और मायकोवस्की यदि खुद को ख़त्म न कर लेते तो क्या करते ? ( यह सूची और भी लम्बी हो सकती है.)...और दूसरे अनेक कवियों की वजह से हमें वह अपकीर्ति भी समझ में आती है --वह खंदक जिसमें आकर आधुनिक कविता का पशु गिर पड़ा है. यह केवल समाज की गलती नहीं है, एक बड़ी हद तक इसमें कवियों का भी दोष है!
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( उपरोक्त विचार इतालवी कवि इयुजेनियो मोन्ताले के हैं. कविता और विचार पर केन्द्रित कवि-आलोचक विजय कुमार के संपादन में निकले उद्भावना के कवितांक में मोन्ताले का निबंध पढ़ा था. ये विचार-बिंदु वहीं से साभार लिए गए हैं. सबद पर मोन्ताले के साथ ही विचारार्थ नामक स्तंभ शुरू किया जा रहा है. इसके दायरे में ज़ाहिर है, सिर्फ साहित्य नहीं होगा, हालाँकि उसका होना अनिवार्य होगा. )

6 comments:

मनीषा पांडे said...

Your blog is a Gem my dear...

Uday Prakash said...

kyaa aap log ab jeene denge...? yah main imaandaari aur gambheerataa se poochh rahaa hoon.
Hope you have moralities still left after all these demonic barbarities and moral degradations...

Ratnesh said...

1.'हम बहुत तेजी से दौड़ते हैं, पर फिर भी कहीं पहुँचते नहीं' Montale hamare samay me manushya ki badhawas sthiti pr sateek tipanni ki hai.
2. Uday Prakash jaise rachnakar ki bechaini samjh se pre hai.

Anonymous said...

हिन्दी भाषा के लेखक की ट्रेजेडी यह है वह अपनी थोड़ी सी सफलता भी पचा नहीं पाता.आत्म मुग्धता की बीमारी बड़ी जल्दी उसे घेर लेती है.उदय प्रकाश ने कुछ अच्छी कहानियां लिखी है पर अब वे एक विशेष किस्म की आत्म मुग्धता के शिकार हैं.उन्हें लगता है कि सब उनसे जलते हैं, सब उनके दुश्मन हैं.वे अपनी पीड़ा और निर्वासन के सच्चे-झूठे किस्से गढ़्ते रहते हैं. लेखक द्वारा अपनी व्यक्तिगत पीड़ा का यह सार्वजनिक रुदन बहुत रुग्ण एवं हास्यास्पद है. सच तो यह है कि यह एक नौटंकी अधिक लगती है. समाज में जो सचमुच बहुत पीडित हैं वे अपने दुख का इस तरह ढोल नहीं पीटते .उदय प्रकाश जिस तरह अपने निर्वासन के किस्से बताते रहते हैं , उनके आधार पर कोई उन्हें सोल्ज़ेनित्सिन, नाज़िम हिकमत या महमूद दरवेश तो मानने से रहा.
-कनक तिवारी

prabhat ranjan said...

montale ka anuvad achha laga. dhanyavad itne achhe anuvad ko parhwane ke liye.

shraddha said...

ek aise samay me jab bade bade kalakaar bhi zyada se zyada janta ke beech jana chahte hai,hamesha news me bana rehna chahte hai, thik usi samay me wo apni hi vidha ke logo se barabar doori banaye rehna chate hai .aisa kyon? zara sochne ki baat hai, zaha tak muzhe lagta hai is upar se shant dikhne wale hindi literature me bhi badi uthapatak hai, swasth pratispardha ka prashn shayad bemani ho chala hai.aage wale jo jagah bana chuke hai use chodne ko taiyar nahi, aur peeche wale aage badhne ke liye har hathkanda akhtiyar karne ko taiyar hai.....