सबद
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सबद पुस्तिका : २ : कुंवर नारायण




( कुंवरजी का यह ताज़ा लेख पहलेपहल सबद पुस्तिका के रूप में यहाँ छप रहा है। ८२ की उम्र में भी उनकी मेधा, चिंतन-प्रक्रिया और कवि-कर्म में कोई शैथिल्य नहीं आया है। इस बात की पुष्टि जितना आगे दिया जा रहा यह लेख करता है, उतना ही उनका नवीनतम काव्य-संग्रह 'हाशिए का गवाह' भी। कविता-संग्रह से कुछ कविताएं भी इस पुस्तिका की संगिनी हैं। साथ में दी गई तस्वीर हेनरी मतीस की। )

खंड
: क


साहित्य और आज का समाज

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक अब लगभग समाप्ति पर है। पिछले दस वर्षों में हुए परिवर्तनों पर एक उड़ती नज़र डालें तो कुछ ख़ास बातें सामने आती हैं जिनका समाज और साहित्य दोनों के लिए परिवर्तनकारी महत्वा रहा है। जैसे, आर्थिक, राजनीतिक और भाषाई दृष्टियों से एशियाई देशों - ख़ासकर भारत और चीन - का विश्व-शक्तियों के रूप में उभारना। हिन्दी साहित्य और समाज से सम्बंधित ऐसे कुछ सवालों की ओर ध्यान जाता है जो उपरोक्त तीनों विषयों से अलग रख कर नहीं सोचे जा सकते।

यह तथ्य कि हिन्दी इस समय संसार की प्रमुख भाषाओँ में से है, देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों से अनिवार्यतः जुड़ा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे मुख्यतः व्यावसायिक और राजनीतिक कारण हैं, तथा मीडिया और प्रचार-प्रसार की टेक्नोलॉजी में विकास ने हिन्दी भाषा को नई तरह की ज़रूरतों से जोड़ा है। भाषा की क्षमता बढ़ी है। वह एक ज़्यादा बड़े हिन्दी-भाषी समुदाय तक पंहुच रही है। उसके द्वारा जनमानस तक क्या संदेसा पंहुच रहा है- इसके गहरे अध्ययन से समाज के लिए आज साहित्य की उपयोगिता का प्रश्न जुड़ा है। इस संदेशे के पीछे किस तरह के अंदेशे और उद्देश्य काम कर रहे हैं इस पर ही, बहुत कुछ, समाज में साहित्य जैसी चेष्टाओं का महत्व निर्भर है।

शुरू में ही 'सामजिक यथार्थ' और सामजिक चेतना' के बीच एक बारीक, किंतु आवश्यक, फ़र्क करते हुए अपनी बात कहना चाहता हूँ।

भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यन्त जटिल, बहुस्तरीय और रूढिबद्ध है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेज़ी से नहीं कि वह 'सामाजिक चेतना' को बदल दे। इससे पहले, और इससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से, वे शक्तियां सामाजिक चेतना को बदल रही हैं जिन्हें आज साफ़-साफ़ बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पहचाना जा सकता है। उनका अपना तिजारती तंत्र है जो अच्छी तरह जानता है कि नई-नई चीजों के लिए आदमी की भूख को कैसे बढ़ाया जाए। वह तंत्र अत्यन्त विक्सित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों से भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति हमारी स्वाभाविक आसक्ति को पुष्ट करता रहता है।

मेरी बात से यह नकारात्मक निष्कर्ष निकलने की जल्दी न की जाए कि मैं औधोगिक प्रगति को एक सिरे से खारिज कर रहा हूँ। उसके लाभ भी सब तक पंहुच रहे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता- लाभ जो हमें एक बेहतर ज़िन्दगी दे रहे हैं। मेरी कोशिश सिर्फ़ उस असंतुलन की ओर ध्यान खींचना है जो आज के समाज में, सारी प्रगति के बावजूद, एक गहरा असंतोष, विसंगति और विषमता भी पैदा कर रहा है।

साहित्य एक शाब्दिक-कला है, भाषा से अनिवार्यतः जुड़ी हुई। वह सामजिक-चेतना को सीधे संबोधित करती है, किसी अन्य विषय की भाषा और व्याख्या के मार्फ़तनहीं। वह जीवन की भाषा है- सच्ची और बेबाक़। अपनी तरह विभिन्न विषयों से संपर्क रखते हुए भी वह अपनी बात कहती है। उसका यह अधिकार आज भी सुरक्षित है, लेकिन उसकी आवाज़ जिन कानों तक पहुंचनी चाहिए उन्हें एक ऐसे शोरगुल ने घेर रखा है कि साहित्य, ख़ासकर कविता, जैसी कोशिशों की उपस्थिति ही महसूस नहीं होती। संक्षेप में, सामजिक-चेतना से साहित्यिक-चेतना का सीधा संवाद सम्भव नहीं हो पता रहा। क्या यह सिर्फ़ साहित्य के लिए एक चुनौती है ? या एक शिक्षित समाज के लिए भी कि वह, जाने-अनजाने, मानव-समाज की एक अत्यन्त समृद्ध सांस्कृतिक चेष्टा से वंचित होता न चला जाए ?

थोड़ा आत्मचिंतन साहित्य, विशेषतः कविता, की ओर से भी ज़रूरी है। बीसवीं सदी की काव्यचेतना ने जिन कुछ बीज-शब्दों और सन्दर्भ-पदों के आधार पर अपनी एक अलग 'पहचान' बनाई उन पर भी थोड़ा गौर अब ज़्यादा प्रासंगिक जान पड़ता है। या शायद, अब अधिक प्रासंगिक हो गया है। ध्यान देन कि अधिकांश शब्द उन विषयों से लिए हुए शब्द थे जो साहित्य से बहार के विषय थे। 'आधुनिकता' शब्द इतना आधुनिक भी नहीं था जितना हम समझ रहे थे- लगभग ५०० वर्ष पुराना इतिहास है उसका। बोद्लेअर जैसे फ्रेंच कवि ने बहुत पहले ही उसके छिछले आशयों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी। 'क्रांति' राजनीति का शब्द था : फ्रेंच और रूसी क्रांतियों से निकला शब्द, जिसके बरक्स 'औद्योगिक क्रांतियों' और गाँधी की 'नैतिक क्रांति' के भी उदाहरण थे। हम सब चाहते थे कि दुनिया बदले : वह बदलती रही, और अब भी बदल रही है- लेकिन उस तरह नहीं जैसे हम चाहते थे : वह कुछ इस तरह बदली कि उसने हमें बदल दिया।

'परिवर्तन' का जूनून चढ़ता उतरता रहा। 'प्रगति' शब्द, ख़ासतौर पर उद्योग-धंधों की दुनिया का शब्द, मानव-समाज में मानो एक नई मशीन की तरह आया, कुछ दिन तेज़ी से चला, फ़िर बराबर मरम्मत मांगता रहा। 'प्रयोग', सीधे किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला से उठाया हुआ शब्द। आकर्षक, लेकिन ज़ल्दी ही किसी 'नए' प्रयोग की ज़रूरत के सामने खारिज हो गया ! इस भीड़ में 'नया' शब्द सबसे निरीह लगता है जिसे देखते-देखते बाज़ारवाद ने और उपभोक्तावाद ने समूचा हड़प लिया ! मानो अब उसका कोई मतलब साहित्य के काम का न हो, सिर्फ़ बाज़ार के मतलब का हो।

कविता में 'तकनीक' और 'शिल्प' वगैरह की पदावली आज की हर क्षेत्र में विकसित टेक्नोलॉजी के सामने फ़ुटनोट की तरह लगती है। नए का मतलब नई-नई चीजें ! 'नई' का 'कविता' के साथ कोई योग नहीं बैठता ! नया कुछ चाहिए तो हम बाज़ार की तरफ़ देखते हैं, नई कविता की तरफ़ नहीं।

तो फिर ऐसी कविता, जिसके सारे संदर्भ-साधन छिन चुके, क्या दे सकती है समाज को ? या अभी ऐसा कुछ बचा है, कविता और समाज के बीच, जो दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है ? हम नई कोई चीज़ चाहते हैं तो बाज़ार की ओर दौड़ते हैं, लेकिन आत्मिक कुछ चाहते हैं तो कविता की ओर देखते हैं। प्रेम में, दुःख में, उदासी में, अकेलेपन में, मुश्किलों में, बेबसी में, भावुक क्षणों में क्यों हमें अनायास याद आती हैं कविताएं ? वह अजीब-सा, रहस्यमय 'कुछ' जो हमें मिलता है सिर्फ़ कविता से, क्या वह हमें मिल सकता है बाज़ार से ?

मैं उस कविता-बराबर ज़रा-से 'कुछ' को परिभाषित नहीं करना चाहता- चाहूँ भी तो नहीं कर सकूँगा। पर इतना जानता हूँ कि वह हमारी प्राणवायु की तरह सूक्ष्म है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। वह एक सीमारहित, अपरिभाषित दुनिया है। उसकी अपनी शर्तें हैं। हम उसमें जाते हैं हमेशा ही कुछ पाने के लिए नहीं ; कभी-कभी अनायास उसमें खो जाने के लिए - कहीं भी, किसी भी समय में। भाषा में संभव इस अद्भुत कला को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहूँगा। जिगर साहब के इस शेर को अक्सर याद करता हूँ :

ज़रा-सा दिल है लेकिन कम नहीं है
इसी में कौन-सा आलम नहीं है

आज के समाज में मैं कविता की ज़रूरत और उसकी उपस्थिति को कुछ इस तरह सोचता हूँ कि वह मुख्यतः एक 'सूचनापरक' विधा नहीं है। इस माने में वह साहित्य की अन्य विधाओं से बहुत भिन्न है। वह मूलतः अत्यन्त उदार और उदात्त अर्थों में, 'आत्मचिंतन' की भाषा है। आत्मचिंतन को संकुचित करके 'आत्म-केंद्रित' के अर्थों में न लें : निहायत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक भाषा भी बिल्कुल स्वार्थी अर्थों में आत्म-केंद्रित हो सकती है। कविता जितना कुछ जीवन के बारे में कहती है, उससे कहीं अधिक उस भाषा को ही एक सार्थक रचनात्मक अनुभव बना कर कहती है जिस भाषा में वह काव्य-रचना करती है। इसीलिए कविता हमेशा ही अपने को परिसीमित करनेवाले सन्दर्भ-पदों और शब्दावली का उल्लंघन और अतिक्रमण करने के लिए बाध्य है।

रचनात्मक ऊर्जा विस्फोटक होती है। अस्तित्व में आने के बाद ही उसकी 'पहचान' और 'नियम' बन पाते हैं। इसीलिए उसकी पारिभाषिक शब्दावली कभी भी उसके स्वरुप-निर्धारण में पर्याप्त नहीं ठहरती। जिस तरह भाषा, व्याकरण के नियमों को तोड़ते हुए, जीवन के साथ-साथ चलते हुए बदलती और विकसित होती है, उसी तरह भाषा में बसी कविता भी, जीवन के 'साथ' चलती है। इस 'साथ-चलने' के अर्थ को विस्तृत करके इस तरह समझें कि वह अपने समय के जीवन के साथ लगातार एक अत्यन्त संवेदनशील संवाद है जिसमें केवल सहमतियाँ ही नहीं प्रतिरोधों की भी पूरी गुंजाइश है।

इस अंतरंग संवाद से छन कर जो काव्यविवेक निकलता है उसके पीछे केवल 'तात्कालिक' और 'स्थानिक' सन्दर्भ नहीं होते, एक व्यापक और सर्वकालिक जीवनानुभव से निकली हुई वे ध्वनियाँ और अंतर्ध्वनियां भी होती हैं जिनसे एक सुसभ्य और न्यायप्रिय मानव-समाज की चेतना बनती है। इसे जीवित रखना ज़रूरी है। कविता इसे जीवित रखने की एक विनम्र कोशिश है।

( रचना तिथि : ५ नवम्बर, २००९ )
****

खंड : ख

प्यार की भाषाएँ

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है
पहला प्यार
ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में...
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में :

दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में
एक सेनेटोरियम की उदासी तक :

फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी उंगुलियां :

एक परदे के दूसरी तरफ़
खिली धुप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में
देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है :

एक-से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल...

अगला प्यार
भूली बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़कर
हम बनाते हैं
प्यार की भाषा
****

उजास


तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थे
जब दुनिया में
पहले प्यार का जन्म हुआ

तब तक आत्मा की खोज भी नहीं हुई थी,
शरीर ही सब कुछ था

काफ़ी बाद विचारों का जन्म हुआ
मनुष्य के मष्तिष्क से

अनुभवों से उत्पन्न हुई स्मृतियाँ
और जन्म-जन्मांतर तक
खिंचती चली गईं

माना गया कि आत्मा का बैभव
वह जीवन है जो कभी नहीं मरता

प्यार ने
शरीर में छिपी इसी आत्मा के
उजास को जीना चाहा.

एक आदिम देह में
लौटती रहती है वह अमर इच्छा
रोज़ अँधेरा होते ही
डूब जाती है वह
अँधेरे के प्रलय में

और हर सुबह निकलती है
एक ताजी वैदिक भोर की तरह
पार करती है
सदियों के अन्तराल और आपात दूरियां
अपने उस अर्धांग तक पहुँचने क लिए
जिसके बार बार लौटने की कथाएँ
एक देह से लिपटी हैं
****

मामूली ज़िन्दगी जीते हुए

जानता हूँ कि मैं
दुनिया को बदल नहीं सकता,
न लड़ कर
उससे जीत ही सकता हूँ

हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ
और उससे आगे
एक शहीद का मकबरा
या एक अदाकार की तरह मशहूर...

लेकिन शहीद होना
एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है

बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी
लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं
****

मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ
जब कविता लिखता

कुछ भी करते हुए
कहीं और भी होना
धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है

हर वक़्त बस वहीं होना
जहाँ कुछ कर रहा हूँ
एक तरह की कम-समझी है
जो मुझे सीमित करती है

ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है
फैलने के लिए

इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ
और अपनी मजबूरी भी
पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक
फिर लौटना चाहता हूँ सब तक
जैसे लौटती हैं
किसी उपग्रह को छूकर
जीवन की असंख्य तरंगें...
****

उदासी के रंग

उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं
जैसे
फक्कड़ जोगिया
पतझड़ी भूरा
फीका मटमैला
आसमानी नीला
वीरान हरा
बर्फीला सफ़ेद
बुझता लाल
बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता
उल्लास के इन्द्रधनुषी रंगों से खेलते वक़्त
कि कहीं वे
किन्हीं उदासियों से ही
छीने हुए रंग तो नहीं ?
****

नई किताबें

नई
नई किताबें पहले तो

दूर
से देखती हैं
मुझे
शरमाती हुईं

फिर संकोच छोड़ कर
बैठ
जाती हैं फैल कर

मेरे
सामने मेरी पढ़ने की मेज़ पर

उनसे पहला परिचय...स्पर्श
हाथ
मिलाने जैसी रोमांचक

एक
शुरुआत...


धीरे
धीरे खुलती हैं वे

पृष्ठ
दर पृष्ठ

घनिष्ठतर
निकटता

कुछ
से मित्रता

कुछ
से गहरी मित्रता

कुछ
अनायास ही छू लेतीं मेरे मन को

कुछ
मेरे चिंतन की अंग बन जातीं

कुछ
पूरे परिवार की पसंद

ज़्यादातर
ऐसी जिनसे कुछ न कुछ मिल जाता


फिर
भी

अपने
लिए हमेशा खोजता रहता हूँ

किताबों
की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोडी
अल्हड़-चुलबुली-सुंदर

आत्मीय
किताब

जिसके
सामने मैं भी खुल सकूँ

एक
किताब की तरह पन्ना पन्ना

और
वह मुझे भी

प्यार
से मन लगा कर पढ़े..

****

13 comments:

"भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यन्त जटिल, बहुस्तरीय और रूढिबद्ध है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेज़ी से नहीं कि वह 'सामाजिक चेतना' को बदल दे।"

एक तरह की मानसिक सक्रियता जगा देती हैं आपकी रचनाएँ और यह इस आलेख के पढ़ने के बाद भी मै महसूस कर पा रहा हूँ,.निश्चित ही जीवन के लिए जरूरी स्पेस बचा कर रख पाना बेहद आवश्यक है इस भौतिक-उपलब्धियों की महत्ता वाले युग में...उत्कृष्ट आलेख के लिए आभार..


साथी !
बड़ी अच्छी लगी मेरे प्रिय साहित्यकार पर आपकी
यह पोस्ट | शोध के दौरान मैंने कुंवर जी को पढ़ा और
बहुत कुछ सीखा | 'सामाजिक यथार्थ ' और ' सामाजिक चेतना '
के बीच का फर्क और इसमें ' साहित्यिक चेतना ' की दशा और दिशा
की जानकारी हुई | कुंवर जी का यह विचार कि '' कविता की मौजूदगी
का तर्क जीवन-सापेक्ष है ...'' , फिर याद आ गया और ऊर्जावान कर
गया | बाजारवाद और उपभोक्तावाद की सीमाएँ स्पष्ट हो गयीं |
...अच्छी प्रस्तुति का शुक्रिया ...
आभार ... ...


अच्छा लगा आप के ब्लॉग पर आकर । कुंवरजी का लेख पढ कर अभिभूत हो गई । कविता के बारे में समाज रचना के बारे में उनके विचारों से मै एकदम सहमत ङूँ । बहुत सुंदर प्रस्तुति ।


आपका ब्लॉग तो बस जैसे एक दस्तावेज़ लगता है. जब भी कुछ अच्छा सोचने का दिल करता है मैं पुराणी पोस्ट भी पढता हूँ... कुवर नारायण तो एक अलग ही होरिजोन हैं... पूरा आलेख है सलामी के लायक है... कृपया रेगुलर रहें... hamein intzaar rehta hai...


ek mamuli zindagi shaheed or shahadat per aap ki kavita dil ko chu gayi....ek aam insaan ke dil ke ankahe shabdo ko jubaan deti hai ye kavita.....udasi ke rangon ke visheshan satik or hridaygrahi hain....lga mano pehli baar rango ka naamkaran ho gaya....saras saargharbhit sanskarit aur sahrridayapurn kavitaayee.....


kunvar narayan ki kaviatayen : pyar ki bhashayen aur ujas bahut sundar lagi.nai kitaben kitabon k stah prem ko ek bahut alag dhang se samne lati hain.


shaanadaar vaktavya hai Kunwar ji kaa . pahalee do kavitaaen to adbhut hain . 'udaasee ke rang' kavitaa to unhone hamaaree patrikaa ke liye likhee thee jo 2006 mein chhap chukee hai kuchh any kavitaaon ke saath . Kunwar ji hamaare samay ke bade kavi hain . aapane bahut achchhe dhang se prastut kiyaa hai .


सबद पुस्तिका की शुरूआत एक अच्‍छी पहल है. कुंवर नारायणजी का लेख और कविताएं उनके नये संग्रह को जल्‍द से जल्‍द पढ़ने के लिए विवश करती हैं. प्रस्‍तुति के लिए बधाई.


kuwarji ki kavitayen padhna ek sukhad anubhuti se gujarne jaisa hai.


kunwarji ka yah kavita k bare me yah kahna ki वह हमारी प्राणवायु की तरह सूक्ष्म है। उसके बिना हम जी नहीं सकते।, bahut sarthak hai.ham sab kavita ko isi tarah se prem karte hain,pr hame use paribhashit krne nahi aaya.unki kavitayen,khaskar,pyar ki bhashyen,ujas,mamuli zindgi jite hue aur nai kitaben bahut pasand aai.


bhai vats ji bahut sukhad hai aapke blog par aana.kunvar ji ka alekh our kavitayen sab padh gaya.ek garimamay sahityakar ki itni samagri uplabdh karane ke liye aapka abhar.aaj 6 dec. ko kuvar ji ki ayodhya kavita post karne ke liye bhi dhanyvad. aaj dubara padha is kavita ko,kafi kuchh sochne par vivash hua. sakhi, sabad, ramaini srinkhala bejod hai.kafi kuchh hai aapke blog par .punah badhai , abhar mujhe isse jodne ke liye
Dr. Dinesh Rripathi


कुंवर नारायण ने लेख में कविता को जीवन से जोड़ते हुए उसपर समग्रता से विचार किया है.कवितायेँ जीवन के अंतिम छोर पर उनकी परिपक्व सोच को परिभाषित करती हैं.प्रेम की निशब्द भाषा,जीवन की असलियत, आकांक्षाओं की अनंतता,उदासी का आलम और साथी की तुलना किताब से करने वाली ये कवितायेँ कवि की कुलबुलाहट को बखूबी दर्शाती हैं.


सबद से जुड़ने की जगह :

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

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सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

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किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी