( अहमद फ़राज़ की यह ग़ज़ल जितनी मकबूल हुई शायर के शब्दों में उतनी ही उसके बदनामी का सबब भी बनी। लेकिन फ़राज़ की मकबूलियत के सामने बदनामी जाती रही और पीढियों को इसका लुत्फ़ मिलता रहा। ज़बां उर्दू में इस दफा अहमद फ़राज़। हालाँकि इससे पहले भी उनकी एक ग़ज़ल की आमद सबद पर हुई थी, जब पिछले बरस वो इंतकाल फरमा गए थे। बहरहाल। यह ग़ज़ल। तस्वीर मधुमिता दस के कैमरे से।)
सुना है ...
सुना है लोग उसे आँख भरके देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आपको बर्बाद करके देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चशमे नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उसको भी है शेर-व-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
यह बात है तो चलो बात करके देखते हैं
सितारे बामे फ़लक से उतरकर देखते हैं
सुना है दिन में उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात में जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है हश्न है उसकी गिज़ाल सी आँखें
सुना है उसको हिरण दश्त भरके देखते हैं
सुना है रात से बढ़कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं
सुना है उसकी सियाह चस्मगी क़यामत है
सो उसका सुरमा फ़रोश आह भरके देखते हैं
सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धरके देखते हैं
सुना है आईना तिमसाल है ज़बीं उसकी
जो सादा दिल है उसे बन संवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाईल है उसकी गर्दन में
सुना है चश्मे तसव्वुर से दश्ते इमकां में
पलंग ज़ाविये उसकी कमर के देखते हैं
सुना है उसके बदनकी तराश ऐसी है
वह सर-व-कद है मगर बे गुले मुराद नहीं
कि इसे शहर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहवाने तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उसके शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
रुकें तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो ज़माने उसे ठहर के देखते हैं
किसे नसीब कि बै पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर-व-दीवार घर के देखते हैं
कहानियां ही सही सब मुबालगे ही सही
अगर वह ख्वाब है ताबीर करके देखते हैं
अब उसके शहर में ठहरें की कूच कर जाएं
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र करके देखते हैं
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब लहजा बदल के देखते हैं
जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं
रहे वफ़ा में हरीफ़े खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकाल के देखते हैं
तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जलके देखते हैं
यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं
न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं
यह कौन है सरे साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं
अभी तक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं
बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ए यार चलके देखते हैं
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Saturday, 24 October, 2009
बहुत बहुत आभार।
Saturday, 24 October, 2009
यह तो मदमस्त करने वाली बात हो गयी किस किस को दाद दूँ... हरेक मिसरे को, अहमद फ़राज़ को, या हम तक पहुँचाने के लिए आपको.... फिलहाल सबको दाद देता हूँ... कल्पना की ऐसी उडान ... क़यामत और कुछ नहीं... सच बताऊँ को मुझे भी जलन होने लगी... दिन अच्छा बना दिया आपने... यह खुमारी तो अब क्या उतरेगा...
Saturday, 24 October, 2009
Bahut hi Saandar. AnuragG Shabad par Faraz saab ki gazal Padane ka shukriya
Saturday, 24 October, 2009
bahut hi mast ghajal hai ji... pahli do lines to chura hi li maine!!!
Saturday, 24 October, 2009
बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ए यार चलके देखते हैं.....
gazal jo khatam hone ke baad bhi khatm nahi hoti, aisa lagta hai abhi bahut kuch kahne ko baki hai.good collection.
Saturday, 24 October, 2009
I liked this blog very much. I appreciate your work. I want to say keep on this work.
It is very good for the lover of poetry.
Farhan
Tuesday, 27 October, 2009
वाह फराज़साहब की यह गज़ल पढ़कर मज़ा आ गया ..कितने आयाम ।
Tuesday, 27 October, 2009
फराज का फेन हूं...ये गजल भी ज्ञानपीठ द्वारा उन पे निकली किताब में भी है ...पर उनकी नज्मे भी अपना पुरजोर असर रखती है ...
Sunday, 29 November, 2009
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
यह बात है तो चलो बात करके देखते हैं
bahut khoob janab!
Wednesday, 25 July, 2012
बहुत ही उम्दा शायरी ! अब जाना कि काव्यात्मक धैर्य क्या होता है :-)
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