वह बस में है। दफ्तर के शुरूआती दिनों से ही उसने इसे रीडिंग रूम बना लिया है। उसे जगह मिल जाए, वह भी खिड़कीवाली, इसके लिए वह दो स्टाप पीछे चढ़ता है। हालाँकि एक यही वजह नहीं थी पीछे चढ़ने की।...जाम हर रोज़ लगता है और वक्त उससे काटे नहीं कटता। उसके हाथ में कामू के नोटबुक्स हैं। थैले में थोड़ा कोएटजी और क्लीमा। ...बस अभी गर्ल्स हॉस्टल के स्टाप पर रुकी है। यहाँ वह बस नहीं, ऑटो लेने आती थी। वह लड़के की तरह कभी बस में नहीं चली। लड़का ख़ुद भी जब उसके साथ उन दिनों जाता था, तो ऑटो लेता था...अब ऑटो पर चढ़ने के पहले वह कई दफा सोचता है।... बस में भीड़ और शोर बढ़ रहा है। आश्रम से एक चूरन बेचनेवाला चढ़ा है और अपनी बेलौस आवाज़ में चूरन बेच रहा है। उसका यह कार्यक्रम कोई दस मिनट चलेगा।...उसके लिए ध्यान लगाना दूभर हो रहा है। उसने टिकट को बुक-मार्क बना कर किताब बंद कर दी है। उसके मन में कामू की कुछ पंक्तियाँ वन-लाइनर की तरह आज फ़िर खुब गई हैं, जिसे वह ज़ज्ब करने की कोशिश कर रहा है : THERE IS ALWAYS A PART OF MAN THAT REFUSES LOVE. IT IS THE PART THAT WANTS TO DIE. IT IS THE PART THAT NEEDS TO BE FORGIVEN...सबसे पहले उसने ये पंक्तियाँ अपने प्रिय लेखक की किताब में समर्पण पंक्तियों की जगह पढ़ी थी। तब वह बहुत छोटा था, और सिवाय इसके की उसे ये भा गई थीं, और कुछ समझ में नहीं आया था। वर्षों बाद हॉस्टल वाली लड़की की 'ढुलमुल-सी हाँ-ना' के बाद वह इन पक्तियों के बीच अपने लिए एक अर्थ पा सका था। एक सांत्वना। हल्की राहत। ...उसने इन पंक्तियों में से आखिरी को बिना लिखे उसे मैसेज किया था। थोड़ी ही देर बाद उधर से एक स्माइली के साथ जवाबी मैसेज आया ...वेरी ट्रू जुल्फी, आई स्वे़र... ये उसके आखिरी शब्द थे। अबोले दिन बीतते रहे। लड़के ने उन्हीं दिनों अपने तईं अबोलेपन की लिपि और भाषा ईजाद की।... उसे इस बात का कभी-कभी अफ़सोस होता है कि मैसेज में उसने आखिरी वाक्य भी क्यों नहीं लिख भेजा! शायद वह सच को तब महज हैरत भरी खुशी से देखने की बजाय किसी और निगाह से भी देखती...शायद?...लड़के को झपकी आ रही है...****
( ऊपर एरलेंड म्योर्क की पेंटिंग : मेलंकली )
24 comments:
सुंदर.
THERE IS ALWAYS A PART OF MAN THAT REFUSES LOVE. IT IS THE PART THAT WANTS TO DIE. IT IS THE PART THAT NEEDS TO BE FORGIVEN...
the language of silence जैसा कुछ. अब अापकाे लगातार िलख्ाना चािहए एेसी चीज़ें.
(वैसे लड़का ग़लत समय झपकी ले रहा है) :-)
ye jaise WKW ka koi scene hai, bheed ke beech, daudti trains ke beech, kaisa to avsaad.
गति के बीच स्थिरता के लिए आवेदन.
chungking express ki shuruaat jaisa.
phir sunder.
बहुत बढि़या सर जी
very touching description Anurag . I like ur Prose .. ur way of presenting things .
great simply.....thanks for this post really...
गीत जी की बात से सर्वथा सहमत..बल्कि कहूंगा कि उनके एक अन्य मूवी Days of Being Wild मे एंडी लाउ का चरित्र भी ऐसा ही है कुछ..व्यथित मगर शांत, एकाकी और ऊबा हुआ सा.
अबोले दिन बीतते रहे। लड़के ने उन्हीं दिनों अपने तईं अबोलेपन की लिपि और भाषा ईजाद की
THERE IS ALWAYS A PART OF MAN THAT REFUSES LOVE. IT IS THE PART THAT WANTS TO DIE. IT IS THE PART THAT NEEDS TO BE FORGIVEN.
-छा गये महाराज!!
कितनी गहरी बात... वाह!
...कई बार खिड़की वाली सीट लेने की यही वजेह होती है...
आपकी पहली पोस्ट भी पढ़ी... सोचा कितना कठिन काम विष्णु जी अपने हाथ में लिया और बेहतर तरीके से निभाया...
पर यह सब आपने द्वारा ही हम तक पहुँचता है... इसलिए आभार...
सच है ....इस अबोलेपन की भी ढेरो भाषायें है ...
well done.
अभी देखा। पढ़ा। आपका यह टुकड़ा मुझे छू गया। मेरी एक खास तरह की सेंसिबिलिटी बन चुकी है और मुझे इसी तरह की चीजें पसंद आती हैं। आप इस तरह की चीजें लगातार क्यों नहीं लिखते। शुभकामनाएं।
बहुत बढ़िया अनुराग...ऐसे ही लिखते रहो... :)
kuch cheeze uljhee hui hi achi lagti hai....is kahani me jo nahi kaha wahi is kahani ke srijan ki wazah hai...keep it up.
Beautiful!!! reminds me of a couplet, I don't know who penned them, if you know do share.
Hamne sabse alag ek bhaashaa chuni
sirf tum sun sako, sirf maiN hi kahuN
great going...
Sonali
Very good,Anurag.
THERE IS ALWAYS A PART OF MAN THAT REFUSES LOVE. IT IS THE PART THAT WANTS TO DIE. IT IS THE PART THAT NEEDS TO BE FORGIVEN...its really true....
अच्छा लगा अनुराग जी यह पढ़ना ..लेकिन इस तरह टुकड़ों टुकड़ों में पढना ,,अजीब लगता है जैसे ही हम उस द्रश्य मे शामिल होते है ब्रेक लग जाता है फिरभी .. ।
bahut sundar.
priy anurag ji ,
rachnaa bahut achchhi hai. kaafi samvedanksham, shaant, sundar, sajal aur manansheel bhi. yah ek adaa hai aapke rachanaatmak gady ki, jismein ek saraahneey kashish hai. aapko apni is kalaatmak pratibhaa ko aur-aur viksit karnaa, nikhaarnaa chaahiye. lekin is rachnaa mein jis 'theme' kee shurooaat hui hai, wah ek zyaadaa 'vivid', bahu-aayaami aur antarang exploration kee maang kar rahi thee, jise 'abolepan kee bhaashaa aur lipi eejaad kar lene' kee vajah se shaayad rachnaakaar 'pursue' nahin kartaa. 'abolaapan' achchha hai, magar jahaan zaroori ho, vahin. jo log sirf aur sirf aapkee taareef kar rahe hain, unmein-se kuchh abodh, nishchhal yaa maasoom ho sakte hain; par kuchh aise hain, jinse ek sajag kalaakaar ko apni saadhanaa ke is aarambhik maqaam par saavdhaan rahnaa darkaar hai.
---pankaj chaturvedi
kanpur
हाउ स्वीट!
लेकिन इतना काफी नहीं है. आप इससे ज्यादा डिजर्व करते है और उस और आपको जाना होगा.
bahut achhi lagi apni chuppiyon men bolti huyi si.
क्षिप्र और स्वप्नमय भाषा. विधाओं की आपसदारी के उत्कृष्ट प्रमाण की तरह इसे पढ़ा जाना चाहिए. यथार्थ यहाँ कोई दिक्क़त नहीं है, एक दिलकश धारावाहिकता में वह संभव हो रहा है. अभियक्ति के यही तरीके हमारा आदर्श हैं.
लेकिन अनुराग जी, गुणवत्ता ही नहीं, हमें आपसे परिमाण भी चाहिए. ' कम से कम वाली बात न हमसे कहिए '.
THERE IS ALWAYS A PART OF MAN THAT REFUSES LOVE. IT IS THE PART THAT WANTS TO DIE. IT IS THE PART THAT NEEDS TO BE FORGIVEN
ये पंक्तियां जितनी गजब हैं और उतनी ही सटीक। पर एक बात मुझे बहुत पसंद आई, अबोलेपन की भी एक भाषा होती है और हर मैसेज में एक लाइन हमेशा मिस हो ही जाती है, पता नहीं क्यों वो हर बार मिस होती है और हर बार आप उसे ही उस मैसेज में कहना चाहते थे
Achha likha hai bas main bhi Sharad Kokas ji se sahmat hoon :)
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