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विष्णु खरे का लेख

( महान जर्मन कवि-लेखक गोएठे के सुप्रसिद्ध काव्य-नाटक 'फाउस्ट' का विष्णु खरे कृत अनुवाद हाल ही में प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली से छप कर आया है. यहाँ दिया जा रहा लेख अनूदित पुस्तक की भूमिका है, जिसके स्वतंत्र-पाठ का भी अपना मह्त्व है. इसे छापने की स्वीकृति देने के लिए हम लेखक के आभारी हैं. )

हम फाउस्ट क्यों पढ़ें ?

नाटक, टेलिविज़न, फ़िल्म तथा गल्प-साहित्य तक के क्षेत्रों में आजकल कथानकों का पेशेवर एक-पंक्तीय सार-संक्षेप ( वन लाइनर ) मांगने या देने का नियम-सरीखा है। 'फाउस्ट' का ऐसा खुलासा कुछ इस प्रकार होगा : ''मानवता के शत्रु के प्रलोभनों में फंसकर एक संशयग्रस्त बुद्धिजीवी किस तरह अपनी आत्मा तथा

अपनी निरीह प्रेमिका को घनघोर नैतिक और भौतिक संकट में दल देता है।''

'शैतान' और 'शैतानी' शब्द दक्षिण एशिया में इस्लामी सभ्यता की उपस्थिति के कारण ही प्रचलित हुए क्योंकि शैतान की अवधारणा सामी ( सेमिटिक - यहूदी, ईसाई, इस्लामी ) आस्थात्रयी की आदिमिथकों से उपजती है। 'याहवेह', 'येहोवा', 'गॉड' या 'अल्लाह' सृष्टि के आरम्भ में फरिश्तों को अस्तित्व में लाता है जिसमें सेटन, शैतान या इब्लीस और एडम या आदम भी है। ये सारे फ़रिश्ते अजर-अमर थे। सामी ईश्वर ने आदम (मानव) को अपनी ही छवि में सिरजा है। सारे फरिश्तों में उसे सर्वश्रेष्ठ का दर्ज़ा देकर ईश्वर चाहता है कि बाकी सारे फ़रिश्ते आदम के सामने झुकें। बाकी सब झुकते भी हैं, सिर्फ़ शैतान गहरी ईर्ष्या और घृणा के कारण आदम का सिजदा करने से इनकार कर देता है। बाद में शैतान ही आदम की संगिनी 'हव्वा' को प्रलोभन देता है जिसके फलस्वरूप आदम और हव्वा को मर्त्य बनाकर उन्हें हमेशा के लिए जन्नत यानी स्वर्ग से निकल दिया जाता है। धरती पर आकार आदम और हव्वा सहित उनकी सारी संतान, यानी समूची मानवीयता, मरने के लिए अभिशप्त हो जाती है। शैतान किंतु अन्य फरिश्तों के साथ अमर है और मानव का सबसे बड़ा शत्रु है।

विधान ऐसा है कि सामी ईश्वर, यानी याहवेह, गॉड या अल्लाह, चाहकर भी शैतान का विनाश नहीं कर सकता। शैतान कभी सोता भी नहीं है, एक शाश्वत जागृति में वह सिर्फ़ मानव के भौतिक तथा आध्यात्मिक विनाश की षड्यंत्री योजनाओं को अंजाम देने में जुटा रहता है। सामी ईश्वर कभी मानव को बचाता है, कभी नहीं बचा पता लेकिन शैतान को नष्ट करना तो दूर, वह उसे निष्क्रिय भी नहीं कर पाता या नहीं करना चाहता। ऐसा लगता है जैसे शैतान की एक समांतर सत्ता हो। भारतीय मूल की बौद्ध तथा जैन जैसी नास्तिक आस्थाओं में भी 'मार' सरीखी शैतान से मिलती-जुलती अवधारणा भले ही हो, वह कोई शाश्वत सक्रिय उपस्थिति नहीं है, 'अशुभ' अथवा 'पाप' जैसे प्रत्यय और उनके प्रतीक भले ही हों। असस्थाओं के उस परेशान कर देने वाले महामेले में, जिसे 'हिन्दू धर्म' जैसे नितांत अपर्याप्त नाम से पुकारा जाता है, 'ईश्वर' तो कोई हैं लेकिन उन्हें चुनौती देने वाला कोई मृत्युंजय, लगभग सर्वशक्तिमान, शैतान-जैसा देवता, देवदूत, पात्र अथवा चरित्र नहीं है। दक्षिण एशियाई मूल के धर्मों के लिए यह कल्पनातीत है कि ईश्वर का कोई स्थाई, पापिष्ट, सशक्त प्रतिद्वंद्वी भी हो।

कभी-कभी लगता है कि सामी शैतान, जिसका यूनानी नाम मेफिस्टोफेलीस है, सामी ईश्वर के किसी संभावित नकारात्मक आयाम का अवतार ही है। यदि निर्गुण निराकार ब्रह्म को छोड़ दें तो शेष सभी ईश्वरों में क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिकार आदि की 'मानवीय' भावनाएं प्रचुर मात्रा में देखि जा सकती हैं। शैतान को इतना अधिकार ईश्वर के संज्ञान के बिना कैसे मिल सकता है कि वह मानव को पतन की ओर ले जा सके - ईश्वर स्वयं मानव को अमानवीय भावनाओं से मुक्त क्यों नहीं रखता? वह सीधे-सीधे या शैतान के मध्यम से मानव को संकट में क्यों डालता है? मानव को यदि श्रेष्ठ सिद्ध करना ही है तो उसे अग्नि-परीक्षाओं से ही क्यों गुजरना पड़े?

ये वे प्रश्न हैं जिन पर आस्तिकों और नास्तिकों के बीच ही नहीं, आस्तिकों और आस्तिकों के बीच भी बहस होती आई है और तब तक चलती रहेगी जब तक ईश्वर के अस्तित्व या अनस्तित्व से मानव का प्रत्यक्ष साक्षात्कार न हो ले। शैतान के दुस्साहस की सीमा तो उस प्रकरण में देखी जा सकती है जब वह स्वयं ईश्वरपुत्र ईसा को आकाश में ले जाकर कहता है कि यदि तू अपने पिता में आस्था को तज दे तो मैं तुझे इस सारी सृष्टि का स्वामी बना दूँगा। ईसा ने तब वह अमर वाक्य कहा था : तू मेरे ( सामने से हटकर ) पीछे चला जा, शैतान! कुछ ऐसी ही कोशिश शैतान ने मुहम्मद के साथ की थी जब उसने धोखा देकर कुछ मूर्तिपूजन-समर्थक आयतें उतार दी थीं किंतु मुहम्मद शैतान की साजिश को समझ गए और उन्होंने उन आयतों को रद्द कर दिया। यही प्रकरण सलमान रुश्दी के विवादग्रस्त तथा प्रतिबंधित उपन्यास 'द सैटनिक वेर्सेज' ( शैतानी आयतें) के केन्द्र में है जिस पर अभी तक ईरान का जानलेवा फतवा लागू है।

ज़ाहिर है कि ईसा मसीह और हज़रात की तुलना में गोएठे के काव्य-नाटक का नायक फाउस्ट एक बहुत कमतर इंसान है। वह एक ईसाई बुद्धिजीवी है जो यूरोपीय 'रेनासां' (पुनर्जागरण) तथा 'रेफर्मेशन' ( संशोधन) का उत्पाद है किंतु ब्रह्माण्ड, अस्तित्व, ईश्वर, सत्-असत् तथा स्वयं अपने भौतिक प्रलोभनों की समस्याओं से ग्रस्त है। स्वर्ग में बैठा हुआ इश्वर उसे अपना भक्त मानता है और शैतान इश्वर से बाज़ी लगता है कि वह फाउस्ट को उसके विवेक और नैतिकता के मार्ग से गिरा देगा। धरती पर पहुँच कर मेफिस्टोफेलीस अपने भयावह और घिनौने षड़यंत्र में लग जाता है और जान लेता है कि फाउस्ट एक किशोरी को बहुत चाहता है और उसका प्रेम पाने के लिए कुछ भी -शैतान का साथ और शिष्यत्व - स्वीकार करने को भी तैयार है। किन्तु फाउस्ट की किशोर प्रेमिका मार्गरेट या ग्रेट्षेन ईश्वर में सम्पूर्ण आस्था रखने वाली एक धर्मभीरु प्राणी भी है। वह अपने प्रेमी फाउस्ट के अशुभ मित्र मेफिस्टो की वास्तविकता जानती तो नहीं है किन्तु यह अहसास उसे है कि वह कोई पापात्मा है। मेफिस्टो की योजना अब मार्गरेट को नैतिक और भौतिक रूप से नष्ट कर देने की है ताकि परिणामस्वरूप फाउस्ट भी पराजित हो जाये और स्वयं मेफिस्टो इस तरह ईश्वर को निचा दिखा सके। किन्तु स्वर्ग में बैठा हुआ ईश्वर इस सब पर अपनी दिव्यदृष्टि रखे हुए है।

गोएठे की इस कालजयी कृति के विषय शाश्वत हैं - सत् और असत्, पाप और पुण्य, अपराध और दंड, प्रलोभन और संयम, प्रेम और वासना, बंधन और मुक्ति, व्यक्ति और समाज, स्वर्ग और नरक, नर और नारी, संशय और विवेक, प्रकाश और अंधकार। शैतान तमस और प्रलोभन का प्रतिनिधि है, फाउस्ट संदेह और लालसा का, जबकि मार्गरेट निर्दोषिता, पावनता और ईश्वरभीरुता का प्रतीक है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि 'फाउस्ट' एक उबाऊ, उपदेशों से सराबोर 'मोरैलिटी प्ले' है ( नैतिकतावादी नाटक) है। बेशक उसकी गहरी व्याख्या की कभी उपेक्षा नहीं की जा सकती किन्तु एक नाटक के तौर पर वह अत्यंत पठनीय, दिलचस्प और मार्मिक कृति है जो मूलतः मानवीय है। इसमें 'महाभारत', यूनानी तथा शेक्सपियरीय कथानकों का तनाव, औत्सुक्य, नाटकीयता, हर्ष और विषाद के सारे लक्षण मौजूद हैं।

फाउस्ट जैसी हर महान कृति चूँकि प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वबोध का प्रतिफलन होती है इसलिए वह हर युग में किसी न किसी तरह प्रासंगिक होती रहती है क्योंकि अंततः उसके केंद्र में म्सानव-जीवन, उसकी विदाम्ब्नाएं और समस्यां, उसके हर्ष-विषाद, जय-पराजय, उत्थान-पतन और कामदी एवं त्रासदी होते हैं। गोएथे को शायद इसका अनुमान तक न रहा होगा कि २१ वीं सदी तक आते-आते विश्व केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, शैतान के कितने अवतार हो चके होंगे और फाउस्ट तथा ग्रेट्षेन के सामने कैसे प्रलोभन उपस्थित हो जायेंगे। गोएथे विश्व-साहित्य ( वेल्ट लिटेराटूअर) की अवधारणा का जनक था किन्तु विश्व-बाज़ार, विश्व-पूंजीवाद, वैश्विक ( नव) साम्राज्यवाद, वैश्विक-आतंकवाद आदि की कल्पना भला उसे कैसे हो सकती थी और अब तो विश्व इतनी तेजी से बदल रहा है कि हम अगले वर्ष की कल्पना भी नहीं कर सकते, अगली शताब्दियों की तो बात ही बहुत दूर है। आज मेफिस्टो राष्ट्रों, राजनीतियों, राजनेताओं, धर्म के भ्रष्ट और मानवद्रोही संस्करणों, पूंजीवाद, बाजारवाद, माल-संस्कृति, (अ) नैतिक स्वच्छन्दतावाद, संचार-माध्यमों, 'लाइफ स्टाइल', 'पेज थ्री', माफिआओं, विज्ञापनों, 'हिअर-एंड-नाउ', 'कार्पेडिएम' आदि के माध्यम से करोडों प्रौढ़ और युवा फाउस्‍टों और ग्रेट्षेनों को प्रलोभन और विनाश के वापसीविहीन मार्ग पर ले जा रहा है।

सारा संसार धनकुबेरों और मार्की द साद की विश्वव्यापी वाल्पुर्गिसरात्रि में बदल गया है। बल्कि कभी-कभी लगता है कि प्रलुब्ध होने के लिए आज के हम फाउस्‍टों और ग्रेट्षेनों को मेफिस्टो की ज़रूरत रही ही नहीं, ठीक उसी तरह जैसे ड्रैकुला को सिर्फ एक बार अपने शिकार की गर्दन का खून पीने की ज़रूरत होती है जिसके बाद शिकार खुद एक नए शिकारी ड्रैकुला में बदल जाता है और इस तरह यह संक्रामक सिलसिला अनंत होता चला जाता है। आज मानवता ही और अधिक मेफिस्टो, फाउस्ट और ग्रेट्षेन बनती जा रही है।

किन्तु चूँकि इसका अहसास हमें है, ठीक इसीलिए हममें अपनी सभ्यता के मेफिस्‍टोवाद का सामना करने का संकल्प और माद्दा भी बचा हुआ है। केवल इश्वर की इच्छा और कृपा पर निष्क्रियता से निर्भर रहते हुए हम अपने बीच मौजूद मेफिस्टो से बच नहीं सकते। क्या कभी-कभी ऐसा नहीं लगता कि वह सर्वशक्तिमान स्वयं मेफिस्टो के कई अवतारों में हमारी परीक्षा ले रहा है? यदि उसने हमें मेफिस्टो दिया है तो उसी ने हमें सनातन और समसामयिक शैतानों पर विजय प्राप्त करने वाला विवेक, विचारधारा, भविष्य-स्वप्न और नैतिक संकल्प भी दिए होंगे। ईश्वर की अनुकम्पा से ही अब हमें ईश्वर की ज़रूरत नहीं रही, जैसे धर्मों के सरे योगदान के बाद अब हमें धर्मों की ज़रूरत नहीं रही।

आज हमारे पास गोएठे जैसे दृष्टा और 'फाउस्ट' -जैसी कालजयी नैतिक कृतियाँ हैं। मानवतावादी, समतावादी, प्रगतिकामी आस्थाएँ और विचारधाराएँ हमारे साथ हैं। 'फाउस्ट' कोई एकमात्र कृति नहीं जो हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करेगी या चेतावनी देगी, जिस तरह कोई एक ईश्वर, कोई एक धर्म, कोई एक धर्मग्रन्थ या कोई एक मसीहा नहीं जो हमें बचायेगा, किन्तु इन सबका प्रगतिधार्मा सार ही हमें अपना उद्धार करने में सहायता देगा। तब वह शाश्वत सवेरा होगा जिसके उजाले में मेफिस्टो की सारी शक्तियां चली जाती हैं।
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6 comments:

अभी सरसरी निगाह डाली है प्रिंट आउट ले जा रहा हूँ सोमवार को जवाब दूंगा... इस ब्लॉग पर तो आँख बंद कर के यकीन है की बेहद उम्दा लेख ले जा रहा हूँ...


हिन्दी में ’फ़ाउस्ट’ का आना महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि मैंने सुना है कि अरविन्द कुमार जी ने भी उसका हिन्दी में अनुवाद किया है। लेकिन चूँकि मैंने दोनों में से कोई भी अनुवाद नहीं देखा है, इसलिए अनुवाद के बारे में तो क्या कहा जा सकता है, लेकिन अपने आप में ’फ़ाउस्ट’ एक ऐसी महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसस न केवल हिन्दी के पाठकों बल्कि हिन्दी के लेखकों और विशेष रूप से कवियों को भी
अवश्य जानना चाहिए। विष्णु जी अब तक बहुत से विदेशी कवियों का अनुवाद हिन्दी में कर चुके हैं और उनके अनुवाद प्रायः अच्छे होते हैं, इसलिए ’फ़ाउस्ट’ का अनुवाद अच्छा होगा, इसमें कोई शक नहीं है। ’फ़ाउस्ट’ के बारे में लिखा गया यह लेख या ’क़िताब की भूमिका’ ही बता रही है कि विष्णु जी ने बड़ी तन्मयता से अनुवाद किया होगा।


apni hi nahin, duniya kee saari paramparaaon ke bodh ko kis tarah ek saargarbhit, secular aur kraantikaari---behad samkaaleen, samaaveshi aur moolyanishth---chetnaa mein roopaantarit kiyaa jaa saktaa hai, vishnu khare kaa yah durlabh lekh is baat kaa anyatam udaaharan hai. wah apni kavita aur aalochnaa mein bhi sabhyataa, sanskriti aur saahitya mein antarvyaapt "mefistovaad" se bahut saarthak, sashakt aur kaargar dhang se lohaa lete hain. aise anoothe lekh ko prastut karne ke liye aapkaa jitnaa shukriyaa adaa kiyaa jaaye, kam hai.
-----pankaj chaturvedi
kanpur


एक अद्भुत लेख है .जो विचारो को एक गतिशीलता सी देता है....आपके ब्लॉग पर एक बड़ा खजाना है ....जिसमे कई नायाब मोती है ..ओरहन पामुक ,निर्मल वर्मा .त्रिलोचन .इस्मत......फराज ....एक पूरा दिन बिता सकने लायक...


khare ji ke kai `mahabhartnuma vishvashon` ka bavjood ise padhna aur samjhne ki koshish karna kafi achha laga.


पिछले दिनों अनुवाद संबंधी एक सेमिनार में विष्‍णु जी चंडीगढ़ आए थे। तब उन्‍होंने इसी क्रति और अनुवाद के बारे में बात की थी। मुझे याद है उनका कहना....आखिर ये गोएठे अपने आप को समझता क्‍या है, पढ़कर भी अच्‍छा लगा आज।


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