Wednesday, October 07, 2009

पहली कहानी : नीरज पाण्डेय

 ( नीरज पाण्डेय की ख्याति वेंसडे फिल्म से है. वे अपनी फिल्मों के लिए खुद लिखते हैं. यह फिल्म से बहार उनकी पहली कहानी है. इसे नीरज और उनके मित्र प्रभात रंजन ने मिलकर अनूदित किया है. हम दोनों के आभारी हैं.)

प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात

उसने तीसरी घंटी पर दरवाजा खोला।
मैं बाथरुम में थी!
और तुम वहां क्या कर रही थी?

पुरुष ने मुस्कुराकर उसे चूम लिया। वह शरमा गई। उसने उसके नितंबों को दबाया। स्त्री ने उसके सीने को थपथपाया। पुरुष ने अपना बैग नीचे रखा और मेल देखने लगा।

वह रसोई में गई और चाय बनाने लगी।
पुरुष हाॅल में बैठा क्रेडिट कार्ड का स्टेटमेंट देखने मशरूफ है।
कुछ बर्तन खड़खड़ाए और...

पुरुष

पता नहीं साली बिना आवाज किए चाय बनाना कब सीखेगी? मेरा मतलब है, आप ही बताइए, चाय बनाने में तो कोई आवाज नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसी कुतिया है कि पूछिए नहीं... ये कभी नहीं सीखने वाली है।

अब आएगी मर्तबान की आवाज, अब कैबिनेट खोलने की - अब बंद करने की आवाज और गुनगुनाने की आवाज कहां गई? हां... वह रही!

सात साल... चुतियापे से भरे सात साल हो गए लेकिन उसमें रत्ती भर बदलाव नहीं आया। हमेशा  बाथरुम में घुसी रहती है। अभी भी इंतजार करती है कि दरवाजे पर पहुंचते ही उसे दबाऊँ! और उसकी बेवकूफी भरी मुस्कुराहट! पहले कभी दिलचस्प हुआ करती थी उसकी यह बेवकूफी भरी मुस्कुराहट भी। पर वह समय काफी पहले बीत चुका है। अब वह मुस्कुराहट उसके चेहरे पर मेरे दर्द का बयान है।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि आखिर साली किस चीज की बनी है। मेरा मतलब है सारा दिन बस खाना और सोना और वही आवाज वाली चाय बनाना। और टीवी देखना। धार्मिक चैनल; आस्था, संस्कार, प्रेरणा, मिरैकल, वगैरह, वगैरह। कोई चूतिया बाबा बताता रहता है कि जीवन क्या है? ख़ुशी  क्या है? कर्म क्या है?

अच्छा भाइयो, जीवन पाखाना है। ख़ुशी इसमें है कि अच्छी तरह से पाखाना हो जाए। और कर्म है अपने पाखाने को साफ करना।

मेरी मानिए। उन बाबाओं को कुछ भी मालूम नहीं है।

अरेंज मैरेज! बस बताने के लिए कि कहीं आप कुछ और न सोच बैठें। मेरे माता-पिता मेरे लिए एक गाय चाहते थे। सो वे मेरे लिए ले आए। बस, यह गाय बोलने लगी।

इस गाय की और मेरी एक वारिस है। उसकी आंखें अपनी मां की तरह नहीं हैं। थोड़ी सी उलाहना भरी। वह मुझे पा बुलाती है। मेरे खयाल से इस कारण क्योंकि वह जानती है कि वह हमारी अधूरी इच्छा का परिणाम थी।

जीवन ने मुझे टीना के रूप में सांत्वना पुरस्कार दिया है। मेरी निजी सहायिका। मेरी अपनी, अंतरंग, मेरे लिए सब कुछ करने वाली। उसकी भी शादी हो चुकी है और एक बच्चा भी है।
टीना ये भी है वो भी है और बहुत कुछ और भी है।
समझौतों की इस बावली दुनिया के लिए हम बिल्कुल माकूल ठहरते हैं।

औरत

वे मुझे नहीं चाहते, मैं जानती हूं। वे मुझे क्यों नहीं चाहते, मैं यह भी जानती हूं। उनमें मुझे बताने की मर्दानगी क्यों नहीं है, मैं ये नहीं जानती।

मुझे उनसे बातें करना अच्छा लगता है... चाहती हूं कि उनको भी अच्छी लगूं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे मुझे एप्रीसिएट नहीं करते। उन्होंने ही मुझे यह शब्द सिखाया था- एप्रीसिएट करना!

मैं तो उनको हमेशा एप्रीसिएट करती हूं लेकिन वे मुझे कभी नहीं करते। मैं बहुत कोशिश करती हूं लेकिन वे कभी एप्रीसिएट नहीं करते। मैं पढ़ी-लिखी, समझदार दिखने की भी भरसक कोशिश करती हूं लेकिन वे कभी एप्रीसिएट नहीं करते।

मैंने तो नौ महीनों तक उनका बच्चा अपनी कोख में पाला लेकिन उन्होंने इसको भी एप्रीसिएट नहीं किया। पहले मुझे यह डर था कि वे मुझे बच्चा गिरवा लेने के लिए कहेंगे। इसलिए यह बात मैंने उनको तीसरे महीने बताई। इस तरह माया पैदा हुई। उन्होंने एप्रीसिएट नहीं किया।

उनको मेरा संभोग करते समय आवाजें निकालना भी पसंद नहीं। इसीलिए मैं अब हर कहीं आवाजें करती रहती हूं। अगर उनको लगता है कि दरवाजे के पास मुझे उस तरह से दबाना काफी है तो उनको और अच्छी तरह से करना चाहिए। उनको तो लगता है मीठे बोल ही काफी होते हैं। वे मुझे लेकर कहीं भी नहीं जाते क्योंकि उनको शर्म आती है। वे माया से भी बात नहीं करते। शायद उनको लगता है मैं कोई गाय हूं।

मैं एप्रीसिएट नहीं करती।

उनका चक्कर चल रहा है। मैं जानती हूं। औरतें हमेशा समझ जाती हैं। हमेशा। वे औरतें जिनके साथ धोखा हुआ हो? मेरे खयाल से वे धोखा खाना चाहती भी हैं। मैंने उसकी आवाज सुनी है। मैंने उनके ऑफिस में फोन किया था और उसी औरत ने फोन उठाया था। उसने कहा था कि मैं होल्ड करुं तब तक वह ट्रांसफर कर रही है। उसकी कांपती आवाज। बातें करते-करते बीच में रुक जाना। मैं तुरंत समझ गई।

लेकिन मैं इसे एप्रीसिएट नहीं करती।

बाद में मेरे दिमाग में बुरे-बुरे खयाल आने लगे। बुरे ख्वाब। बुरी बातें। मैं उनकी मौत के बारे में सपने देखने लगी। या मैं उनको सचमुच मरा हुआ देखना चाहती थी? बहरहाल, असल बात यह है कि तब मुझे उदासी नहीं होती थी। मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ। नहीं। मैं झूठ बोल रही हूं।

असल में मैं इन सबको एप्रीसिएट करने लगी हूं।

इसलिए मैंने घर-घर की कहानी देखना छोड़ दिया और धार्मिक चैनल देखने लगी। बाबा लोग बकबक करते रहते हैं और मुझे नींद आ जाती है। उसी नींद में मुझे यह सपना आया। हां। वह सपना जिससे सब कुछ ठीक हो सकता था। जिससे सब कुछ बेहतर और सामान्य हो सकता था। मुझे और माया को ख़ुशी मिल सकती थी।

मुझे बस टीना के पति के बारे में पता करना था। वह कहां काम करता है?
मैंने उसे फोन करके बता दिया कि उसकी पत्नी क्या गुल खिला रही है? उसने मुझसे पूछा मैं कौन हूं? मैंने फिल्मी स्टाइल में जवाब दिया- इससे कुछ फर्क पड़ता है क्या?

आज की शाम सब कुछ का फैसला हो जाएगा।
मुझे यह पसंद आया। जो होने वाला है उसे आप लोग भी एप्रीसिएट करेंगे।

प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात

दरवाजे की घंटी बजी। अजय ने नजरें उठाई।
मैं उठ रहा हूं।
प्लीज।
काजल ने रसोई में टंगी घड़ी की ओर देखा। वह सात बजा रही थी। अजय ने दरवाजा खोला।

दो आदमी खड़े थे। एक लंबा, एक ठिगना। ठिगने ने हाथ में राॅड पकड़ रखा था। वे दस मिनट अजय के जीवन के सबसे लंबे, दर्द भरे लम्हे थे। टीना के पति और उसके साथ आए आदमी ने वे हड्डियां तोड़ डालीं जिनके बारे में अजय को पता भी नहीं था कि वे थीं भी।

उन्होंने केवल उसकी पिटाई ही नहीं की, एक तरह से उसको निचोड़ डाला। फिर उस ठिगने ने उसके मुंह पर पैर रखकर कहा- टीना से दूर रहना।

काजल ने रसोई में गर्म चाय का एक घूंट लिया और मुस्कुराने लगी। प्यार के संबंध में वह छोटी सी बात यह है कि वह एक ही समय में रिसता भी रहता है और भरता भी जाता है।

चार महीने बाद

सब खुश हैं।
****

9 comments:

वाणी गीत said...

कल ही किसी अखबार में कार्टून देखा था ...गाय बहुत सीधी होती है ...मगर इसे परेशान करो तो ...उसके पास सींग भी होते हैं...!!

सागर said...

स गाय की और मेरी एक वारिस है। उसकी आंखें अपनी मां की तरह नहीं हैं। थोड़ी सी उलाहना भरी। वह मुझे पा बुलाती है। मेरे खयाल से इस कारण क्योंकि वह जानती है कि वह हमारी अधूरी इच्छा का परिणाम थी।

तमाम कोशिशों के बावजूद वे मुझे एप्रीसिएट नहीं करते। उन्होंने ही मुझे यह शब्द सिखाया था- एप्रीसिएट करना!

अंत में...

प्यार के संबंध में वह छोटी सी बात यह है कि वह एक ही समय में रिसता भी रहता है और भरता भी जाता है।

नीरज पांडे का डायरेक्शन भी जबरदस्त है, वेंस डे जिस तरेह से बनाया वोह एक बानगी भर है... अलग अलग जिंदगी एक साथ एक कहानी से कैसे जुडी बेहतरीन है...

कहानी जबरदस्त थी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया....

कुश said...

कहानी बड़ी कातिल है.. ये भी है वो भी है वाली लाईन पसंद आई.. कम शब्दों में ताबड़तोड़ कहानी.. मज़ा आ गया..

anita said...

cruel reality......beautiful story.....

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

जबरदस्त लेखन....नीरज जी की वेंस्डे तो भुलाये नहीं भूलती,,,,,कहानी एक साथ यथार्थ व नाटकीयता का कलेवर विश्वासपूर्वक लेकर चलती है.....नीरज जी का ट्रीटमेंट फास्ट और वास्ट......रीयली....

Tushar Dhawal Singh said...

बिलकुल किसी फिल्म के स्क्रीन प्ले की तरह लगा इस कहानी का शिल्प. इस shot पर कट, कैमरा रोल, यहाँ से पॅन करता हुआ वह अगला shot ! सांसारिक प्रेम, उसकी घुटन और प्रेम की हिंसा, यह हमारे समय का प्यार है, जिसमे अपेक्षा, कुंठा, असुरक्षा और हिंसा, सब मिले होते हैं. कहीं न कहीं इसमें विवाह के institution पर भी एक subtle सा प्रश्न है. शिल्प मजेदार और ज्यादातर लिखी जा रही कहानियों से अलग लगा. रुचिकर लगा. जैसे फिल्मों में कम से कम शब्द में रियल टाइम और स्पेस को लाँघ कर बात अन्य माध्यमों से कहीं जाती है, वही इस कथा के शिल्प में भी महसूस हुआ.
लेखक और अनुवादक को इस सुन्दर कृति के लिए बधाई.
अनुराग, तुम भी न जाने कहाँ कहाँ से नायब मोती उठा लाते हो ! शुक्रिया दोस्त !
तुषार धवल

सोनू said...

हिंदी फ़िल्मों की पटकथा अंग्रेज़ी में लिखी जाती है। बाद में संवाद-लेखक उसका अनुवाद करता है। ऐसा सिर्फ़ भारत में ही होता है। इस वजह से हिंदी फ़िल्में, जनता की हिंदी की शब्दावली को उन्नत करने में नाकामयाब है।

फिर भी, नीरजजी ने खुद, और किसी दूसरे के साथ मिल कर अनुवाद किया, इसे सराहता हूँ।

nalin said...

mind blowing,it is very sensitive,kya aapko bhi darr lag raha hai ki aapki patni kahin aapko pitwa na dae?? hmmm

sumit jha said...

kahani me dam hai par lachila ho sakta tha..! shale main anubad nahi ho paya hai....! niraj jee or ranjan sir ko thanks kahunga....!