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विष्णु खरे के लेख पर एक बढ़त : रविभूषण

( हमने कुछ हफ्ते पहले विष्णु खरे का भारत भूषण पुरस्कार के तीस वर्षों की अवधि पर लिखा एक लेख छापा था. तब से विभिन्न हलकों में वह लेख विवाद और चर्चा के केंद्र में रहा और अब भी है. दिलचस्प यह है कि उस लेख का जिन लोगों ने विरोध किया है, उसका आधार लेख के भीतर की स्थापनाएं नहीं हैं. उससे उलझने की ईमानदार कोशिश नहीं दिखी है, जो एक तरह से चिंता का विषय है. यह इस बात का सूचक है कि हमारे बीच असहमत होने के लिए जो ज़रूरी अध्यवसाय लोगों को करना चाहिए, उसके बिना बात बनाने का चलन बढ़ रहा है. अपवादस्वरूप प्रभात खबर दैनिक में दिल्ली से दूर बैठे वरिष्ठ लेखक रविभूषण ने पुस्तक ''उर्वर प्रदेश'' की नोटिस लेने के साथ-साथ विष्णुजी के लेख का अपने ढंग से पाठ भी किया है. हम इसे साभार यहाँ दे रहे हैं. इस बीच दो पुष्ट-अपुष्ट बातें भी सामने आई हैं. पुष्ट यह कि विष्णु खरे ने तीस वर्षों तक भारतभूषण स्मृति पुरस्कार समिति में रहने के बाद उससे इस्तीफा दे दिया है और अपुष्ट किन्तु अपने आप में अत्यंत अलोकतांत्रिक और दुखद यह कि उर्वर प्रदेश का वह संस्करण जिसमें विष्णु खरे का विवादस्पद लेख छापा गया है, प्रकाशक उसे कुछ स्वनामधन्य लेखकों के दबाव में हटाकर छापने वाले हैं. अगर यह बात सच साबित होती है, तो हिंदी में वैचारिक असहिष्णुता की एक नई मिसाल ही कायम होगी ! ...)









3 comments:

विष्णु खरे के लटकों-झटकों ने ही, हर चीज़ को विवादास्पद बना देने की उनकी आदत ने ही इस इतने अच्छे पुरस्कार को भी विवादास्पद बना दिया। भले ही अब कितनी भी लीपा-पोती क्यों न की जाए, मन्तव्य को बदला नहीं जा सकता है। विष्णु खरे ने ठीक किया या
गलत अब इस पर बहस करने से क्या फ़ायदा। अब तो निर्णायक-मंडल ही बदला जा चुका है। और यह पुरस्कार की महत्ता को बनाए रखने के लिए आवश्यक था।
बस एक बात रविभूषण जी से यह कहनी है कि ’प्रजातन्त्र’ शब्द अब खटकने लगा है। अब तो लोकतन्त्र कहा जाना चाहिए। इंगलैंड की तरह भारत में अब किसी राजा या रानी का शासन नहीं है। इंगलैंड में तो प्रजातन्त्र हो सकता है, भारत में तो लोकतन्त्र ही है। जनता ही निर्णायक है।


vaise jo naya bana hai usase chelaa sanskrit ke khatm hone kaa koi aasaar nahi.

pata nahii yah kyaa thaa? kahiin kisi adhikari ki lekhakon ke khilaaf chaal to nahii?


मैं भी इस बात से सहमत हूं कि अकेले श्री सिर्फ विष्णु जी हैं जो हमेशा ठीक सोचते हैं,ठीक बोलते हैं, जिम्मेदारी से बोलते है,बिना ईष्र्या-द्वेश के बोलते हैं और निष्पक्ष बोलते हैं। अब भला वे इस सचाई का क्या करें इस हिन्दी संसार में वही सच बोलने वाले सही निर्णय देने वाले नीर-क्षीर का विवेक करने वाले झूठ को नंगा करने वाले और सच का साथ देने वाले कवि-आलोचक-विचारक-सुधारक-संहारक आदि अनेक कामों के लिए इस धरा-धाम पर अकेले भेजे गए हैं। यह तो उनकी बड़ी कृपा है कि इन बेइमान हिन्दी वालों में के बीच होना उन्हांेने स्वीकार कर लिया है और सारे विरोधों के बावजूद साफसफाई का महान काम करते रहते हैं। ऐसे महान निर्णायक आलोचक विचारक की अभिरक्षा में खड़ा हो कर रविभूषण जी ने भी अपनी ईमानदारी का परिचय दिया है। मगर ध्यान रहे रविभूषण जी, आप अपनी ईमानदारी और साफगोई की सनक में कभी विष्णु जी के प्रतिकूल कोई टिप्पणी न कर बैठियेगा। उनके लोकतंत्र में प्रतिकूल टिप्पणी का सिर्फ और सिर्फ उन्हें अधिकार है।


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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