Friday, October 23, 2009

ज़बां उर्दू : ६ : अहमद फ़राज़


( अहमद फ़राज़ की यह ग़ज़ल जितनी मकबूल हुई शायर के शब्दों में उतनी ही उसके बदनामी का सबब भी बनी। लेकिन फ़राज़ की मकबूलियत के सामने बदनामी जाती रही और पीढियों को इसका लुत्फ़ मिलता रहा। ज़बां उर्दू में इस दफा अहमद फ़राज़। हालाँकि इससे पहले भी उनकी एक ग़ज़ल की आमद सबद पर हुई थी, जब पिछले बरस वो इंतकाल फरमा गए थे। बहरहाल। यह ग़ज़ल। तस्वीर मधुमिता दस के कैमरे से।)

सुना है ...
सुना है लोग उसे आँख भरके देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आपको बर्बाद करके देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चशमे नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-व-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
यह बात है तो चलो बात करके देखते हैं
सितारे बामे फ़लक से उतरकर देखते हैं

सुना है दिन में उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात में जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है हश्न है उसकी गिज़ाल सी आँखें
सुना है उसको हिरण दश्त भरके देखते हैं

सुना है रात से बढ़कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चस्मगी क़यामत है
सो उसका सुरमा फ़रोश आह भरके देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धरके देखते हैं

सुना है आईना तिमसाल है ज़बीं उसकी
जो सादा दिल है उसे बन संवर के देखते हैं

सुना है जब से हमाईल है उसकी गर्दन में
सुना है चश्मे तसव्वुर से दश्ते इमकां में
पलंग ज़ाविये उसकी कमर के देखते हैं

सुना है उसके बदनकी तराश ऐसी है
वह सर-व-कद है मगर बे गुले मुराद नहीं
कि इसे शहर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहवाने तमन्ना भी डर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

रुकें तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो ज़माने उसे ठहर के देखते हैं

किसे नसीब कि बै पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर-व-दीवार घर के देखते हैं

कहानियां ही सही सब मुबालगे ही सही
अगर वह ख्वाब है ताबीर करके देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें की कूच कर जाएं
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र करके देखते हैं

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब लहजा बदल के देखते हैं

जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं

रहे वफ़ा में हरीफ़े खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकाल के देखते हैं

तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जलके देखते हैं

यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं

न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं

यह कौन है सरे साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ए यार चलके देखते हैं
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Monday, October 12, 2009

आखिरी वाक्य

वह बस में है। दफ्तर के शुरूआती दिनों से ही उसने इसे रीडिंग रूम बना लिया है। उसे जगह मिल जाए, वह भी खिड़कीवाली, इसके लिए वह दो स्टॉप पीछे चढ़ता है। हालाँकि एक यही वजह नहीं थी पीछे चढ़ने की।...जाम हर रोज़ लगता है और वक्त उससे काटे नहीं कटता। उसके हाथ में कामू के नोटबुक्स हैं। थैले में थोड़ा कोएटजी और क्लीमा। ...बस अभी गर्ल्स हॉस्टल के स्टॉप पर रुकी है। यहाँ वह बस नहीं, ऑटो लेने आती थी। वह लड़के की तरह कभी बस में नहीं चली। लड़का ख़ुद भी जब उसके साथ उन दिनों जाता था, तो ऑटो लेता था...अब ऑटो पर चढ़ने के पहले वह कई दफा सोचता है।...

बस में भीड़ और शोर बढ़ रहा है। आश्रम से एक चूरन बेचनेवाला चढ़ा है और अपनी बेलौस आवाज़ में चूरन बेच रहा है। उसका यह कार्यक्रम कोई दस मिनट चलेगा।...उसके लिए ध्यान लगाना दूभर हो रहा है। उसने टिकट को बुक-मार्क बना कर किताब बंद कर दी है। उसके मन में कामू की कुछ पंक्तियाँ वन-लाइनर की तरह आज फ़िर खुब गई हैं, जिसे वह ज़ज्ब करने की कोशिश कर रहा है : There is always a part of man that refuses love. It is the part that wants to die. It is the part that needs to be forgiven... 

पहले उसने ये पंक्तियाँ अपने प्रिय लेखक की किताब में समर्पण पंक्तियों की जगह पढ़ी थी। तब वह बहुत छोटा था, और सिवाय इसके की उसे ये भा गई थीं, और कुछ समझ में नहीं आया था। वर्षों बाद हॉस्टल वाली लड़की की 'ढुलमुल-सी हाँ-ना' के बाद वह इन पक्तियों के बीच अपने लिए एक अर्थ पा सका था। एक सांत्वना। हल्की राहत।

...उसने इन पंक्तियों में से आखिरी को बिना लिखे उसे मैसेज किया था। थोड़ी ही देर बाद उधर से एक स्माइली के साथ जवाबी मैसेज आया ...वेरी ट्रू, आई स्वे़र... ये उसके आखिरी शब्द थे। अबोले दिन बीतते रहे। लड़के ने उन्हीं दिनों अपने तईं अबोलेपन की लिपि ईजाद की।

... उसे इस बात का कभी-कभी अफ़सोस होता है कि मैसेज में उसने आखिरी वाक्य भी क्यों नहीं लिख भेजा! शायद वह सच को तब महज हैरत भरी खुशी से देखने की बजाय किसी और निगाह से भी देखती...शायद? ...लड़के को झपकी आ रही है...
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( ऊपर एरलेंड म्‍योर्क की पेंटिंग : मेलंकली )

Saturday, October 10, 2009

विष्णु खरे का लेख

( महान जर्मन कवि-लेखक गोएठे के सुप्रसिद्ध काव्य-नाटक 'फाउस्ट' का विष्णु खरे कृत अनुवाद हाल ही में प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली से छप कर आया है. यहाँ दिया जा रहा लेख अनूदित पुस्तक की भूमिका है, जिसके स्वतंत्र-पाठ का भी अपना मह्त्व है. इसे छापने की स्वीकृति देने के लिए हम लेखक के आभारी हैं. )

हम फाउस्ट क्यों पढ़ें ?

नाटक, टेलिविज़न, फ़िल्म तथा गल्प-साहित्य तक के क्षेत्रों में आजकल कथानकों का पेशेवर एक-पंक्तीय सार-संक्षेप ( वन लाइनर ) मांगने या देने का नियम-सरीखा है। 'फाउस्ट' का ऐसा खुलासा कुछ इस प्रकार होगा : ''मानवता के शत्रु के प्रलोभनों में फंसकर एक संशयग्रस्त बुद्धिजीवी किस तरह अपनी आत्मा तथा

अपनी निरीह प्रेमिका को घनघोर नैतिक और भौतिक संकट में दल देता है।''

'शैतान' और 'शैतानी' शब्द दक्षिण एशिया में इस्लामी सभ्यता की उपस्थिति के कारण ही प्रचलित हुए क्योंकि शैतान की अवधारणा सामी ( सेमिटिक - यहूदी, ईसाई, इस्लामी ) आस्थात्रयी की आदिमिथकों से उपजती है। 'याहवेह', 'येहोवा', 'गॉड' या 'अल्लाह' सृष्टि के आरम्भ में फरिश्तों को अस्तित्व में लाता है जिसमें सेटन, शैतान या इब्लीस और एडम या आदम भी है। ये सारे फ़रिश्ते अजर-अमर थे। सामी ईश्वर ने आदम (मानव) को अपनी ही छवि में सिरजा है। सारे फरिश्तों में उसे सर्वश्रेष्ठ का दर्ज़ा देकर ईश्वर चाहता है कि बाकी सारे फ़रिश्ते आदम के सामने झुकें। बाकी सब झुकते भी हैं, सिर्फ़ शैतान गहरी ईर्ष्या और घृणा के कारण आदम का सिजदा करने से इनकार कर देता है। बाद में शैतान ही आदम की संगिनी 'हव्वा' को प्रलोभन देता है जिसके फलस्वरूप आदम और हव्वा को मर्त्य बनाकर उन्हें हमेशा के लिए जन्नत यानी स्वर्ग से निकल दिया जाता है। धरती पर आकार आदम और हव्वा सहित उनकी सारी संतान, यानी समूची मानवीयता, मरने के लिए अभिशप्त हो जाती है। शैतान किंतु अन्य फरिश्तों के साथ अमर है और मानव का सबसे बड़ा शत्रु है।

विधान ऐसा है कि सामी ईश्वर, यानी याहवेह, गॉड या अल्लाह, चाहकर भी शैतान का विनाश नहीं कर सकता। शैतान कभी सोता भी नहीं है, एक शाश्वत जागृति में वह सिर्फ़ मानव के भौतिक तथा आध्यात्मिक विनाश की षड्यंत्री योजनाओं को अंजाम देने में जुटा रहता है। सामी ईश्वर कभी मानव को बचाता है, कभी नहीं बचा पता लेकिन शैतान को नष्ट करना तो दूर, वह उसे निष्क्रिय भी नहीं कर पाता या नहीं करना चाहता। ऐसा लगता है जैसे शैतान की एक समांतर सत्ता हो। भारतीय मूल की बौद्ध तथा जैन जैसी नास्तिक आस्थाओं में भी 'मार' सरीखी शैतान से मिलती-जुलती अवधारणा भले ही हो, वह कोई शाश्वत सक्रिय उपस्थिति नहीं है, 'अशुभ' अथवा 'पाप' जैसे प्रत्यय और उनके प्रतीक भले ही हों। असस्थाओं के उस परेशान कर देने वाले महामेले में, जिसे 'हिन्दू धर्म' जैसे नितांत अपर्याप्त नाम से पुकारा जाता है, 'ईश्वर' तो कोई हैं लेकिन उन्हें चुनौती देने वाला कोई मृत्युंजय, लगभग सर्वशक्तिमान, शैतान-जैसा देवता, देवदूत, पात्र अथवा चरित्र नहीं है। दक्षिण एशियाई मूल के धर्मों के लिए यह कल्पनातीत है कि ईश्वर का कोई स्थाई, पापिष्ट, सशक्त प्रतिद्वंद्वी भी हो।

कभी-कभी लगता है कि सामी शैतान, जिसका यूनानी नाम मेफिस्टोफेलीस है, सामी ईश्वर के किसी संभावित नकारात्मक आयाम का अवतार ही है। यदि निर्गुण निराकार ब्रह्म को छोड़ दें तो शेष सभी ईश्वरों में क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिकार आदि की 'मानवीय' भावनाएं प्रचुर मात्रा में देखि जा सकती हैं। शैतान को इतना अधिकार ईश्वर के संज्ञान के बिना कैसे मिल सकता है कि वह मानव को पतन की ओर ले जा सके - ईश्वर स्वयं मानव को अमानवीय भावनाओं से मुक्त क्यों नहीं रखता? वह सीधे-सीधे या शैतान के मध्यम से मानव को संकट में क्यों डालता है? मानव को यदि श्रेष्ठ सिद्ध करना ही है तो उसे अग्नि-परीक्षाओं से ही क्यों गुजरना पड़े?

ये वे प्रश्न हैं जिन पर आस्तिकों और नास्तिकों के बीच ही नहीं, आस्तिकों और आस्तिकों के बीच भी बहस होती आई है और तब तक चलती रहेगी जब तक ईश्वर के अस्तित्व या अनस्तित्व से मानव का प्रत्यक्ष साक्षात्कार न हो ले। शैतान के दुस्साहस की सीमा तो उस प्रकरण में देखी जा सकती है जब वह स्वयं ईश्वरपुत्र ईसा को आकाश में ले जाकर कहता है कि यदि तू अपने पिता में आस्था को तज दे तो मैं तुझे इस सारी सृष्टि का स्वामी बना दूँगा। ईसा ने तब वह अमर वाक्य कहा था : तू मेरे ( सामने से हटकर ) पीछे चला जा, शैतान! कुछ ऐसी ही कोशिश शैतान ने मुहम्मद के साथ की थी जब उसने धोखा देकर कुछ मूर्तिपूजन-समर्थक आयतें उतार दी थीं किंतु मुहम्मद शैतान की साजिश को समझ गए और उन्होंने उन आयतों को रद्द कर दिया। यही प्रकरण सलमान रुश्दी के विवादग्रस्त तथा प्रतिबंधित उपन्यास 'द सैटनिक वेर्सेज' ( शैतानी आयतें) के केन्द्र में है जिस पर अभी तक ईरान का जानलेवा फतवा लागू है।

ज़ाहिर है कि ईसा मसीह और हज़रात की तुलना में गोएठे के काव्य-नाटक का नायक फाउस्ट एक बहुत कमतर इंसान है। वह एक ईसाई बुद्धिजीवी है जो यूरोपीय 'रेनासां' (पुनर्जागरण) तथा 'रेफर्मेशन' ( संशोधन) का उत्पाद है किंतु ब्रह्माण्ड, अस्तित्व, ईश्वर, सत्-असत् तथा स्वयं अपने भौतिक प्रलोभनों की समस्याओं से ग्रस्त है। स्वर्ग में बैठा हुआ इश्वर उसे अपना भक्त मानता है और शैतान इश्वर से बाज़ी लगता है कि वह फाउस्ट को उसके विवेक और नैतिकता के मार्ग से गिरा देगा। धरती पर पहुँच कर मेफिस्टोफेलीस अपने भयावह और घिनौने षड़यंत्र में लग जाता है और जान लेता है कि फाउस्ट एक किशोरी को बहुत चाहता है और उसका प्रेम पाने के लिए कुछ भी -शैतान का साथ और शिष्यत्व - स्वीकार करने को भी तैयार है। किन्तु फाउस्ट की किशोर प्रेमिका मार्गरेट या ग्रेट्षेन ईश्वर में सम्पूर्ण आस्था रखने वाली एक धर्मभीरु प्राणी भी है। वह अपने प्रेमी फाउस्ट के अशुभ मित्र मेफिस्टो की वास्तविकता जानती तो नहीं है किन्तु यह अहसास उसे है कि वह कोई पापात्मा है। मेफिस्टो की योजना अब मार्गरेट को नैतिक और भौतिक रूप से नष्ट कर देने की है ताकि परिणामस्वरूप फाउस्ट भी पराजित हो जाये और स्वयं मेफिस्टो इस तरह ईश्वर को निचा दिखा सके। किन्तु स्वर्ग में बैठा हुआ ईश्वर इस सब पर अपनी दिव्यदृष्टि रखे हुए है।

गोएठे की इस कालजयी कृति के विषय शाश्वत हैं - सत् और असत्, पाप और पुण्य, अपराध और दंड, प्रलोभन और संयम, प्रेम और वासना, बंधन और मुक्ति, व्यक्ति और समाज, स्वर्ग और नरक, नर और नारी, संशय और विवेक, प्रकाश और अंधकार। शैतान तमस और प्रलोभन का प्रतिनिधि है, फाउस्ट संदेह और लालसा का, जबकि मार्गरेट निर्दोषिता, पावनता और ईश्वरभीरुता का प्रतीक है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि 'फाउस्ट' एक उबाऊ, उपदेशों से सराबोर 'मोरैलिटी प्ले' है ( नैतिकतावादी नाटक) है। बेशक उसकी गहरी व्याख्या की कभी उपेक्षा नहीं की जा सकती किन्तु एक नाटक के तौर पर वह अत्यंत पठनीय, दिलचस्प और मार्मिक कृति है जो मूलतः मानवीय है। इसमें 'महाभारत', यूनानी तथा शेक्सपियरीय कथानकों का तनाव, औत्सुक्य, नाटकीयता, हर्ष और विषाद के सारे लक्षण मौजूद हैं।

फाउस्ट जैसी हर महान कृति चूँकि प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वबोध का प्रतिफलन होती है इसलिए वह हर युग में किसी न किसी तरह प्रासंगिक होती रहती है क्योंकि अंततः उसके केंद्र में म्सानव-जीवन, उसकी विदाम्ब्नाएं और समस्यां, उसके हर्ष-विषाद, जय-पराजय, उत्थान-पतन और कामदी एवं त्रासदी होते हैं। गोएथे को शायद इसका अनुमान तक न रहा होगा कि २१ वीं सदी तक आते-आते विश्व केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, शैतान के कितने अवतार हो चके होंगे और फाउस्ट तथा ग्रेट्षेन के सामने कैसे प्रलोभन उपस्थित हो जायेंगे। गोएथे विश्व-साहित्य ( वेल्ट लिटेराटूअर) की अवधारणा का जनक था किन्तु विश्व-बाज़ार, विश्व-पूंजीवाद, वैश्विक ( नव) साम्राज्यवाद, वैश्विक-आतंकवाद आदि की कल्पना भला उसे कैसे हो सकती थी और अब तो विश्व इतनी तेजी से बदल रहा है कि हम अगले वर्ष की कल्पना भी नहीं कर सकते, अगली शताब्दियों की तो बात ही बहुत दूर है। आज मेफिस्टो राष्ट्रों, राजनीतियों, राजनेताओं, धर्म के भ्रष्ट और मानवद्रोही संस्करणों, पूंजीवाद, बाजारवाद, माल-संस्कृति, (अ) नैतिक स्वच्छन्दतावाद, संचार-माध्यमों, 'लाइफ स्टाइल', 'पेज थ्री', माफिआओं, विज्ञापनों, 'हिअर-एंड-नाउ', 'कार्पेडिएम' आदि के माध्यम से करोडों प्रौढ़ और युवा फाउस्‍टों और ग्रेट्षेनों को प्रलोभन और विनाश के वापसीविहीन मार्ग पर ले जा रहा है।

सारा संसार धनकुबेरों और मार्की द साद की विश्वव्यापी वाल्पुर्गिसरात्रि में बदल गया है। बल्कि कभी-कभी लगता है कि प्रलुब्ध होने के लिए आज के हम फाउस्‍टों और ग्रेट्षेनों को मेफिस्टो की ज़रूरत रही ही नहीं, ठीक उसी तरह जैसे ड्रैकुला को सिर्फ एक बार अपने शिकार की गर्दन का खून पीने की ज़रूरत होती है जिसके बाद शिकार खुद एक नए शिकारी ड्रैकुला में बदल जाता है और इस तरह यह संक्रामक सिलसिला अनंत होता चला जाता है। आज मानवता ही और अधिक मेफिस्टो, फाउस्ट और ग्रेट्षेन बनती जा रही है।

किन्तु चूँकि इसका अहसास हमें है, ठीक इसीलिए हममें अपनी सभ्यता के मेफिस्‍टोवाद का सामना करने का संकल्प और माद्दा भी बचा हुआ है। केवल इश्वर की इच्छा और कृपा पर निष्क्रियता से निर्भर रहते हुए हम अपने बीच मौजूद मेफिस्टो से बच नहीं सकते। क्या कभी-कभी ऐसा नहीं लगता कि वह सर्वशक्तिमान स्वयं मेफिस्टो के कई अवतारों में हमारी परीक्षा ले रहा है? यदि उसने हमें मेफिस्टो दिया है तो उसी ने हमें सनातन और समसामयिक शैतानों पर विजय प्राप्त करने वाला विवेक, विचारधारा, भविष्य-स्वप्न और नैतिक संकल्प भी दिए होंगे। ईश्वर की अनुकम्पा से ही अब हमें ईश्वर की ज़रूरत नहीं रही, जैसे धर्मों के सरे योगदान के बाद अब हमें धर्मों की ज़रूरत नहीं रही।

आज हमारे पास गोएठे जैसे दृष्टा और 'फाउस्ट' -जैसी कालजयी नैतिक कृतियाँ हैं। मानवतावादी, समतावादी, प्रगतिकामी आस्थाएँ और विचारधाराएँ हमारे साथ हैं। 'फाउस्ट' कोई एकमात्र कृति नहीं जो हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करेगी या चेतावनी देगी, जिस तरह कोई एक ईश्वर, कोई एक धर्म, कोई एक धर्मग्रन्थ या कोई एक मसीहा नहीं जो हमें बचायेगा, किन्तु इन सबका प्रगतिधार्मा सार ही हमें अपना उद्धार करने में सहायता देगा। तब वह शाश्वत सवेरा होगा जिसके उजाले में मेफिस्टो की सारी शक्तियां चली जाती हैं।
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Wednesday, October 07, 2009

पहली कहानी : नीरज पाण्डेय

 ( नीरज पाण्डेय की ख्याति वेंसडे फिल्म से है. वे अपनी फिल्मों के लिए खुद लिखते हैं. यह फिल्म से बहार उनकी पहली कहानी है. इसे नीरज और उनके मित्र प्रभात रंजन ने मिलकर अनूदित किया है. हम दोनों के आभारी हैं.)

प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात

उसने तीसरी घंटी पर दरवाजा खोला।
मैं बाथरुम में थी!
और तुम वहां क्या कर रही थी?

पुरुष ने मुस्कुराकर उसे चूम लिया। वह शरमा गई। उसने उसके नितंबों को दबाया। स्त्री ने उसके सीने को थपथपाया। पुरुष ने अपना बैग नीचे रखा और मेल देखने लगा।

वह रसोई में गई और चाय बनाने लगी।
पुरुष हाॅल में बैठा क्रेडिट कार्ड का स्टेटमेंट देखने मशरूफ है।
कुछ बर्तन खड़खड़ाए और...

पुरुष

पता नहीं साली बिना आवाज किए चाय बनाना कब सीखेगी? मेरा मतलब है, आप ही बताइए, चाय बनाने में तो कोई आवाज नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसी कुतिया है कि पूछिए नहीं... ये कभी नहीं सीखने वाली है।

अब आएगी मर्तबान की आवाज, अब कैबिनेट खोलने की - अब बंद करने की आवाज और गुनगुनाने की आवाज कहां गई? हां... वह रही!

सात साल... चुतियापे से भरे सात साल हो गए लेकिन उसमें रत्ती भर बदलाव नहीं आया। हमेशा  बाथरुम में घुसी रहती है। अभी भी इंतजार करती है कि दरवाजे पर पहुंचते ही उसे दबाऊँ! और उसकी बेवकूफी भरी मुस्कुराहट! पहले कभी दिलचस्प हुआ करती थी उसकी यह बेवकूफी भरी मुस्कुराहट भी। पर वह समय काफी पहले बीत चुका है। अब वह मुस्कुराहट उसके चेहरे पर मेरे दर्द का बयान है।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि आखिर साली किस चीज की बनी है। मेरा मतलब है सारा दिन बस खाना और सोना और वही आवाज वाली चाय बनाना। और टीवी देखना। धार्मिक चैनल; आस्था, संस्कार, प्रेरणा, मिरैकल, वगैरह, वगैरह। कोई चूतिया बाबा बताता रहता है कि जीवन क्या है? ख़ुशी  क्या है? कर्म क्या है?

अच्छा भाइयो, जीवन पाखाना है। ख़ुशी इसमें है कि अच्छी तरह से पाखाना हो जाए। और कर्म है अपने पाखाने को साफ करना।

मेरी मानिए। उन बाबाओं को कुछ भी मालूम नहीं है।

अरेंज मैरेज! बस बताने के लिए कि कहीं आप कुछ और न सोच बैठें। मेरे माता-पिता मेरे लिए एक गाय चाहते थे। सो वे मेरे लिए ले आए। बस, यह गाय बोलने लगी।

इस गाय की और मेरी एक वारिस है। उसकी आंखें अपनी मां की तरह नहीं हैं। थोड़ी सी उलाहना भरी। वह मुझे पा बुलाती है। मेरे खयाल से इस कारण क्योंकि वह जानती है कि वह हमारी अधूरी इच्छा का परिणाम थी।

जीवन ने मुझे टीना के रूप में सांत्वना पुरस्कार दिया है। मेरी निजी सहायिका। मेरी अपनी, अंतरंग, मेरे लिए सब कुछ करने वाली। उसकी भी शादी हो चुकी है और एक बच्चा भी है।
टीना ये भी है वो भी है और बहुत कुछ और भी है।
समझौतों की इस बावली दुनिया के लिए हम बिल्कुल माकूल ठहरते हैं।

औरत

वे मुझे नहीं चाहते, मैं जानती हूं। वे मुझे क्यों नहीं चाहते, मैं यह भी जानती हूं। उनमें मुझे बताने की मर्दानगी क्यों नहीं है, मैं ये नहीं जानती।

मुझे उनसे बातें करना अच्छा लगता है... चाहती हूं कि उनको भी अच्छी लगूं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे मुझे एप्रीसिएट नहीं करते। उन्होंने ही मुझे यह शब्द सिखाया था- एप्रीसिएट करना!

मैं तो उनको हमेशा एप्रीसिएट करती हूं लेकिन वे मुझे कभी नहीं करते। मैं बहुत कोशिश करती हूं लेकिन वे कभी एप्रीसिएट नहीं करते। मैं पढ़ी-लिखी, समझदार दिखने की भी भरसक कोशिश करती हूं लेकिन वे कभी एप्रीसिएट नहीं करते।

मैंने तो नौ महीनों तक उनका बच्चा अपनी कोख में पाला लेकिन उन्होंने इसको भी एप्रीसिएट नहीं किया। पहले मुझे यह डर था कि वे मुझे बच्चा गिरवा लेने के लिए कहेंगे। इसलिए यह बात मैंने उनको तीसरे महीने बताई। इस तरह माया पैदा हुई। उन्होंने एप्रीसिएट नहीं किया।

उनको मेरा संभोग करते समय आवाजें निकालना भी पसंद नहीं। इसीलिए मैं अब हर कहीं आवाजें करती रहती हूं। अगर उनको लगता है कि दरवाजे के पास मुझे उस तरह से दबाना काफी है तो उनको और अच्छी तरह से करना चाहिए। उनको तो लगता है मीठे बोल ही काफी होते हैं। वे मुझे लेकर कहीं भी नहीं जाते क्योंकि उनको शर्म आती है। वे माया से भी बात नहीं करते। शायद उनको लगता है मैं कोई गाय हूं।

मैं एप्रीसिएट नहीं करती।

उनका चक्कर चल रहा है। मैं जानती हूं। औरतें हमेशा समझ जाती हैं। हमेशा। वे औरतें जिनके साथ धोखा हुआ हो? मेरे खयाल से वे धोखा खाना चाहती भी हैं। मैंने उसकी आवाज सुनी है। मैंने उनके ऑफिस में फोन किया था और उसी औरत ने फोन उठाया था। उसने कहा था कि मैं होल्ड करुं तब तक वह ट्रांसफर कर रही है। उसकी कांपती आवाज। बातें करते-करते बीच में रुक जाना। मैं तुरंत समझ गई।

लेकिन मैं इसे एप्रीसिएट नहीं करती।

बाद में मेरे दिमाग में बुरे-बुरे खयाल आने लगे। बुरे ख्वाब। बुरी बातें। मैं उनकी मौत के बारे में सपने देखने लगी। या मैं उनको सचमुच मरा हुआ देखना चाहती थी? बहरहाल, असल बात यह है कि तब मुझे उदासी नहीं होती थी। मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ। नहीं। मैं झूठ बोल रही हूं।

असल में मैं इन सबको एप्रीसिएट करने लगी हूं।

इसलिए मैंने घर-घर की कहानी देखना छोड़ दिया और धार्मिक चैनल देखने लगी। बाबा लोग बकबक करते रहते हैं और मुझे नींद आ जाती है। उसी नींद में मुझे यह सपना आया। हां। वह सपना जिससे सब कुछ ठीक हो सकता था। जिससे सब कुछ बेहतर और सामान्य हो सकता था। मुझे और माया को ख़ुशी मिल सकती थी।

मुझे बस टीना के पति के बारे में पता करना था। वह कहां काम करता है?
मैंने उसे फोन करके बता दिया कि उसकी पत्नी क्या गुल खिला रही है? उसने मुझसे पूछा मैं कौन हूं? मैंने फिल्मी स्टाइल में जवाब दिया- इससे कुछ फर्क पड़ता है क्या?

आज की शाम सब कुछ का फैसला हो जाएगा।
मुझे यह पसंद आया। जो होने वाला है उसे आप लोग भी एप्रीसिएट करेंगे।

प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात

दरवाजे की घंटी बजी। अजय ने नजरें उठाई।
मैं उठ रहा हूं।
प्लीज।
काजल ने रसोई में टंगी घड़ी की ओर देखा। वह सात बजा रही थी। अजय ने दरवाजा खोला।

दो आदमी खड़े थे। एक लंबा, एक ठिगना। ठिगने ने हाथ में राॅड पकड़ रखा था। वे दस मिनट अजय के जीवन के सबसे लंबे, दर्द भरे लम्हे थे। टीना के पति और उसके साथ आए आदमी ने वे हड्डियां तोड़ डालीं जिनके बारे में अजय को पता भी नहीं था कि वे थीं भी।

उन्होंने केवल उसकी पिटाई ही नहीं की, एक तरह से उसको निचोड़ डाला। फिर उस ठिगने ने उसके मुंह पर पैर रखकर कहा- टीना से दूर रहना।

काजल ने रसोई में गर्म चाय का एक घूंट लिया और मुस्कुराने लगी। प्यार के संबंध में वह छोटी सी बात यह है कि वह एक ही समय में रिसता भी रहता है और भरता भी जाता है।

चार महीने बाद

सब खुश हैं।
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Saturday, October 03, 2009

विष्णु खरे के लेख पर एक बढ़त : रविभूषण

( हमने कुछ हफ्ते पहले विष्णु खरे का भारत भूषण पुरस्कार के तीस वर्षों की अवधि पर लिखा एक लेख छापा था. तब से विभिन्न हलकों में वह लेख विवाद और चर्चा के केंद्र में रहा और अब भी है. दिलचस्प यह है कि उस लेख का जिन लोगों ने विरोध किया है, उसका आधार लेख के भीतर की स्थापनाएं नहीं हैं. उससे उलझने की ईमानदार कोशिश नहीं दिखी है, जो एक तरह से चिंता का विषय है. यह इस बात का सूचक है कि हमारे बीच असहमत होने के लिए जो ज़रूरी अध्यवसाय लोगों को करना चाहिए, उसके बिना बात बनाने का चलन बढ़ रहा है. अपवादस्वरूप प्रभात खबर दैनिक में दिल्ली से दूर बैठे वरिष्ठ लेखक रविभूषण ने पुस्तक ''उर्वर प्रदेश'' की नोटिस लेने के साथ-साथ विष्णुजी के लेख का अपने ढंग से पाठ भी किया है. हम इसे साभार यहाँ दे रहे हैं. इस बीच दो पुष्ट-अपुष्ट बातें भी सामने आई हैं. पुष्ट यह कि विष्णु खरे ने तीस वर्षों तक भारतभूषण स्मृति पुरस्कार समिति में रहने के बाद उससे इस्तीफा दे दिया है और अपुष्ट किन्तु अपने आप में अत्यंत अलोकतांत्रिक और दुखद यह कि उर्वर प्रदेश का वह संस्करण जिसमें विष्णु खरे का विवादस्पद लेख छापा गया है, प्रकाशक उसे कुछ स्वनामधन्य लेखकों के दबाव में हटाकर छापने वाले हैं. अगर यह बात सच साबित होती है, तो हिंदी में वैचारिक असहिष्णुता की एक नई मिसाल ही कायम होगी ! ...)