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विपिन कुमार शर्मा की चार कवितायें

{ कविता मेरे लिए न शौक की चीज़ है, न सामर्थ्य की, यह मेरे अन्दर छुपे एक क्षुब्ध व्यक्ति का प्रतिरोध है. मैं प्रायः तभी लिखता हूँ जब देश या समाज के समानांतर मेरे मस्तिष्क में बन रही स्थितियां बर्दाश्त के बहार हो जाती हैं. मैं महज अपनी मुक्ति के लिए नहीं लिखता, जो लोग मेरे सोच के दायरे में हैं, उन सबकी मुक्ति-आकांक्षा को अपनी मुक्ति से जोड़कर लिखता हूँ. यही वजह है की लिखने के बाद भी मेरे अन्दर की छटपटाहट कभी समाप्त नही होती. कविता मेरे लिए वाग्जाल नहीं, बल्कि हर तरह के जाल को काटनेवाला खंजर है. अपनी कविता में मैं बातों को उलझाना नहीं, बल्कि सुलझाना चाहता हूँ. इसीलिए सहजता को चुनौती की तरह लेता हूँ- कवि. }

कवि

श्लथ क़दमों से
लौटता है घर
कवि
धीरे-धीरे
भरके निकला था सुबह
कविताओं की टोकरी
बिकीं एक भी नहीं
वापिस लौटा है
लेकर,
भूख-प्यास
कुंठा-त्रास
और वही रोज़ की चिख-चिख
नंगे-अधनंगे बच्चे
हर सम्भव जगह
पिता पर झूल जाते हैं

उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए
परम संतोषी हैं
लेकिन कवि कुछ चाहता है
अपने बच्चों से

उन्हीं की भांति उमगती -विहंसती कवितायें
और गदबदे भी
( उनकी तरह कुपोषित नहीं)
पर बच्चों के पास कवितायें कहाँ !
न ही मालूम है किकैसे बनती हैं कवितायें
फटे बिवाइयों वाले
निरीह से पाँव
जाने कब से चुभ रहे हैं
कवि की आंखों में
दबे कन्धों और झुकी आंखों से
देख रहा है पत्नी की रोनी सूरत
आजिज़ होकर उठता है
बच्चों को धूल-गर्द की भांति
बदन से झाड़ते हुए
और पत्नी के होठों को
दोनों हाथों की उँगलियों से
निर्ममतापूर्वक खींचकर
कहता है -
'' हंसती रहो भाग्यवान !
संपादकों को
अब हास्य कवितायें चाहिए।''

हे मेरी तुम

अनेक दुखों के भार से
बेजार हुई जा रही, इन दिनों
'' हे मेरी तुम !''
मैं जानना चाहता हूँ
की हज़ार मुश्किलों के बीच
एकदम से मुस्करा पड़ने की
मजबूरी क्या है ?

मैंने तुमसे, तुम्हारी
हँसी तो नहीं मांगी थी
यह और बात, कि
लाचारी भी नहीं मांगी थी
ऐसा नहीं कि तुमसे सुख न चाहा
शायद ! ऐसा भी नहीं
कि तुमने मेरे सुख को समझा ही नहीं !

ख़ुद को टुकड़ा-टुकड़ा करके
बारी-बारी देती गईं तुम
और मैं संकोचवश यह न कह सका
कि मैं तुम्हारा पूरा चाहता हूँ
न ही यह, कि मैं
तुम्हें टुकड़ा होते नहीं देख सकता।

गाँधी के देश में

हमारे गाल पर
नहीं मारता अब तमाचा कोई
कि हम
तपाक से दूसरा गाल बढ़ा दें


अब तो चुभते हैं
उनके पीने दांत
खच्च से हमारी गर्दन पर
और उनकी सहस्त्र जिह्वाएँ
लपलपा उठते हैं
फ़व्वारे की तरह चीत्कार करते खून पर


गाँधी के इस देश में
हमें
ज़्यादा से ज़्यादा स्वस्थ होना होगा
ताकि हम उनकी खून की हवस बुझा सकें
या यह भी
कि उनकी यह आदत ही छुड़ा सकें


आदत

कभी भट्ठी में पिघलता लोहा भी
मनमानी पर उतर आता है
बन्दूक के बदले
हँसिया में ढल जाता है
मगर
खून पीने की आदत
बदल नहीं पाता है

****
( ऊपर दी गई पेंटिंग ''पोट्रेट ऑफ़ अ पोएट'' वेन कोस्तुरानोव की है।)

Comments

Apoorv said…
भाई आपकी प्रथम कविता पढ़ कर शैलेश मटियानी साहब की याद भिगो गयी आकर
..एक शेर कभी पढ़ा था
रोज खाली हाँथ जब घर लौट कर जाता हूँ मैं
मुस्करा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मै

आपकी बाकी की कविताओं पर प्रतिक्रिया अगली बार
और हाँ बहुत बेहतरीन चित्र है रचना के साथ
deepika said…
kavitaye bahut hi adbhud hain.padkkar bahut atmitayata mehsus hui hai.........
कवि की लाचारी..स्त्री को टुकड़े टुकड़े बनता देखने की मज़बूरी..गाँधी के देश में खून पीने की आदत..क्या नहीं कहा कविता में ..
बहुत शुभकामनायें ..!!
पारूल said…
हे मेरी तुम....बहुत अच्छी
VIVEK KASHYAP said…
IN BRIEF, I WILL SAY THAT THE POEM IS MARVELLOUS AND THE POET IS GREAT AND EXTRA BRILLIANT.THIS IS A BEAUTIFULL POEM BY A SMART POET.

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