Thursday, September 17, 2009

गिरिराज किराड़ू की सात कवितायें


( शिव कुमार गाँधी की चित्र-कृति A Woman with a Scenario . प्रतिलिपि से साभार )

{ हमेशा से तो नहीं पर पिछले कुछ समय से मेरी कविताओं में कई दूसरे लेखक, कलाकार (ज्यादातर लेखक ही) और उनका काम मौजूद रहने लगा है. लेकिन ये सात कवितायेँ तो दूसरो के काम के बिना संभव ही नहीं थीं - 'डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड' बोर्खेज़ की इसी शीर्षक वाली एक कहानी से निकलती है. 'संगतराश' के. आसिफ/अमान/कमाल अमरोही की मुगल-ए-आज़म से और 'बादशाह मैकबेथ' ज़ाहिर ही शेक्सपीयर के मैकबैथ से. उसी तरह दो अन्य फ्लाबेयर और रेणु के प्रसिद्ध फिक्शन से. 'दो अर्थ का भय' लिखते हुए रघुवीर सहाय की इसी शीर्षक से लिखी कविता दिमाग में थी. 'अभिव्यक्त' शायद विनोद कुमार शुक्ल की कई कविताओं में से या उनकी सब कविता की किसी अनुपस्थिति में से – कवि. }

संगतराश

शायद एक वही सब कुछ पहले से जानता था सब कुछ पहले से तराश रखा था उसने
वह हमेशा वीराने में रहता था और एक दिन अचानक उसके वीराने में जो बहार चली आयेगी
उसकी आँखें ग़ज़ब की होंगी जब दूसरे ख्वाब देख रहे होंगे वह बस अपनी आँखें देखेगी

वो हकीकत ही क्या जिसे मुजुस्तमा न बनाया जा सके वह बहार से कहेगा और बेतहाशा हंसने लगेगा

अभिव्यक्त


नीम का अर्थ पीपल था पीपल का बरगद बरगद का तुलसी इसी तरह कमल का गुलाब गुलाब का बेला बेला का बोगेनवीलिया पर शुक्र है पेड़ का अर्थ कोई पेड़ फूल का कोई फूल ही था इतना रहता था मैं मनुष्यों के बीच फिर भी कबीर का अर्थ घनानंद मीरां का अर्थ महादेवी नहीं था मेरी सारी गफ़लत उन के बारे में थी जो मनुष्य नहीं थे मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब मेरा अर्थ तुम हो जातीं अगर मैं अपना अर्थ रह गया होता मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब पेड़ों से झूल रही थीं लाशें हर तरफ और कई दिनों से विनोद कुमार शुक्ल की कोई कविता नहीं थी जीवन में

बादशाह मैकबैथ
(कवि अरूण कमल के लिये)
क्या हुआ बैंको के बेटे का शेक्सपीयर हमें नहीं बताता – कुछ समझे बादशाह?
उसकी कोई दिलचस्पी नहीं चुड़ैलों के बताये भविष्य में,
तुम्हें कुछ ख़बर भी है कौन बनेगा बादशाह तुम्हारे बाद?

जिस खंज़र ने डरा दिया था तुम्हें उसकी मूठ बर्नम की लकड़ी से तो नहीं बनी थी?
गौर से देखा था तुमने जब हवा में लहरा रहा था वह?

देखो, बादशाह देखो, तुम्हारी त्रासदी मृतक लिख रहे हैं
हिरण चुराने वाला शेक्सपीयर तो उनका लिपिक भर है

डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड

पियरे
मेनार्ड एक किताब लिखना चाहता है पर पहली मुश्किल तो यही कि वो खुद कोई नहीं उसकी जीवनी तो शायद है कोई जीवन नहीं दूसरी यह कि वह एक लिखी हुई किताब को किसी नये तरीके से नहीं लिखना चाहता ऐसा तो सभी लेखक करते ही हैं वह शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द वैसे ही लिखना चाहता है और बेचारा पियरे उसकी तीसरी मुश्किल यह कि वो सोचता है शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द लिख कर ही वो मौलिक लेखक हो पायेगा कि इसी तरह जैसा सभी लेखक नहीं करते वैसा करके ही वह एक लेखक हो पायेगा

कितना
खुशनसीब है पियरे मेनार्ड बस यही तीन मुश्किलें हैं उसकी जान को

पर
इतनी आसान किताब भी जिसमें उसे शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द फिर से लिखना भर है वह कभी पूरी नहीं लिख पायेगा किताबों की भूलभूलैया में घूमते हुए वह शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब के लेखक से टकरा जायेगा और कहेगा मेरी किताब को मुझसे पहले लिखकर आप मैं हो गये आपकी किताब को लिखते लिखते मैं आप हो गया हूँ क्या मिला आपको यह करके मैं कितना मजें में था बिना जीवन के अब चैन पड़ गया आपकी आत्मा को जी में आता है आपको दरिया में डुबा दूँ और किनारे बैठकर मुजरा करूँ आपके डूब मरने का इधर आप डूब मरते रहें उधर मैं खूब सारी बीयर पीता रहूँ

दो अर्थ का भय

अपमान बेहद था होने का रक्त के दरिया में दौड़ते घुड़सवार थे किसी और से नहीं
अपने आप से थी शर्मिंदगी हर साँस में हर शब्द का एक अर्थ दुख दूसरा मज़ाक था – जीवन में
कल्पना में पर नहीं था इनमें से कुछ भी
यही मेरा गुनाह कल्पना में सुखी था मैं

मादाम
बोवारी से क्षमा


वह मादाम बोवारी का अभिनय कर रही है
बिल्कुल अंतिम दृश्य है विष उसके शरीर में फैल रहा है वह क्षमा माँगती है
यह देखते हुए मैं उसके पति की भूमिका में हूँ
मैं भी उससे क्षमा माँगता हूँ –

क्षमा करो प्रिये, मैं इस कथा से अभी विदा नहीं ले सकता
तुम्हारा अंतिम संस्कार मेरा अंतिम संस्कार नहीं है
मैं तुम्हारा समाधिलेख नहीं हूँ
मैं जीवन का आज्ञाकारी पालतू हूँ
मुझे तुम्हारी याद की ही नहीं कब्र की भी देखभाल करनी है

क्षमा
करो, प्रिये, क्षमा

कहानी के फेर में

हिरामन
तीन कसमें खाता है
फिर किसी कहानी का सुपात्र नहीं बनूंगा
फिर किसी कहानीकार को अपने बारे में नहीं लिखने दूंगा
फिर किसी कहानी में अपना ही पार्ट नहीं करुंगा –

रेणु थोड़ा उदास हो कर उसे देखते हैं फिर तनिक हंसकर कहते हैं
जा रे जमाना, तू भी आ गया मेरी कहानी के फेर में!
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6 comments:

Pratyaksha said...

वाह ! (सात बार कहना चाहती थी :-)

Pramod Singh said...

दोस्‍त ही नहीं, इन दिनों प्रसन्‍नता भी कैसे तो मुश्किल से हाथ चढ़ती है. जब चढ़ती है तो ताज़्ज़ुब होता है यहीं इतना करीब थी और देखो, हम देख नहीं पाये चढ़ रही है!

कुछ सकुचाया-सा प्रसन्‍न हो रहा हूं, कि कहीं ज़माने के फेर में आके होनेवाली प्रसन्‍नता तो नहीं.. कई दिनों से जीवन में क्‍या-क्‍या नहीं था, थोड़ी कविता है, क्‍या कम है. जिओ, बाबू बीयर पिवैया.

prabhatranjan said...

girirajji ki kavitaon men sandarbhon ki sandarbhheenta hoti hai, sadharanta ke viprit vishishtata par bal hota hai aur abhivyakti ka nirala andaz. apne priya kavi ki kavitayen parhkar achha laga.
prabhat

Geet Chaturvedi said...

बहुत अच्‍छी.

मीनू खरे said...

वाह ! बहुत ही स्तरीय और मर्मस्पर्शी.

ओम पुरोहित'कागद' said...

bhai giriraj ji kiraru.vande!
bahut dino or lambi talash ke bad mile ho.iska shrey bhai piush daiya ko jata hai.piush ki e-mail aaj achanak mili.bas uska peechha karte karte aap tak pahunch bani.
yahan aa kar aapki 7 behtreen kavityen padhne ko mili.
badhai ho!
kabhi mere blog par bhi padharen-
www.omkagad.blogspot.com