Thursday, September 10, 2009

सबद पुस्तिका : १ : विष्णु खरे



(आगे दिए जा रहे लेख को विष्णुजी ने हमारे आग्रह पर यहाँ पुस्तिका स्वरुप छापने की अनुमति दी है. हम उनके आभारी हैं. यह लेख यों भूमिकास्वरुप कुछ संशोधनों के साथ राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार पर केंद्रित पुस्‍तक ‘उर्वर प्रदेश’ में छपा है. इस नाते लेख के अविकल छापने का आग्रह ज़ाहिर है दुतरफा रहा है. याद नहीं आता कि हिंदी में किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार के निर्णायक मंडल में रहते हुए उसके औचित्य, चयन-प्रक्रिया, निर्णायक और प्राप्तकर्ता के बारे में इससे पहले किसी ने इतना निर्भीक, तार्किक और ज़रूरी मूल्यांकन का यत्न किया है. इसमें दूसरों पर लिखते हुए खुद के निर्णयों को बख्शने की सलाहियत नहीं है और न ही यह एक लोकप्रिय विवाद को जन्म देकर उसमें केन्द्रीयता हासिल कर लेने की अपरिपक्व सोच की ही उपज है. इन मायनों में सत्तर के करीब विष्णु सौभाग्यवश अपने उन समकालीन और बुजुर्गवार लेखकों से भिन्न हैं जो कुछ ठोस लिखने की बजाए धौलधप्पा खेल हमें इंगेज रखने की लज्जाजनक कोशिश कर रहे हैं। साथ में दी गई पेंटिंग गोया की 'मेन रीडिंग' सीरीज से। )


एक पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा
विष्‍णु खरे

कोई ऐसा वार्षिक पुरस्‍कार, जिसे सरकारें या साहित्यिक-ग़ैर-साहित्यिक संस्‍थान प्रयोजित न कर रहे हों बल्कि एक कवि की स्‍मृति में उसके परिजनों ने स्‍थापित किया हो, जिसकी राशि लुभाने वाली न हो, जो 'पिछले वर्ष' प्रकाशित 35 साल की आयु से कम के किसी कवि की सिर्फ़ एक कविता पर दिया जाता हो, जिसका निर्णय पांच लेखक प्रति वर्ष बारी-बारी से स्‍वतंत्र रूप से करते हों, जो 1980 से लगातार दिया जा रहा हो और इस तरह 2009 में अपने तीस वर्ष पूरे कर चुका हो, आश्‍चर्य, हर्ष और अभिनंदन की भावनाएं जगाता है. इसमें संदेह नहीं कि भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार 'तार सप्‍तक' के यशस्‍वी कवि दिवंगत भारत जी की स्‍मृति को बनाए रखने के अपने मौलिक उद्देश्‍य में सफल रहा है.

लेकिन किसी भी पुरस्‍कार को मात्र उसके प्राथ‍मिक लक्ष्‍य की कामयाबी या असफलता पर नहीं आंका जाता. वह उसकी प्रतिज्ञाओं, उसके निर्वाह और उससे उत्‍पन्‍न परिणामों और प्रतिघातों पर परखा जाएगा. कुछ बहसें तो ऐसी होंगी, जिनका कोई हल होगा ही नहीं – मसलन क्‍या चर्चाधीन पुरस्‍कार के सारे निर्णायक इस योग्‍य और पूर्वग्रहमुक्‍त हैं कि वे पात्र कवि की 'पिछले वर्ष' की 'श्रेष्‍ठ' कविता जान और चुन सकें, क्‍या वे वाक़ई सारी वांछनीय कविताएं पढ़ चुके होते हैं, क्‍या सारे निर्णायक और हिंदी कविता के सभी कि़स्‍म के पाठक सचमुच सहमत हो पाते हैं कि पुरस्‍कृत कविता विचाराधीन वर्ष की श्रेष्‍ठ कविता है? प्रारंभिक भलाई यही मानकर चलने में है कि संसार का कोई भी पुरस्‍कार मतभेद और विवाद से परे हो नहीं सकता- यदि उसमें दिलचस्‍पी रखने वालों का जैसा-तैसा प्रबुद्ध बहुमत उसके पक्ष्‍ा में प्रतीत हो तो उसे वैध मानना होगा.

यदि समसामयिक हिंदी कविता में आपकी दिलचस्‍पी सामान्‍य से अधिक है या उसमें आपकी किसी भी कि़स्‍म की सक्रिय भागीदारी है तो पुरस्‍कार पर निर्णय देने के आपके मापदंड और जटिल होते जाएंगे. पहला सवाल यही किया जा सकता है कि क्‍या भारतजी इतने महत्‍वपूर्ण कवि और लेखक थे कि उनकी स्‍मृति को बनाए रखने के लिए कोई पुरस्‍कार स्‍थापित किया जाता? यह इसलिए कि जब हम आज के 'निजी' या 'पारिवारिक' पुरस्‍कारों पर नज़र डालते हैं तो दुर्भाग्‍यवश यह पाते हैं कि उनमें से कई ऐसे अज्ञातकुलशील दिवंगतों के नाम पर हैं जो नितांत साहित्‍यसंगीतकलाहीन थे - यद्यपि वैसा होना कोई अपराध नहीं – और उनके समर्थ वंशजों, शुभचिंतकों या मातहतों ने परस्‍पर अमरत्‍व तथा निजी प्रभाव-क्षेत्र और साख प्राप्‍त करने के लिए स्‍मृति पुरस्‍कार स्‍थापित कर डाले. भारतजी 'तार सप्‍तक' और उसके पहले और बाद की अपनी कविताओं के कारण ही नहीं, हिंदी उपन्‍यास पर अपने मौलिक शोध और साहित्‍य अकादेमी में भारतीय साहित्‍यों और हिंदी के लिए किए गए ठोस काम, अपने कुछ अप्रतिम अनुवादों और वाक़ई युवा प्रतिभाओं को सक्रिय प्रोत्‍साहन देने के लिए साहित्‍य में चिरस्‍थायी स्‍थान बना चुके हैं. उनके परिवार को न तो उनके लिए और न अपने लिए हिंदी या किसी भी अन्‍य क्षेत्र में किसी स्‍वार्थ-सिद्धि के लिए इस पुरस्‍कार का इस्‍तेमाल करना है. हिंदी में इतने असंदिग्‍ध औचित्‍य वाले पुरस्‍कार बहुत कम हैं.

समस्‍या निर्णायकों को लेकर हो सकती है. तीस वर्षों में निर्णायकों में से एक ही नाम बदला है- नेमिचंद्र जैन के देहावसान के बाद उनके स्‍थान पर इसी पुरस्‍कार के पहले विजेता और अब सुपरिचित प्रौढ़ कवि अरुण कमल को निर्णायक बनाया गया है वर्ना नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, विष्‍णु खरे और अशोक वाजपेयी 1980 से निर्णायक हैं. यह भी एक अच्‍छा संयोग है कि तीसवें पुरस्‍कार के निर्णायक अरुण कमल हैं, जो उनका प्रवेश-निर्णय है. जिस वर्ष (1979) में निर्णायक-मंडल तय हुआ है तब उसके युवतम सदस्‍य विष्‍णु खरे (39 वर्ष) और अशोक वाजपेयी (38 वर्ष) थे और उन्‍हें युवा ही कहा जाएगा. अशोक वाजपेयी अपने लेखन और सांस्‍कृतिक गतिविधियों से तभी पर्याप्‍त ख्‍याति अर्जित कर चुके थे यद्यपि विष्‍णु खरे का उस समय से लेकर अब तक साहित्‍य में तो क्‍या, कहीं भी क्‍या स्‍थान है यह कहना कठिन है. 'तार सप्‍तक' योजना के जन्‍मदाता और उसकी पांडुलिपि के मूल संयोजक-संपादक नेमिचंद्र जैन, जो स्‍वयं उसमें कवि के रूप में उपस्थि‍त हैं और भारतभूषण अग्रवाल के आजीवन मित्र और विवाह के बाद हमज़ुल्‍फ़ रहे, निर्णायक मंडल के वरिष्‍ठतम सदस्‍य थे. हिंदी के अनेक लेखकों की अनेक असहमतियां नेमिजी से हो सकती थीं किंतु उन जैसा कठोर साहित्यिक और व्‍यक्तिगत नैतिकता वाला, अपने विचारों, अवधारणाओं, मूल्‍यांकनों-निर्णयों पर अटल कवि-आलोचक-अनुवादक-सम्‍पादक, 'नो नॉन्‍सैंस' स्‍पष्‍टवादी बुद्धिजीवी हिंदी में शायद ही कोई दूसरा हो. उन्‍होंने हिंदी की सतत् पतनशील दुनिया में कभी इतना लोकप्रिय नहीं होना चा‍हा कि कोई पुरस्‍कारप्रार्थी उनके नज़दीक भी फटक सके. उनकी साहित्यिक पसंद-नापसंद से असहमत होना हमेशा संभव था, उनकी नीयत और ईमानदारी पर लेशमात्र भी संदेह करना कुफ़्र ही समझा जाएगा. उनके कुछ अभिमतों को आप दुर्भाग्‍यपूर्ण कह सकते थे, दुरभिसंधि-प्रेरित नहीं.

यहां
नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की आलोचनात्‍मक साहित्यिक जीवनियों ('‍क्रिटिकल लिटरेरी बाइऑग्राफ़ी') के खुलासों में जाने का न अवकाश है और न औचित्‍य, किंतु यह सच है कि हिंदी की अकादमिक दुनिया में कुछ अर्से तक सत्‍त-सम्‍पन्‍न रहने के बावजूद केदारनाथ सिंह हिंदी प्रतिष्‍ठान के संदिग्‍ध व्‍यक्तित्‍व कभी नहीं बन पाए. निस्‍संदेह हिंदी साहित्‍य में उनकी छवि एक अजातशत्रु भले व्‍यक्ति की है और एक कवि के रूप में अकादमिक-ग़ैर-अकादमिक तथा साहित्यिक-ग़ैर-साहित्यिक हलक़ों में उन्‍हें असाधारण प्रतिष्‍ठा और लोकप्रियता हासिल है. वे मिलनसार, सामाजिक तथा अपने मित्रों और प्रशंसकों के हितैषी और प्रोत्‍साहक रहे हैं. उन्‍हें 'मृदूनि कुसुमादपि' माना जाता है. आलोचक के रूप में नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी की, और कवि के रूप में मात्र अशोक वाजपेयी की, आज जो भी प्रतिष्‍ठा बच रही हो, हिंदी साहित्‍य जगत में दोनों के विराट, प्रतियोगी प्रभाव-मंडल और 'क्‍लाउट' हैं. दोनों की विचारधाराएं, यदि उन्‍हें यह नाम दिया जा सकता हो तो, प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों के भक्‍त, अनुयायी और कृपापात्र 'ए गर्ल इन एवरी पोर्ट' की तरह हर क़स्‍बे, शहर, महानगर में बिछे पड़े हैं. यदि नामवर सिंह का असर हिंदी की विस्‍तीर्ण पतनोन्‍मुख दुनिया, एक दयनीय लेखक संघ और हाशिए की राजनीतिक राजनीति पर है तो अशोक वाजपेयी की प्रति‍क्रियावादी विचारधारा एक ओर तो हिंदी साहित्‍य की एक बावली और साकि़त मग़ज़ी (लूनटिक एंड डिकेडेंट फ्रिंज) को साथ लिए और पोषित किए हुए चलती है और दूसरी ओर देश के प्रशासकीय और राजनीतिक गलियारों और चित्रकला की अरबों रुपयों की 'एलीटिस्‍ट' दुनिया से ताक़त हासिल करती है और उन्‍हें ताक़त देती है. अशोक के पास हमेशा सत्‍ता रही है और उन्होंने उसका मिला-जुला इस्‍तेमाल किया है लेकिन इस समय वे हिंदी में अपने चरम पर हैं.

इस
तूमार का लुब्‍बेलुबाब यह है कि जब ऐसे सत्‍ताधारियों के अनुगामियों, मातहतों, मुरीदों और प्रशंसकों की संख्‍या बढ़ती जाती है तो जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे वे अपने भक्‍तों की उम्‍मीदों और मांगों के शिकार या क़ैदी भी होने लगते हैं. जो आराध्‍य अपने पूजकों को वरदान नहीं देता, उसकी मूर्ति शीघ्र ही उपेक्षित हो जाती है. औलिया और मुतवल्‍ली एक-दूसरे से ताक़त हासिल करते हैं. फिर हिंदी में व्‍यामोह ('पैरेनोइआ') और षड्यंत्र-सिद्धांत ('कॉन्स्पिरेसी थियरी') लगभग स्‍थायी-भाव हैं सो अलग. इसलिए अन्‍य पुरस्‍कारों सहित भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता-पुरस्‍कार पर भी हर वर्ष जाति, प्रदेश, क्षेत्र, बोली, आस्‍था, विभिन्‍न कि़स्‍मों के अंतंरंग सम्‍बंध, रसूख़, विनिमय आदि के सच्‍चे-झूठे संदेह किए ही जाते रहे हैं.

समस्
‍या
यह है कि जब तक कोई निर्णायक ही अपने कमज़ोर लमहों में क़ुबूल न कर ले - एक अन्‍य पुरस्‍कार की निर्णायक-मंडल बैठक में ऐसा हो चुका है - कि उसने किसी दबाव में पुरस्‍कार दिया है, या कोई और ठोस, क़ानूनी-सरीखा प्रमाण न हो, तब तक सिर्फ़ पुरस्‍कृत कृति की गुणवत्‍ता पर बहस की जा सकती है और उसी के आधार पर कहा जा सकता है कि निर्णायक की श्रेष्‍ठ कविता की समझ स्‍थायी रूप से या 'इस बार' चली गई है, या कोई असवाधानी या लापरवाही हुई है या, जो कि सबसे भयावह होगा, पुरस्‍कार के साथ कोई अनैतिक समझौता किया गया है. लेकिन कोई कविता पिछले वर्ष की श्रेष्‍ठ कविता थी या नहीं, इसका फ़ैसला कोई दूसरा एक व्‍यक्ति नहीं, हिंदी साहिय जगत में, वह जैसा भी है, उसे लेकर बना बहुमत ही कर पाएगा. वैसे अपनी निजी राय रखने का मौलिक जनतांत्रिक अधिकार प्रत्‍येक व्‍यक्ति के पास सुरक्षित रहता ही है.

कथित
हिंदी साहित्‍य में आपकी अपनी 'जगह' और 'शोहरत' क्‍या है इसका निर्णय दूसरों और काल पर छोड़ देना ही बेहतर है- यही कहा जा सकता है कि पिछले त्रेपन वर्षों से 'सक्रिय' रहने के कारण आपकी अच्‍छी-ख़राब कोई तस्‍वीर तो बनी होगी. आप यह दावा कर सकते हैं कि आपने साहित्‍य सहित शेष सारे जीवन-क्षेत्रों में न्‍यूनतम बेईमानी करने की कोशिश की है लेकिन उसका फ़ैसला भी दूसरे ही करेंगे. इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने द्वारा निर्णीत पुरस्‍कारों का ही यथासंभव बचाव करूं और उसके बाद दूसरे निर्णायकों के फ़ैसलों पर कोई टिप्‍पणी करूं. मैंने अब तक विनोद भारद्वाज की कविता 'हवा' (पुरस्‍कार-वर्ष 1982) से शुरू कर विमल कुमार की 'सपने में एक औरत से बातचीत', संजय चतुर्वेदी की 'पतंग', नीलेश रघुवंशी की 'हंडा', आर. चेतनक्रांति की 'सीलमपुर की लड़कियां' और गीत चतुर्वेदी की 'मदर इंडिया' कविताओं को चुना है.

हिंदी
कविता, जिससे हमारा अर्थ 'निराला' द्वारा स्‍थापित 'मुक्‍त-छंद' 'अतुकांत' 'आधुनिक' कविता है, शेष हिंदी कविता नहीं, के पाठक और ज्ञाता यह जानते ही हैं कि समसामयिक कवियों की सूची में विनोद भारद्वाज का नाम अनायास नहीं आ जाता - उसे स्‍मरण करना पड़ता है. उन्‍होंने कविताएं कम लिखी हैं और उनके संग्रह भी चर्चित नहीं हो पाए हैं जिसका एक कारण तो यह है कि वह कवियों की क़तार में धक्‍का-मुक्‍की करते नहीं पाए जाते. लेकिन जि़दंगी को देखने की उनकी निगाह अधिकांश हिंदी कवियों से अलग है और उसका प्रसार भी व्‍यापक और दूरगामी है. उनकी कविता 'हवा', जो हिंदी में अनायास पर्यावरण-प्रदूषण पर लिखी गई बहुत कम कविताओं में विशिष्‍ट स्‍थान रखती है, कथ्‍य और शिल्‍प में बेजोड़ है. पर्यावरण और पत्रकारिता से आगे जाकर वह एक गांव के हालिया अवर-इतिहास से होते हुए देश की वृहत्‍तर पूंजीवाद-राजनीति दुरभिसंधि तक पहुंचते हैं. हिंदी कवियों में 1982 में यह चेतना कम थी. आज देश और विश्‍व जिस (पर्यावरण) विनाश के क़गार पर खड़े हैं, उसे इस कविता ने बहुत पहले देख लिया था. विनोद भारद्वाज की अब तक की अधिकांश कविताओं ने मुझे निराश नहीं किया है, बल्कि कुछ ने चौंकाया है.

मैं
इस या दूसरे पुरस्‍कारों के निर्णायकों के बारे में कुछ नहीं कह सकता, किंतु यदि कोई पुरस्‍कार के लिए सिर्फ़ मैं उत्‍तरदायी हूं तो मैं सोचता हूं कि मेरी जवाबदेही सिर्फ़ मेरे निर्णय का औचित्‍य बतलाने तक ही सीमित नहीं रह जाती. यह सही है कि कोई भी पुरस्‍कार इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि उसका प्राप्‍तकर्ता यदि गुणवत्‍ता में उस कृति से आगे नहीं जाएगा, तो कम-से-कम वह स्‍तर तो क़ायम रखेगा : कोई भी निर्णायक आजीवन इसके लिए जि़म्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसके फ़ैसले ने जो उम्‍मीद जगाई थी, उसे इनामयाफ़्ता निभा या आगे ले जा न सका. फिर भी निर्णायक एक नैतिक उत्‍तरदायित्‍व के बोझ से मुक्‍त नहीं हो सकता. यह कोई संरक्षक-अभिभावक ग्रंथि नहीं, बल्कि साहित्‍य की अपनी समझ, वस्‍तुपरकता और अख़्लाक़ की चिंता है. इसलिए हिंदी का सब-कुछ पढ़ने-जानने की कोशिश के साथ मैं अपने द्वारा चुने गए कवियों की रचनाएं, संग्रह और उनका अन्‍य लेखन भी लगातार खोजकर पढ़ता रहता हूं ताकि आश्‍वस्‍त हो सकूं कि वे मुझे या स्‍वयं को शर्मिंदा तो नहीं कर रहे. तमाम परस्‍पर जि़म्‍मेदारियों के साथ ये आपके साहित्यिक परिवार के निकट सदस्‍य हो जाते हैं, उन पुरस्‍कारों के स्‍थापक-नियामक तथा अन्‍य निर्णायकों के साथ, भले ही वे चाहें या न चाहें.

इसीलिए मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि विमल कुमार ने जो उम्‍मीदें 'सपने में एक औरत से बातचीत' से जगाई थीं, वे उन्‍हें, मेरे विचार से, अपनी बाद की अधिकांश कविताओं में निभा नहीं पा रहे हैं. बेशक, दस वर्ष पहले, जब भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति पुरस्‍कार का पहला मुकम्मिल संकलन 'उर्वर प्रदेश' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, तब उसमें उनकी तत्‍कालीन ताज़ा रचना 'उस सौंदर्य को देखना दर्पण के लिए एक नया अनुभव था', जो अपनी गुणवत्‍ता में 'सपने में...'से कमतर न थी,भी दी गई थी. यहां किसी कवि की विस्‍तृत समीक्षा संभव नहीं है और न ही अभीष्‍ट, इसलिए झाड़ूबुहारी और फ़तवेबाज़ी के आरोपों का जोखिम उठाते हुए भी यही कहना होगा कि विमल कुमार अभी-भी कभी-कभी स्‍तरीय कविता लिख डालते हैं, लेकिन कुल मिलाकर आपको जब आज के महत्‍वपूर्ण कवियों के नाम याद आते हैं तो स्‍वत:स्‍फूर्त ढंग से विमल कुमार उनमें नहीं होते. उनकी कविता में उच्‍चावचन और झोल औसत से ज़्यादा हैं.

1992 के बाद भी संजय चतुर्वेदी की ‘पतंग’ मैं कई बार पढ़ चुका हूं और उसमें अब भी इतना आकर्षण है कि भविष्‍य में भी पढ़ता रहूंगा. कथ्‍य, भाषा, शिल्‍प, लय और संगीत में उसे मैं हिंदी की उत्‍कृष्‍ट कविताओं में शुमार करता हूं- प्रतिबद्ध विवेकशील विश्‍वचेतना का यह विरला उदाहरण है. सात वर्ष बाद 'उर्वर प्रदेश' में सहप्रकाशित उनकी कविता 'संकेत' भी 'पतंग' की परंपरा में ही रखी जाएगी. संजय चतुर्वेदी ने इन वर्षों में पर्याप्‍त लिखा है, लेकिन वे एक अमर्ष, एक '‍हुब्रिस' में अपना काव्‍य-संग्रह प्रकाशित करने से इन्‍कार कर रहे हैं. दरअसल वे हिंदी की साहित्‍य-संस्‍कृति के पतन और मार्क्‍सवादी-रूपवादी खेमों के नैतिक ह्रास से असामान्‍य रूप से क्रुद्ध हैं - जिसके लिए उन्‍हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता - और अपनी भयावह हास्‍य-व्‍यंग्‍य भरी कविताओं में दोनों पर अपनी लानत भेजते रहे हैं - उससे भी एतराज़ नहीं हो सकता - लेकिन दुर्भाग्‍यवश ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वे अपने क्रोध और घृणा को ही एक स्‍थायी या दीर्घावधि काव्‍य-प्रेरणा बना बैठे हैं और इस तरह अपनी असंदिग्‍ध काव्‍य-प्रतिभा को अब अकारण नकारात्‍मक ढंग से सीमित कर रहे हैं. उनसे कोई यह नहीं कह रहा है कि वे अपना क्रोध भूल जाएं लेकिन 'पतंग', 'संकेत' और इस तरह की अन्‍य कविताओं के सार्थकतर संसार में अवश्‍य लौटें.

नीलेश रघुवंशी की ही कविता 'संतान सातें' को यदि मैं 1997 के पुरस्‍कार के लिए चुन पाता तो मुझे और ख़ुशी होती क्‍योंकि संजय चतुर्वेदी की 'पतंग' की तरह जब भी मैं उसे पढ़ता हूं तो विचलित हुए बिना नहीं रहता. लेकिन 'संतान सातें' 1995 में प्रकाशित हुई थी और मैं 1996 में निर्णायक नहीं था. फिर भी 1996 में प्रकाशित अन्‍य पात्र कवियों की रचनाओं के साथ नीलेश रघुवंशी की कविता 'हंडा' को पढ़कर मुझे कोई संदेह न रहा कि इस युवा प्रतिभावान कवयित्री की वह रचना वर्ष की श्रेष्‍ठ कविता थी. उसकी मार्मिक सादगी प्राण है. नीलेश रघुवंशी भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के कुछ पहले ही अपनी पहचान बना चुकी थीं और अगर मैं ग़लत नहीं हूं, तो उनकी पहली पांडुलिपि पुरस्‍कार से पहले ही स्‍वीकृत हो चुकी थी. बहरहाल, अब उन्‍होंने मात्र कवयित्रियों के बीच नहीं, समसामयिक हिंदी कविता में अपनी जगह हासिल कर ली है. उनका विकास देखकर आश्‍वस्ति और ख़ुशी होती है और उसमें कोई अवरोध भी नज़र नहीं आ रहा.

युवा प्रतिभाओं को दिए जाने वाले पुरस्‍कारों से वे साहित्‍य में स्‍थापित होती हैं या नहीं- यानी क्‍या ऐसे पुरस्‍कार ही उनके कैरियर में एक प्रारंभिक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं - इस पर बहस हो सकती है. यदि पुरस्‍कार ही लेखकों को बनाते-मिटाते तो फिर ऐसा क्‍यों होता कि जिन श्रेष्‍ठ रचनाकारों को ऐसे कोई भी पुरस्‍कार नहीं मिले, या एकाध ही मिला, उनकी संख्‍या पुरस्‍कृत रचनाकारों से हमेशा ज़्यादा रही? कई कवि तो भारतभूषण पुरस्‍कार की स्‍थापना से पहले ही स्‍थापित हो चुके थे. आलोकधन्‍वा, असद ज़ैदी, मंगलेश डबराल, गिरधर राठी, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, अजीत चौधरी, सत्‍यपाल सहगल, नरेंद्र जैन, कात्‍यायनी, अनिता वर्मा, सविता सिंह आदि अनेक कवि-क‍वयित्रियों को अनेक कारणों से यह पुरस्‍कार नहीं मिला. 'निराला' को उनके जीवन-काल में और मुक्तिबोध को मरणोपरांत साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार नहीं दिया गया, तो क्‍या वे उसके मोहताज हैं? दरअसल पुरस्‍कार तभी प्रतिष्‍ठा पाते हैं जब वे सुपात्रों को दिए जाते हैं और तभी वे उस प्रकाश को अगले पुरस्‍कृत व्‍यक्तियों पर परावर्तित करते हैं. पुरस्‍कारदाताओं को अपने महत्‍व के बारे में अत्‍यधिक भ्रम नहीं पालने चाहिए. यदि निर्णायक निर्लज्‍ज नहीं हुए हैं और उन्‍हें अपनी इज़्ज़त, यदि वह है तो, का ज़रा भी ख़याल है, तो अच्‍छा पुरस्‍कार देकर स्‍वयं उन्‍हें प्रतिष्‍ठा-सुख और गर्व होता है.

जहां तक मेरी जानकारी है, आर. चेतनक्रांति ने 2002 के पुरस्‍कार के बहुत पहले कविताएं लिखना शुरू नहीं किया था लेकिन जो भी उनकी रचनाएं पत्रिकाओं में प्रकाश्ति हुई थी, उन्‍होंने मुझ-सरीखे पाठकों का ध्‍यान आकर्षित किया था. चेतनक्रांति की सिर्फ़ 'सीलमपुर की लड़कियां' पुरस्‍कार-योग्‍य नहीं थी - उनकी कुछ दूसरी कविताएं भी उसकी पात्र हो सकती थीं लेकिन यह कविता हिंदी में दिल्‍ली की ऐसी भौगोलिकी और संस्‍कृति लेकर आई, और कवि की अपनी भाषा और शिल्‍प, कि उसे ही श्रेष्‍ठ मानना पड़ा. उसके बाद भी मैं चेतनक्रांति के कृतित्व और विकास से आ‍कर्षित होता रहा हूं और मुझे उन्‍होंने किसी आशंका या पछतावे में नहीं डाला है, बल्कि मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उनकी कविताओं की एक निजी पहचान बन चुकी है. वे एक ठेठ भाषा-शैली की ठोस, निर्भीक रचनाएं हैं.

गीत चतुर्वेदी भी उन युवा कवियों में हैं जिनकी रचनाएं मुझ सरीखे निर्णायक के सामने चुनाव का संकट खड़ा करती हैं. उन्‍होंने जबसे प्रकाशित होना शुरू किया है, तब से अपने स्‍तर को शर्मिंदा करने वाली बहुत कम कविताएं लिखी होंगी. उनकी पुरस्‍कृत रचना 'मदर इंडिया' (प्र.व. 2006) का शीर्षक पाठक को एक शोर-शराबे और राजनीतिक व्‍यंग्‍य आदि से लबरेज़ कविता की आशंका से भर देता है लेकिन वह एक अलग मार्मिकता और नश्‍तर को लेकर आती है. आज का युवा कवि दीन-दुनिया के एक या कुछ ही पक्षों को नहीं देख रहा, बल्कि मानव-अस्तित्‍व और अस्तित्‍व-मात्र के लगभग सभी पहलुओं को छूने की कोशिश कर रहा है और इस वजह से उसकी प्रतिबद्धता व्‍यापकतर, जटिलतर होती जाती है. गीत जैसे कवियों को कीलित करना कठिन है.

निर्णायकों को अपने चुनाव पर टिप्‍पणी देनी होती है और विनोद भारद्वाज की कविता को मैंने ''गहरी सामाजिक टिप्‍पणी, असंदिग्‍ध प्रतिबद्धता, बहुआयामी दृष्टि तथा भाषा एवं शिल्‍प पर विलक्षण नियंत्रण'' के लिए श्रेष्‍ठ माना था. उसके बाद मेरी प्रशस्तियां कुछ और सविस्‍तार होती गईं और सभी अपने अविकल रूप में पाठकों के लिए उपलब्‍ध हैं. इनमें निर्णायक की संस्‍तुति और तर्क तथा कैफि़यत शामिल हैं.

किसी पुरस्‍कार का निर्णायक-मंडल यदि सामूहिक फ़ैसला नहीं देता और उसका प्रत्‍येक सदस्‍य स्‍वायत्‍त होता है तो एक अघोषित, अलिखित शिष्‍टाचार यह रहता है कि वह दूसरों के फ़ैसलों पर कोई ज़ाहिरा प्रतिकूल टिप्‍पणी न करे. वैसा मैंने अब तक नहीं किया है. लेकिन एक कवि, समीक्षक और पाठक के नाते, जैसा भी मैं होने के लिए अभिशप्‍त हूं, यह मेरा अधिकार है कि दूसरे निर्णायकों के चुनाव पर अपनी राय रखूं. यदि मैं उसे स्‍याह-सुफ़ैद में दर्ज करने जा रहा हूं तो शायद इसे विश्‍वासघात, अमानत में ख़यानत, 'वनअपमैनशिप', अतिरिक्‍त होशियारी और चतुराई, शेष निर्णायकों की अवमानना आदि कहकर उसकी सही या ग़लत भर्त्‍सना की जा सकती है. निर्णायक-मंडल के शेष सदस्‍य और पुरस्‍कार के नियामक कोई सख़्त कार्रवाई भी कर सकते हैं. लेकिन जिस पुरस्‍कार को चलते हुए तीस वर्ष हो चुके, जो हिंदी में प्रतिष्ठित हो चुका, उसके बारे में एक निर्णायक की निजी राय आखि़र उसे कितनी क्षति पहुंचा सकती है? आशंका तो अधिक यही है कि उस निर्णायक की कुख्‍याति में ही कुछ इज़ाफ़ा हो जाए. यदि शेष निर्णायक में से कोई भी एक 'अभद्र', 'गरिमाहीन' बहस में न पड़ना चाहे तो अलग बात है वर्ना तीस वर्ष एक मुक्‍त चर्चा के लिए पर्याप्‍त माने जाने चाहिए- मुझसे असहमत होने का अधिकार उनसे कौन छीन सकता है?

बहरहाल, मैं पहले (अशोक वाजपेयी/अरुण कमल/1980) पुरस्‍कार से ही असहमत था. आज 1979 में प्रकाशित 35 वर्ष से कम आयु के कवियों की रचनाओं को याद कर पाना असंभव-सा है लेकिन 'उर्वर प्रदेश' उस वर्ष की सामान्‍य अच्‍छी कविता ही लगी थी, विशिष्‍ट नहीं. आज भी वह शायद इस पुरस्‍कार के कारण ही उल्‍लेख्‍य है. उनके संग्रह 'नए इलाक़े में' की कविताओं में मुझे एक मार्मिक, नए अरुण कमल दिखाई दिए थे लेकिन उसके पहले और बाद के संग्रहों में उनकी कविताएं 'उर्वर प्रदेश' की सामान्‍य अच्‍छी ज़मीन की ही लगती हैं. यह मालूम करना मुश्किल है कि आज कवि के रूप में उनकी वास्‍तविक प्रतिष्‍ठा क्‍या है. अशोक वाजपेयी ने अगले चार पुरस्‍कार गगन गिल, तेजी ग्रोवर, शिरीष ढोबले और गिरिराज किराडू की कविताओं को दिए. गगन गिल की पुरस्‍कृत कविता 'एक दिन लौटेगी लड़की' निस्‍संदेह तब तक महिला कवियों में एक नया निर्मम तेवर, अमर्ष, विद्रोह और बेबाकी लेकर आई थी. यह कहे जाने पर कि महादेवी के बाद ऐसी अलग, सशक्‍त अभिव्‍यक्ति पहली बार देखी गई, बहुत शोर भी मचा था. लेकिन उसके बाद शायद 'आधुनिकता', 'आंतरिकता', बौद्ध और सूफ़ी प्रभावों के कारण उनकी कविता बदल गई और अब वह इतनी निजी, अंतर्मुख और 'मिस्टिक' हो चुकी है कि कविता से वृहत्‍तर उम्‍मीद रखने वाले मुझ जैसे पाठकों के लिए वह एक ऐसी पहेली बन गई है जिसे हल करने की लालसा ही नहीं होती. तेजी ग्रोवर और गिरिराज किराडू की पुरस्‍कृत कविताओं में गगन गिल की प्रवृत्तियों की ही आधुनिकतर प्रयोगधर्मिता है और गहन शब्‍दों, बिंबों, शैलीगत नवाचारों से काव्‍यरव पैदा करने की दुहरावग्रस्‍त कोशिश है किंतु अंतत: वे कविताएं न कुछ कह पाती हैं और न कोई प्रभाव छोड़ती हैं, यद्यपि दोनों ने इनसे अलग, और मुझे लगता है कि बेहतर, कविताएं भी लिखी हैं. यह समझ में नहीं आता कि जिस तरह की अर्थहीन कविताएं अब यूरोप, और विशेषत: फ्रांस, तक में भी नहीं लिखी जा रही हैं उनमें हमारे ऐसे कवि अपनी प्रतिभा क्‍यों नष्‍ट कर रहे हैं. शिरीष ढोबले की कविता 'प्रदक्षिणा है यह' अपने भक्तिवाद-रहस्‍यवाद से स्‍वयं ही रोमांचित है और आत्‍माभिनंदन कर रही है तो पाठक भी उन्‍हें उनके स्‍तोत्रों की प्रयोजनहीनता पर छोड़ रहा है. अशोक वाजपेयी की ऐसी कविताओं की प्रशस्तियां इन्‍हीं का एक हास्‍यास्‍पद उपोत्‍पाद लगती हैं और अपने निरर्थक वाग्‍जाल में उस असंभव ऑक्‍टोपस की तरह हैं जिसने स्‍वयं किसी तरह अपनी भुजाओं में गांठ बांध लेने में सफलता प्राप्‍त कर ली है. यतीन्‍द्र मिश्र की 'बारामासा' 2004 की श्रेष्‍ठ कविता थी या नहीं इस पर मतभेद की गुंजाइश है फिर भी वह इतनी सार्थक तो है कि अपने निर्णायक का उद्धार कर सकी. दरअसल यतीन्‍द्र मिश्र पहले साधारण कवि ही थे लेकिन समय रहते संभल गए और अब उनमें हिंदी कविता की सकारात्‍मक मुख्‍यधारा में शामिल होने के कुछ लक्षण दिखाई दे रहे हैं.

यतीन्‍द्र मिश्र सरीखा आत्‍मोद्धार उदय प्रकाश (केदारनाथ सिंह/1981) ने अपने संग्रह 'रात में हारमोनियम' की कविताओं में और उसके बाद करने की कोशिश की लेकिन तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि वे रघुवीर सहाय, उनकी समवर्ती तथा परवर्ती पीढि़यों की मुख्‍यधारा कविता का अनुकरण करके ही कवि होने का कुछ आभास दे पा रहे हैं वर्ना उनकी 'तिब्‍बत' को श्रेष्‍ठ तो क्‍या, कविता भी मान पाना कठिन है. यही हाल उनकी 'सुनो कारीगर' और 'अबूतर कबूतर' की कथित कविताओं का है. कहानी-लेखन में असाधारण ख्‍याति और सफलता कमाने के बावजूद कवि के रूप में भी स्‍वीकृत होने की उनकी त्रासद महत्‍वाकांक्षा उनसे कविता में अतिलेखन करवा रही है. स्‍वप्निल श्रीवास्‍तव की 'ईश्‍वर बाबू' (1986) किसी भी तरह से 'रामदास' से आगे नहीं जाती और उनकी बाद की कविताएं भी उन्‍हें प्रमुख कवि माने जाने के विपक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं. बद्री नारायण की कविता 'प्रेमपत्र' (1991) में केवल एक पंक्ति 'बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएंगी' को छोड़कर कुछ भी तार्किक नहीं है और वह एक कृत्रिम काव्‍यात्‍मकता रचने की कोशिश ही रह जाती है. यह समस्‍या उनकी बाद की कविताओं में भी मौजूद है - कभी वे भाषा, कभी कथ्‍य और कभी शिल्‍प को पूर्णरूपेण निबाह नहीं पाते और कभी भवानीप्रसाद मिश्र-केदारनाथ सिंह की पाठक को शामिल-संबोधित करने वाली 'पेटेंट' शैली में बचकाना हो जाते हैं. भाषा की कुछ भूलें भी उनसे होती हैं लेकिन यह मर्ज़ इधर के हुड़ुकलुल्‍लू-मार्का युवा लेखन में वबा का दर्जा हासिल कर चुका है. आप किसी भी प्रदेश, क्षेत्र या बोली से आते हों, यदि हिंदी में लिखने की महत्‍वाकांक्षा है तो पहले सही ज़ुबान आनी चाहिए. हिंदी में आंचलिक बोलियों और उनके व्‍याकरणों का अनावश्‍यक, दिग्‍भ्रमित, छौंक-बघार भी भर्त्‍सना और विरोध का विषय है. अनामिका की कविता 'अनुवाद' एक युक्ति ('डिवाइस') या 'कंसीट' से प्रेरित है - लोगों के बीच की दूरी उन्‍हें अंग्रेज़ी शब्‍द 'स्‍पेस' का स्‍मरण दिलाती है (‍‍'डिस्‍टैंस' का नहीं, जबकि 'स्‍पेस' चाहना पाश्‍चात्‍य जगत में एक सकारात्‍मक मांग है) और उसका हिंदी अनुवाद वे 'विस्‍तार' के बजाय 'अंतरिक्ष' करना चाहती हैं. विडंबना यह है कि 'स्‍पेस' का अर्थ 'विस्‍त’र' होता ही नहीं. अब 'अंतरिक्ष' शब्‍द कविता में एक ऐसी उड़नतश्‍तरी ले आता है जो फिर उसमें नहीं लौटती - क‍वयित्री को याद नहीं आता कि वह 'फ़्लाइंग सॉसर' का अनुवाद है. तीसरा चरण कविता की 'थीम' से नितांत असंबद्ध है, उसे वहां होना ही नहीं चाहिए था. अब चूं‍कि कवयित्री को गिरस्‍ती की चीज़ों का 'अनुवाद' करना है, तो बिना किन्‍हीं तार्किक सोपानों के कविता 'ख़ाली घर' में प्रवेश करती है, हालांकि 'स्‍पेस' का एक अनुवाद 'ख़ला' भी हो सकता है यह कवयित्री को नहीं सूझा. फिर वह 'उतरनों' का अनुवाद जल की भाषा में, प्‍लेटों का पंखुडि़यों में, सिंक का राग में, घर का किसी और भाषा में, शाम का पर्दे खोलने में और 'स्‍पेस' का 'विस्‍तार' में करना चाहती हैं. अनामिका जिसे 'अनुवाद' कहती हैं, वह दरअसल 'रूपांतरण' ('ट्रांस्‍फॉर्मेशन'), 'पुनर्सृजन' ('ट्रांस्क्रिएशन') या 'कायांतरण' ('मेटामॉर्फा़सिस') है, 'तर्जुमा' ('ट्रांस्‍लेशन') नहीं. उनकी अधिकांश कविताओं में समस्‍या यह है कि उनकी काव्‍य-अवधारणा एक रूमानी किशोरसुलभ नाज़-ओ-अंदाज़ से आगे नहीं जा सकी है और उनकी भाषा और शैली को वात्‍सल्‍य-कामना में क़ैद किए हुए है जिसमें वयस्‍कता का चेतन-अवचेतन नकार है. हेमंत कुकरेती की 'सिलबट्टा' (2001) अपने विषय की तरह ही ग़ैर-रूमानी, मूर्त और ठोस है. उसकी कई पीढि़यां, परंपराएं, कहानियां और संस्‍करण हैं, उसका एक अंश हमारे शरीर के रक्‍त-लवण में बहता है. हेमंत कुकरेती ने लगातार अच्‍छी कविताएं ही लिखी हैं और यदि वे अपने से कुछ वरिष्‍ठ या अपने समवयस्‍कों से बेहतर नहीं तो निस्‍संदेह उनके समकक्ष हैं, लेकिन हिंदी में उन्‍हें वह तवज्‍जो और स्‍वीकृति नहीं दी जा रही है जिसके वे पात्र हैं. केदारनाथ सिंह द्वारा उन्‍हें पुरस्‍कृत किया जाना न केवल उचित था, बल्कि आवश्‍यक भी था और समयोचित. दुर्भाग्‍यवश, जितेंद्र श्रीवास्‍तव की कविता 'ज़रूर जाऊंगा कलकत्‍ता' (2006) और उनके कवि को लेकर ऐसा कह पाना मेरे लिए संभव नहीं है. कलकत्‍ते की गाड़ी में बैठे हुए कवि का यह संकल्‍प ही पुनरुक्तिदोषग्रस्‍त है, जब तक कि विदाउट टिकट होने के कारण कोई टीटी उन्‍हें उतारने की धमकी न दे रहा हो. बहरहाल, हिंदी के 'अदना-सा कवि' को 'अपने मिर्जा़ ग़ालिब' की कलकत्‍ता-यात्रा याद आती है जिससे वे 'ज़ेहन में आधुनिकता लेकर' लौटे थे. यहीं से कवि का ग़ालिब, उनकी दिल्‍ली और तत्‍कालीन कलकत्‍ता का अज्ञान उरियां होने लगता है. ग़ालिब को कलकत्‍ता गए अभी दो सौ वर्ष भी नहीं हुए हैं - 'सैकड़ों साल' का प्रश्‍न ही नहीं उठता. 'आधुनिकता' के लिए ग़ालिब कलकत्‍ता के मुहताज न थे, 'नयी रोशनी' उनमें पहले ही बहुत थी. यदि कलकत्‍ता उस वक़्त महानगर था तो दिल्‍ली भी मुग़लिया दारुलसल्‍तनत थी. जितेंद्र श्रीवास्‍तव उस ज़माने के कलकत्‍ता के अख़बारों को देखें जिनमें 'जादुई विज्ञापन' छपने लगे थे. उन्‍हें यह भी मालूम नहीं है कि उनके मिर्जा़ ग़ालिब कलकत्‍ते को दिल दे बैठे थे - कलकत्‍ते का जि़क्र ही उनके सीने पर एक तीर-सा मार देता था और वे हाय-हाय कर उठते थे. इस तरह की कोई भी कविता काव्‍य-नायक की जीवनी पढ़े बग़ैर लिखी ही नहीं जानी चाहिए. यह कल्‍पना करना कठिन है (या शायद नहीं भी है) कि केदारनाथ सिंह ने, जो हिंदी में ग़ालिब के सबसे आधिकारिक मुरीद हैं, क्‍योंकर इस बोगस रूमानियत से भरी कविता को पुरस्‍कृत किया. जितेंद्र श्रीवास्‍तव के नये संग्रह में भी बमुश्किलतमाम दो छोटी कविताएं कुछ सलीक़े की हैं.

नामवर सिंह द्वारा अपने पहले पुरस्‍कार को दिवंगत शरद बिल्‍लौरे की कविता 'तय तो यही हुआ था' (1983) को दिया जाना एक तरह की अपराध-बोध-जन्‍य क्षतिपूर्ति थी लेकिन राजा शिबि की पुराकथा से प्रेरित यह छोटी कविता वाक़ई मिथक के बेहतरीन इस्‍तेमाल, उसे समसामयिकता देने की सिफ़अत, त्रासद मर्मांतक नैतिकता तथा मितकथन का एक सबक़ है. उसकी प्रासंगिकता, जो अब तक बनी हुई है और बनी रहेगी, इसमें भी है कि आज के युवा कवियों में से बहुत कम अपने या विश्‍व के अन्‍य मिथकों को जानते हैं जो किसी भी कविता का एक महत्‍वपूर्ण पोषक तत्‍व है. पश्‍चदृष्टि से इस संयोग पर सुखद आश्‍चर्य होता है कि नामवर सिंह का दूसरा निर्णय भी एक मिथक-प्रेरित कविता, देवीप्रसाद मिश्र (1988) की 'प्रार्थना के शिल्‍प में नहीं', के पक्ष में गया था जो मिथक की पुष्टि या अनुमोदन नहीं करती बल्कि अपने निहितार्थ में मात्र वैदिक देवमाला को ही नहीं, बल्कि सारी सत्‍ताओं पर आरूढ़ समस्‍त आराध्‍यों, देवदूतों, पैग़म्‍बरों, धर्माधिकारियों, महंतों और मठाचार्यों को हट जाने की चुनौती देती है. हिंदी में शायद अपनी तरह की यह पहली कविता थी, यद्यपि उसके पहले भी देवीप्रसाद मिश्र विलक्षण कविताएं लिख चुके थे और अब तक कुछ सार्थक और जटिल प्रयोग कर रहे हैं‍ जिन्‍हें सराहने और विश्‍लेषित करने की क़ूवत अधिकांश हिंदी काव्‍यालोचन में नहीं है. इन दो अनिंद्य निर्णयों के बाद नामवर सिंह ने जिन चार कवियों : अनिल कुमार सिंह /'अयोध्‍या 1991'/ 1993, संजय कुंदन/'अजनबी शहर में'/1998, सुंदरचंद ठाकुर/'कविता के मुक्तिबोधों का समय नहीं यह'/2003 तथा निशांत/'अट्ठाइस साल की उम्र में'/2008 : को सम्‍मानित किया उनमें अनिल कुमार सिंह और निशांत की कविताएं निराश ही करती हैं. अयोध्‍या की 'मानवता' की थीम बुरी न थी, लेकिन वहां जो 1992 में होने दिया गया, उसकी भयावहता को वह न तो कम कर पाई है और न समझा सकी है. राक्षसों और नरभक्षियों के हवाले अयोध्‍या हुई कैसे? एक भोली भावुकता के पीछे राजनीतिक जागरूकता के अभाव को छिपाया नहीं जा सकता. अपनी बाद की कविताओं में भी अनिल कुमार सिंह अपनी कोई पहचान नहीं बना पाए हैं. उधर निशांत का आत्‍ममुग्‍ध कवि अट्ठाइस साल की उम्र के कवि को 'लड़का' कह रहा है जिसके सपने में एक पवित्र सुर्ख़ लाल गुलाब लहलहा रहा है, इस बहुत ही महत्‍वपूर्ण उम्र में उसके दिल से सच्‍ची प्रार्थना निकल रही है, उसका मन हल्‍का पारदर्शी और पवित्र है, लेकिन वह धूमिल, धर्मवीर भारती और अकविता के बीच दिग्‍भ्रमित हो रहा है. उनकी दूसरी कविताएं भी अपनी अतिसामान्‍यता के कारण ही उल्‍लेखनीय हैं. संजय कुंदन की समस्‍या यह है कि वह अच्‍छी या बेहतर कविताएं लिखने में सक्षम हैं लेकिन अक्‍सर शिल्‍प को लेकर सावधानी बरतने में कोताही कर जाते हैं. सिरहाने एक लोटा जल पड़ा कैसे रहता है? यह जल, नदी का सपना तथा स्‍मृति का सोता न तो कविता में अर्थ पाते हैं और न लौटते हैं तथा बाज़ार में बौने होते रुपये से उनका न तो कोई सामंजस्‍य है और न तनाव. पहली चार पंक्तियां शेष कविता से नितांत असंबद्ध हैं और उन्‍हें हटाकर पढि़ए, तो कविता कुछ निखर भी आती है. सुंदरचंद ठाकुर की कविता अभिव्‍यक्ति के ख़तरों की ही नहीं, अभिव्‍यक्तिमात्र की समस्‍याओं को अभिव्‍यक्ति देती है. एक ओर कवि का समष्टिबोध है, दूसरी ओर उसकी निजी जि़दंगी और भाषा हैं, अभिव्‍यक्ति का संकट, उसकी चुनौतियां जटिलतर होते जाते हैं लेकिन न्‍यस्‍त स्‍वार्थों वाले आलोचक कहते हैं यह मुक्तिबोधों का समय नहीं, मुक्तिबोध अब संभव नहीं, सरल कविता लाओ, जटिल को निष्‍कासित करो. आश्‍चर्य यही है कि स्‍वयं ऐसे आलोचक ने इस कविता को श्रेष्‍ठ कैसे माना? जो हो, सुंदरचंद ठाकुर ने अब तक अपने पाठकों की उम्‍मीद की हिफ़ाज़त की है और अपने व्‍यक्तित्‍व को अपने कवित्‍व में विकसित किया है.

दिवंगत नेमिजी ने अपना पहला निर्णय राजेंद्र धोड़पकर की कविता 'अंतिम आदमी' (1984) के पक्ष में दिया था. हाशिये पर धकेल दिए गए एकाकी आदमी पर यह पहली कविता नहीं थी और न अंतिम. आखि़री पंक्ति का नैराश्‍यपूर्ण अंत कुछ आकस्मिक लगता है जिसका औचित्‍य पूर्वगामी पंक्तियों में दिखाई नहीं देता. राजेंद्र धोड़पकर ने कविताएं लिखना बंद क्‍यों कर दिया यह एक रहस्‍य है, लेकिन वह एक आदर-भाव जगाता है. हिंदी में बीसियों ऐसे कवि हैं जिन्‍हें कविता लिखने से पहले ही लिखना बंद कर देना चाहिए था. नेमिजी का कुमार अंबुज की कविता 'किवाड़' (1989) को पुरस्‍कृत करने का भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के इतिहास में वही स्‍थान है जो उससे एक वर्ष पहले नामवर सिंह द्वारा देवीप्रसाद मिश्र की कविता को चुने जाने का है. अपनी धोखादेह सादगी, मितभाषिता, वसाहीनता और अर्थबाहुल्‍य में वह बेजोड़ है. पिछले बीस वर्षों में कुमार अंबुज ने हिंदी कविता में अपना स्‍थान अर्जित कर लिया है और उनका कवि होना विवादातीत है. जब 1994 में पंकज चतुर्वेदी की कविता 'एक संपूर्णता के लिए' पुरस्‍कृत हुई, तब से अब तक शायद वे ऐसे सबसे कमउम्र सम्‍मानित कवि का कीर्तिमान धारण किए हुए हैं. 1999 के 'उर्वर प्रदेश' में प्रकाशित यह और दूसरी कविता 'उसने कहा था' कवि-कर्म की त्रासदी और जोखिमों के बारे में है. पुरस्‍कृत कविता के पहले तीन चरणों में पर्याप्‍त काव्‍योचित परोक्षता है लेकिन अंतिम चरण उसे अचानक सामान्‍य बना देता है क्‍योंकि उसमें एक विचित्र दैन्‍य और पलायन है. अपने कवि होने का अहसास बार-बार पंकज चतुर्वेदी की कविताओं में आता है और शायद वही कवि के रूप में उनके तत्‍काल पहचाने जाने के मार्ग में एक बाधा है. बोधिसत्‍व की कविता 'पागलदास' (1999) एक सहज प्रश्‍न के उत्‍तर की तलाश में एक आरोपित उत्‍कंठा तथा असमंजस की जासूसी कहानी बन जाती है जिसमें आधी पंक्तियां सिर्फ़ एक तूमार बांधने के लिए हैं. पागलदास की मृत्‍यु/हत्‍या का आख्‍यान निस्‍संदेह भयावह और मार्मिक हो सकता था लेकिन दो पागलदासों का निर्माण कर और यह दो-टूक न बताकर कि कौन-से अन्‍याय और असत्‍य के विरुद्ध वे सक्रिय थे और उनके हत्‍यारे कौन थे - पागलदास 'रामदास' या 'ईश्‍वर बाबू' की तरह एक प्रतीक-पात्र न थे - बोधिसत्‍व अपनी कविता को कुंद और भावनिक ('सेन्टिमेंटल') बनाते हैं. यह भावविह्वलता उनकी अन्‍य कविताओं में भी देखी जा सकती है और 'स्‍त्री को देखना' कविता की पंक्तियां ''उसको चिता में जलाकर देखो/ दिखेगी तब भी नहीं'' अपनी विकृति ('मॉर्बिडिटी') में भयावह है. प्रेमरंजन अनिमेष की पुरस्‍कृत कविता 'इक्‍कीसवीं सदी की सुबह झाड़ू देती एक स्‍त्री' के शीर्षक में एक मार्मिक व्‍यंग्‍य है. अंग्रेज़ी में बुहारने की क्रिया से 'स्‍वीपिंग' और 'स्‍वीप' संज्ञाएं बनती हैं और अनिमेष की कविता में 'स्‍वीप' तो अच्‍छा है, यदि वह कम 'स्‍वीपिंग' होती तो बेहतर होती. उनकी 'पचीस साल के नौजवान का बयान' कविता को निशांत की कविता 'अट्ठाइस साल की उम्र में' के बरक्‍स रखिए - यह जानने में देर न लगेगी कि अनिमेष की कविता सार्थकतर क्‍यों है. लेकिन यदि वे 'पायदान पर बचपन' सरीखी बेहतरीन कविता और अधिक लिखें तो स्‍वयं उनके और हिंदी के लिए बहुत श्रेयस्‍कर होगा.

भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार के प्रथम आदाता और पिछले तीस वर्षों में ख्‍यातिलब्‍ध कवि तथा अब निर्णायक-मंडल के नये सदस्‍य अरुण कमल के पहले निर्णय को लेकर हिंदी में एक आशंकापूर्ण औत्‍सुक्‍य था क्‍योंकि कविता पर जैसा लेखन उन्‍होंने अधिकांशत: किया है और जिस दुर्भाग्‍यपूर्ण ढंग से वे त्रैमासिक 'आलोचना' का संपादन और सामग्री-चयन कर रहे हैं, उससे बहुत आश्‍वस्ति नहीं होती है. लेकिन मनोज कुमार झा की रचना 'स्‍थगन' (2009) का चयन कर उन्‍होंने मुझ-जैसे शंकालुओं को सुखदता से ग़लत सिद्ध किया है. 'स्‍थगन' पहली बार मां बनने जा रही एक ग्रामीण युवती के बारे में है जो अपने घर-आंगन, क्षेत्र, ऋतु, प्रकृति और वृहत्‍तर संसार से घिरी हुई है, वायुयान की घरघराहट उसके ऊपर है, उसके गर्भ में एक शिशु विकस रहा है और इन सबकी उपस्थिति के बीच कामना, जीवन और आशा में स्‍थगित वह कच्‍चा आम खा रही है. मनोज कुमार झा की कविताओं के बारे में अरुण कमल ने सही लिखा है कि उनकी सामग्री प्राय: गांवों के जीवन से आती है लेकिन अपनी अंतिम निर्मिति में वह विचारप्रवण तथा वैश्विक होती है. इसी क्षमता को मैं प्रतिबद्ध विवेकशील विश्‍वचेतना कहना चाहता हूं.

सही निर्णय हुए हों या ग़लत, सायास हुए हों या अनायास, यह साफ़ है कि भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति पुरस्‍कार प्राप्‍त अधिकांश कवि समसामयिक हिंदी कविता पर किसी भी गंभीर बहस में उल्लिखित होंगे, भले इनमें से कुछ ने ही साहित्‍य में असंदिग्‍ध स्‍थान बनाया हो, कुछ में अब भी विकास की न्‍यूनाधिक संभावनाएं हों और कुछ से, दुर्भाग्‍यवश, उम्‍मीद बहुत कम रह गई हो, हालांकि सृजन-शक्ति कभी भी कोई चमत्‍कार दिखा सकती है. हम चाहें तो कह सकते हैं कि इनमें से कुछ को इस पुरस्‍कार ने अपने कवि-अध्‍यवसाय में ठोस मदद दी होगी और कुछ के लिए यह खद्योत-सम साबित हुआ होगा. दृष्‍टव्‍य यह है कि अपने वक्‍तव्‍यों में लगभग प्रत्‍येक कवि ने पुरस्‍कार का ऋण स्‍वीकार किया है, भले ही वह औपचारिक भलमनसाहत में ही क्‍यों न हो. एक अच्‍छा कवि अपने विरोधाभासों और विडंबनाओं के बावजूद एक नैतिक इंसान होना और दिखना चाहता है. एक सार्थक पुरस्‍कार तीन कोटियों के व्‍यक्तियों पर एक नैतिक उत्‍तरदायित्‍व और बोझ बनता है - उसके नियामकों पर, निर्णायकों पर और प्राप्‍तकर्ताओं पर. भारत में आज लाखों और हज़ारों रुपये के सरकारी-ग़ैरसरकारी साहित्यिक पुरस्‍कारों की संख्‍या सौ से ऊपर होगी, लेकिन उन्‍हें देनेवालों, तय करनेवालों और लेनेवालों में से अधिकांश की ईमानदारी और पात्रता में गहरा संदेह है, इसलिए कौन-सा लेखक इनामों से लखपति हो चुका है इसके अलावा चर्चा का कोई मसला ही नहीं है. मुझे लगता है कि भारतभूषण अग्रवाल कविता पुरस्‍कार का प्राप्‍तकर्ता प्रत्‍येक कवि-कवयित्री उसे एक नैतिक-सर्जनात्‍मक उत्‍तरदायित्‍व की तरह लेता है - पहले तो वह चाहता है कि वह उसे मात्र गुणवत्‍ता के आधार पर निष्‍पक्ष निर्वैयक्तिकता से मिले, फिर यह कि यदि वह गुणवत्‍ता असली है तो वह अपने आगामी कृतित्‍व और शायद अपने व्‍यक्तित्‍व में भी उसी गुणवत्‍ता को यदि विकसित न कर पाए तो भी उस स्‍तर पर बनाए रखे. साहित्यिक बिरादरी भी हर ऐसे पुरस्‍कार पर नज़र रखती है - उसे रखनी चाहिए. मुझे लगता है कि अपने तीस वर्षों के अस्तित्‍व में भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार और उसके प्राप्‍तकर्ता इन कठिन शर्तों को अधिकांशत: निभा पाए हैं. इसके अलावा किसी पुरस्‍कार की सार्थकता व महत्‍ता और क्‍या हो सकती है?

****

23 comments:

sidheshwer said...

मतलब कि 'उर्वर प्रदेश'का नया संस्करण आया है.
जो भी हो , आलेख पूरा पढ़ गया. बहुत ही उम्दा और निर्मम आलोचना से भरा.
'सबद' का आभार इसे मुझ तक पहुँचाने के लिए.

जनविजय said...

विष्णु जी इस आलेख के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं, यह अस्पष्ट ही रह गया। यह आलेख वैसा ही चलताऊ किस्म का है, जैसी चलताऊ समीक्षाएँ फिलर के तौर पर कुछ पत्रिकाएँ प्रकाशित करती हैं। एक-एक दो-दो वाक्यों में कविताओं को निपटा देने और कवियों तथा निर्णायकों
पर आलोचना के नाम पर अपना फ़तवा देने से ही लेख अच्छा नहीं बन सकता। अच्छे आलोचक को यह भी बताना चाहिए कि इन कविताओं में और कवियों में कमी क्या है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता का नाम "ईश्वर एक लाठी है" था, "ईश्वर बाबू" नहीं। रघुवीर सहाय की कविता "रामदास" से तो उसका कोई साम्य ही नहीं है। कहाँ "रामदास" और कहाँ "ईश्वर एक लाठी है"। स्वप्निल की कविता वृद्ध पिता के बारे में है जिनका ईश्वर ही सहारा है। विष्णु खरे ने वह कविता पढ़ी ही नहीं, बस, अपनी स्मृति के आधार पर ही जो मन में आया लिख मारा। "कह रहा हूँ जुनूं में क्या-क्या"।
ऐसा लगता है यह लेख उन्होंने बस लिखने के लिए लिखा है और इस पर पूरी मेहनत नहीं की है।

pankaj said...

विष्णु खरे जी का यह लेख शानदार है . बहुत निर्मम , पारदर्शी , विचार-प्रवण , मूल्यनिष्ठ और मार्मिक . इस तरह सच कहने का साहस ही आज हिन्दी आलोचना में नदारद है . इसीलिए वह मूल्यवान होना तो दूर ,
उल्लेखनीय भी नहीं हो पा रही है . लेकिन इस आलेख में अच्छे और बुरे में फ़र्क़ करने का दुर्लभ विवेक है .
समकालीन युवा कविता के इतिहास में शायद पहली बार यह हुआ है कि किसी प्रतिष्ठित कवि- आलोचक ने दो-टूक यह बताया है कि उसकी नज़र में कौन-से युवा कवि और उनकी कौन-सी कविताएँ अच्छी हैं अथवा नहीं हैं और ऐसा आखिरकार क्यों है . इससे साबित होता है कि इतिहास-प्रक्रिया में यह मुमकिन ही नहीं है कि आप लम्बे समय तक लिखते या पुरस्कृत होते चले जायें और आपकी रचनाशीलता पर कभी कोई निर्णय आये ही नहीं . युवा कविता के सन्दर्भ में गौरतलब है कि इस लेख और पिछले दो-तीन वर्षों में जगह-जगह छपे प्रणय कृष्ण , आशुतोष कुमार , प्रियम अंकित , शिरीष कुमार मौर्य और व्योमेश शुक्ल के लेखों के मद्देनज़र फ़ैसले की यह घड़ी
अब आ गयी है . यह सुखद और महत्त्वपूर्ण है कि विष्णु खरे ने इस अनिवार्य और ऐतिहासिक आलोचनात्मक कार्रवाई की ठोस और उपजाऊ ज़मीन तैयार कर दी है . यह मक़ाम है , जहाँ आलोचित कवियों को हमलावर होने की
बजाए आत्मालोचन करना चाहिए और कुछ आलोचकों को ज़्यादा संपूर्ण , ज़्यादा वस्तुनिष्ठ और ज़्यादा गहन विश्लेषण की दिशा में , अगर वे चाहें तो , आगे बढ़ना दरकार है . विष्णु खरे की ज़्यादातर बातों से असहमत होना
असंभव है , क्योंकि वे बातें सचाई की पुकार के मानिन्द हैं . उनमें मुक्तिबोध की-सी धधकती हुई ईमानदारी है . इस मामले में समकालीन हिन्दी संसार में वह अनन्य हैं . आप
उनसे असहमत हो सकते हैं , मगर यहाँ मैं प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का यह बयान उद्धृत करना चाहूँगा------
"असहमत होने का नैतिक अधिकार उसको ही है , जिसका अपना भी कोई मत हो . लेकिन हिन्दी में तो यह माहौल है
कि अक्सर लोग यह कहते मिलते हैं कि हमारा अपना कोई मत नहीं है , लेकिन हम आपसे सहमत नहीं हैं ." विष्णु खरे ने आखिर इसमें क्या गलत कहा है कि देवी प्रसाद मिश्र और कुमार अम्बुज अब तक पुरस्कृत युवा
कवियों में सबसे अच्छे , समर्थ और महत्त्वपूर्ण कवि हैं . उनके इस आलेख पर आगे बहस हो सकती है और शायद होगी भी , मगर मेरी नज़र में उसमें व्यक्त ज़्यादातर बुनियादी स्थापनाएँ , मंतव्य और observations बिलकुल सही हैं . आगामी काव्यालोचना के लिए यह लेख बेहद अहम , कारगर और बहुआयामी प्रस्थान की
ऐतिहासिक भूमिका निभायेगा . विष्णु खरे के शब्दों में कहूँ , तो यह अपने प्रकाश से भावी आलोचना को परावर्तित
करेगा .
-----पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

Pankaj Parashar said...

आदरणीय विष्णु जी की अधिकांश बातों से असहमत होना किसी भी काव्य-रसिक व्यक्ति के लिए कठिन है. हां, इस लेख के बाद उन लोगों को लिखने की प्रेरणा जरूर मिल सकती है जो प्रशंसातिरेकी काव्यालोचन के दबाव में जाने-अनजाने चुप थे.

bipinkumar said...

vishnu khare ne bahut sahas k sath bharatbhushan agrwal smriti puraskar prapt kavion pr jo tipanni ki hai, wah bahut zaroori tha.umeed hai unke is bahastalab lekh ko swasth tarike se aage badhaya jayega.yah puraskar kai aisi kavitaon pr diye gaye jo nissandeh us warsh ki sresth to kya samanya kavitayen v nahi thin.nishant aur jitendra srivastav ki kavita iska taza udahran hai.namvar singh ne parikatha me ashok tripathi se baat karte hue kavi rakesh ranjan ki 5 kavitaon ko poora poora udhrit kiya tha aur bhoori bhoori tareef ki thi.lekin jab puraskar k liye chayan ka samay aaya, to unhen 28 sal ka 'ladka' yaad aa gaya.jabki rakesh k samne bahut km kavitayen padhne yogya bhi thahrti hain.agar vyaktigat rag-dwesh sadhna ho to chayankarta kisi aur trah se apni kripa varshayen, puraskaron ko iska madhyam na banayen.isse kavita k prati aam pathkon ki ruchi ghatati hai. doosre, puraskaron ko lekar in vidwanon ka rawaiya kitna gairjimmedarana hai, yah aaj ka pathak bhali-bhanti samajh rha hai. vishwsniyata sirf kavita ki hi nahi, aalochna ki v ghati hai.

Bipin kumar sharma.JNU...9868565061

Arpit said...

स्वप्निल की पुरस्कृत कविता का नाम '' ईश्वर बाबू '' ही है. " ईश्वर एक लाठी है " उनके कविता-संग्रह का शीर्षक है और " कह रहा हूँ जुनूं में क्या-क्या " की जगह अगर '' बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या '' लिखते तो जनविजय महोदय का '' ज्ञान '' इतने लज्जाजनक तरीक़े से पाठकों के सामने न आया होता. जब टिप्पणीकर्ता द्वारा प्रस्तुत तथ्य ही इतने भ्रष्ट हैं तो मूल्यों के बारे में कुछ न कहना ही बेहतर है.

सिर्फ़ चेला होना पर्याप्त नहीं है जनविजय जी. कविता और कविता की आलोचना पर बात करने के लिये कुछ पढाई-लिखाई भी हो तो अच्छा होगा.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आदरणीय विष्णु जी को तीस साल बाद जो सुधि आई है उसे इमानदार कतई नहीं माना जा सकता। तीस साल तक पुरस्कारों के पत्रों पर बिना हिचक हस्ताक्षर करने के बाद उन्हें होश आया कि उनके अलावा सारे निर्णायक भांग पीकर निर्णय करते रहे हैं।

जिन कविताओं की वह सार्वजनिक मंचो से वाहवाही कर चुके हैं वे अब उन्हें कूडा लग रही हैं। जितेंद्र की कविता उनके साथ ही तद्भव में छपी थी…तब वे चुप रहे…पुरस्कार मिला तब भी…बोधि की कविता जब अनामिका और अंबुज जी के साथ (शायद साहित्य एकेडमी के कार्यक्रम में) पढी गयी थी तो पुरस्कार मिलने के पहले ही वह इसे पुरस्कृत कर चुके थे… पर अब पागलदास पागलपन नज़र आ रही है।

देर से आई इस सदबुद्धि का स्वागत किया जा सकता था अगर वह अंधा बांटे रेवडी के सूत्रधार न होते। अर्जुन सिंह पर चमचागिरी की हद तक जाकर कविता(?) लिखने वाले कवि वैसे भी यूं ही कुछ नहीं करते।

इसे पढकर ऐसा लग रहा है कि जो कवि उनकी तरह गद्य में नहीं लिखते या जिनके साहित्य में अभी लय बची है वे सब अयोग्य हैं और उनका अनुशरण कर चौकोर कवितायें(?) लिखने वाले और उनके झोले ढोने वाले ही कविता के युवा माडल हैं।

हिन्दुस्तानी राजनीति में नेता के ज्ञानचक्षु तभी खुलते हैं जब वह पार्टी बदलने वाला होता है या फिर नई पार्टी बनाने वाला। कभी चुनाव लडने को बेक़रार रहे विष्णु जी जे साथ भी यही हुआ लगता है।

चौपटस्वामी said...

विष्णु जी कसाई किस्म के आलोचक हैं . यहां कसाई शब्द को निर्मम की तरह प्रशंसामूलक अर्थ में ग्रहण करें . वे समकालीन हिंदी आलोचना में ’परशुरामी आलोचना’ के जनक हैं .

संजय चतुर्वेदी,कुमार अम्बुज और देवीप्रसाद मिश्र तथा प्रेमरंजन अनिमेष और मनोज कुमार झा के संबंध में उनकी सकारात्मक टिप्पणियों से सहमति है .

अनिल कुमार सिंह और निशांत की कविताओं पर उनकी टिप्पणी कवियों से अधिक उन्हें पुरस्कार देने वालों पर टिप्पणी मानी जानी चाहिए .

उदयप्रकाश और बोधिसत्त्व की कविताओं पर उनकी टिप्पणी जॉन डन की ’कंसीट्स’ की तरह है जिसकी गिरह सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि के डिसाइफर होने तक शायद ही खोली जा सके .

जिस आलोचक की निगाह में उदय प्रकाश से ज्यादा महत्वपूर्ण कवि विनोद भारद्वाज और विमल कुमार हों,उसे आलोचना के जुरूरी काम से कुछ समय के लिये फुरसत पाकर किसी ऑफ़्थैल्मोलॉजिस्ट से तुरत सम्पर्क करना चाहिए .

कई अच्छे कवियों से हमारी पहली/शुरुआती पहचान कराने वाला भारतभूषण पुरस्कार वस्तुतः अपने चरित्र में अधिनायकवादी किस्म का पुरस्कार है जिसकी ’जूरी’ तो है पर वस्तुनिष्ठ प्राचलों के आधार पर ’जूरी’ के सदस्यों के बीच किसी स्वस्थ ’डेलिबरेशन’ के बाद एक सुसंगत निर्णय तक पहुंचने का कोई अवसर यहां नहीं है . इसका निर्णय एक निर्णायक अपनी निजी पसन्द और नापसन्दगी के आधार पर करता है और फिर उसके लिये तर्क गढता है .

यही कारण है कि सभी कवि-निर्णायकों ने ये पुरस्कार अपने जैसी शैली में कविता लिखने वाले अनुयायी को ही दिये हैं .भले ही वे उनके सांद्र अम्ल का तनु अम्ल बनाते हों और कोई नई जमीन तोड़ना तो दूर उसे ताकते भी न हों . ऐसे युवा कवि कविता में एक किस्म का पातिवर्त्य निभाते हैं या कहें गंडाबंद घरानेदारी वाली कविता करते रहते हैं .

अगर विष्णु खरे को अशोक वाजपेयी द्वारा पुरस्कृत कवि उनकी प्रतिमूर्ति-से दिखते दुहरावग्रस्त और अर्थहीन लगते हैं तो कई भरोसेमंद काव्य-मर्मज्ञों को विष्णु खरे द्वारा पुरस्कृत कुछ बाद के कवि अगर उनकी लद्दड़ गद्यात्मक शैली की फीकी अनुकृति लगें तो आश्चर्य क्या.

यह शानदार आलोचना कुछ कम शानदार दिखने लग पड़ती है जब प्रशंसित कवि विनम्र कृतज्ञताज्ञापन के बजाय उन्हें ’पारदर्शी , विचार-प्रवण , मूल्यनिष्ठ और मार्मिक; मूल्यवान दुर्लभ विवेक;सुखद और महत्त्वपूर्ण ;ठोस और उपजाऊ ’आदि विशेषण सर्टीफ़िकेट के रूप में देने लगे .

यह ’मुक्तिबोध की-सी धधकती हुई ईमानदारी’ की बजाय वह स्थिति ज्यादा लगती है जिसकी ओर विष्णु खरे ने अपने लेख में इशारा किया है .

विष्णु जी की इस बात से पूरी सहमति है कि हिंदी कविता के संसार में " सत्‍ताधारियों के अनुगामियों, मातहतों, मुरीदों और प्रशंसकों की संख्‍या बढ़ती जाती है तो जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे वे अपने भक्‍तों की उम्‍मीदों और मांगों के शिकार या क़ैदी भी होने लगते हैं. जो आराध्‍य अपने पूजकों को वरदान नहीं देता, उसकी मूर्ति शीघ्र ही उपेक्षित हो जाती है. औलिया और मुतवल्‍ली एक-दूसरे से ताक़त हासिल करते हैं."

बिपिन कुमार शर्मा की इस राय से पूरा इत्तिफ़ाक है कि राकेश रंजन बेहतर कवि हैं .

vijay gaur/विजय गौड़ said...

इस आलेख के बहाने एक टिप्पणी:- http://likhoyahanvahan.blogspot.com/2009/09/blog-post_13.html
देखें।

Anonymous said...

तो लगता है कि भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार भी अन्य पुरस्कारों की तरह ही ऐसे निर्णायकों या ज्युरी मंडल के सदस्यों के हाथ में रहा जो अपने समय की उत्कृष्ट कवि प्रतिभा का आकलन करने में असफल रहे. अपवाद के रूप में, जिसने कठिन काव्य-निकषों के आधार पर और वैयक्तिक रुचियों, पूर्वग्रहों और संबंधों को परे रखते हुए चयन का मानक प्रस्तुत किया, वे कोई और नहीं स्वयं विष्णु खरे हैं। भारत भूषण अग्रवाल की संदिग्ध और सृजनात्मक प्रतिमानों के आधार पर 'भ्रष्ट' (Alter or shady)ज्युरी के सबसे संदिग्ध निर्णायक, खरे जी के अनुसार अशोक वाजपेयी ठहरते हैं क्योंकि :''अशोक वाजपेयी की प्रतिक्रियावादी विचारधारा एक ओर तो हिंदी साहित्य की एक बावली और साकित मगज़ी (लूनेटिक एंड डिकेंडेंट फ़्रिंज़)को साथ लिए और पोषित किए चलती है और दूसरी ओर देश के प्रशासकीय और राजनीतिक गलियारे और चित्रकला की अरबों रुपयों की 'एलीटिस्ट' दुनिया से ताकत हासिल करती है....''
(कविता की व्यावहारिक आलोचना के विकास के लिए खरे जी के ये आलोचनात्मक 'उपकरण' (tools of criticism)बहुत उपयोगी होंगे और 'एलीटिज़्म' की एक नितांत मौलिक और इतिहासोत्तर परिभाषा गढ़ने के लिए, मुक्तिबोध के बाद निस्संदेह उनका नाम अग्र-गणनीय होगा।)
अब अगले निर्णायक नामवर सिंह, जिन्होंने 'कविता के नये प्रतिमान' जैसी आलोचना की पुस्तक लिखी, उनके बारे में खरे जी की 'साहसिक''वस्तुपरक' और 'बेलाग' टिप्पणी देखिये :''नामवर सिंह का असर हिंदी की विस्तीर्ण पतनोन्मुख दुनिया , एक दयनीय लेखक संघ (इशारा प्रगतिशील लेखक संघ की ओर है) और हाशिये की राजनीतिक राजनीति पर है...''
ज़ाहिर है खरे जी और उनके अनुयायी इस 'हिंदी की विस्तीर्ण पतनोन्मुख दुनिया' के कीच-पंक से ऊपर कमलवत निष्कलंक उगे हैं, जिसके प्रमाण में अर्जुन सिंह-सुदीप बैनर्जी के शासनकाल में उनकी संघर्षशीलता, त्याग और गैरचाटुकारिता के उच्च 'माडल' स्थापित करने के प्रयत्न में देखा जा सकता है।
अब ले दे कर केदारनाथ सिंह बचे तो वे 'अजातशत्रु' और इतने 'मृदून कुसुमादपि' हैं कि उदय प्रकाश, अनामिका, अनिमेष, स्वप्निल जैसे ऐसे कवियों को यह पुरस्कार दे चुके हैं जो खरे जी के डबराल, अनिता वर्मा, सविता सिंह, विनोद भारद्वाज आदि के आसपास तक नहीं हैं।
खरे जी के मुताबिक हिंदी में (उनको और उनके अनुयायियों को छोड़ कर)'व्यामोह' (पैरानोइआ) और 'षडयंत्र सिद्धांत' (कांस्पिरेसी थ्योरी) स्थायी भाव की तरह चलती रही है, इसलिए स्पष्ट है कि उनके अलावा अन्य सभी निर्णायकों ने अपने-अपने'अनुगामियों''भक्तों' 'मुरीदों' और 'क्लाउट' के प्रतिभाहीन कुकवियों को ही भारत भूषण पुरस्कार बांटे हैं।
यहां यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्वयं उनके समेत खरे जी की लिस्ट के उत्कृष्ट कवियों को जो जो पुरस्कार, जिसमें साहित्य अकादमी, अनगिनत राज्यों के सरकारी पुरस्कार वगैरह शामिल हैं, वे बिल्कुल उचित और कठोर काव्य-सृजन कसौटियों के आधार पर ही दिये गये हैं। अर्जुन सिंह के पुत्र तत्कालीन संस्कृति मंत्री 'राहुल भैया' (अजय सिंह) के कार्यकाल में स्वयं इस प्रखर प्रतिभा संपन्न 'कवि-आलोचक शिरोमणि' विष्णु खरे को 'शिखर सम्मान' म.प्र. राज्य शासन द्वारा उनकी नैतिक सर्जनात्मक उत्कृष्टता और विचारधारात्मक दृढ़ता का ही स्वीकार है।
यह मेरी टिप्पणी की आंशिक पीठिका है। फ़िलहाल भारत भूषण पुरस्कार जैसे संदिग्ध पुरस्कार के बारे में मेरी निजी राय है कि कम से कम तेजी ग्रोवर, गगन गिल, उदय प्रकाश, स्वप्निल, अनिल सिंह, गिरिराज किराडू, बोधिसत्व, बद्री नारायण, विमल कुमार आदि को यह पुरस्कार तुरत इस समिति के संयोजकों को लौटा देना चाहिए और जब तक वे विनोद भारद्वाज, आर.चेतन क्रांति, सुंदरचंद ठाकुर, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, सविता सिंह, अनिता वर्मा जैसी ऊंचाइयां और काव्य-कौशल न हासिल कर लें तब तक इस ओर न देखें। उन निर्णायकॊं को धिक्कार है। उन कवियों को भी।

रंगनाथ सिंह said...

विष्णु खरे की इस तथाकथित भूमिका को पढ़ कर समझ आता है की मुक्तिबोध आलोचक को साहित्य का दारोगा और चेखव आलोचक को घुड़मख्खी क्यों कहते थे !! ऐसे आलाचकों के कारण ही दुनिया भर के कई रचनाकार आलोचक नाम से चिढ़ते हैं…..

इस भूमिका का उद्देश्य इसके उपशीर्षक में स्पष्ट है ” एक अंशतः विवादस्पद जायजा ”

विष्णु खरे ने वाग्जाल बुनकर जो ब्लर्ब लिखे हैं उनकी रोशनी में मुझे साफ नजर आ रहा है की ये भूमिका सिर्फ विवाद पैदा करने के लिए लिखी गयी है. चार-दस लाइन में दाखिल-खारिज करके अदालती फैसला सुनाना विष्णु खरे के अगंभीर रवैये की पुष्टि मात्र करता है. विष्णु खरे ने इस संग्रह का चर्चा में आने के लिए दुरूपयोग किया है. यह भूमिका पुरस्कार समारोह ख़त्म होने के बाद बाहर जनता को फोटो कापी बांटी गयी. मेरी रूचि तो उस अंशतः संशोधन को जानने में है जो विष्णु खरे ने किताब में दी हुयी भूमिका में किया है…..पता तो चले की जनता को बांटे गये और किताब में छपवाए गये पाठ के बीच में क्या फर्क है ?

mark rai said...

जब ऐसे सत्‍ताधारियों के अनुगामियों, मातहतों, मुरीदों और प्रशंसकों की संख्‍या बढ़ती जाती है तो जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे वे अपने भक्‍तों की उम्‍मीदों और मांगों के शिकार या क़ैदी भी होने लगते हैं. जो आराध्‍य अपने पूजकों को वरदान नहीं देता, उसकी मूर्ति शीघ्र ही उपेक्षित हो जाती है.......very nice.....

अभय तिवारी said...

अच्छी बुरी कविताएं लिखी जाती हैं.. और पुरस्कार भी साधे जाते हैं.. हिन्दी में ही नहीं अंग्रेज़ी में भी.. अगर जुगाड़ से नहीं तो किसी अन्य हेतुओं से..
बड़ी देर में चेते..खैर! खरे जी ने देर से ही अपनी राय सामने रखी, अच्छी बात है.. उन्हे उसे रखने का पूरा अधिकार है, मैं उसका सम्मान करता हूँ, जितना किसी दूसरे व्यक्ति की राय का। आखिर कला मनोजगत का मामला है.. कोई आलू-प्याज़ तो है नहीं कि एक आलोचक ने तोल के बता दिया कि तीन छटांक है तो हर किसी के लिए उतना ही पड़ेगा।

आदरणीय खरे जी की राय को अन्तिम ईश्वरीय निर्णय मानने की कोई ज़रूरत नहीं है.. जैसा कि कुछ लोग आभास दे रहे हैं..

वो शायद इसलिए कि हिन्दी में प्रकाशक जो किताब छापता है उसे सरकारी संस्थानों में हिन्दी प्रभाग में जंग खा रही अलमारियों के खानों में ऊपर नीचे करने वाले चूहे पढ़ते हैं। कवि सम्मेलन में भी तो नहीं जाते हिन्दी कवि, जाना चाहे भी तो कैसे.. कविता से संगीत तो कब का घर-निकाला पा चुका। बेचारा कवि अपनी कविता के मूल्यांकन के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ आलोचक पर निर्भर है, और अपनी प्रतिष्ठा के लिए इन्ही आलोचको द्वारा निर्णीत पुरस्कारों पर।

Arpit said...

'' यह भूमिका पुरस्कार समारोह ख़त्म होने के बाद बाहर जनता को फोटो कापी बांटी गयी.''

इस वाक्य के गठन पर ध्यान दीजिए संपादक महोदय. ऐसे दुर्भाग्य हिंदी विभागों में जन्म लेते हैं. यह वाक्य (लेखक नहीं) किसी सिंह-मात्र की ही नाजायज़ संतान है.

'' मेरी रूचि तो उस अंशतः संशोधन को जानने में है ''

ध्यान दीजिए - आंशिक संशोधन नहीं, " अंशतः संशोधन ", और रुचि नहीं " रूचि ''.

अगर ऐसे लोग हिंदी का भविष्य हैं तो हिंदी का भविष्य वही है जो उसका वर्तमान है.

''…..पता तो चले की जनता को बांटे गये और किताब में छपवाए गये पाठ के बीच में क्या फर्क है ?''

वह फ़र्क़ तो न जाने कब पता चले लेकिन इतना तय है कि एक मूर्ख और एक धूर्त में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है.

Anonymous said...

विष्णु खरे साहब खरी खरी बातें दो चार वाक्यों में नहीं निपटायी जातीं. वह तो फ़तवेबाज़ी कहलाती है.और आप इसके मास्टर माने जाते हैं. कृपया कुछ मेहनत करें और किसी गहरे विष्लेषण के साथ अपनी बात करें.आपको किसी कवि की तारीफ़ या निन्दा करने का पूरा पूरा हक है पर अपनी बात ठोस ढंग से कहने की कृपा करें.. और यदि आप ऐसा नहीं कर रहे हैं तो फिर आपमें और हमारे तथाकथित शलाका पुरुष नामवर सिंह में फ़र्क ही क्या है?
-नरेश यादव

Tushar Dhawal Singh said...

हिंदी आलोचना पिछले कुछ वर्षों से शिथिल हो चली है और इसमें खरी और बेबाक बात कह देने का माद्दा भी घटता जा रहा है. आम तौर पर इसी धारणा के मद्देनज़र लेखक और पाठक सभी एक मौन निराशा से जूझ रहे हैं. कई बार देखने में यह भी आता है कि साहित्येतर गल्प भी साहित्यिक गल्प का नकाब ओढे साहित्य में घुसे आ रहे हैं. प्रायः पुरस्कारों पर भी यही आरोप लगते रहे हैं. जिसे मिल जाये वह निर्णय को सही बताता है, जिसे न मिल पाया वह उसमे कुछ नुक्स निकालता है. कुल मिला कर अपेक्षाओं और अहम् का यह योग हमें हर उस संयोजन, समीकरण और सन्दर्भों के दर्शन कराता है जिसमे रचना, रचनाशीलता और रचना धर्मिता कब की पीछे छूट चुकी होती है. हमारी प्रायः रचनाएँ भी मठोन्मुख हो रही हैं. शुद्ध लेखन जो बिलकुल मौलिक हो, इस पर जोर घटता जा रहा है. 'तुंरत-फटाफट' वाले इस समय में शोहरत भी instant ही चाहिए होती है, जब कि कला - साहित्य की साधना तो पूरी ज़िन्दगी मांगती है, और प्रायः एक ज़िन्दगी भी उसके लिए कम ही पड़ती है.
आज के इस माहौल में खरे जी का यह लेख महत्त्व रखता है. इसलिए नहीं कि उसमें अमुक निर्णायक या अमुक कवि को कमतर बताया गया है बल्कि इसलिए कि उसमें बेबाकी है . विष्णु जी कि स्थापनाओं से सहमत हुआ ही जाये, ज़रूरी नहीं है. लेकिन जिस बात पर उनके इस लेख की तारीफ होनी चाहिए वह यह है कि अपनी सहमती - असहमति, अपनी पसंद- नापसंद को उन्होंने बेबाकी से सामने रखा है. ज़रूरी नहीं है कि उनका कहा सब ठीक ही हो, लेकिन इससे आगे और भी कुछ लिखे जाने की संभावनाओ को बल तो मिला ही है, खास तौर से युवा लेखन पर.
यह लेख आपसी कलह को जन्म न दे कर अगर एक स्वस्थ साहित्यिक बहस को जन्म दे तो इससे हिंदी का ही भला होगा.

रंगनाथ सिंह said...

अर्पित नामधारी जी

आपका धन्यवाद की आपने दिखावटी और बनावटी शालीनता का ढोंग रचे बिना टिप्पणी की। मैं विष्णु खरे की तरह कुलशीलवादी भी नहीं हूँ कि आपको न जानने के कारण हेय समझ लूँ। लेकिन आपकी मंशा पर शंका जरूर है। अभी तक आपने मूल पोस्ट पर अपनी कोई राय नहीं रखी है। आप तो सिर्फ विष्णु खरे से असहमति जताने वालों के खिलाफ कमेंट करने आते हैं। आपने पहले अनिल जनविजय का काउंटर कमेंट किया और अब मेरा।

आपका इस लिए भी धन्यवाद कि,हिन्दी में अच्छे प्रूफरीडरों की कमी होती जा रही है। लेकिन इस बार आपने जल्दबाजी की है। कृपया दुबारा पढ़ें। और वैसे भी, आप कमेंट की प्रूफरीडिग करने की जगह लेख की प्रूफरीडिंग किया करें तो बेहतर। विष्णु खरे ने लिखा है...साहित्यसंगीतकलाहीन...? मूलतः संस्कृत से उठाया गया यह पदबंध सही है या गलत इस पर भी कोई राय जरूर दें। मैंने एक नमूना दिया है। शेष आपका काम है।

मुझे एकबार किसी ने बताया कि कामायनी की प्रूफरीडिंग संभवतः शांतिप्रिय द्विवेद्वी ने की थी। उसी तरह मुक्तिबोध के भाषाई सीमाओं की तरफ खुद त्रिलोचन ने ध्यान दिलाया था। निराला को द्विवेदी- शुक्ल का सामना करना पड़ा था। सुना है कि कुछ संस्कृतनिष्ठ भाई लोगो को प्रेमचंद की हिन्दी उर्दू लगती थी !!
लुब्बेलुबाब यह है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रूफरीडरों और सर्जकों का अपना-अपना इतिहास है। हर किसी का अपना काम है।

आपको बता दूँ कि मैं काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के गणित विभाग से स्नातक हूँ। मैंने कभी भी हिन्दी साहित्य की अकादमिक पढ़ाई नहीं की है। इसलिए आपसे कहुँगा है कि किसी के लिए अपने दुराग्रह के आधार पर सभी हिन्दी विभागों को कोसना ठीक नहीं है। रही हिन्दी के भविष्य की, भरोसा रखिए हिन्दी का भविष्य वही सुधारेगें जो हिन्दी को पेट से नहीं दिल से प्यार करते हैं। यदि मुझ जैसे कुछ बण्ड, जो कालांतर में बाणभट्ट कहे जा सकते हैं, का ज्ञान कुछ कम है तो भी कोई खास चिंता की बात नहीं है। हम धीरे-धीरे सीख लेंगे। बाण ने भी ऐसे ही सीखा था। आखिरकार निराला ने भी तो बीबी की लाग-डांट के बाद ही हिन्दी सीखी थी। हम आप जैसों की लाग-डांट से सीख लेंगे।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अर्पित जी
बस इतना कहना चाह रहा था कि मूर्ख और धूर्त में बहुत अंतर होता है-- और अगर धूर्त शीर्ष पर बैठा हो तो वह ज़्यादा घातक होता है।

अभिनव ओझा जी के उत्तराधिकारी का स्वागत। ( यह कतई कटाक्ष न माना जाये। ब्लाग हो या प्रिंट भाषा का निबाह ज़रूरी है।)

kapildev said...

खरे जी की समस्या यह है कि उन्हें साहित्य की सीधी राह चलना पसंद नहीं है। सीधे तैार पर चलना तो बिलकुल नहीं। चुपचाप अपना काम कर रहे कवियों लेखकों को मुहं चिढ़ाना, नोच-खसोट करना और इस तरह अपनी मानसिक खलिस मिटाना उनकी आदत है। अपनी इसी आदत के वशीभूत उन्हें हर छठे छमासे कोई आलेाचक, कोई कवि या कोई प्रसंग ढूंढ़ते रहना होता है। इस बार संयोग या दुर्योग से भारत-भूषण अग्रवाल पुरस्कार से पुरस्कृत कवि ही अगर उनके अंट पर चढ़ गये तो इसमें खरे जी का क्या देाष! आग का काम भस्म करना है। वह अपने जन्मजात कारणों से अपना काम करती ही रहती है। वैसे हमारे अग्निवर्षी खरे जी अपने स्वभाव में अग्नि की तरह इतने निःस्पृह, बेबाक और निडर भी नहीं हैं जितना कि दिखने या दिखाने का प्रयास करते हैं। जैसा कि अपने इस गर्हित उद्देश्य को छिपाने के लिए भूमिका गढ़ने का असफल प्रयास उनके इस लेख (?) में देखा जा सकता है। लेकिन उनकी सारी चतुराई के बावजूद यह समझना मुश्किल नहीं कि इस बार के निशाने पर उन्हें किसे रखना था, और कैसे रखना था। किस मुतवल्ली का कैसे उद्धार करना था । बचाने और बध करने में सिद्ध खरे जी की आलोचना जिन शब्दों या शब्द-पदों से अपने मुतवल्लियों का उद्धार करना चाहती है,उसकी कुछ बानगी यहां देखने लायक है-(1)‘‘भारद्वाज ने कविताएं कम लिखी हैं। लेकिन जिन्दगी को देखने की उनकी निगाह अलग और प्रसार दूरगामी है। उनका शिल्प बेजोड़ है।’’ अब इसमें ऐसा क्या है जिससे भारद्वाज जी कविता को समझने का द्वार खुलता है,यह तो वे मुतवल्ली वंधु ही बता सकते हैं जिन्हें खरे जी का यह आलेख‘‘आलोचना की अनिवार्य ऐतिहासिक कार्यवाही’’ जान पड़ता है। आश्चर्य है कि कुण्ठा से बजबजाते इस आलेख की तुलना मुक्तिवोध की धधकती ईमानदारी से करते हुए इन मुतवल्लियों की शारदा अपना सर पटक कर मर नहीं जाती। मगर हर चालाकी की अपनी एक सीमा होती है। विनोद भारद्वाज को उबारने और जितेन्द्र श्रीवास्तव को कविता की दुनिया से बाहर कर देने की मुहिम में रचा गया यह सारा खेल(लेख नहीं) अंततः जिस हास्यास्पद अंत को प्राप्त होता है, वह देखने ही लायक है। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता पर पुनरूक्ति दोष वाला आरोप पढ़ कर रोना तो आया ही, अपने बालपन की एक घटना भी याद आई। परशुराम-लक्ष्मण-संवाद वाले प्रसंग में लक्ष्मण का एक बड़बोला कथन है: ‘‘जो राउर अनुशासन पावउं। कंदुक इव ब्रहमाण्ड उठावउं।।’’ हमारी तर्कवुद्धि इसे लेकर बहुत परेशान थी कि ब्रहमाण्ड उठाने वाले लक्षण स्वयं कहां खड़ा होंगे। तब हम लोग ऐसे प्रश्न पूछ कर अपनी वौद्धिकता प्रमाणित करते रहते थे। पूछने पर हमारे चाचा जी,जो स्वयं एक साहित्य-पाठी थे, ने समझाया कि अरे, वह तो क्रोध में कही बात है, इस पर इतनी माथा पच्ची क्यों करते हो। मुझे अब समझ में आता है कि ऐसी बालोचित तर्कशीलता से साहित्य को समझने की चेष्टा का उत्तर वैसे ही दिया जा सकता था जैसे कि चाचा जी ने दिया था।
अब ‘‘त्रेपन वर्ष’’ से लगातार साहित्य साधना में लगे विष्णु खरे जी को कोई कैसे समझाए कि साहित्य को यदि ऐसे तर्कांे से समझा जा सकता तो आज उसपर वकीलों, वैज्ञानिकों अथवा तर्कशास्त्र के मुदर्रिसों का कब्जा होता। सबसे दयनीय बात तो यह है कि खरे जितेन्द्र श्रीवास्तव की जिस कविता में पुनरूक्ति दोष देख रहे हैं वहां तो पुनरूक्ति दोष का कोई संदर्भ ही नहीं है। कलकत्ता की यात्रा के दौरान कवि गालिब को याद करता है और इसी क्रम में उनके कलकत्ता जाने से खुद के जाने को जोड़ कर कहता है-
मैं जी भर कर देखना चाहता हूं कलकत्ता/इसलिए चाहे जितना पिराये कमर/चाहे जितनी सताए थकान/मैं लौटूंगा नहीं दिल्ली/जरूर जाऊंगा कलकत्ता

अब यह तो कोई साधारण दृष्टि वाला मनुष्य भी बता देगा कि यहां मूल संदर्भ थकान है। थकान और कमर पिराने के प्रसंग से ‘कलकत्ता’ का शब्दार्थ एक अन्यार्थ ग्रहण करता है और इसी थकान और कमर पिराने की अनुभूति के कारण कविता एक साभ्यतिक यात्रा के इतिहास से जुड़ जाती है। अब यह तो विष्णु खरे जी का कोई मुतवल्ली ही बता पाएगा कि कविता की आखिरी पंक्ति अपनी पूर्ववर्ती पक्तियों से अलगा कर भला कैसे पढ़ी जा सकती है ? मगर विष्णु जी अलगा कर ही पढंेगे क्यों कि जितेन्द्र और केदारनाथ सिंह का वध इसी हथियार से करना उन्होंने तय कर लिया है।
अंत में, बहुत कुछ न कहते हुए,भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से पुरस्कृत देवी प्रसाद मिश्र की कविता का सहारा ले कर अब तो यही कहना उचित होगा कि हे अपार-दृष्टि सम्पन्न महा आलोचक विष्णु खरे जी! आप कृपया कविता के मैदाने से बाहर जायं ताकि हमारा सहृदय समाज कविता के साथ अपना सरल और मनुष्योचित संबंध निर्मित करने में कामयाब हो सके। आमीन!

Jawarimal Parakh said...

vishnu Khare ka lekh pura padh gaya. Yeh samjhana mushkil hai ki ise lekar itna vivaad kyon ho raha hai. Puraskrit kaviyon par ki gayi tippaniyon ke alawa bhi bahut si mahattwapoorna baaten kahi gayi hain. Kaviyon par jo tippaniyan ki gayi hain, unko ek kavi-aalochak ki apni raay maan kar vichar hona chaahiye. jaroori nahin ki hum unse sahmat hon. Durbhaagya purna yeh hai ki jin kaviyon ke baaren mein pratikool tippaniyan ki gayi hain, ve uske pichhe shadyantra dekh rahe hain, Vishnu khare ki kuntha dekh rahe hain. Sankshipt hi sahi pratyek kavi par ki gayi tippaniyon mein vichaar ke sutra hain. Vishnu ji ne yathasambhav is aalekh ki bhasha ko sanyamit rakhne ka prayaas kiya hai.
Jawarimal Parakh

lina niaj said...

अपने इस लेख से विष्णु जी आख़िर कहना क्या चाहते हैं कि भारत भूषण पुरस्कार भी कविता के और हिन्दी साहित्य के या दुनिया भर के अन्य पुरस्कारों की तरह ही जोड़-तोड़ की राजनीति से मिलता है।

Anonymous said...

माफ कीजिएगा कि बेनामी लिख रहा हूँ. पर वह फ्रिक न कीजिए, बक़्त नज़दीक है कि नाम भी बता दूँगा.
विष्णु जी, क्या आपकों पहल में अंतिम अंक में छपी अपनी कविताएँ याद हैं, जरूर याद होंगी, आखिर आप कविताओं को बार बार पढते जो हैं. युवाओं में हो सकता है कि कुछ कमियाँ हो, भाषा शैली में परिष्कार न हो, हो सकता है कि वे जो लिखते हो, वह कविता ही न हो. लेकिन अपने और अपनी पीढी के गिरेबान में झाँक के देखे (देख सकेंगे). नहीं. आखिर आपकों जो अर्जुन सिंह के दरबार में हाजिरी जो देनी थी (आपकी संद्रभित कविता उनकी की चाटुकारिता से ज्यादा क्या थी), जाने दीजिएआप एक समय संजय गाँधी के सिपहसालार थे, और आपकी पीढी......... उसी के अपराधों को आज की पीढी भोग रही है. आप ही लोगों ने युवाओं को चाटुकारों की टोली में तब्दील कर दिया है. खैर, आप और आपका ईमान..... ख़ुदा खैर करें.

जय कौशल said...

बेहतर...