Sunday, September 06, 2009

शहरनामा : १ : लखनऊ

( बहुत तकलीफ के साथ आलोकधन्वा ने अपनी कविता सफ़ेद रात में यह दर्ज किया था : लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ/इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद/ कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़/अब इन्हीं शहरों में/कई तरह की हिंसा कई तरह के बाज़ार/कई तरह के सौदाई/इनके भीतर इनके आसपास/इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर/और श्रीनगर तक/हिंसा/और हिंसा की तैयारी...यह हानि-बोध हमारे शहरी जीवन के अनुभव के अत्यन्त निकट है। कुछ ठहरकर सोचने पर लगता है कि इन तमाम शहरों का अपना अतीत और वैभव उनसे छूट रहा है। यह आदमी की तरफ से शहर के ख़िलाफ़ की गई सबसे क्रूरतम कार्रवाई की वजह से हुआ है। इसलिए कुंवर नारायण जब यह कहते हैं कि अब आदमी ही नहीं शहर की तरफ से भी सोचना होगा, तो वह शहर को उसकी गरिमा और वैभव सौंपने जैसी बात लगती है। शहर को यह गरिमा कवि-लेखक ही सौंप सकते हैं। सबद पर शहरनामा नामक इस स्तम्भ को शुरू करने के पीछे की मंशा यही है। हम शहरों को उनके अतीत और आज में याद और ज़ज्ब करके उनके प्रति कुछ हद तक सहिष्णु बन सके, तो हमारे आदमीनामे में भी इससे कुछ गरिमा ज़रूर लौट आएगी। शहरनामा की पहली पेशकश में हम कुंवरजी की ही उनके अपने शहर लखनऊ पर लिखी कविता दे रहे हैं। लखनऊ को नवाबी शानो-शौकत का बखान करती इतिहास की पोथियों से कहीं ज़्यादा संजीदगी से सरशार और शरर, मजाज़ और मिर्ज़ा रुस्वा, सरदार जाफ़री, कुंवर नारायण और मनोहरश्याम जोशी के ज़रिये जाना जा सकता है। हम हर बार किसी एक कवि-लेखक का शहर विशेष के बारे में गद्य-पद्य देंगे। कुंवरजी ने नेह के नाते इस कविता का इस्तेमाल करने की हमें अनुमति दी, हम इसके लिए उनके आभारी हैं। शहर केंद्रित एक अन्य आयोजन भी इससे पूर्व सबद पर संभव हुआ है। पर विधिवत शुरुआत इसे ही माना जाए। नीचे लखनऊ का एक विहंगम दृश्य और इसी शीर्षक से कुंवर नारायण की कविता। )


लखनऊ


किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्योरियां चढ़ाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढे-सा खांसता हुआ लखनऊ।
काफ़ी-हाउस, हज़रतगंज, अमीनाबाद और चौक तक
चार तहजीबों में बँटा हुआ लखनऊ।

बिना बात बात-बात पर बहस करते हुए-
एक-दूसरे से ऊबे हुए मगर एक-दूसरे को सहते हुए-
एक-दूसरे से बचते हुए मगर एक-दूसरे से टकराते हुए-
ग़म पीते हुए और ग़म खाते हुए-
ज़िन्दगी के लिए तरसते कुछ मरे हुए नौजवानोंवाला लखनऊ।

नई
शामे-अवध--
दस सेकंड में समझाने-समझनेवाली किसी बात को
करीब दो घंटे की बहस के बाद समझा-समझाया,
अपनी सरपट दौड़ती अक्ल को
किसी बे-अक्ल की समझ के छकड़े में जोतकर
हज़रतगंज की सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर थकाया,
ख्वाहिशों की जगह बहसों से काम चलाया,
और शामे-अवध को शामते-अवध की तरह बिताया।


बाज़ार
-
जहाँ ज़रूरतों का दम घुटता है,
बाज़ार-
जहाँ भीड़ का एक युग चलता है,
सड़कें-
जिन पर जगह नहीं,
भागाभाग-
जिसकी वजह नहीं,
महज एक बे-रौनक आना-जाना,
यह है- शहर का बिसातखाना।


किसी
मुर्दा शानोशौकत की कब्र-सा,
किसी बेवा के सब्र-सा,
जर्जर गुम्बदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवाइफ की ग़ज़ल-सा
हर आनेवाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ़ आदाब-सा लखनऊ,
खण्डहरों में सिसकते किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक़ मलमल पर कढ़ी हुई बारीकियों की तरह
इस शहर की कमज़ोर नफासत,
नवाबी ज़माने की ज़नानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
कव्वालियाँ गाती हुई नज़ाकत :
किसी मरीज़ की तरह नई ज़िन्दगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज़ का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज़ का लखनऊ :


यही
है किब्ला
हमारा और आपका लखनऊ।

****

6 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

शहरनामें में लखनऊ केन्द्रित कविता की प्रस्तुति के लिये आभार । हम अगली कड़ियों के लिये प्रतीक्षा कर रहे हैं । आभार ।

अजय कुमार झा said...

वाह जी भारत के शहरों ..को लेकर कविता ...खूब जी बहुत खूब.....हमें लखनऊ से तो ज्यादा लगाव है..बचपन बीता है वहां..आभार..

anita said...

achi lagi.. kuwar ji kavita...alok dhanva ji se sehmat hun har shehar me uske pehchaan kam bachi hai...lko.me bhi lko nahi raha...dimag par jor dalna padega hai k yaha kabhi kisi umrao jaan ke aawaj nawabon ke sham rangeen banya karti hoge....ya kuch purani imarten hai..jinhe dekhne ab tourist bhi nahi jate...mall culture ne sare sheron ke pehchaaan cheen le hai...awadh ke sham bhi bhi....gunj ke chakachundh ke baad bhi udas hai....

सागर said...

गोया पूरी कविता ही लाजबाब है... सिर्फ एक बार पढने से दिल नहीं भरेगा...

शुक्रिया इतनी अच्छी कविता पोस्ट करने के लिए...

Ratnesh said...

किसी मुर्दा शानोशौकत की कब्र-सा,
किसी बेवा के सब्र-सा. har achhe shahar ki niyati aaj aisi hi ho chali hai.marmik kavita.shaharnama stambh k liye badhai!

Yudhisthar raj said...

बेहतरीन कविता ... वाह