Saturday, August 29, 2009

कवि कह गया है : ५ : तुषार धवल


( तुषार धवल हिन्दी के नए कवियों में अपने रचना-स्वभाव की वजह से अलग से पहचाने जाते हैं। उनकी कविता में समकालीन यथार्थ के साथ-साथ एक आध्यात्मिक प्रेक्षा भी जुड़ी है। बहुधा ऐसी प्रेक्षाओं को ग़लत पढ़ लिया जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उस कोहेतूर की भी सैर कर आयें जहाँ कविता में इन प्रेक्षाओं का नियोजन होता है। तुषार ने हमारे आग्रह पर यह तलघर खोला है। उनके शब्दों के आलोक में हम यहाँ विचर सकते हैं। 'कवि कह गया है' स्तम्भ में इस बार तुषार की अन्तः-क्रिया। हाल ही में कवि का पहला कविता-संग्रह, 'पहर यह बेपहर का'नाम से छपकर आया है। सबद कवि को उनके पहले संग्रह और भविष्य की शुभकामनायें देता है। तुषार कविता करने के साथ-साथ बहुत उम्दा चित्र भी बनाते हैं। ऊपर उन्हीं की चित्र-कृति ,''शेष '' दी गई है। )


एक तत्त्व है कविता

तुषार धवल

मन ... मन के पार एक कोमल अँधेरा पसरा रहता है। नहीं, अँधेरा भी नहीं, इसे एक कोमल उजास कहना चाहिए। या उजास भी नहीं, यह एक शून्य है। ....शून्य है ? नहीं वह भी नहीं। तो फिर क्या है ? पता नहीं, लेकिन कुछ तो है। कोई तो एक ज़मीन है। अवकाश या न जाने क्या है, जहाँ मन में उठती लहर मुझे धकेल रही है।

यह रास का काल है। लय, गति और बारीक हरकतों का मिला जुला संयोजन! कविता वह नहीं जिसे हम जानते हैं। अनुभूति वह नहीं, जिसे हम व्यक्त करते हैं। यह कुछ शब्दातीत-सा होता है। सृष्टि ने अपनी रचना का सूत्र अपने भीतर छुपा रखा है। खजाने की कोई गुमशुदा चाबी गहरे अतल में किसी सूक्ष्म भाव में 'एनक्रिप्ट' करके रख दी है। उसे 'डी-कोड' करना मुझे नहीं आता। लेकिन एक संकेत कहीं भीतर से उठता है। कौन ? कहाँ ? लुका-छिपी का खेल चलता है ! मन को सतर्क करता हूँ। मुझे मालूम है, कहीं से कोई 'धप्पा' दे देगा और फिर से खेल अपनी शुरुआत पर लौट जायेगा।

एक 'सिम्फनी' है शब्दों की। 'रिद्मिक'। लय जो मुझे चारों तरफ से घेर रही है। कुनमुन कुनमुन कुछ कुनमुनाता है मेरे भीतर। टन्न से एक घंटी बजती है। स्वरों का जमघट एक 'रिदम' में फैलने लगता है। भाव उसी 'रिदम' पर चल रहे हैं। पड़ोस में कोई ड्रिल मशीन तीखी घिर्र-घिर्र करती दीवार में उतरती जा रही है। एक चील हवा में चकल्लस करती हुई गोता लगा रही है। फेरीवाला पुकार लगाता है। यहीं ट्रैफिक भी है। बीवी, ऑफिस, बॉस भी। ये सब हैं, लेकिन इन क्षणों में ठीक वैसे नहीं, जैसा हम उन्हें चीन्हते-जानते आए हैं। जानना भी कभी-कभी कितना अनजान होना है!

सृष्टि सेवित ( सृष्ट ) हर चीज़ की जो यह लय है, क्या हम इस लय को जान समझ पाते हैं ? इस नैसर्गिक लय का असर बहुत सीधा होता है। बहुत पक्का। भीतर जो उमड़ता-घुमड़ता है, वह इसी लय से तारतम्य बिठा कर इसमें विलय का आकांक्षी होता है। रचना वहीँ से उगती है। और यह लय सहजता की होती है।

इस 'सिम्फनी' में मैं भी डूब-उतरा रहा हूँ। आदिम संस्कार हैं, अहम् है, जो काठ के किवाड़-सा आड़े आ जाता है। जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ।

कभी कोई लय गीत के ताल पर उठती है तो कभी गद्य के ताल पर। उसका कोई फार्मूला नहीं है। कभी कभी तो बिलकुल निर्जन सपाट-सी भी लय होती है किसी भाव-चेतना की। बस उसके सहज में सहज हो जाने में सब कुछ बसा होता है। काठ के किवाड़ में दरार है जिसके पीछे से ढिबरी ढिमक ढिमक कुछ कह रही है। देखो उसकी लौ का 'रिदम'। यह संसार का 'रिदम' है। जो कुछ भी सहज-सृष्ट है उसमें 'रिदम' है।

कविता शब्दों में नहीं होती। शब्दों से बनती भी नहीं। एक तत्त्व है कविता।
कविता सिर्फ वहां संभव 'होती' है, जहाँ शब्दों के वाहन हमें ले जा कर छोड़ देते हैं !

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5 comments:

परमजीत बाली said...

एक बहुत ही सुन्दर पोस्ट पढ़वानें के लिए धन्यवाद।

Anonymous said...

Indeed very interesting , it provokes you to think afresh and takes you beyond the dichotomous world and word. Thanks for publishing in your blog and sharing with us.

Geet Chaturvedi said...

इसे पढ़कर तुषार की कविताएं याद आ गईं.

prabhatranjan said...

tushar ki kavitaon men avchetan ki bhumika bhi hoti hai, unke is chitra men srishti ka avchetan hai. jitna achha unhone likha hai chitra bhi utna hi achha hai.

Ratnesh said...

kavi-man ki baat.bahut saghan aur kuch aspasht si.par mahtwapurn hai is kavi-man ko padhna.