Monday, August 31, 2009

यह जो हरा है

तुषार धवल की कविता कई मायनों में ''शद्ध कविता'' है। इन कविताओं में कवि की अन्तः प्रेरणा दूषित प्रभावों की तुलना में प्रबलतर हैं, जो इसे ''कनट्राइव्ड पोएट्री'' होने से बचाती हैं। इसका सामना जिन अधिकतर कविताओं से है उसमें कवि का श्रम और युक्ति दिखती है। इसलिए तुषार को पढ़ते हुए कई दफा यह भ्रम होता है कि उनके यहाँ चीजें कच्ची तो नहीं रह गईं। पर एकाधिक जगहों को छोड़ कर आपको उसका कच्चा या हरा होना ही मोहता है। एक नए कवि में अक्सर 'यह जो हरा है', उसका न होना सबसे ज़्यादा खटकता है। और अगर कवि-कर्म आपने महज सायानी जमात में हिस्सेदारी की गरज से इस हरे से शुरू न करके ठूंठ से शुरू की होती है तो वृक्ष की संभावनाएं भी आप ख़ुद ही निःशेष करते जाते हैं। अनेक नए कवि इसी तरह काल-कलवित हो गए और हो रहे हैं। तुषार के यहाँ यह हरा एक वृक्ष का आश्वाशन है। अस्तु। तुषार ने ( प्रभात रंजन ने ठीक मार्क किया है ) ऐसी कवितायें लिखी हैं जिनमें अवचेतन का अविरल प्रवाह आद्योपांत कायम रहता है। हालाँकि तुषार सिर्फ़ इसी से कविता नहीं संभव कर लेते। विमल मन जब वह कहते हैं कि ''जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ'' तो उसका यह आशय कतई नहीं है कि अवचेतन को वे अपने हिसाब से गढ़ते या पुनर्सृजित नहीं करते। दरअसल, इसी पुनर्सृजन में उनकी वैचारिकी और आध्यात्मिक प्रेक्षाएं भी जगह पाती हैं। तुषार की कविताओं के लिए इसीलिए 'प्रेक्षा' शब्द का इस्तेमाल करना मुझे उपयुक्त जान पड़ता है। प्रेक्षा का अर्थ है देखना। पर उनकी प्रेक्षाएं भी कुछ फर्क हैं। मसलन वे दृश्य-पाठ तक अपने को सीमित नहीं रखतीं। वे अपने लिए एक ज़्यादा बड़ा संदर्भ ढूँढने-पाने की चेष्टाएँ हैं। अनायास ही तुषार की कविता में नैतिक-आध्यात्मिक आयाम नहीं जुड़ जाते। ज़ाहिर है वे इन्हें प्रार्थना के शिल्प में स्वायत्त नहीं करते, बल्कि अपने तीखे यथार्थ-बोध से समंजस करते हैं।
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(''पहर यह बेपहर का'' नाम से प्रकाशित कवि के प्रथम संग्रह को पढने की एक कोशिश। ऊपर पुस्तक का आवरण चित्र , जो कवि की तुलिका से ही निकली है। नाम 'मिस्टिक क्वेस्ट'। )

4 comments:

Nirmla Kapila said...

बहुत अच्छा विशलेशण् किया है कोई कविता भी पढ्ने को मिलरी तो अच्छा था आभार्

सागर said...

मैं खुश हूँ कुछ ऐसे ब्लॉग भी हैं जहाँ इतनी गहरी विवेचना होती है... और मेरी साहित्यीक भूख मिटती है.. आप ऐसे ही लिखते रहिये और स्तर बनाये रखिये... मैं आपके साथ हूँ...

pankaj said...

तुषार धवल की painting "मिस्टिक क्वेस्ट " लाजवाब है . बार-बार देखने , महसूस करने की इच्छा होती है , जो एक अच्छी कला-कृति की निशानी है . उनके कविता-संग्रह पर आपकी "लिखत" ( कवि-मित्र गिरिराज किराडू का शब्द ) भी शानदार है . 'हरे का कच्चापन ' निश्चय ही एक अच्छे , नये कवि की कविताओं की genuine खुसूसियत के तौर पर वांछित होता है . अगर वह वहाँ है और नैतिक-आध्यात्मिक "प्रेक्षा" के साथ-साथ "तीखा यथार्थ-बोध" भी , तो फिर और क्या चाहिए ? बधाई , कवि- चित्रकार को और आलोचक को भी !
-----पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

Ratnesh said...

tusharji ki kavitayen sabad k aapke bheje link se gujarkar hi padhta raha hun.aur ab yh arthpurn tipanni.kavitaon ki samajh me yh madadgar hogi.