Saturday, August 29, 2009

बही - खाता : ८ : पॉल ऑस्टर



किताब पाठक लिखता है


मेरी
यह कोशिश रहती है कि अपने गद्य में इतनी जगहें छोड़ता चलूँ जिसमें पाठक का वास हो। क्योंकि मेरी यह दृढ मान्यता है कि यह पाठक है जिसने किताब लिखी होती है, लेखक ने नहीं।

जब मैं लिखता हूँ, मेरे दिमाग में कहानी सर्वोपरि रहती है, और मुझे लगता है इस पर किसी और को वरीयता नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए सबकुछ तज देना चाहिए : अत्यन्त मनोरम और उत्सुकता से भर देनेवाले उन तमाम हिस्सों को भी, अगर वे, जो मैं कहना चाहता हूँ उसके साथ एक प्रासंगिक जुड़ाव नहीं रखते।

इतनी निर्ममता ज़रूरी है। तब जब आप एक कहानी कह रहे हों और उम्मीद करते हों कि लोग आपको सुनें। इसमें छटांक भर विचलन भी लोगों के मन में भारी बोरियत पैदा कर सकता है। अंततः आप वही किताब नहीं लिखते जिसे लिखने की ज़रूरत आपने महसूस की थी, आप वह किताब भी लिखना चाहेंगे जिसे आप ख़ुद पढ़ना पसंद करें।

मैं जब यह सोचता हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ, तो मुझे अचरज होता है। लिखते हुए न तो मैं कोई सुंदर वस्तु बना रहा होता हूँ और न मनोरंजक कहानियाँ गढ़ने की ही मेरी मंशा होती है। फिर ? मुझे दरअसल यह शिद्दत से महसूस होता है कि लेखन जीवित रहने के लिए किया जानेवाला एक ज़रूरी कर्म है। एक ऐसा काम जिसे न करूँ तो मुझे अपना अस्ति-बोध भयावह लगने लगता है।

मेरे लिए लिखना हमेशा सुखकर नहीं रहा है। पर यह न लिख पाने की पीड़ा से हमेशा बेहतर रहा है।

जिन जीवनानुभवों से गुजरा हूँ उन्हें दर्ज कर मैं उनके प्रति एक नैतिक आभार प्रकट करता हूँ। मैं अपनी जी हुई दुनिया पर ज़्यादा यकीन करता हूँ, बनिस्बत मुझे बताई गई दुनिया के।...इस तरह हर लेखक अपने लेखन में अपने जीवनानुभवों को कमोबेश शामिल करता है और हर उपन्यास आत्मकथात्मक जान पड़ता है। पर इसमें लुत्फ़ कल्पना द्वारा यथार्थ में सुराख करने से पैदा होता है, यथार्थ को ज्यों का त्यों परस देने से नहीं।

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अनुवाद : अनुराग वत्स
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( अमेरिकी कथाकार और कवि पॉल ऑस्टर के ये विचार-बिन्दु उनके गद्य संकलन द रेड नोटबुक से लिए गए हैं। ऑस्टर की ख्याति क्राइम-फिक्शन के लिए है। साथ ही वे अपने अनुवाद और कथेतर गद्य के लिए भी जाने जाते हैं। बही-खाता में इस दफा ऑस्टर ही। )

7 comments:

सागर said...

मैं क्यों लिखता हूँ... कुछ इसी टोपिक पर मंटो ने भी २ पेज लिख मारा था और वोह भी कमाल लिखा था... वो कहते है मैं एक जेबकतरा हूँ (यह बीबीसी पर मौजूद है)... बहरहाल आपने एक अच्छी पोस्ट डाली... शुक्रिया..

Anonymous said...

Its really great to see this latest lines. Well.. its all about writing and I hope this is the cognition process on human mental status that stimulates anyone to become a writter. Like I myself has been a regular visitor of this blog but I rarely find the stiluli that ignite me to write something. This today when I was goting through this blog I want not able to stop myself to pur these lines.
The moot question remains there that afterall why anyone writes something and the answer has been well drafted with the view of many writers and scholors. Altogater writing is something like you are talking with your self. In fact it works like a meditation. It is not less than a medicin. It helps human brain to think something positive like what a human brain feels after offering one's pray to one's god or godess. I too believe writting is non other than the pray. I too feel similar solace and peace once I write down something or somewhere.

Last but not least I really feel quite relax and wish to extend my high regards to the writer of this blog for raising such a topics for the public/reader interest. Thanks!

Tushar Dhawal Singh said...

लिखना शायद ही कभी प्रीतिकर अनुभव रहा हो. मुझे तो लगता है हर सृजन के पहले "लेबर पेन" से गुजरना होता है. हर माँ इस कष्ट को जानती है, और हम से बेहतर जानती है. एक विचार, एक 'आईडिया' अचानक हमारी स्थिरता और जड़ता को तोड़ देता है और फिर वही बेचैनी चस्पां हो जाती है हमारे वजूद पर. हम नहीं जानते कि वह क्या है, और उसी को खोजते रहते हैं. अगर कभी उसे वैसे का वैसा खोज लिया तो अच्छी रचना मिल जाती है, नहीं खोज पाए तो संसार में जुगत लगानी पड़ती है. आज के रचना संसार में यह एक सच है जिसे हम सभी जानते हैं और इसे हमारी मौन सहमती भी मिल रही है.
एक रचनाकार दर असल बहुत बेचारा किस्म का प्राणी होता है. मजबूर होता है. उसे रचना करनी ही होती है और इस दर्द से गज़रना ही होता है. वह कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इसके बिना वह जी भी तो नहीं सकता.

अनुराग, तुमने न जाने कहाँ कहाँ से ला कर इन अनमोल मोतियों को हमारी झोली में भर दिया है.
शुक्रिया भाई.

तुषार धवल

ravindra vyas said...

कल्पना द्वारा यथार्थ में सूराख। लुत्फ। बस यही शायद। कितना सुंदर टुकड़ा। छोटी-छोटी प्यारी सी और न्यारी सी बातें। बहुत अच्छा अनुराग जी।

Ratnesh said...

मेरी यह कोशिश रहती है कि अपने गद्य में इतनी जगहें छोड़ता चलूँ जिसमें पाठक का वास हो। क्योंकि मेरी यह दृढ मान्यता है कि यह पाठक है जिसने किताब लिखी होती है, लेखक ने नहीं।. pathak k liye itni jaghen ho to uske padhne ka maza duna ho jata hai.

dinesh trapathi said...

likhne ki prakriya ko tamam logon ne tamam tarah se vyakt karne ki koshish ki hai. koyee ise prasav peeda bata raha hai , to koyee bhavnatmak samvegon ka prasfutan. par mere vichar se yeh ek lekhak ke jivan ka sahaj-swabhavik ang hai. theek usi tarah jaise sans lena. 'main kyu likhta hu' shayad isi shirshak se agyey ji ka bhi ek alekh hai. ek achchhi post ke liye dhanyvad

shraddha said...

आप वही किताब नहीं लिखते जिसे लिखने की ज़रूरत आपने महसूस की थी, आप वह किताब भी लिखना चाहेंगे जिसे आप ख़ुद पढ़ना पसंद करें।
मेरे लिए लिखना हमेशा सुखकर नहीं रहा है। पर यह न लिख पाने की पीड़ा से हमेशा बेहतर रहा है।
मैं अपनी जी हुई दुनिया पर ज़्यादा यकीन करता हूँ, बनिस्बत मुझे बताई गई दुनिया के।...ये तीन वाक्यांश लगभग प्रत्येक रचनाकार के मन में कभी न कभी जरुर आते है. पढ़कर एक अच्छी अनुभूति मिली.