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ज़बां उर्दू : ४ : मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा'

आखिरी सफे...

मिर्ज़ा रुस्वा साहब, जब आपने मेरी ज़िन्दगी के हालात लिखके मसविदा मुझे पढ़ने के लिए दिया, तो मुझे ऐसा गुस्सा आया कि जी चाहता था टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दूँ। बार-बार ख़याल आया कि ज़िन्दगी में क्या कम काला मुंह हुआ था, जो उसकी कहानी मरने के बाद भी बाकी रहे और लोग पढ़ें और मेरी लानत-मलामत करें ? मगर कुछ आपका लिहाज़ करके हाथ रुक गया।
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मुझे नेक औरतों का खयाल आता है। उन्हें अपने ऊपर जितना घमंड न हो, थोड़ा है। हम-जैसी बज़ारियों का उनसे क्या मुकाबला! मगर मैंने सोचा कि इसमें वक्त ही का हाथ है, जो मैं बाज़ार में आई और अपनी किस्मत का लिखा पूरा किया। वक्त न होता, तो क्या दिलावर खां मुझे उठाके लाता और लाके खानम के हाथ बेचता और मैं वह बुरे काम करती, जिनको अब मैं बुरा समझती हूँ ? उस ज़माने में मैं उन चीज़ों को नहीं समझती थी और न मुझे बताया गया था कि मैं उन कामों से बचूं।
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जवान होने के बाद ऐशो-आराम में पड़ गई। उस ज़माने में गा-बजाके मर्दों को रिझाना मेरा पेशा था। इसमें औरों के मुकाबले मुझे जितनी कामयाबी मिलती थी, उतनी ही मैं खुश होती थी। जहाँ कामयाबी नहीं होती थी, रंज होता था। मेरी सूरत दूसरों की बनिस्बत कुछ अच्छी न थी, मगर गाने और शेरो-शायरी के शौक की वजह से मैं सबसे बढ़ी-चढ़ी रही। अपनी उम्रवालों में मुझे ज़्यादा बड़ा दर्जा मिला हुआ था। इसका नतीजा यह हुआ कि जितनी मेरी इज्ज़त बढ़ती, मैं अपनी निगाहों में ख़ुद को इज्ज़तदार समझने लगी। इससे नुकसान यह हुआ कि मैं तो अपने काम में मुंह देखती रह जाती और दूसरी रंडियां अपना मतलब निकाल लेतीं।

फ़िर वह ज़माना आया कि मैं रंडी के ज़लील पेशे को ऐब समझने लगी और उससे हाथ खींच लिया। हर ऐरे-गैरे से मिलना छोड़ दिया और सिर्फ़ नाच-मुजरे पर गुज़र करने लगी।

जब
मैंने उन कामों को छोड़ा, जिन्हें मैं बुरा समझती थी, तो कई बार मेरे जी में आया कि किसी के घर बैठ जाऊँ। फिर सोचा लोग कहेंगे कि आख़िर रंडी थी न, कफ़न का चोगा किया। जब कोई रंडी उम्र से उतर जाने के बाद किसी के घर बैठती है तो तजुर्बेकार तमाशबीन कहते हैं कि मरते-मरते कफ़न ले मरी...बात सच है, हमलोग ऐसी ही होती हैं, खुदगर्ज़, लालची, फरेबी।
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एक बड़ी बी कभी-कभी मेरे मकान पर आया करती हैं। किसी ज़माने में बड़ी मशहूर रंडियों में थीं। जवानी में हजारों रुपये कमाए। जब सिन से उतरी, तो वही कमाई यारों को खिलाना शुरू कर दी। बुढ़ापे में एक नौजवान के घर जा बैठी। वह खूबसूरत था, कमसिन था, इन पर क्यों रीझता ? मगर यह न समझीं। पहले तो साहबजादे की बीवी इनको देखकर ज़रा बिगड़ीं, मगर जब मियां ने असल मतलब समझा दिया, तो खामोश हो रहीं और उनकी खूब खातिर-मदारत करने लगीं। जब तक माल रहा, मियां-बीवी ने खूब फुसलाकर खाया और जब खुख हो गईं, तो घर से निकाल दिया। अब गलियों की ठोकरें खाती फिरती हैं।

लखनऊ
के गली-कूचों में जो बूढी-फ़कीरनियाँ पड़ी रहती हैं, उनमें ज्यादातर रंडियां हैं और वे रंडियां, जो कभी ज़मीन पर पैर न रखती थीं, जिन्होंने क़यामत बरपाकर रखी थी...जहाँ जाती थीं, लोग आँखें बिछाते थे, जहाँ बैठ जाती थीं, लोग बाग़-बाग़ हो जाते थे; आज उनकी तरफ कोई आँख उठाके नहीं देखता...
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मैं बहुत दिन तकदीर और तदबीर के मसले में फंसी रही। मगर अपने हालत को क्योंकर भूल सकती हूँ! मेरी ज़िन्दगी में काम वही दो हरूफ आए, जो मौलवी साहब ने पढ़ा दिए थे...उस ज़माने में जब मैं नाच-मुजरा करती थी, तो मौलवी साहब से हासिल किये हुए इल्म की वजह से मेरी शोहरत हुई। उस वक्त तो मैं बराबर तारीफ करनेवालों से घिरी रहती थी। पढ़ने-लिखने के लिए ज्यादा फुरसत नहीं मिलती थी। लेकिन अब मैं अकेली हूँ, तो मौलवी साहब की दी हुई किताबें पढ़ने के शौक की वजह से ही ज़िन्दा हूँ। अगर यह शौक न होता तो जवानी के मातम, पुरानी दिनों के ग़म और मर्दों की बेवफाई का रोना रोते हुए ज़िन्दगी खत्म हो जाती।

रहती रंडी की तरह हूँ, ख़ुदा चाहे मारे, चाहे जिलाए, मुझसे पर्दे में घुटकर तो न बैठा जायेगा। मगर मैं पर्देवालियों के लिए दिल से दुआ मांगती हूँ, ख़ुदा उनका राज-सुहाग कायम रखे और रहती दुनिया तक उनका पर्दा रहे। जहाँ तक मेरी बात है, अपने हाल तो यह हैं कि :

मरने के दिन करीब हैं शायद कि ऐ हयात
तुझसे तबीयत अपनी बहुत सीर हो गई
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( यह गद्य मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा' का है। रुस्वा उर्दू के आरंभिक गद्यकारों में अग्रगण्य हैं। यहाँ दिए गए अंश उनके अत्यंत प्रसिद्द उपन्यास उमराव जान 'अदा' से चयनित हैं। रुस्वा का यह उपन्यास उन्नीसवीं सदी के अवध ( लखनऊ) का आईना है। हालाँकि इसमें एक वेश्या अपने जीवन का अक्स देखती है, लेकिन बजरिये उसके पूरे युग का चरित और त्रासद विडम्बनाएं उजागर होती जाती हैं। इन मायनों में इसकी अमरता इतिहास पुस्तकों से कुछ ज्यादा है। साथ-साथ यह उपन्यास तत्कालीन गद्य मात्र में हिंदी के बरक्स उर्दू की बढ़त का सूचक भी है। ज़बां उर्दू में इस दफा यही। जोड़ना ज़रूरी है कि प्रस्तुत अंश गिरीश माथुर द्वारा उपन्यास के पुस्तकाकार अनुवाद से हैं। )
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Comments

virendra said…
es dard bhari dastaan ko padhne ke baad mere paas shabad nahi hi us dard ko bayan kerne ke liye
khadija said…
Bohat khoob.......Daastaan-e-Umrao Jaan, khud me bepanaah dard sametye hue mere dil ko to chhoo gayi...kisi ki zindgi ka dard or logon k liye dard bhari kahani.......!!!
Dua hai meri KHUDA se jo is ladki k sath guzri wo kisi dushman k sath bhi na beetye....AMEEN!
anita said…
maine ye book to nahi padhi,movie dekhi hai behad achi lagi the ..par ye tukde padh k lagta hai kitab movie se jyada khoobsoorat hai...mujhe nek aurto ka khyal aata hai....beautiful line....thanx to u...achi cheejon se rubru karane k liye..
Ratnesh said…
alag hi umrao.jise film me padhna mumkin nhi tha,in safon me padha ja sakta hai.
नग्न हकीकत की कडवी बयानबाजी अच्छी लगी.
बेहतरीन लिखा है...कब से यह किताब पढ़ने को बेचैन थी....आपने इसका यह अंश पढ़ाया । आप का शुक्रिया...।
बेहतरीन लिखा है...कब से यह किताब पढ़ने को बेचैन थी....आपने इसका यह अंश पढ़ाया । आप का शुक्रिया...।

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