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कोठार से बीज : ८ : कारेल चापेक

नींद की दया असीम है

रात होते ही दूसरी ज़िन्दगी शुरू हो जाती है, पीड़ा और दुविधा से भरी हुई।

जो आदमी सो नहीं पाता, वह किसी भी चीज़ से छुटकारा नहीं पा सकता।

जब आदमी सो नहीं पाता, तो शुरू-शुरू में वह किसी के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहता। वह या तो गिनती गिनने लगता है, या प्रार्थना करने लगता है। फिर अचानक उसे बीच में ही खयाल आता है- हे ईश्वर, कल मैं अमुक काम करना भूल गया। और बाद में एक नया खयाल तंग करने लगता है कि कल सौदा खरीदते समय दुकानदार ने उसे ठग लिया था। फिर उसे सहसा याद आता है कि उस दिन उसकी पत्नी या मित्र ने कितने अजीब ढंग से उससे बातचीत की थी।

नींद सिर्फ एक शारीरिक विश्राम नहीं है, नींद एक तरह से बीते हुए दिन का प्रायश्चित और शुद्धिकरण है। वह क्षमादान है। अच्छी नींद के पहले कुछ मिनटों में हर व्यक्ति की आत्मा बच्चे की तरह निर्मल और पवित्र हो जाती है।

नींद एक गहरे, अंधेरे पानी की तरह है। उसमें वह सबकुछ बह जाता है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते और जिसके बारे में हमें कुछ नहीं जानना चाहिए। हमारे भीतर जो अजीब-सी कीचड़ जमा हो जाती है, नींद उसे बहाकर उस अचेतन में डुबो देती है, जो अपने में असीम है। हमारी नीचता और कायरता...रोज़मर्रा के हमारे कुलबुलाते पाप, हमारी लज्जास्पद मूर्खताएं और असफलताएं, अपने प्रिय लोगों की आंखों में झूठ और घृणा देखने की पीड़ा, वे लोग जिन पर हम लांछना लगाते हैं, और वे लोग जो हम पर लांछन लगाते हैं...ये सब चीजें रात की सुप्त घड़ियों में चुपचाप चेतना के नीचे बह जाती है। नींद की दया असीम है...वह न केवल हमें क्षमा कर देती है बल्कि उन सबको भी, जो हमारे प्रति गुनाहगार हैं।
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( ऊपर दिए गए अंश किसी निबंध से नहीं, प्रख्यात चेक लेखक कारेल चापेक की कहानी नीं से लिए गए हैं। कई दशक पहले हिन्दी को चापेक के दुर्लभ गद्य-गुण से निर्मल वर्मा ने परिचित कराया था। टिकट-संग्रह नाम से उन्होंने चापेक की कहानियों का पुस्तकाकार अनुवाद किया था। नींद उसी संग्रह की आखिरी कहानी है। इस कहानी के उपरोक्त अंशों को यहाँ भले कुछ मनमाने ढंग से संयोजित किया गया है, उसका औचित्य महज एक पाठ-निर्मिति का ही रहा है। जिसे हम साहित्य का आत्म-सत्य कहते हैं, वह कहानी या कविताओं में इसी तरह बिखरा पड़ा है। उन्हें उनकी अस्थि-मज्जा ( कथा या काव्य तत्व ) से अलगाना लगभग असम्भव है। फिर भी ऐसी चमकदार पंक्तियाँ आपका ध्यान खींचती हैं और एक अलग पढ़त बनती है। कोठार से बीज में इस दफा यही। )
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5 comments:

is kahani ko padhker ramchandra shukl ki yaad barbas hi dimag mai aa gayee,unke chitamani ke nibandh.....anurag ji puri kahani ka intzaar rahega......


itani gahr baat pehle mene need k vishay me nahi padha tha.ise padhkar is barey me ek nai soch paida hui.


जितना भी अंश पढा वो प्रभावित करता है। कहानी को पूरा पढने का लोभ संवरण नहीं हो रहा है।


need ki ninda karne walo ke liye ek jaroori kahani....


sachmuch नींद की दया असीम है...वह न केवल हमें क्षमा कर देती है बल्कि उन सबको भी, जो हमारे प्रति गुनाहगार हैं।. panktiyon ka badhiya chayan kiya hai aapne. kahani padhne ki lalak uthna swabhavik hai.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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