Tuesday, August 18, 2009

फिर भी कुछ लोग


चालीस पार को युवा कहने की लापरवाह आदत डाले हम हिन्दी वालों के लिए करीब तीस के व्योमेश शुक्ल का जमा सत्तावन कविताओं का पहला कविता-संग्रह, 'फिर भी कुछ लोग' दिक्कत पैदा करनेवाला है। हम किन नामों से अभिहित करेंगे इस कवि को जिसकी संवेदना का धरातल इतना ठोस और मर्मग्राही है, जिसकी वैचारिक प्रौढ़ता के सामने उनके समवयस कवि किशोर और चालीस पार युवा युवतर सखा नज़र आते हैं ( अगर यह बड़बोलापन लगे तो संग्रह की तीसरी ही कविता पढ़ ली जानी चाहिए : अस्तु ), जो आरंभिक शिल्प-सजगता की बात तो जाने दीजिए, बेसंभाल शिल्प में लिखने का जोखिम अभी से उठा रहा है और जिसे मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, विनोद कुमार शुक्ल या विष्णु खरे जैसे कवियों की लिखी गई कविताओं के लील जाने वाले प्रभाव से बचने, सीखने और रचने का हुनर मालूम है। ऐसे कवि का पहला कविता-संग्रह उसे तुंरत किसी नामावली में खातियाने की हमारी आदत में खलल तो है ही। इससे इतर यह बहुत प्रमाणिक ढंग से इस बात को पुष्ट करने का भी दस्तावेज़ है कि कविता की अभी बिल्कुल अभी वाली पुरानी अवधारणा को कितनी कुशलता से व्योमेश सरीखे कुछ कवि चुपचाप बदल रहे हैं। विष्णु खरे का संग्रह के अंतिम हिस्से में व्योमेश की कविताओं पर एकाग्र लंबा लेख इस उक्ति के आलोक में द्रष्टव्य है। व्योमेश यहाँ से किस ओर रुख करते हैं यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि कविता के स्वनिर्मित और प्रशंसित प्रासाद में टिक रहने की हिंदी कवियों की नियति से वे परिचित नहीं हैं, ऐसा फ़िलहाल नहीं लग रहा।
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4 comments:

abhishek said...

पढ़कर अच्छा लगा। अनुराग वत्स की विशेषता है कि वो जो लिखते हैं, वह मन से लिखते हैं। इसलिए आप जब भी उनका लिखा पढ़ते है, तो सुखद अनुभूति होती है।

अजित वडनेरकर said...

सुंदर सुखद अभिव्यक्ति...

भारत भूषण तिवारी said...

बकौल शिरीष मौर्य,व्योमेश शुक्ल की कविताएं समकालीन कविता में नए युग की शुरुआत का विनम्र घोषणापत्र है. मैं इस वक्तव्य से 'विनम्र' शब्द हटा देना चाहूँगा (शिरीष जी से इस धृष्टता के लिए क्षमा-याचना सहित). विनम्रता इस घोषणापत्र का आवश्यक गुण है भी नहीं शायद; बल्कि उसे तो 'इन-योर-फेस' होना चाहिए. 'यथास्थिति को बचा लेने की कोशिशों' और 'दुर्घटनाग्रस्त' होने के खतरों से डरने वाले समकालीनों के खिलाफ़ वक्तव्य देने के लिए कहन में कुछ औद्धत्य ज़रूरी है.
दूरदर्शन से सॅटॅलाइट टेलिविज़न के संक्रमण काल में किशोरावस्था में कदम रखने वाली पीढ़ी का ऐसा गहन अंतर्द्वंद्व और कहीं नहीं मिला. इस भारतीय 'जेनरेशन-एक्स' की दुनियावी उपलब्धियों, फैशनेबल मान्यताओं और अभिनव तौर-तरीकों के आख्यानों के पार जो कुछ 'युवा' है वह व्योमेश शुक्ल की कविता में देखा जा सकता है.
चूंकि रवायत है, पहले संकलन के प्रकाशन पर कवि को बधाई.

Ratnesh said...

kavi ko badhai aur bhavishya k liye anek shubhkamnayen.aapka vishleshan khasa rochak aur uksau hai.