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अनकहा कुछ : ३ : मारियो वर्गास य्योसा


( यह खुशी की बात है कि युवा कहानीकार प्रभात रंजन ने सबद के लिए लिखे जा रहे अपने स्तंभ, अनकहा कुछ, को एक लंबे अंतराल के बाद पुनः शुरू किया है और इस बार पेरू के मशहूर लेखक मारियो वर्गास य्योसा के लेखन और व्यक्तित्व पर एकाग्र किया है। मार्केस के सामानांतर लेखन में सफलता अर्जित करनेवाले य्योसा हिन्दी में अल्पज्ञात ही हैं। इस आलेख से उनके साहित्य में लोगों की दिलचस्पी बढेगी, ऐसी आशा है। प्रभात रंजन ने इससे पूर्व शेक्सपियर और हेमिंग्वे पर लिखा था। )


झूठ को सच की तरह लिखनेवाला लेखक

प्रभात रंजन

अपनी पुस्तक लेटर्स टु ए यंग नॉवेलिस्ट में मारियो वर्गास य्योसा ने लिखा है कि सभी भाषाओं में दो तरह के लेखक होते हैं- एक वे होते हैं जो अपने समय में प्रचलित भाषा और शैली के मानकों के अनुसार लिखते हैं, दूसरी तरह के लेखक वे होते हैं जो भाषा और शैली के प्रचलित मानकों को तोड़कर कुछ एकदम नया रच देते हैं। 28 मार्च, 1936 को लैटिन अमेरिका के एक छोटे से गरीब देश पेरू में पैदा होनेवाले इस उपन्यासकार, निबंधकार, पत्रकार ने स्पैनिश भाषा के मानकों को तोड़ा या उसमें कुछ नया जोड़ा यह अलग बहस का विषय है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि संसार भर में य्योसा को अपनी भाषा के प्रतिनिधि लेखक के तौर पर जाना जाता है। पेरू के एक पत्रकार ने उनके तआरूफ में लिखा था, हमारे देश की दो बड़ी पहचानें हैं- माच्चूपिच्चू की पहाड़ी ऊँचाइयां और लेखक मारियो वर्गास य्योसा।

य्योसा अपने लेखन, अपने जीवन में एडवेंचरस माने जाते हैं, जीवन-लेखन दोनों में उन्होंने काफी प्रयोग किए। विद्रोह को साहित्यिक लेखन का आधार-बिंदु माननेवाले मारियो वर्गास य्योसा शायद हेमिंग्वे की इस उक्ति को अपना आदर्श मानते हैं कि जीवन के बारे में लिखने से पहले उसे जीना अवश्य चाहिए। उनकी कई यादगार रचनाएं अपने जीवनानुभवों से निकली हैं। 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने खुद से 13 साल बड़ी अपनी आंटी जुलिया (स्पेनिश भाषा में खुलिया) से शादी कर ली, कुछ साल बाद दोनों में अलगाव भी हो गया। बेहद प्रसिद्ध उपन्यास आंट जुलिया एंड द स्क्रिप्टराइटर में उन्होंने इसकी कथा कही है। हालांकि यह उपन्यास केवल प्रेमकथा नहीं है। उपन्यास को याद किया जाता है स्क्रिप्टराइटर पेद्रो कोमाचो के चरित्र के कारण, जो उन दिनों रेडियो पर प्रसारित होनेवाले सोप-ऑपेराओं का स्टार लेखक था। उसके माध्यम से य्योसा ने रेडियो पर धारावाहिक प्रसारित होने वाले नाटकों के उस दौर को याद किया है जो बाद में टेलिविजन धारावाहिकों के प्रसारण के कारण लुप्त हो गया।

1977 में प्रकाशित इस उपन्यास में उन्होंने निजी-सार्वजनिक कहन की एक ऐसी शैली से पाठकों का परिचय करवाया, बाद में जिसकी पहचान उत्तर-आधुनिक कथा-शैली के रूप में की गई। उत्तर-आधुनिक कथा-लेखन की एक और प्रमुख शैली के वे पुरस्कर्ता कहे जा सकते हैं- हास्य-व्यंग्य की चुटीली शैली में गहरी बात कह जाना। उन्होंने अपने पहले उपन्यास द टाईम ऑफ़ द हीरो में सैनिक स्कूल के अनुभवों की कथा कही है। सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार के कथानक से इस पहले उपन्यास से ही लेखक के रूप में उनकी विवादास्पद पहचान बनी। प्रसंगवस, ऐतिहासिक घटनाओं के बरक्स निजी प्रसंगों की कथा की शैली य्योसा की प्रमुख विशेषता मानी जाती है।

अपने समय में स्पेनिश भाषा के सबसे बड़े लेखक के रूप में जाने जानेवाले ग्राबियल गार्सिया मार्केस की रचनाओं पर शोध करके लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त करनेवाले इस लेखक की तुलना अक्सर मार्केस से की जाती है। मार्केस के बाद निस्संदेह य्योसा स्पैनिश भाषा के सबसे बड़े लेखक हैं। जादुई यथार्थवाद की शैली को ऊँचाइयों तक पहुंचाने वाले मार्केस और मुहावरेदार वर्णनात्मक शैली के बेहतरीन किस्सागो य्योसा की शैलियां भले अलग हों, मगर दोनों के सरोकार, राजीतिक-सामाजिक चिंताएं काफी मिलती-जुलती हैं। सर्वसत्तावादी व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह का भाव दोनों की रचनाओं में दिखाई देता है, अपनी संस्कृति से गहरा लगाव दोनों की रचनाओं में दिखाई देता है।

लैटिन अमेरिका के दो पिछड़े देशों से ताल्लुक रखनेवाले दोनों लेखकों के उपन्यासों में निजी-सार्वजनिक का द्वंद्व दिखाई देता है, मार्केस ने अपने उपन्यास जेनरल इन हिज लेब्रिंथ में तानाशाह के चरित्र को आधार बनाया है। य्योसा के उपन्यास फीस्ट ऑफ़ गोट में भी डोमिनिक रिपब्लिक के एक तानाशाह का जीवन-सन्दर्भ है। य्योसा का दूसरा प्रकाशित उपन्यास कनवर्सेशन इन द कैथेड्रल में पेरू के एक तानाशाह से विद्रोह करनेवाले नायक की कहानी है। मार्केस ने लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा के रूप में प्रेम के एपिकल उपन्यास की रचना की, हाल ही में य्योसा का उपन्यास प्रकाशित हुआ बैड गर्ल। यह भी प्रेम की एपिकल संभावनाओं वाला उपन्यास है। वैसे इस तुलना का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि खुद य्योसा ने मार्केस के बारे में लिखा है कि पहले से चली आ रही भाषा उनका संस्पर्श पाते ही जादुई हो जाती है। भाषा का ऐसा जादुई प्रभाव रचनेवाला दूसरा लेखक नहीं है।

लैटिन अमेरिका के दोनों महान लेखकों में एक समानता यह जरूर है कि दोनों ने कुछ भी कमतर नहीं लिखा। य्योसा ऐसे लेखक के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने विषय और शैली के स्तर पर कभी अपने आपको दुहराया नहीं। हेमिंग्वे की तरह उनके उपन्यासों में विषय की विविधता है और युद्ध का आकर्षण। ब्राजील के एक ऐतिहासिक प्रसंग को आधार बनाकर लिखे गए उनके उपन्यास द वार ऑफ़ द एंड ऑफ़ द वर्ल्ड को अनेक आलोचक उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास भी मानते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे विविधवर्णी लेखक हैं।

अपनी एक भेंटवार्ता में य्योसा ने कहा है कि साहित्य-लेखन के प्रति वे इसलिए आकर्षित हुए क्योंकि इसमें झूठ लिखने की आजादी होती है। ऐसा झूठ जो पहले से प्रचलित सत्यों में कुछ नया पहलू जोड़ देता है, कोई नया आयाम जोड़ देता है। साहित्य में जीवन की पुनर्ररचना नहीं होती है, वह उसमें कुछ नया जोड़कर उसे रूपांतरित कर देता है। यही साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति होती है। य्योसा के साहित्य के व्यापक प्रभाव का भी शायद यही कारण है।
****
5 comments:

ल्योसा के साहित्य के बारे में उत्सुकता पैदा कर रहा है यह आलेख। लेखक और प्रस्तुत करता दोनों का आभार।


Nice work. We need more similar works on the writers on another language which are not from English literature!

I liked very much the part in which you have talked about La tía Julia y el escribidor! It is very comic novel.

These days Llosa is in Spain, and working a lot in Real Academia Española, which you have forgotten to mention and fighting for African and latin american rights


आपने य्योसा को पढने की भूख तो जगा दी पर अपन इस कस्बे में उन्हें ढूंढे कहां?
अगर अंग्रेज़ी में कुछ उपलब्ध हो तो कृपया बतायें।


Mario is an all time favourite. I am fortunate enough to have read all of his great works including the latest one called 'The Way to Paradise' which records two journeys - Gauguin's and his grandmother's.

Good post, Anurag!


Very educative and informative article...


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