Saturday, May 23, 2009

सबद विशेष : ७ : यानिस रित्सोस

( अपरिहार्य कारणों से यूनानी जनकवि यानिस रित्सोस की बाकी कविताएं मंगलेशजी के अनुवाद में इतने विलंब से दी जा रही है। इसके लिए अनुवादक और सबद के स्नेही पाठकों से क्षमा याचना की जाती है। )

कविताएं पिछली पोस्ट से आगे :

औरतें

औरतें बहुत दूर हैं। उनकी चादरों से 'शुभरात्रि' की
महक आती है।
वे ब्रेड लाकर मेज पर रख देती हैं ताकि हमें यह न लगे
कि वे अनुपस्थित हैं।
तब हमें यह महसूस होता है कि यह हमारी गलती थी। हम
कुर्सी से उठते हैं और कहते हैं :
'आज तुमने बहुत ज्यादा काम कर लिया' या 'तुम रहने दो,
बत्ती मैं जला लूँगा।'

जब हम माचिस जलाते हैं तो वह आहिस्ता से मुड़ती है
और एक अनिर्वचनीय एकाग्रता के साथ
रसोईघर की तरफ जाती है। उसकी पीठ एक बेहद उदास
पहाड़ी है कई मृतकों से लदी हुई --
परिवार के मृतक, उसके मृतक, तुम्हारी खुद की मृत्यु।

तुम पुराने लकड़ी के फर्श पर उसके चरमराते क़दमों को
सुनते हो। तुम अलमारी में तश्तरियों का रोना
सुनते हो। फिर तुम उस ट्रेन की आवाज़ सुनते हो
जो मोर्चे की ओर फौजियों को ले जाती है।
****
समझ

इतवार।
जैकेटों के बटन बिखरी हुई
हंसी की तरह दमकते हैं. बस जा चुकी है।
कुछ सुखद आवाजें -- अजीब बात है
कि तुम उन्हें सुन सकते हो और जवाब में कुछ कह सकते हो।
चीड़ के झुरमुट के नीचे एक मजदूर
बांसुरी बजाना सीख रहा है। एक औरत ने
किसी को नमस्ते की -- इतनी सरल
और स्वाभाविक नमस्ते
कि तुम्हारा भी मन हो चीड़ के पेड़ों के नीचे
बांसुरी बजाना सीखने का।


कोई भाग देना या घटाना नहीं। बस अपने से बाहर
देखने में समर्थ होना -- ऊष्मा और शांति।
'सिर्फ तुम' नहीं बल्कि 'तुम भी' होना।
थोड़ा सा जोड़ना, थोड़ा सा व्यावहारिक गणित, इतनी
आसानी से समझ में आने लायक
कि उसे कोई बच्चा भी कर सके रोशनी में अपनी
उँगलियों पर गिनते हुए या वह बांसुरी
बजाते हुए उस औरत को सुनाने के लिए।
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कवि का काम

बरामदे में छतरियां, जूते, आईना
आईने में खिड़की बाकी चीजों से कुछ ज्यादा खामोश :
खिड़की से दिखता सड़क के उस पार अस्पताल का प्रवेश द्वार। वहां
रक्तदाताओं की एक लम्बी, बेचैन, जानी-पहचानी कतार --
पहली खेप ने अपनी कमीजों की आस्तीनें ऊपर कर रखी हैं
जबकि भीतर के कमरों में हो चुकी हैं पांच घायलों की मौत।
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4 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

पिछ्ली और ये सभी कवितायें शानदार हैं. कवि के "जनकवि" कहलाने को सिद्ध करती हैं. मॅंगलेश जी के अनुवाद में उनकी अपनी गूँज सुनाई देती है. पोस्टकर्ता को शुक्रिया.

kshitish said...

most intelligent collection of good and meaningful poetry. anuvad bhi zabardast hai. kshitij

ravindra vyas said...

इतने सादा ढंग से, इतने सादा शब्दों में इतनी मार्मिक बात कहना किसी बड़े कवि के बूते की ही बात ही है। जाहिर है, यह सिर्फ काव्य कौशल ही नहीं है।
रवीन्द्र व्यास

dhiresh said...

pichhli post ki aakhiri kavita bhoole nahi bhoolti hai. is dusri kadi ki kavitayen bhi shandaar hain.