Friday, May 01, 2009

सबद विशेष : ७ : यानिस रित्सोस


( आज कालजयी यूनानी जनकवि यानिस रित्सोस
का सौवाँ जन्मदिन है. यानिस की कुछ कविताओं के हिंदी अनुवाद और एक क्षिप्र और सारवान वक्तव्य के ज़रिये मंगलेश डबराल उन्हें याद कर रहे हैं. साहित्य संसार में शताब्दी समारोहों की चतुर्दिक मचती धूम के बरअक्स, इस तरह, यह सबद के लिए एक शांत उल्लास और गहरी सार्थकता का अवसर बन गया है. ज़ाहिर है कि हमारे प्रयत्न में कविता के साथ मज़दूर दिवस की उमंग भी शामिल है. )

एक मनुष्य और एक देश का कंपन

मंगलेश डबराल

महाकवि यानिस रित्सोस (१ मई १९०९ -- ११ नवम्बर १९९०) क़रीब पंद्रह वर्ष तक यूनान की तानाशाह या दक्षिणपंथी सरकारों द्वारा क़ैद या नज़रबंद रखे गए, क़रीब २४ साल तक उनकी रचनाओं के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा रहा, १९३६ में जनरल मेटाक्सस की तानाशाही के दौरान उनकी प्रसिद्द लम्बी कविता 'एपिताफियोस' को सार्वजनिक रूप से जलाया गया, लगभग सात वर्ष तक वे टीबी से पीड़ित रहे और नौ साल तक उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. रित्सोस के १०० से अधिक कविता संग्रह, दो नाटक और दो उपन्यास प्रकाशित हैं. यूनान में १९३६ की हड़ताल के दौरान पुलिस द्वारा मारे गए एक नौजवान के शव के पास रोती हुई उसकी माँ से प्रेरित कविता 'एपिताफियोस' को जब प्रसिद्द संगीतकार मिकिस थियोदोराकिस ने संगीतबद्ध किया तो वह बहुत लोकप्रिय हुई और यूनान की कम्युनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय गीत जैसा बन गई. विकट संघर्षों से भरा जीवन जीते हुए रित्सोस अंत तक यूनान की कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय रहे. रित्सोस का जब निधन हुआ तो उनके काव्य व्यक्तित्व की महानता ही थी कि यूनान की दक्षिणपंथी सरकार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा.

यूनानी कविता में कोन्स्तान्तिन कवाफी, जार्ज सेफरिस और ओदीसियस एलाइतिस के बाद चौथे महाकवि यानिस रित्सोस हैं. फ्रांसीसी कवि लुई अरागां ने कहा था: '' धरती पर सबसे बड़े जीवित कवि का नाम यानिस रित्सोस है. ऐसा लगता है जैसे यह कवि मेरी आत्मा के सारे रहस्य जानता हो. एक से दूसरी कविता में जाते हुए किसी रहस्य के खुलने का कम्पन महसूस होता है. एक मनुष्य और एक देश का कम्पन, मनुष्य और देश की गहराइयों का कम्पन.'' रित्सोस ख़ुद अपनी कविताओं को 'सरल वस्तुएँ' कहते थे, लेकिन वे इतनी सरल नहीं हैं. उनकी अद्भुत ख़ूबी यह है कि वे वैयक्तिक और सार्वजनिक, संवेदनात्मक और वैचारिक - दोनों दिशाओं में एक साथ सक्रिय रहती हैं और सौन्दर्य और विचारधारा के एक प्रगाढ़ संश्लेषण में ख़ुद को व्यक्त करती हैं. जेलों और यातना शिविरों में रहते हुए या शारीरिक यंत्रणाएं सहते हुए वे कविताएँ लिखकर एक बोतल में रखते जाते थे और बोतल जेल के फ़र्श में दबा देते थे. उनकी एक छोटी सी कविता व्यक्तिगत और राजनैतिक के अद्भुत मेल का उदाहरण है: ''यह उबकाई / कोई बीमारी नहीं है / यह एक जवाब है.''

छह हज़ार से ज़्यादा पृष्ठों में फैली हुई यानिस रित्सोस की कविता में से कोई प्रतिनिधि चयन करना कठिन है. उन्होंने काफ़ी लम्बी और बिलकुल छोटी कविताएँ भी लिखी हैं. फिर भी, उदाहरण के तौर पर इस महाकवि की कुछ कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं जिनमे एक प्रसिद्ध कविता ' पेनिलोपी का शोक' भी है. यूनानी पुराकथा में पेनिलोपी परम सुंदरी और स्पार्ता के राजा ओदीसियस ( युलीसिस ) की पत्नी थी. ट्रॉय के युद्ध में जाने के बीस साल बाद ओदीसियस स्पार्ता लौटता है लेकिन इस बीच विभिन्न द्वीपों के एक सौ राजा पेनिलोपी से विवाह करने आते हैं. पेनिलोपी एक कफ़ननुमा कपड़े पर सौ चिडियाँ काढ़ने और सौवीं चिड़िया के पूरे होने पर उनमे से किसी राजा से विवाह करने का वचन देती है. ओदीसियस सौवें दिन लौटता है और उन सौ राजाओं को मार गिराता है. होमर के काव्य 'ओदीसी' में यह पुराकथा एक पुरुषवाची स्वर लिए हुए है क्योंकि पेनिलोपी अपने पति को पहचानने से इनकार कर देती है लेकिन उसका बेटा तेलेमाकुस अपनी माँ को राजी करता है. रित्सोस इस कविता को पेनिलोपी के लम्बे इंतज़ार की व्यथा में परिवर्तित कर देते हैं और एक स्त्री के आंतरिक संसार को मार्मिक ढंग से उभारते हैं. यह कविता 'दूसरे' की संवेदना में प्रवेश करने का अप्रतिम उदाहरण है.

यानिस रित्सोस की कविताएँ
( अनुवाद : मंगलेश डबराल )

डिक


हवा ने पत्थर को साफ़ धो-पोंछ दिया है
हवा ने, खामोशी ने,
हम और कुछ नहीं सिर्फ़ पत्थर के हृदय को सुनते हैं
गुस्से और दर्द से धड़कता हुआ
भारी, धीमा, लगातार।

भरपूर पत्थर
भरपूर हृदय,
हम उनका उपयोग करेंगे भविष्य के कारखाने बनाने में
नया मज़दूर वर्ग बनाने में
लाल स्टेडियम
और क्रांति के नायकों के लिए भव्य स्मारक बनाने में।

और बेशक, हम एक स्मारक डिक के लिए बनाना नहीं भूलेंगे
हाँ, हमारा कुत्ता डिक
जो तोपखाने के साथ था
जिसे जेल के संतरियों ने मार डाला
क्योंकि वह हम ज़लावतनों से बहुत प्यार करता था।

एक स्मारक डिक के लिए
वह पत्थर का कुत्ता
जिसके पिछले हिस्से में बहुत मांसपेशियां थीं
आँखों की जगह समर्पण की दो बूंदें थीं
जिसका ऊपरी होंठ थोड़ा उभरा हुआ था
उससे उसका बायाँ दांत बाहर को झांकता था
जैसे वह रात की एड़ी को काटने जा रहा हो

या जेल के संतरी की छाया को
या लालटेन से निकलनेवाली लंबी, पतली शहतीरों को
जो हमारे शब्दों और हमारे हाथों के बीच
खामोशी की तख्ती रख देती थी ।

साथियो, हम डिक को कभी नहीं भूलेंगे
अपने उस दोस्त को
जो रात में जेल के दरवाज़े के पास समुद्र की तरफ़
भौंकता था
और स्वाधीनता के नंगे पैरों को,
अपने उठे हुए कानों के ऊपर सुबह के तारे की
सुनहरी मक्खी को खरोचता हुआ हमें सुलाता था ।

डिक अब अनंत शांति में सोया है
हमेशा के लिए अपना बायां दांत दिखलाता हुआ ।

शायद परसों फिर से उसकी आवाज़ सुनाई देगी
ख़ुश होकर किसी प्रदर्शन में भौंकते हुए
पताकाओं के नीचे आगे-पीछे डोलते हुए
शायद उसके बायें दांत से एक पताका झूल रही हो
जिसमें लिखा हो,' कान के पर्दों का नाश हो !'

डिक तुम्हीं थे सबसे अच्छे कुत्ते
साथियो, हम उसे कभी नहीं भूलेंगे
हमारा कुत्ता जिसका ज़िक्र भी वे हमारी चिट्ठियों में से निकाल देते थे
हमारा कुत्ता जिसे मार डाला गया
क्योंकि वह हमें बहुत प्यार करता था ।
****
पेनिलोपी का शोक

ऐसा
नहीं था कि वह चूल्हे से निकलती हल्की रोशनी में,
उसके भिखारियों जैसे तार-तार कपड़ों में उसे पहचान न पायी हो; नहीं, सब कुछ साफ़ था:
घुटने की हड्डी पर वही निशान, वही दिलेरी और चतुर निगाहें

दीवाल से पीठ टिकाये हुए वह डर गयी, उसने कोई बहाना खोजना चाहा,
ताकि थोड़ा वक़्त मिल जाये, तुंरत जवाब न देना पड़े,
वह अपनी भावनाएँ छिपा सके
तो क्या इसी के लिए उसने अपने
बीस साल गँवा दिये ?
इंतज़ार करने और सपने देखने के बीस साल, इसी कंबख्त, खून से सने हुए
सफेद दाढ़ी वाले आदमी के लिए ? वह अवाक एक कुर्सी पर
ढह गयी, फिर उसने गौर से अपने विवाह के प्रार्थियों को फ़र्श पर मरे हुए देखा
जैसे अपनी ही मरी हुई इच्छाओं को देख रही हो
उसने कहा, 'आइए',
और उसे अपनी ही आवाज़ किसी और की, दूर से आती हुई लगी
एक कोने में रखे हुए
उसके करघे की छाया छत पर पिंजड़े की तरह पड़ रही थी; और वे तमाम चिडियां
जिन्हें वह हरे पत्तों के बीच लाल धागों से काढ़ती रही थी, अब
वापसी की इस रात में अचानक ज़र्द और काली पड़ गयी थीं
और उसकी आखिरी सहनशीलता के सपाट आसमान में बहुत नीचे उड़ने लगी थीं

****
लोग और सूटकेस

अपना
गीला तौलिया मेज़ पर मत छोडो ।
चलने की तैयारी करने का समय आ गया है ।
क़रीब महीने भर में बीत जायेगा एक और ग्रीष्म ।
कैसा उदास निष्कासन है यह, उतार कर रखना नहाने के सूट को,
धूप के चश्मों, बनियानों, चप्पलों,
चमकते हुए समुद्र की शाम के रंगों को ।
जल्द ही आउटडोर सिनेमा बंद हो जायेंगे, उनकी कुर्सियां
खिसका दी जायेंगी कोने में । नावें पहले से कम
चलने लगेंगी सुन्दर टूरिस्ट लड़कियां सकुशल घर लौटकर
देर रात तक जागेंगी। हमारी नहीं तैराकों, मछुआरों,
मल्लाहों की रंगीन तस्वीरों को उलटती-पुलटती रहेंगी।
पहले से ही दुछत्ती पर रखे हुए हमारे सूटकेस जानना चाहते हैं
कि हम कब जाने वाले हैं, इस बार कहाँ जा रहे हैं
और कितने दिनों के लिए । तुम यह भी जानते हो कि उन घिसे हुए,
खोखले सूटकेसों के भीतर कुछ रस्सियाँ पड़ी हैं,
कुछ रबर बैंड हैं, और कोई झंडा नहीं है ।
****
टूटा हुआ दरवाज़ा

बढ़इयों से कहा, मिस्त्रियों से कहा, बिजलीवाले से कहा
राशन की दूकान के लड़के से कहा, 'इस दरवाज़े को ठीक कर दो,
इसकी चूलें उखड़ी हुई हैं, सारी रात
यह हवा में भड़भड़ाता रहता है, मुझे सोने नहीं देता।
घर का मालिक बाहर है। और घर खंडहर
हो रहा है। पिछले बारह साल से
यहाँ कोई नहीं रहा। इसे ठीक कर दो
सारा ख़र्चा मैं उठाऊँगा।'

उन्होंने कहा, 'इस पर हमारा कोई हक़ नहीं है।'
उन्होंने कहा, 'हम इसमें कोई दख़ल नहीं दे सकते।'
'मालिक बाहर है। यह एक अजनबी का मकान है।' -- मुझे
इसी जवाब की उम्मीद थी, यही मैं उनसे
सुनना चाहता था, यही जानना चाहता था कि इस पर उनका अधिकार नहीं है।
दरवाज़े को ऐसे ही रहने दो, उसे इसी तरह भड़भड़
करने दो बागीचे के ऊपर, घोंघों और छिपकलियों से भरे सूखे तालाब के ऊपर
बिच्छुओं और खाली चर्खियों के ऊपर,
टूटे हुए काँच के ऊपर। वह आवाज़ मुझे एक
जायज़ तर्क देती है, और मुझे सुला देती है।
****
शनिवार की ओर


एक
गहरी आवाज़ सुनाई दी और भी गहरी रात में।
फिर टैंक गुज़रे। भोर हुई।
तब आवाज़ फिर से सुनाई दी, थोड़ी धीमी, कुछ और दूर।
दीवार सफ़ेद थी। रोटी लाल थी। सीढ़ी
लगभग लंबाकार पुरानी सड़कबत्ती से सटी हुई थी।
बूढी औरत काले पत्थरों को एक-एक कर
जमा करती जाती थी काग़ज़ के एक थैले में।
****
लघुचित्र


औरत
मेज़ के सामने खड़ी हो गई। उसके उदास
हाथ चाय के लिए नींबू के पतले टुकड़े
काटना शुरू करते हैं जैसे वे किसी बच्चे की परीकथा की
एक नन्हीं सी गाड़ी के पहिये हों।
उसके सामने एक नौजवान अफसर एक पुरानी हत्थेवाली
कुर्सी में धंसा है।
वह उसकी तरफ़ नहीं देखता। वह अपनी सिगरेट
सुलगाता है।
माचिस की तीली पकड़े उसका हाथ काँपता है जिसकी रोशनी
पड़ती है उसकी कोमल ठुड्डी और चाय के प्याले
के हत्थे पर।
क्षण-भर के लिए घड़ी की धड़कन रुक जाती है।
कुछ है जो स्थगित हो गया है। वह क्षण जा चुका है।
अब बहुत देर हो चुकी है। चलो अपनी चाय पियें।
तब क्या मुमकिन है कि मृत्यु इसी तरह की
गाड़ी में आये ?
इधर से गुज़रे और चली जाये ? और बस अपने नींबू के
पहियों वाली यह गाड़ी रह जाये
जो इतने बरसों से बुझी हुई बत्तियों वाली एक गली में
खड़ी है ?
और फिर एक छोटा-सा गीत, हल्की सी धुंध,
और फिर कुछ नहीं ?
****
सादगी


आगे
वही पदचाप, पीछे भी वही। दोनों तरफ़
एक जैसी दीवार।
इसके एक छेद में छिपकली बैठी है।
छत पर मकड़ी है। अगर बारिश होने लगे
तो चिड़िया कहाँ जायेगी और वह आदमी कहाँ जायेगा
जिसके पास एक पुराना-सा टोप है, जेब में
एक गन्दा-सा रुमाल है,
और जो फ़र्श की ईंट पर नमक के दो डले रखे हुए हैं।

****
सरलता का अर्थ

मैं
मामूली चीज़ों के पीछे छिपता हूँ
ताकि तुम मुझे पा सको;
तुम मुझे नहीं पाओगी तो उन चीज़ों को पाओगी।
तुम उसे छुओगी जिसे मेरे हाथों ने छुआ है।
हमारे हाथों की छाप आपस में मिल जायेगी।

रसोईघर में अगस्त का चन्द्रमा
कलई किये हुए बर्तन जैसा चमकता है (जो बात
मैं तुमसे कह रहा हूँ उसकी वजह से ऐसा होता है)
वह खाली घर को प्रकाशित कर रहा है और उसकी
घुटने टेके बैठी ख़ामोशी को -
ख़ामोशी हमेशा ही घुटने टेके रहती है।

प्रत्येक
शब्द एक मुलाक़ात का दरवाज़ा है
जो अक्सर स्थगित हो जाती है
और शब्द तभी सच्चा होता है जब वह हमेशा
मुलाक़ात के लिए आकुल हो।
****

7 comments:

DHIRESH said...

BAHUT VIKAL KARNE WALI ADBHUT KAVITAYEN hAIN. EK BADA KAVI ISI TARH YAAD KARTA HAI APNE PRIY KAVI KO. MANGLESH JI KI VAJAH SE IS MAHAN KAVI AUR USKI KAVITA SE HAMARA BHI PARICHYA HO PAYA.

मुनीश ( munish ) said...

Nice note book style background !The poet has genuine Greek features!

शिरीष कुमार मौर्य said...

इस अनुवाद के लिए आदरणीय अग्रज मॅंगलेश जी का आभार और प्रस्तुति के लिए आपका!

रागिनी said...

बहुत अच्छी कवितायें और चयन. मंगलेश डबराल जी ने मजदूर दिवस की मूल भावना को पकड़ते हुए एक महान कवि से परिचय कराया. वे खुद भी मेरे पसंद के कवि है.

उमेश पंत said...

sunder kavitaaen hai anuraag bheya.
प्रत्येक शब्द एक मुलाक़ात का दरवाज़ा है
जो अक्सर स्थगित हो जाती है
और शब्द तभी सच्चा होता है जब वह हमेशा
मुलाक़ात के लिए आकुल हो।
bahut sunder............

ssiddhant said...

bahut hi acchi kavitayen. sahriday dhanyvaad.

ssiddhant mohan tiwary
Varanasi.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यानिस रित्सोस से परिचय कराने के लिये अनुराग जी और मंगलेश जी का बहुत-बहुत आभार।
अगली कडी का इंतज़ार रहेगा।