Saturday, April 25, 2009

कवि कह गया है : ४ : गिरिराज किराड़ू


जिसका ब्याह काल और अकाल से हो गया हो


''A
plague on both your houses.''
(MERCUTIO in Romeo and Juliet by William Shakespeare)

रोमियो एंड जूलियट शेक्सपीयर का पहला नाटक था जिसमें ट्रेजेडी और कॉमेडी के तत्व एक दूसरे में मिल गए थे. उस से पहले उनके नाटक भी या ट्रेजेडी होते थे या कॉमेडी और सबको, खासकर उस ज़माने के 'यूनिवर्सिटी विट्स' को आसानी रहती थी चीज़ों को समझने में. मर्क्युशियो नामक जिस पात्र के मुँह से यह वाक्य शेक्सपीयर ने कहलवाया है वह रोमियो और जूलियट के परिवारों की खूनी लडाई में एक पक्ष होते हुए भी कोई पक्ष नहीं है. उसे 'वफादारी' के किसी विवरण में गर्क नहीं किया जा सकता. वह मरते हुए कहेगा ही कि 'कहर टूट पड़े तुम्हारे दोनों खानदानों पर'. क्योंकि हिंसा की इस अर्थ-व्यवस्था में किसी एक के मंगल की कामना करना हिंसा के मंगल की कामना है.

कवि मर्क्युशियो की तरह जीते भी शायद हों, मरते तो निश्चय ही उसी की तरह हैं - दोनों घरों को शाप देते हुए.
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जिन लोगों ने शेक्सपीयर इन लव (१९९८) नामक फिल्म देखी है वे और कुछ नहीं तो इस बात के लिए फिर से समकालीन पश्चिम के मुरीद हो सकते हैं कि अब एक कल्चरल आइकन, एक राष्ट्रीय गर्व आदि भी हो चुके शेक्सपीयर के जीवन के बारे में जितनी छूट इस फिल्म में ली गयी (उसे जिस तरह एक ही नाटक के लिए दो लोगों से एडवांस रकम खा जाने वाले, अपने समकालीन नाटककार क्रिस्टोफर मार्लो से नाटकों के प्लाट चुराने वाले आवारागर्द की तरह चित्रित किया गया) उसे लेकर पश्चिम में वैसा कुछ नहीं हुआ जैसा मिसाल के तौर पर कालिदास या गालिब के बारे में कल्पनापूर्ण खेल करने वाले किसी फिल्मकार/लेखक के साथ हमारे यहाँ हो सकता था.

इस फिल्म का शेक्सपीयर एक थियेटर कंपनी से लिए एडवांस से दूसरी कंपनी के अभिनेताओं को 'तोड़' लेता है; उस अभिनेता मंडली का नाम 'एडमिरल'स मैन' है और उनका मुखिया उस ज़माने का सबसे काबिल अभिनेता एडवर्ड एलेन है जो प्रतिद्वन्द्वी क्रिस्टोफर मार्लो के नाटकों में लीड भूमिकायें निभा कर बहुत मकबूल हो गया है. फिल्म में शेक्सपीयर ने सबको झांसा दे रखा है कि वह एक नाटक लिख रहा है जिसका नाम, प्लाट आदि रोज़ रोज़ बदलते रहते हैं सामने खड़े शख्स के हिसाब से. एडवर्ड एलेन को यह झांसा दिया जाता है कि वही लीड रोल, हीरो का रोल करेगा. यह झांसा जरूरी भी है वर्ना एडवर्ड आयेगा ही नहीं. यह वादा किये जाने तक यह बन रही स्क्रिप्ट वैसी ही कॉमेडी है जो शेक्सपीयर के ज़माने में 'फार्मूला' हो गयी थी. बाद में सब बदल जायेगा, पात्रों के नाम, प्लाट, अभिनेताओं की भूमिकाएं. एलेन जो हीरो का रोल करने आया था मर्क्यूशियो का रोल करता है अंततः. जबकि हीरो - रोमियो- की भूमिका खुद शेक्सपीयर करता है.

मर्क्यूशियो मरता है और कॉमेडी ट्रेजेडी के रास्ते चल पड़ती है.

मर्क्यूशियो
, मरता हुआ मर्क्यूशियो जानता है उसका कोई पक्ष नहीं; उसकी भूमिका करता हुआ एडवर्ड जानता है उसका भी कोई पक्ष नहीं, अब वह एक “गौण” अभिनेता (=पात्र) है जिसे एक शाम या एक प्रेम के हैंगओवर में लिखने वाला एक अनचाही भूमिका में, अनचाही वीरगति के, मौत के हवाले कर सकता है, कर देता है. एक कवि (मेरे लिये शेक्सपीयर नाटक लिखते हुए भी कवि ही हैं पारंपरिकों की तरह) के कवित्व की शिनाख्त सिर्फ रोमियो या जूलियट के प्रेम से नहीं, उनकी ट्रेजेडी से नहीं मर्क्यूशियो के साथ हुए अन्याय, एडवर्ड के साथ हुए छल से भी होती है, होनी चाहिये.
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कवि एक बड़ा सा तोता है
जिसे उसके संरक्षक पालते हैं
कई होते हैं वे
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कविता और कवियों से जो प्रत्याशा है - यद्यपि वह एक आत्म-प्रत्याशा, आत्म-छवि ही है हिंदी जैसे पाठक पर्यावरण में - वह चकित करती है. इस समय हिंदी कवि होना एक असंभव ढंग से नैतिक, अस्वाभाविक ढंग से प्रशिक्षित और इसके मुआवजे में खूब आत्म-मुग्ध लेकिन फिर भी अवांछित व्यक्ति होना है. (इतनी तो कविता लिखी जा रही है! कितने कवि हैं !!!)

कवि से कुछ ऐसा होने की प्रत्याशा है कि वह संसार को बाईनरीज और बाईनोक्यूलर से ही देखे, जीवन में कुछ भी करे कविता में 'सही' राजनीति करे और मनुष्य होने मात्र के संताप को बिलकुल अनुभव न करें इसे सामाजिक अपराध माना जा सकता है, कि वह इतना जीवन के पक्ष में हो कि मृत्यु जैसी आस्तित्विक अलामतें तब तक उसके लिए 'अपठनीय' ही बनी रहे जब तक वे हत्या/आत्महत्या की शक्ल में न आय. कि वह अपने समय के अलावा बाकी समयों के बारे में, अपनी विधा, अपनी भाषा, अपनी अकादमी, अपने आलोचक, अपने पुरस्कर्ता, अपने संगठन के बाहर किसी चीज़ के बारे में, ज्यादा चिंतित न हों, कि वह बहुत बहुत नैतिक जान पड़े, कि बहुत बहुत पीड़ित जान पड़े, कि बहुत बहुत कमिटेड जान पड़े, कि बहुत बहुत राजनैतिक जान पड़े, कि वह फालतू इधर उधर का ज्यादा पढ़े देखे नहीं. और उसमें कोई अंतर्द्वंद्व, एम्बीवैलेंस कतई नहीं हो इस तरह के कन्फ्यूजन से, संदेह से परिवर्तन और प्रतिरोध के कथ्य और शिल्प दोनों को क्षति हो सकती है. पार्टनर की पोलिटिक्स साफ़ होना हर हाल में ज़रूरी है लेकिन सिर्फ लेखन में ही.

मुझे लगता है यह एक ऐसे परिदृश्य की विडम्बनाएं हैं जो विडंबनात्मक ढंग से ही बहुत साहित्यवादी है - यहाँ साहित्य पर संदेह सदैव हैं, उस पर अधिक भरोसा न करने की हिदायतें सदैव हैं उसे अपर्याप्त मानने के प्रमाण सदैव हैं, एक नंगे-भूखे जनपद में कला करने को लेकर अपराधबोध है, कम कला करने को लेकर अपराधबोध है, अधिक कला करने वालों पर लांछन है पर यह सब साहित्य में, और साहित्य के रूप में ही है.

वास्तविक
समाज में कितना परिवर्तन/प्रतिरोध हिंदी कवि या उसकी कविता करती है और हिंदी के लेखक परिवर्तन और प्रतिरोध के लिए साहित्य के अलावा क्या कर रहे हैं यह हम नहीं जानते, यह जानने की कोई विश्वसनीय पद्धति, दुर्भाग्य से, अभी तक है नहीं. जो लेखन या लेखकों का ऐसा करना जरूरी नहीं मानते उनके विषय में इससे बहुत फर्क नहीं पडेगा लेकिन जो मानते हैं उनके किये में लेखन की क्या भूमिका है, अगर है, और इससे उनके साहित्य के मूल्यांकन पर क्या फर्क पडेगा?

एक तरफ प्रभुत्वशाली, विडंबनात्मक साहित्यवादिता है और दूसरी तरफ यह देशज/‘भारतीय' विचार कि साहित्य से यह सब प्रत्याशा ही अवाँछनीय है क्योंकि वह एक 'काम्य' कर्म है, 'नैमैतिक' कर्म नहीं.

मर्क्युशियो अगर हिन्दी में जारी लडाईयों में एक सिपहसालार होता तो मरते हुए यही कहता 'कहर टूट पड़े तुम्हारे दोनों खानदानों पर’.
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वह जो जानता है अच्छी कविता क्या है अच्छा कवि नहीं है
और वह जो जानता है बुरी कविता क्या है बुरा कवि नहीं है

(एन्तोज़ियो पोर्चिया को अशोक वाजपेयी के अनुवाद में पढ़कर, उनकी शैली में एक कविता, 2005)
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मैं किसे कवि मानता हूँ ? इसका जवाब मैंने जब अपनी कविताओं में ढूंढना चाहा तो मुझे एक जगह यह लिखा मिला – कवि वह है जिसका ब्याह काल और अकाल से हो गया हो. यह कविता वर्धा यूनिवर्सिटी की पत्रिका बहुवचन के छठे अंक में छपी थी, 7-8 साल हो गये. मुझे नहीं लगता इस वाक्य को आज लिखता तो कुछ बदल कर लिखता.
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कुछ मित्रों को याद आ गया होगा कि कवि को ‘बड़ा-सा’ ही सही पर तोता किसी और ने नहीं शमशेर बहादुर सिंह ने कहा था.
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( गिरिराज एक फर्क संवेदनात्मक धरातल से कविता संभव करते हैं और यह फर्क होना उनकी वैचारिकी में भी लक्षित किया जा सकता है। उनसे सहमति-असहमति हो सकती है, उन्हें अनसुना नहीं किया जा सकता। हमें खुशी है कि उन्होंने हमारे आग्रह पर इस स्तम्भ के लिए लिखना स्वीकार किया। इससे पूर्व आप अनुवाद में बोर्हेस तथा मूलतः इसी स्तम्भ के लिए लिखे गए चंद्रभूषण और संजय कुंदन के विचार पढ़ चुके हैं। )

10 comments:

vyomesh said...

बहसें लगातार और अनंतिम होती हैं. शुरूआत की तरह उनके अंत के बिंदु भी निश्चित नहीं किये जा सकते. गिरिराज किराडू का यह वक्तव्य इस धारणा के बेहतर उदाहरण की तरह है. वह असहमतियों को प्रकाशित और उत्तेजित करने वाली एक अनिवार्य लोकतांत्रिक दखलंदाज़ी और सृजनप्रक्रिया को सार्वजनिक दिक्कत की तरह लेने वाले मुक्तिबोधीय कार्यभार का ज़रूरी निर्वाह है. हिंदी की पाठक संस्कृति और उसकी स्पर्शकातरता, वर्चस्वशाली राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाओं और शक्ति-संबंधों पर उनका नैतिक-साहसिक और जोखिमभरा गुस्सा उन्हें बहुत अकेला कर सकता है, करता है, जो उनके साथ हमारे लिए भी एक मूल्य है.

लेकिन हिंदी संस्कृति में जो खानदान उन्होंने बनाये हैं उन पर पर्याप्त आपत्ति की जानी चाहिए. शायद यह रूपकों की भाषा में जाने के अपरिहार्य झमेले हों, या मैं ही उन्हें अपनी रीडिंग में ज़रूरत से ज़्यादा व्यावहारिक बनाकर ले रहा होऊं. दरअसल फ़िलहाल ऐसे दो नहीं कई खानदान सक्रिय हैं. इस तथ्य को अगर नज़रंदाज़ किया जाए तो इस पूरी हलचल के एक किंचित पुराने और अप्रासंगिक विभाजन में लौट जाने का ख़तरा बना रहता है. यह एक किस्म की पराजय होगी हमारे लिए, और इस उत्तर समकालीन समय को संबोधित करने के लिए जिन नयी कोशिशों, जिज्ञासाओं, संदेहों, कार्यप्रणालियों और समूहों का बीते दिनों में निर्माण और विकास हुआ है उसको गँवाने की नौबत भी आ सकती है. यह एक रणनीतिक चूक होगी. हमारे आग्रह और वरीयताएँ ज़ाहिर है कि भिन्न हैं और उन्हें स्थापित करने के लिए हो रहे और किये जाने वाले प्रयत्न भी. लेकिन प्रतिपक्ष को कायदे से पहचानना खानदानों की तरह हमारे लिए भी बेहद ज़रूरी है.

वफ़ादारी के स्थूल आशयों पर शक करने का गिरिराज का प्रस्ताव ईमानदार और मानीखेज है लेकिन उस पर भी ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया जाना चाहिए. जैसे वफादारी की शर्तें मैकेनिकल हो जाती हैं वैसे ही वफादारी न करने की प्रतिज्ञाएँ भी मैकेनिकल और प्रतिगामी हो जाती हैं. एक बहुत बारीक रेखा है वफ़ा और बेवफ़ाई के बीच. नागार्जुन की एक अद्वितीय कविता 'प्रतिबद्ध हूँ' उस रेखा को शब्दों में मूर्त करती है - "सम्बद्ध हूँ, जी हाँ सम्बद्ध हूँ / निश्चय से अनिश्चय से संशय से भ्रम से क्रम से व्यतिक्रम से / निष्ठा से अनिष्ठा से आस्था से अनास्था से संकल्प से विकल्प से...... सबसे और किसी से नहीं / और जाने किस किससे!"

हमारा पक्ष है और इसी शक्ल का है.

परिवर्तन और प्रतिरोध के लिए साहित्य के अलावा कवि क्या करता है हम पूरा-पूरा भले ही नहीं जानते, लेकिन जानते भी तो हैं. उस अभिज्ञान के लिए इज्ज़त और जिज्ञासा का एक कॉमन सेंस अगर विकसित किया जा सके तो ऐसे "साहित्येतर" प्रयत्नों के ज़रिये साहित्य के मूल्यांकन के कुछ कारगर औजार हमें उपलब्ध हो सकेंगे. एक कवि कविता जितना ही ज़रूरी भदोही के कालीन मजदूरों के आन्दोलन को संगठित करना मानता है और आजीवन इसके लिए संघर्ष करता है. एक कवि बाबरी मस्जिद-ध्वंस के खिलाफ दो सम्पादकीय लिखकर अपनी नौकरी से निकाल दिया जाता है, एक कवि इमरजेंसी के खिलाफ दो साल तक जेल में रहता है लेकिन इसका शोर नहीं करता, बहुत से लेखक बाबरी-ध्वंस के खिलाफ एक जुलूस निकालते हुए गिरफ्तार हो जाते हैं और महीनों जेल में रहते हैं, एक युवा आलोचक को पुलिस से बचने के लिए महीनों भूमिगत रहना पड़ता है. एक कवि जानबूझकर साहित्य अकादमी और अन्य हिंदीसेवी संस्थाओं के हिन्दुत्ववादी रवैये के खिलाफ एक ऐसी कविता लिखता है, जिसके कारण उसके संग्रह को कभी भी साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिलेगा. गुजरात दंगों के मुखर विरोध के कारण एक कवि को अपनी नौकरी में विस्तार नहीं दिया जाता. यह सब काम कविता लिखने के अलावा नहीं, कविता लिखने के दौरान, कविता लिखने के बीच में, कविता को अधूरा छोड़कर किये जाते हैं. यह एक झाँकी भर है. इन कार्यकलापों के साथ रचना का सम्बन्ध ढूँढने का कार्य हमारा और अन्य लोगों का है. इस सम्बन्ध को अंतिम पैमाना बना लेने की बात कोई नहीं कर रहा है, लेकिन इनकी ज़रूरत से इनकार करने का हक भी किसी को नहीं है.


कुछ और बातें करने की इच्छा है, बस थोडा सा अवकाश चाहिए. गिरिराज किराडू को इस विचारोत्तेजक वक्तव्य के लिए बधाई.

giriraj kiradoo said...

आखिर बहस आगे बड़ी. व्योमेश का शुक्रिया.

१. 'वफादारी' के स्थूल रूपों से ही मेरा भी अभिप्रेत था. नागार्जुन की कविता में जिन चीज़ों से 'प्रतिबद्ध' रहने की बात है उन सबके प्रति मैं 'वफादार' भी हो सकता हूँ. हाँ पर एक कवि को हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाणभट्ट के जैसा 'वफादार' होना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है - 'सत्य के लिए किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं.' जाहिर ही यहाँ सत्य भी व्यख्यापेक्षी है.
मुझे वे ज़ेन और बौद्ध कवि भी याद आते हैं जो अपनी 'मृत्यु' कविताओं (आसन्न मृत्यु के आसपास कविता लिखने की परंपरा रही है दोनों में) में अपने पंथ और धर्म के साथ बुद्ध पर भी, उनके होने पर भी संदेह करते थे. उन्हें किसी अनोखे अंतिम नकार में 'त्याग' देते थे.
२.
हिंदी में दो खानदान मैंने नहीं बनाये है भाई. और मुझे हिंदी संस्कृति के बहुपक्षीय हो चलने का पूरा अहसास है - हो सकता है यह कुछ रूपकों की समस्या हो कुछ व्यवहारिकी की. बहुत लम्बे अरसे से जो प्रभावशाली द्विपक्षीयता रही है हो सकता है उसकी कुछ छाया रूपकों पर रही हो. पर क्या वो द्विपक्षीयता पूरी तरह नष्ट हो गयी या अभी कुछ बाकी है?
३.
मुझे उन मित्रों का,दिवंगतों का किया हुआ बखूब याद है जिनके बारे में व्योमेश ने लिखा है और मेरे मन में उन सब के प्रति गहरा सम्मान है - प्रश्न है लेखकों का वास्तविक समाज में परिवर्तन और प्रतिरोध के लिए लिखने के अलावा भी कुछ करना जो ज़रूरी मानते हैं - उनके उस किये में साहित्य का कितना योगदान है और इससे उनके साहित्यिक मूल्यांकन पर क्या फर्क पड़ना चाहिए. जिन्होंने किया है उसका विस्मरण कतई नहीं है. न ही इसकी ज़रुरत से इंकार किया गया है. यह एक बहुत नाज़ुक मुद्दा है बहस का. मुझे उम्मीद है मित्र इस पर गहरे से विचार करेंगे.

शिरीष कुमार मौर्य said...

प्रिय गिरि !

व्योमेश की काव्यभाषा में कहूँ तो समय पर प्रतिक्रिया ना दे पाने के "कारण अनेक हैं!" मुझे भी इस टिप्पणी के ना दिए जा सकने पर नागार्जुन ही याद आ रहे हैं - "जो हो ना सके पूर्ण काम! उनको मेरा प्रणाम!" कई जगह एक साथ उलझा रहा, इधर ये भी मन में आया कि हड़बड़ी में लिखूं तो लिखूं क्या?

व्योमेश की ही आलोचकीय भाषा में कहूँ तो मेरे साथ "केंद्रीय दिक्कत ये है" कि मुझे जो कहना था, उसे व्योमेश ने अधिकाँशतः कह ही दिया है. अब मैं पंकज भाई की अवश्यसंभावी टिप्पणी का इंतज़ार करता हूँ.

इस विचारवान लेख की तुम्हें बधाई !

तुम्हारा शिरीष

vyomesh said...

समाज को बदलने या बेहतर करने के लिए जो भी लोग जो भी कोशिशें करते हैं उनमे कविता होती ही है वह लिखी गयी हो या न लिखी गयी हो. कभी उन कोशिशों में लिखी गयी कविताएँ होती हैं और कभी उन्हें लिखने वाला कवि भी होता है. बहुत बार ऐसा नहीं भी होता. इसका कोई नियम नहीं होता या होता है तो अक्सर उस जादुई सार्थकता का हमें पता नहीं लग पाता. कवि के पास शामिल होने के बहुत से तरीके हैं, जैसे कविता लिखना या कुछ और करने की कविता लिखना. कविता की शर्तों पर जीवन जीना और जीवन की शर्तों पर कविता लिखना. समाज भी कविता की शर्तों पर कभी चलता है कभी नहीं चल पाता, जैसे कवि. समाज भी कविता से बनता है और बढ़ता है जैसे कविता भी समाज से, भले ही कविता लिखने को एक निजी कोशिश भी हम मानें. उसे एक समवेत प्रतिफल भी हम मानते हैं. कवियों के किये में साहित्य का योगदान होता है यह एक सच है और ज़्यादा बड़ा सच यह है कि जो कवि नहीं हैं उनके किये में साहित्य का योगदान होता है. एक नाटक देखकर लड़का जिंदगी में कभी झूठ न बोलने का संकल्प ले लेता है और महात्मा बन जाता है तो यह समाज, लड़के और कविता - सबका संकल्प हो जाता है. लड़का अगर झूठ के खिलाफ अभियान छेड़ देता है तो उसमें कविता और कवि भी शामिल है, कवि बरसों पहले दिवंगत हो गया है, इस सूचना से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता.

एक बात और इसी से सम्बद्ध - "कवियों के किये में साहित्य का कितना योगदान है" जैसा सवाल "कवियों के साहित्य में उनके किये का क्या योगदान है" जैसे प्रतिप्रश्न को भी बहस के बीच में ले आता है. मेरे ख़याल से इन दोनों पर साथ-साथ बात संभव है. अभी नहीं तो कभी.

जब तक द्विपक्षीयता का असर बाक़ी है तब तक उसकी उपस्थिति को नज़रंदाज़ किया जाना गलत है, एक रणनीति के तौर पर विस्मरण को भले ही हम आजमा लें. गिरिराज एक दुखद और भयावह तथ्य, बल्कि सच्चाई का इस मौके पर अभिकथन करते हैं - "हो सकता है यह कुछ रूपकों की समस्या हो कुछ व्यवहारिकी की." शायद द्विपक्षीयता एक ऐसी बला है जो पूरी तरह नष्ट हो गयी है फिर भी बाक़ी है. सोचिये, संघर्ष कितना विविध और जटिल है और यह एक पहलू भर है.

गिरिराज किराडू, शिरीष मौर्य और अनुराग वत्स के लिए आभार की औपचारिकता.

giriraj kiradoo said...

और ज़्यादा बड़ा सच यह है कि जो कवि नहीं हैं उनके किये में साहित्य का योगदान होता है-
यह एक बहुत ज़रूरी बात है. शायद लेखक 'वास्तव' में जाके जितना करते हैं, उससे अधिक उनका लेखन ही करता है. और जो दूसरों के किये में आ जाने वाला साहित्य है वो बहुत बार उनका लिखा हुआ हो सकता है जो 'वास्तव' में नहीं जाते.
हिंदी में शायद सबसे अधिक इस तरह दूसरों के किये में मुक्तिबोध का लिखा गया है और वे खुद लेखन के अलावा किसी साईट पर नज़र नहीं आते. हमें ऐसी सलाहियत तो लाना ही पड़ेगी कि सबसे एक जैसी प्रत्याशा नहीं हो सकती.

शिरीष तुम आ गए यहाँ यही कुछ कम नहीं -
हाँ अब पंकज चतुर्वेदी की टिप्पणी का इन्तज़ार है.

vyomesh said...

अगर कविता 'किये जाने' का तर्क है तो जीवित है अन्यथा जब वह किये जाने का तर्क बनेगी तब जीवित हो जायेगी. यह कविता का जीवन है. 'जो 'वास्तव' में नहीं जाते'.वे भी कर रहे होते हैं लिखकर, और जाने वाले जा-जाकर कविता रचते रहते हैं. कविता लगातार रचनारत है - कवियों और अ-कवियों के हाथों से. सबसे एक जैसी प्रत्याशा नहीं है, नहीं हो सकती, लेकिन सब लोग अलग-अलग और मिलकर कविता की वजह हैं. अच्छी और बुरी कविताओं के सफल और असफल कवि - सबलोग - इनमें से कुछ कवि हैं और कुछ नहीं. लेकिन यह भी कौन कह सकता है.

शुक्रिया बार-बार.

भारत भूषण तिवारी said...

मुझे नहीं लगता कि द्विपक्षीयता नष्ट हो गयी है या नष्टप्राय है. इस उत्तर समकालीन समय में वह अपने इवोल्व्ड रूप में सामने खड़ी है. जिसे बहुपक्षीयता समझा जा रहा है वह शायद इन्ही दो पक्षों के विविध 'ऑफशूटों' का समां हैं.और इन सब में मज़बूत ऑफशूट है उपयोगितावाद जो साहित्य और साहित्येतर जीवन में भी अपने चरम पर है.
इस उपयोगितावाद या प्रागमैटिज़्म का मूल-मंत्र है 'अपॉलिटिकल' होना. अपने गैर-साहित्यिक कार्यक्षेत्र में मैंने देखा है कि ये स्वघोषित अपॉलिटिकल लोग ही हद दर्जे के राजनैतिक होते हैं.
परसाई ने कहा था कि कोई लेखक अराजनैतिक हो ही नहीं सकता. फर्क सिर्फ इतना है कि लेखक और राजनीतिज्ञ के माध्यम अलग अलग है. इस में किसी को संदेह नहीं होगा कि लेखन की अपनी सीमाएँ हैं और बड़े परिवर्तन लेखन से नहीं आन्दोलनों से होते हैं. यह जानते हुए भी कि लेखक और आन्दोलनकर्ता में अंतर होता है, साहित्यिक मूल्यांकन में रचनागत उद्देश्यों को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता.
सबद पर प्रकाशित अपने आत्म-कथ्य में कही गई लाल्टू की बात याद आती है. वे कहते हैं कि 'हमारे निजी जीवन में प्रतिबद्धता सीमित पर कविता में मुखर होती है'. उनका मानना है कि 'कविता में उतनी ही बात हो जितनी हम जीते हैं'. मुझे लगता है कवि का (मुक्तिबोधीय) आत्म-संघर्ष 'कही' जा रही और 'जियी' जा रही प्रतिबद्धता के बीच इक्विलीब्रियम बनाने का प्रयास ही है.
लेकिन प्रतिबद्धता से कोई बचाव नहीं है!

pankaj said...

Jaari bahas mein sabhi log itna achchha kah chuke hain ki ab kuchh bhi behtar kahne ki mere liye 'koi soorat nazar nahin aati.' ek tathakathit ghair-saahityik kshetra---goki mujhe maaloom nahin, yah kya & kahaan hota hai---se aanevaale shri bhaarat bhushan tewari ne sabse kam shabdon mein sabse saarthak ya enlightening baatein kahi hain; yah kathit taur par saahityik biraadari se sambaddha ham sabhi logon ke liye ek sabaq ho sakta hai---basharte ham aisa chaah bhi sakein !
baharhaal ! giri ke is vaakya ne mujhe yahaan na chaahte hue bhi aane ko majboor kar diya---"shirish, tum aa gaye yahaan, yahi kuchh kam nahin !" manager pandeya ne kahin kaha hai ki "suvidha ki raajneeti duvidha ki bhaasha mein vyakt hoti hai." kaisa aashcharya hai ki giri suvidha ki koi raajneeti nahin kar rahe; iske baavujood duvidha ki bhaasha bolne ko baadhya hain ! isiliye wah shakespeare ki kriti se ek paatra pakad laate hain aur goya uski tarah yah kahte hue marne ki kaamna karte hain ki 'tum donon qhaandaanon par qahar gire !'
mujhe yah parhte hi dharmaveer bhaarati ke 'andha yug' ki besaaqhtaa yaad aayi; jismein kisi paatra ke bahaane wah kahte hain---'antim parinati mein donon hi jarjar karte hain/paksha chaahe satya ka ho/ athawaa asatya ka !' ghaurtalab hai ki yahaan nateeje ko hi sab kuchh maan liya gaya hai; bajaaye us prakriya ke, jo saahitya ho ya zindagi, donon mein hi zyaada ahamiyat rakhti hai. giri bhi---aisa mujhe lagta hai---parinaam se itne qhaufzada hain ki prakriya mein nihit pakshadharta ya pratibaddhata ya moolyanishthata (aap use chaahe jo naam deejiye, par uske baghair to jeene maatra ki kalpana karna na-mumkin hai)unke liye koi maani hi rakhti nazar nahin aati. isiliye aaqhirkaar mercutio ka waktavya unke liye sabse maaniqhez ho jaata hai. kya yahaan yah sawaal uthaaya ja sakta hai ki mushkil, naazuk aur nirnaayak mauqon par koi paksha chun-ne ki bajaaye anishchay, asmanjas, kimkartavya-vimoorhata vaghairah ka labaada orh lena zyaada surakshit & mufeed donon ho jaata hai. ek taraf aap aisi cheez lekar haazir hote hain ki aapko sabse abhinav vichaarak maan liya jaaye, doosari or moolyon ke kshetra mein bhi aap isi 'anirnay' ya 'duvidha' ko charam moolya ke taur par ghoshit kar rahe hote hain; jabki is sabka matlab 'akarm' ya 'yathasthiti' ke siwa kuchh nahin hai. yaani ya to status-quo barqaraar rahe ya 'donon qhaandaan' tabaah ho jaayen---koi saarthak dwandwa ya sangharsha darkaar nahin hai---yahi aapki mansha hai.
diqqat yah hai ki aap naye shabdon, mudraaon & lahze mein puraani baatein kar rahe hain. doosari samasya yah hai ki aalochana ya rachana ki jo prakriya aap prastaavit karte hain; us par qhud hi amal nahin kar paate ! maslan giri ko apne mool aalekh mein 'binary' categories par aitraaz tha & unki position se laga bhi ki wah jeevan & rachana mein koi faank nahin dekhte; lekin vyomesh se ulajhanaa kya para ki yah saaf ho gaya ki unki yah position aabhaas bhar thee.
takreeban 20 varshon se shri ashok vaajpeyi se ham yah raag sunte aa rahe hain ki 'saahitya-karm apne-aap mein sampoorna naagariktaa hai.' agarche giri ko ham hindi mein kisi qhaandaan ka nahin maante---jaisi ki unki position ya shaayad chaahat hai---magar aaqhir wah durbhaagyapoorna dhang se 'jeevan
aur lekhan' ki binary categories banaate hain & muktibodh jaisi azeem shakhseeyat ke baare mein yah kahne ki himmat bhi dikhaate hain ki 'aaj lekhan ke alaawa muktibodh kisi site par nazar nahin aate !' main sirf yah kahna chaahta hoon ki unhone apne hi kahe ke mutaabiq binary categories na banaayi hoteen, to muktibodh unhen har site par nazar aate ! ise behad vistrit vishleshan ke zariye saabit kiya ja sakta hai; magar uska na yahaan awakaash hai & na mujhmein itnee taab hi baaqi hai. samajhdaar logon ke liye ishaara kaafi hota hai & jo na samajhanaa chaahe, uske liye poori zindagi bhi kam hai. filhaal giri ke liye sirf ek kavita-pankti shuntaaro taanikaawa ki---'rakta ke alaawa kuchh aur nahin hai kavita' & ek she'r ghaalib ka-----
"rahi na taaqat-e-guftaar, aur agar ho bhi
to kis ummeed pe kahiye ki aarzoo kya hai."
pyaar & shubhkaamnaaon ke saath-----
-----pankaj chaturvedi
kanpur

giriraj kiradoo said...

इमां मुझे रोके है, तो खेंचे है मुझे कुफ्र

काबः मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे

यह बहुत प्रीतिकर है कि पंकज चतुर्वेदी ने इस बहस में शिरकत की। यह भी अच्छा है कि ऐसा उन्होंने दो-टूक शैली में किया। यह शैली लोकप्रिय तो है ही, लोकप्रिय बनाती भी है। इसका यह गुण भी स्पष्ट है कि शैलीकार का पक्ष बहुत साफ साफ घोषित होता है।

दो बातें हैं-

(1) बाईनरीज में देखना मेरे लिये संभव नहीं। बाईनरीज सत्ता व्यवस्थाओं के लिये अनिवार्य हैं। वे सत्ता व्यवस्थाएँ राजनैतिक हो सकती हैं, सामाजिक हो सकती हैं, विचारधारात्मक हो सकती हैं।

दिलचस्प यह है कि धार्मिक, वैचारिक, राजनैतिक, और साहित्यिक फासीवाद के लिये भी बाईनरीज अनिवार्य हैं – बाईनरीज में से किसी एक की ओर न होना इनमें से कहीं भी वाँछनीय तो नहीं ही ‘आपराधिक’ भी हो सकता है। जबकि साहित्य (= सा+हित्य/togetherness) में सदैव ही अंतर्विरोध, अंतर्द्वन्द्व और एम्बीवैलेंसे के लिये और विरोधियों के साथ रहने के लिये सर्वाधिक गुंजाईश हो सकती है, होती है। ‘इमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र’ के लिये साहित्य के अलावा और कहाँ गुंजाईश हो सकती है? गालिब का यह असमंजस और किसके लिये मूल्यवान है?

अंतर्विरोध, अंतर्द्वन्द्व और एम्बीवैलेंसे के लिये और विरोधियों के साथ रहने के लिये गुंजाईश लोकतंत्र में भी है और अगर व्यवस्थाओं का पतन, दर्शनों के पतन का प्रमाण नहीं होता तो लोकतंत्र में मेरे विश्वास का तर्क बहुत समझ में आ सकने लायक होना चाहिये।

शिरीष मौर्य मित्र हैं – एक वर्चुअल मित्र।उनका पक्ष, उनकी राजनीति बहुत साफ है ऐसा कहने वाले किसी के भी जितनी अगर ज्यादा नहीं तो और इसके बावजूद वे इस बहस में शरीक हुए – अपने पक्ष को कुछ जोखिम में डाल के – इसके लिये शुक्रिया करते हुए मैंने कहा था – तुम इस बहस में आ गये यही कुछ कम नहीं। वे स्व-घोषित फितूरी हैं और मुझे लगा यह उनके फितूर का भी एक अंदाज है। मेरे कहे में कोई और अर्थ शिरीष ने नहीं देखा यह मेरे लिये खुशी की बात है। यूँ भी यह पक्षों को गिराने-ढहाने की नहीं उनको अधिक समावेशी, अधिक लोकतांत्रिक बनाने की बहस है, बाईनरीज के परे देखने की कोशिश है – इतना परे, इतना समावेशी कि कोई तीसरा/चौथा/पाँचवा रास्ता/ते ही निकल आये। इसके बरक्स यथास्थिति को बनाये रखना तो यह होगा कि इस द्विपक्षीयता को बनाये रखा जाये। अगर प्रतिबद्धता का अर्थ यह दैवीय विश्वास हो कि एक (मेरा) पक्ष सदैव सही है, कि वह कुछ ऐसा है कि उसके परे जाने का तो खयाल तक गलत/अनैतिक/कुफ्र है तो ऐसा पक्ष लेकर कोई मूलगामी परिवर्तन हो सकता है, इस पर मुझे गहरा संदेह है। यह परिदृश्य को बहुपक्षीय होने से रोकने की कोई नीति ही हो सकती है।

1.1

साहित्य और जीवन का द्वैध इस द्विपक्षीय सत्ता संरचना में ही मूलभूत है। साहित्य को अपर्याप्त मानना या पूर्णतः स्वयंपर्याप्त मानना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं – दोनों में वो जीवन के साथ एक तनाव/विरोध में है। यदि आप इसे पर्याप्त नहीं मानते तो अपने ही तर्क से जो पर्याप्त होगा वह करिये।

यह द्वैध रघुवीर सहाय या मलयज में तो सबसे मुखर है ही मुक्तिबोध भी (अगर उनके बारे में कुछ कहना कुफ्र ना माना जाने लगा हो तो) ‘अब तक जीवन क्या जिया?’ पूछते हुए यह मानों भूल जाते हैं कि अब तक लिखा, कविता लिखी।



1.2

मर्क्यूशियो का इस बहस में होना सबआल्टर्न का होना है; नायक-नायिकाओं की त्रासदी में, सत्ताओं की लड़ाई में उसके जैसे ‘गौण’ पात्र की त्रासदी इसलिये भी पठनीय है कि वह ‘नाटक’ के भीतर भी एक गौण वॉयस है – वह नाटककार के, कवि के द्वारा रचित संसार में एक प्रतिरोधी स्वर है, एक सबआल्टर्न काउंटर-प्वाईंट। इसी तरह एलेन जो नायक की भूमिका करने आया था एक अनचाही ‘गौण’ भूमिका करता है, एक अनचाही वीरगति का अभिनय करता है। एलेन की वही नियति है जो मर्क्यूशियो की है लेकिन अपने इस एक कथन से – कहर टूट पड़े तुम्हारे दोनों खानदानों पर - यह पात्र ट्रेजेडी की सारी भव्यता, और सारी ‘वीरोचित’ हिंसा को संदेहास्पद बना देता है, दर्शक के लिये।

(2)

मुक्तिबोध के बारे में जो मैंने कहा था उसे दोहराने के लिये, खुद को उद्धृत करने के लिये बाध्य हूँ-

शायद लेखक 'वास्तव' में जाके जितना करते हैं, उससे अधिक उनका लेखन ही करता है. और जो दूसरों के किये में आ जाने वाला साहित्य है वो बहुत बार उनका लिखा हुआ हो सकता है जो 'वास्तव' में नहीं जाते. हिंदी में शायद सबसे अधिक इस तरह दूसरों के किये में मुक्तिबोध का लिखा गया है और वे खुद लेखन के अलावा किसी साईट पर नज़र नहीं आते.

मैं इसके अलावा क्या कह रहा हूँ कि जिन हिन्दी लेखकों का लेखन ‘वास्तव’ में गया है, जो दूसरों के किये में गया है उनमें मुक्तिबोध का लेखन शायद सबसे अधिक गया है – मुक्तिबोध के मरणोत्तर हिन्दी साहित्य की जितनी सामाजिक क्रियाशीलता है उसमें मुक्तिबोध से अधिक शायद ही किसी के लेखन की भूमिका रही हो यह मैं कह रहा हूँ। इस वाक्य के आधे हिस्से को इग्नोर करके इसके दूसरे आधे हिस्से पर टिप्पणी की गई है- और वे लेखन के अलावा किसी साईट पर नजर नहीं आते - जहाँ मेरा ईशारा मुक्तिबोध के जीवन की ओर है - मुक्तिबोध ‘एक्टिविस्ट’ लेखक नहीं थे। वे अपने जीवन में साहित्य/लेखन के अलावा किसी साईट पर नजर नहीं आते लेकिन उनका लेखन दूसरों के किये में सर्वाधिक गया है। मैं पंकज से अनुरोध करूंगा वे इस पर गौर करें. उनके जैसे जिम्मेवार आलोचक से यह अपेक्षा बेजा न होगी।पंकज ने मुझे उद्धृत करते हुए ‘आज’ जोड़ दिया है जो मेरे कथन में नहीं हैः

'aaj lekhan ke alaawa muktibodh kisi site par nazar nahin aate

गो कि उन्हें इस बहस से,बहस में शिरकत करने वालों से,खासकर साहित्य से संबंद्ध लोगों से, कोई उम्मीद नहीं, कोई सूरत नजर नहीं आती; उनके लिये वहदत-ए-वुजूद को मानने वाले गालिब से ही उम्मीद की ये सूरत जो बाईनरीज के पूर्ण विलोपन से निकलती है –

बर-रू-ए-शश जिहत, दर-ए-आईनाबाज़ है

यां इम्तियाज़-ए-नाकिस-ओ-कामिल नहीं रहा

pankaj said...

priy giriraj ji & jaari bahas mein shareek dosto;
agar aapko lagta hai ki main lokpriy hone ki gharaz se yahaan aata & likhtaa hoon; to mere lekhan ki yah asafalta hai. yah maan lene mein mujhe koi duvidha nahin. aap bhi jaante hain & main bhi ki hamaari audience kitni & kaisi hai; uske beech kya main 'lokpriy' hone ki kalpana karoonga ?
doosare, mere comment ke pahle hi vaakya mein yah nahin kaha gaya hai ki mujhe apne saahityik mitron mein "koi soorat nazar nahin aati"; balki yah israar hai ki qhud main kuchh behtar kah sakoonga, iski ummeed mujhe hi nahin hai. kripya us vaakya ko dobaara parh leejiye & "ati-paath" mat keejiye; kyonki us-se vaastavik muddon par baat aage nahin barh paati, isliye bhatakti hai.
maine saahitya ya zindagi mein sanshay, anirnay, asmanjas, duvidha ya hichak vagairah ke mauqon & ahameeyat se kabhi inkaar nahin kiya, unke mahattva se main bhali-bhaanti waaqif hoon. kripya fir se ghaur keejiye, agar kar saken, ki maine kaha hai ki 'naazuq, mushkil & nirnaayak' mauqon par bhi asmanjas ka labaada orhe rahne & har sthiti mein use ek charam moolya ki tarah prastaavit ya ghoshit karte rahne se mera aitiraaz hai-----saahitya & jeevan donon mein. maslan 'ramcharitmaanas' mein ram agar dashrath ke asmanjas ko hi sab-kuchh maan lete, to ayodhya mein hi baithe rahte & fir us mahaan shok & udaattataa donon se hamaaraa kabhi saakshaatkaar na hota, jo aaj bhi is maha-desh ki aatmaa & praanon mein samaaye hue hain.
aaqhiri baat is prasang mein, jo kahni mujhe zaroori lag rahi hai, yah ki muktibodh ya nirala ya kabeer ya premchand ko kya aap 'activist' ki kisi 'given' paribhaasha ke tahat 'activist' nahin maante ? kya aapke paas 'activist' ki koi anubhooti-janya paribhaashaa nahin hai ? maslan main to bhaaratendu harishchandra & mahaveer prasaad dwivedi se lekar jnaanranjan, namwar singh & ashok vaajpeyi ko bhi 'activist' maanta hoon. haan, yah zaroor hai ki ve alag-alag qism ke activists hain & unke maqsad bhi, zaahir hai ki, alag-alag hain. inhone sirf saahitya ka hi nirmaan nahin kiya hai; balki saahityik parivesh & anya saahityakaar-vyaktitvon ke nirmaan mein bhi bhoomika nibhaai hai. muktibodh ke kaavya mein ghatit hone-vaali tragedy & unki beemaari aur mrityu ko alagaakar dekh paana mere liye na-mumkin hai.
aapne ghalib se baat shuroo & qhatm ki hai ; isliye filwaqt ghalib ki hi in panktiyon se main bhi viraam leta hoon---

'ragon mein daudte firne ke ham nahin kaayal
jab aankh hi se na tapka to fir lahu kya hai.'
---pankaj chaturvedi
kanpur