Friday, April 24, 2009

पोथी पढि-पढि : २ : मारीना त्स्वेतायेवा



जीवन जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं

हर पुस्तक अपने ही जीवन से एक चोरी की घटना है। जितना अधिक पढ़ोगे, उतनी ही कम होगी स्वयं जीने की इच्छा और सामर्थ्य। यह बात भयानक है ! पुस्तकें एक तरह की मृत्यु होती हैं। जो बहुत पढ़ चुका है वह सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बाहर रहता है, सुख काल अज्ञानता है।

लिखो, और लिखो ! हर क्षण, हर इशारे, हर आह को अंकित करो ! सिर्फ इशारों को ही नहीं, उन्हें देते हुए हाथों को भी, आहों को ही नहीं बल्कि होठों के आकार को भी, जिनके बीच से वे इतनी आसानी से निकली हैं।

सपने में देखना और लिखना तब संभव नहीं होता जब ऐसा करने की इच्छा न हो बल्कि तब संभव होता है जब (कुछ) लिखा जाना चाहता हो, और सपना देखा जाना... लेखक के जीवन में मुख्य चीज़ है लिखना...लिखने में सफल होना नहीं बल्कि कुछ लिख सकना...तुम्हारे भीतर जो चीज़ छिपी और दबी हुई है और कविताओं में खुली और प्रकट हुई है, वही तुम्हारी कविता का 'मैं' है, सपने का 'मैं' है। दूसरे शब्दों में, कविता का 'मैं' उन शक्तियों के प्रति कवि-मन का समर्पण है...

समकालीनता
का मतलब पूरे का पूरा अपना समय नहीं होता, और इसी तरह पूरे की पूरी समकालीनता उसके अनेक रूपों में से केवल एक रूप नहीं होती। गोएठे का युग साथ-साथ नेपोलियन का भी युग है और बेथोविन का भी। श्रेष्ठ की समग्रता ही समकालीनता है।

मेरे
लिए जीवित या मृत, हर कवि --मेरे जीवन का सक्रिय पात्र है। मैं जीवन और पुस्तक, सूर्यास्त और उसके चित्र में कोई फर्क नहीं करती। जो कुछ मुझे पसंद है, पूरे मन से है।

जीवन
जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं। मेरे लिए वह कुछ अर्थ रखना तभी शुरू होता है जब वह रूपांतरित होकर कला में व्यक्त होता है। यदि मुझे कोई समुद्र तट पर ले जाये --स्वर्ग में ले जाये --और लिखने की मनाही करे तो मैं समुद्र और स्वर्ग --दोनों को अस्वीकार कर दूँगी।

दूसरी
औरतें नृत्य में जाने की खातिर, प्रेम, उत्सव या पहरावे की खातिर अपने बच्चों को भूल जाती हैं। मेरे जीवन का उत्सव --कविताएं हैं। पर मैंने कविताओं के कारण इरीना को नहीं भुलाया था...

मुझे
ईश्वर और मृत्यु के बाद के जीवन पर विश्वास नहीं। यही कारण है निराशा, बुढ़ापे और मृत्यु के भय का। मैं पूजा-पाठ करने में बिल्कुल असमर्थ हूँ। जीवन के प्रति पागलपन की हद तक प्रेम है और साथ में है जीने की उत्कट इच्छा।

****

( मारीना त्स्वेतायेवा रूस के महान कवियों में अग्रगण्य हैं। उन तक पहले कविताओं के जरिये ही पहुंचना हुआ। फिर निर्मल वर्मा की डायरी पढ़ते हुए मैं उनके पारदर्शी, कवित्वपूर्ण और तलस्पर्शी गद्य के बारे में जान सका। बाद में मेरी मुलाकात बीसेक बरस पहले छपी उस छोटी-सी किताब से हुई जिसमें कविताओं के अलावा मारीना के पत्र और गद्यांश भी थे। अनुवाद वरयाम सिंह ने किया था। यहाँ उसी पोथी से कुछ वाक्य इधर-उधर से उठाकर जमा किया है। जीवन और कविता से गहरी आसक्ति रखनेवाली मरीना को ताउम्र अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बेटी और बाद में पति की मृत्यु, प्रेम में हताशा और निर्वासन से जूझती मारीना ने ४९ की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। उनकी कवितायें फ़िर कभी। इससे पहले आप इसी स्तंभ में फरनांदो पैसोआ को पढ़ चुके हैं। )

4 comments:

vidya said...

hairani hoti hai yh jankar ki jiske mn me jine ki itni utkat ichcha, use aatmhatya karne k liye badhya hona pada.nischy hi marina ka jivan 'dukh ki badri' rha hoga.kavi jo likhta hai, uska pathkon pr kavita jaisa hi asar padta hai.in panktiyon ka vi asar waisa hi hai.

Ratnesh said...

'जो बहुत पढ़ चुका है वह सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बहार रहता है' kuch logon k sath jite hue maine bhi yah jana!

अस्तेय अनुज said...

समकालीनता का मतलब पूरे का पूरा अपना समय नहीं होता, और इसी तरह पूरे की पूरी समकालीनता उसके अनेक रूपों में से केवल एक रूप नहीं होती। गोएठे का युग साथ-साथ नेपोलियन का भी युग है और बेथोविन का भी। श्रेष्ठ की समग्रता ही समकालीनता है।

Pratibha gotiwale said...

हर पुस्तक अपने ही जीवन से एक चोरी की घटना है। जितना अधिक पढ़ोगे, उतनी ही कम होगी स्वयं जीने की इच्छा और सामर्थ्य। यह बात भयानक है ! पुस्तकें एक तरह की मृत्यु होती हैं। जो बहुत पढ़ चुका है वह सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बाहर रहता है, सुख काल अज्ञानता है।