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बही - खाता : ७ : कुंवर नारायण


( यह एक ज्ञात किंतु कम चर्चित तथ्य है कि कुंवरजी का 'आकारों के आसपास' नाम से एक कहानी-संग्रह भी है, जिसकी कहानियों के बारे ऐसा कह कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि वे एक कवि की कहानियां हैं। उसके पीछे कवि-दृष्टि ज़रूर थी, पर उसे विशिष्टता फैशन, आन्दोलन और प्रतिमानों में बंधकर न लिखने की रचनेवाली मनीषा ने प्रदान की थी। बही-खाता में इस बार उसी जाग्रत मनीषा से संवाद कीजिए। कुंवरजी ने इस संग्रह की भूमिका स्वरुप जो विचार पैंतीस बरस पहले व्यक्त किए थे, उसकी मूल्यवत्ता अब भी जान पड़ती है। भूमिका को किंचित संपादन के साथ यहाँ दिया जा रहा है, इस बात को नोट करते हुए कि कथा-पट इधर फिर से गुलज़ार है और पिछले पाँच वर्षों में पचास के करीब तो कहानी-संग्रह आए हैं ! )


यथार्थ से रोमांस

इन कहानियों में वैसे रोमांचकारी और सनसनीखेज़ तत्व नहीं मिलेंगे जैसे कि आम तौर पर कहानियों में होना लाजिम समझा जाता है। न इनमें कड़वे यथार्थ की झांकी है, न मीठे प्रेम की कल्पना, न पहेली बुझानेवाली चारित्रिक दाँवपेंच, न मनोवैज्ञानिक तिकड़मों में उलझाया हुआ सेक्स और क्राइम...सच पूछिए तो इन सबको ठंडे दिल-दिमाग से सोचते हुए बातचीत का एक अंदाज़ है...यथार्थ से रोमांस। कुछ इस तरह से मानो रोमांस यथार्थ से पलायन न होकर उसी की एक खास पहचान या अतिरिक्त माप हो। ( यहाँ मैं रोमांस शब्द का ठीक उन्हीं अर्थों में इस्तेमाल कर रहा हूँ जिन अर्थों में सरवान्ते का 'डॉन क्विग्जोट' एक रोमांस है।)

कहानी कहते समय मैं पाठक को यह यकीन दिलाने की कोशिश नहीं करता कि कहानी नहीं कह रहा हूँ, बल्कि जगह-जगह पाठक को अपनी तरफ़ करके कहता चलता हूँ कि यह यथार्थ नहीं, सिर्फ़ कहानी है ...कुछ इस तरह कि पाठक को मेरे कहने पर शक होने लगे और वह अपने-आपसे सवाल करे कि क्या सचमुच यह कहानी ही है या उससे भिन्न कुछ भी ? यथार्थ के नाम पर कहानी नहीं, कहानी के नाम पर यथार्थ की बात करता हूँ...उस यथार्थ की बात जिसे केवल व्यावहारिक स्तर पर नहीं, मुख्यतः मानसिक स्तर पर जिया जाता है।

अक्सर इन कहानियों में पात्रों और घटनाओं को केवल गवाही की तरह लाकर मनुष्य की नियति का मुकद्दमा पेश किया गया है।...कहीं-कहीं पूरी कहानी को बिल्कुल एब्सट्रैक्शन के स्तर पर रखकर कुछ ठोस निष्कर्षों से नत्थी कर दिया है मानो सारा अनुभव वस्तुओं और घटनाओं के नहीं, एक खास तरह के मानसिक सन्दर्भ में जिया जा रहा है।

...मैंने कई कहानियों को एक खास तरह से इस्तेमाल किया है, कहानी की किसी परिचित जाति को ठेस पहुंचाकर। इस ठेस पहुँचाने के दौरान मैंने पाठक से एक नए दृष्टिकोण की मांग की है जिसमें वह कहानी के जादू से मुग्ध होकर नहीं, कहानीकार के साथ पूरी तरह जागा रहकर अपने-आपसे तर्क-वितर्क करता चलता है। इस कोशिश में कहानियां कभी-कभी कविता और निबंध की विधा के काफी निकट आ गईं हैं, लेकिन शायद इस तरह नहीं कि उनकी बुनियादी पहचान ही गुम हो गई हो।

कई बार किसी साहित्यिक विधा को उसकी ठस जातीयता के बेलोचपन से उबारने के लिए भी ज़रूरी होता है कि उसमें एक विस्फोट पैदा किया जाये...बहरी तत्वों की घुसपैठ कराके।

ज्यादातर कहानीकारों का ध्यान विषय पर ही केन्द्रित रहा और यथार्थ क नाम पर सेक्स, हिंसा, पारिवारिक और सामाजिक मुश्किलों आदि को ही कहानियो का विषय बनाया गया, लेकिन कहानी के आतंरिक स्ट्रकचर को लेकर बहुत सतर्क प्रयोग काम ही देखने में आये। इन कहानियों में जहाँ कथा-तत्व को गौण रखा गया है, उसकी एक वजह यह भी रही कि मैं कहानी की शुद्ध प्रयोगात्मक संभावनाओं की छानबीन करना चाहता था। उपलब्धि जो भी हो, कोशिश मुझे बेकार नहीं लगी...

सभी कहानियों में प्रयोग का एक-सा आग्रह नहीं रहा। कुछ में कथ्य को ही प्रमुखता देकर कहानी के सहज रूप को अपने-आप बनने दिया गया है। लेकिन इनमें भी मैंने कथाकार की उपस्थिति को पात्रों के काफी नजदीक रखा है...कुछ इस तरह मानो वह किस्से को केवल बयान ही नहीं कर रहा, उसे सोच भी रहा है, नाटकों क कोरस की तरह। इसीलिए भाषा भी जान-बूझकर कई स्तरों पर रखी गई है ताकि अर्थों के रंग विभिन्न बौद्धिक और भावनात्मक ज़मीनों पर महसूस किये जा सकें।
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5 comments:

बढ़िया समीक्षात्मक आलेख.


कुंवरजी की यह भूमिका और उनकी कहानियां हिंदी कहानी को ही नहीं बल्कि साहित्य के बारे में हमारी सामूहिक हिंदी समझ को भी किसी और ही दिशा में ले जा सकती थीं - ऐसा हुआ नहीं यह सच है. आज भी जो 'नए' कथाकार दिखाई दे रहे हैं उनमें से बहुत से उसी फ्रेमवर्क में लिख रहे हैं जिसके बरक्स कुंवरजी ने यह एक अप्रत्याशित दुनिया कहानी की बनाई थी पैंतीस बरस पहले हालाँकि लिखी हुई और भी पहले की होनी चाहिए (उन्होंने लिखा है इसी भूमिका में कि यह संग्रह कुछ बरस पहले भी छपवाया जा सकता था लेकिन तब ऐसा करना उस बहस में लामुहाला पकड़ लिया जाना होता जो कहानी को लेकर...) 'यथार्थ' का जो कल्ट हिंदी में बना हुआ था/है उसके बरक्स यह कुफ्र था. और एक बेहद खुदमुख्तार कुफ्र.

मिलान कुंदेरा ने योरोपीय उपन्यास के इतिहास को इस तरह पढ़ा है कि जिन मार्गों पर, संभावनाओं पर योरोपीय उपन्यास नहीं गया वे कौनसी थीं? हिंदी में कुंवरजी, रघुवीर सहाय का कथा लेखन ऐसे ही मार्ग हैं. विनोद कुमार शुक्ल का पथ इतना एकाकी नहीं रहेगा- उनके कवि और कथाकार दोनों से चुनौती और प्रेरणा लेने वाले युवा अभी से दृश्य में हैं.

मुझे उनके कवि ने भी बहुत आकर्षित किया है लेकिन अगर यह असंभव चुनाव करना ही पड़े तो मैं उनकी कहानियाँ चुनुँगा - 'गुड़ियों का खेल' नहीं होती तो शायद मैं साहित्य में नहीं होता. ऐसे ही कुछ मजमूनों ने,उस कच्ची उम्र में, अपना बेडा गर्क किया था.


हरेक कहानीकार का अपना नजरिया होता है....हरेक की एक अपनी शैली ...मनोहर श्याम जोशी की कस्बाई शैली हो....या फणीश्वर नाथ रेनू की गवई शैली .या निर्मल वर्मा का अपने तरीके से कहने का अंदाज ....तीनो भाते है....


"मैंने कई कहानियों को एक खास तरह से इस्तेमाल किया है, कहानी की किसी परिचित जाति को ठेस पहुंचाकर। इस ठेस पहुँचाने के दौरान मैंने पाठक से एक नए दृष्टिकोण की मांग की है जिसमें वह कहानी के जादू से मुग्ध होकर नहीं, कहानीकार के साथ पूरी तरह जागा रहकर अपने-आपसे तर्क-वितर्क करता चलता है। इस कोशिश में कहानियां कभी-कभी कविता और निबंध की विधा के काफी निकट आ गईं हैं, लेकिन शायद इस तरह नहीं कि उनकी बुनियादी पहचान ही गुम हो गई "



इसके बरक्स
ये जो अपने आप के भीतर अपनी क्रियेटिविटी तलाशने और मापने और पहचानने का एक सहज गर्व (गर्व शब्द शायद अपने सबसे हम्बल कनोटेशन में इस्तेमाल कर रही हूँ ) ..जो कि हर लेखक में अपने लेखन के संदर्भ में होना ही चाहिये , उस नयेपन का एक नैचुरल ग्रेस से अक्सेप्टेंस और इंट्रोडक्शन ...बस इतना ही लेखक को कहना चाहिये अपने लेखन के लिये ..न इससे कम न इससे ज़्यादा

कुँवरजी ने यही किया है .. सरल सहज और मैटर ऑफ फैक्ट वे में नये रास्तों की बात की है ..ये उनके जैसा लेखक ही कर सकता है , बिना शोरशराबे , बिना हँगामे के , एक दुनिया के समकक्ष दूसरी दुनिया खड़ी की है ..समझ की और परसेप्शन की

कहानी क्यों किसी स्ट्रक्चर और फॉर्मूला में बँधे ? पाठक को ज़मीन दे फिर उड़ जाये सब दिशाओं में , जैसे हवा में सेमल के फूल...
to go from concrete to abstract and back ..the easy passage back and forth in time , space , layers and dimensions ....what freedom of expression , such limitless joy of creativity
what more could one want ..what more

प्रत्यक्षा


kiraadoo ji shurooaat karte hain ek kshobh se ki 'aaj ke bahut-se kathakaar (yathaarth ke) usi framework mein likh rahe hain' & aqheer tak aate-aate ek qism ki qhushi se bhar uthate hain ki 'vinod kumar shukla ka path itna ekaaki nahin rahega'-----iske liye unhen haardik badhaaee !
-----pankaj chaturvedi
kanpur


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