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सबद निरंतर


कुंवरजी
जितनी रुचि से पुस्तकें पढ़ते हैं, उतनी ही रुचि से फिल्में भी देखते हैं। यही वजह है कि अस्सी पार, घुटनों और आंखों में तकलीफ के बावजूद, वे फिल्में देखने अब भी निकल लेते हैं। मुझे कल सुबह-सुबह बताया, ''आज चलना है, राजुला की फ़िल्म है'', तो इस संगत का लाभ लेने से भला कैसे चूकता। राजुला की एक और फ़िल्म, बियोंड द व्हील, दो साल पहले आईआईसी में ही देखने की याद भी ताज़ा हो आई। तब अकेले गया था, पर कुंवरजी के साथ फ़िल्म देखने और उसके पहले और बाद, उस पर बात करने का अनुभव बिल्कुल अलहदा होता है। फिल्में देखने-समझने में उनके फिल्मों पर लेखन ( यह जल्द ही पुस्तकाकार आ रहा है ) और ऐसी आत्मीय मुलाकातों के दौरान फिल्मकारों और फिल्मों पर हुई चर्चा से मुझे रोशनी मिलती रही है। ऐसे कई फिल्मकार हैं जिनके बारे में मैं कुंवरजी से जान सका।

उनके लिखे या बोले हुए में विकिपीडियानुमा जानकारी नहीं है, और न उसमें आप्त वचन बोलने का कोई दर्प ही झलकता है। वे कल जब कह रहे थे कि साहित्य और सिनेमा को बहुत अलगा कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि बहुत अच्छे फ़िल्ममेकर दरअसल बहुत अच्छे लेखक ही हैं, तो अपनी कमअक्ल में यह बात कुछ और वसी हुई कि आख़िर फिल्मकार 'विजुअल पोएट्री' कैसे संभव कर पाता है। उनके द्वारा सुझाई गई तारकोवस्की की फिल्में मुझे अपने अनुभव में किसी परतदार कविता सरीखी ही लगती हैं। यही वजह है कि तारकोवस्की या बर्गमान जैसे फिल्मकारों की तरफ़ मन बार-बार लौटता है। सिनेमा की इस बहुप्रभावक्षमता से वाकिफ होना अपने आप में एक पूरी शिक्षा, एक पाठ है।

यह पाठ कल राजुला शाह की नई फिल्म ''सबद निरंतर'' (वर्ड विदिन वर्ड ) देखते हुए मैं आईआईसी थिएटर में भी मन ही मन दुहराता रहा था। वजह थी फिल्म की थीम। राजुला ने मालवा को इस बार अपनी सृजन भूमि बनाया है। जरिया भक्त कवियों --कबीर, गोरखनाथ, मछेन्द्रनाथ आदि की कविताएं हैं। राजुला इन कविओं की लोक-व्याप्ति को ७४ मिनट की अपनी फिल्म में बहुत धैर्य और लगाव से सेल्युलाइड पर उकेरती हैं।

यहाँ मुझे कुंवरजी की ही कविता और लोक-रुची के बारे में कही हुई बात जोड़नी है। एक बार उनसे दूरदर्शन की तरफ से आई किसी मूर्ख प्रतिनिधि ने कहा कि आपकी कविता तो बहुत कठिन है, लोग टीवी पर कैसे समझेंगे। कुंवरजी ने इस पर बड़ी विनम्रता से कहा था कि आप ऐसा कहकर उस विशाल पाठक-समूह का ही अपमान कर रही हैं, जिसने आज तक न जाने कितने बड़े-बड़े कवियों को अपनी स्मृति में ज़ज्ब कर रखा है। राजुला की फिल्म देखने के बाद मैंने सबसे पहले कुंवरजी को उनकी कही हुई इस बात की ही याद दिलाई।

मालवा का लोक ऊपर से देखने में बहुत भिन्न नहीं है। वहां भी खेती-किसानी करनेवाले लोग हैं, पारचून की दुकान लगानेवाले साहूजी हैं, मोहल्ले में अपने घर के एक हिस्से में जलेबी छाननेवाला वृद्ध दम्पति है और है सत्संग करनेवालों की जमात। और सबसे ज्यादा वह बूढी स्त्री जिसमें यह बोध जीवन में गहरे खुब कर ही जन्मा है कि उसके राधेश्याम किसी काशी-मथुरा में नहीं निवास करते, उनका बसाव तो खुद उसके भीतर है। मालवा के लोक-चित्त में यह दुर्लभ कबीर-गुण न होता, तो यह मिट्टी कुमार गंधर्व कैसे उपजाती ?

ये साधारण लोग ही उस समृद्ध लोक का सृजन करते हैं, जिनके यहाँ सबद एक निरंतर यात्रा पर है। कबीर सरीखे कवियों की इन अन्यथा निरक्षर लोगों की समझ, उनके बीजक की स्मृति, गायन और व्याख्या से जब आप रूबरू होते हैं, तो आपके सामने कविता के कुछ अलग अर्थ खुलते हैं और उसकी उत्तरजीविता का भी कुछ पता मिलता है। राजुला ने इस लोक को उसके अनेक राग-रंग में पकड़ने की कोशिश की है और ऐसा करते हुए खुद को उस सयाने बचपने से भरसक बचाए रखा है, जिसमें निर्देशक आपको हर दूसरे फ्रेम में दीक्षित करते दिख पड़ता है।

बातचीत में राजुला ने बहुचर्चित ईरानी कवयित्री फरोखजाद की बनाई एक मात्र फिल्म का जिक्र किया जिसे वहीं के कियारोस्तमी, पनाही वगैरह अपने फ़िल्म-निर्माण की प्रेरणा मानते हैं। वादे के मुताबिक अगर राजुला के फिल्मकार पति अर्घ्य बसु मई में म्यूनिख फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्म के लिए जाते हुए दिल्ली में फरोखजाद की फिल्म भेंट गए, तो शायद अगली चर्चा उसी पर...
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5 comments:

anurag vatsa ke is gadya mein viral qism ki sundarta, sookshmata, samvedansheelta, sanjeedagi & paardarshita hai. wah apni abhivyaktiyon mein lagaataar nikharte & zyaada sajag hote jaa rahe hain-----unko is qadar vikasit hote dekhna mere & unke doston ke liye kaafi sukhad hai-----'jyon badri ankhiyyan lakhi, ankhiyan ko sukh hot'.lagta hai, ab wah utne chhote nahin rahe, jitne bhautik roop se hain & jiska teekha-meetha ehsaas unhen saalta aur oorja muhaiyaa karta rahta hai. shaayad yah mazbooti & parishkaar haal mein ek polemical bahas mein un jaise nishchhal-samvedansheel-manansheel yuva ko kheench liye jaane ka bhi nateeja hai. us prakriya ki aanch mein tapkar, wah aur nikharkar saamne aaye hain-----kavi trilochan ke shabd yaad aate hain------'tap-tapkar hi bhatthi mein sona nikhara hai.'
ab anurag ko dekhkar kahna padta hai ki 'dekhan mein chhote lagen, ghaav karen gambheer !' sachmuch, wah-----ek roopak ke sahaare kahen to----------saahityik blog patrakaarita ki duniya ke GAUTAM GAMBHEER hain.
prastut gadya ki rachanaatmakta, saundarya & vaichaarikta se zaahir hota hai ki anurag vatsa kavita bhi zaroor likhate honge. hamaari guzaarish hai ki agar aisa hai, to unhen apne us durlabh qhazaane ke saath saamne aana chaahiye, jisse ham mitron ko unki kavita se bhi kaafi-kuchh seekhane ko mile.
baharhaal ! raajula shah ki film par likha unka yah rachanaatmak gadya --------ho na ho------ek kavi ka hi gadya hai. ismein 'sayaane bachpane' jaise anoothe shabda-bandh ka unhone baqhoobi istemaal kiya hai. iske alaawa kunwar narayan se praapta amoolya antardrishtiyon ko wah hamse bhi saajha karte hain, iske liye ham unke bahut ehsaanmand hain. baaqi yah ki kunwar ji ka saath, 'sabad nirantar' jaisi zaroori film & kavita ke jis aalok mein wah saans le rahe hain-----usse bahut rashk hota hai unse ! kaash ! auron ko bhi yah sab naseeb ho paata !
-----pankaj chaturvedi
kanpur


आज के हिंसक हिन्दी साहित्य समाज में कुंवर जी की उपस्थिति एक अनोखा सुक़ून देती है ! आपका सौभाग्य है की आप उनका सत्संग कर पाते है. मुझे ये सुक़ून चंद्रकांत देवताले जी,मॅंगलेश जी और वीरेन जी मिल कर और असद जी बात कर के मिलता है. इस तरह तो कवियों की एक अनोखी परम्परा सामने आने लगती है! राजुला की फिल्म भी आपकी पोस्ट में आँखों के आगे गुज़रती- सी लगी. अच्छी पोस्ट - बधाई ! बाक़ी तो पंकज भाई ने विस्तार से कह ही दिया है - शब्द दर शब्द उनसे सहमत !


aapke lekhan ka to mai pahle se hi prasansak tha.....ab to .........
mrityunjay


bahut achha laga.aapki likhat ne rajula ki film dekhne ki pyas jaga di.


kai din baad aapki post padhi. ye bahut achhi lagi. taja posts phir padhunga.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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