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रंगायन : ४ : ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे

( रंगकर्म के जरिये भारत की विविधता कई स्तरों पर उद्घाटित हुई है, यह और बात है कि हम उसका ठीक ढंग से नोटिस लिए बिना उसकी अखिल भारतीय व्याप्ति की व्याख्या करते हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों की अनेक भाषाओं और शैलियों में अपने को व्यक्त करती इस समृद्ध रंग-परंपरा को शिखर रंग-व्यक्तित्वों के बहाने जानने-समझने के आग्रह को वरिष्ठ कथाकार, नाटककार और रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ के सामने रखने का ही सुफल रंगायन है। इस स्तम्भ में आप अब तक हबीब तनवीर, नेमिचंद्र जैन और ब.व. कारंथ के रंग- योगदान पर एकाग्र सुलभजी का गद्य पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में अब ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे। )


खुले मन का सर्जक

हृषीकेश सुलभ
ब. व. कारंथ द्वारा स्थापित रंगायन के निदेशक ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जाने से पूर्व उन्होंने यक्षगान केन्द्र, उडुपी में पारम्परिक यक्षगान के लिए प्रशिक्षण प्राप्त किया था। रंगायन का निर्देशक बनने से पूर्व लगभग बाईस वर्षौं तक जाम्बे निनासम थियेटर इन्स्टीट्युट, हेग्गोडु के प्राचार्य रहे। रंगशिक्षण के इस दीर्घ अनुभव ने उनके रंगकर्म को नयी समझ दी और संस्कृतिकर्म के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण दिया।

जाम्बे ने आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे ( मोहन राकेश), लोअर डेप्थ ( मैक्सिम गोर्की), चेरी का बाग़ीचा, अंकल वान्या, थ्री सिस्टर्स ( चेख़व), जनशत्रु ( इब्सन), किंग लियर, मर्चेन्ट ऑफ़ वेनिस, टिमान ऑफ़ एथेन्स ( शेक्सपीयर), शू मेकर्स वन्डरफुल वाइफ ( लोर्का ), ताम्रपत्र ( देवाशीश मजुमदार), रक्त करबी ( रवीन्द्रनाथ टैगोर), अभिज्ञानषाकुंतलम् ( कालिदास), मुद्राराक्षस (विशाखदत्त), दि पावर ऑफ़ डार्कनेस ( टाल्सटाय), चरनदास चोर ( हबीब तनवीर) आदि नाटकों को कन्नड़ में निर्देशित किया है। गिरीश कारनाड, चन्द्रशेखर कम्बार, एस. बालुराव, जी.बी.जोशी, यू. आर. अनंतमूर्ति, पी. लंकेश, के. वी. सुब्बन्ना आदि के कन्नड़ नाटकों के साथ-साथ विजय तेन्दुलकर और महेश एलकुंचवार के नाटकों के कन्नड़ अनुवाद को निर्देशित करने का विपुल अनुभव भी जाम्बे की रंगपूँजी है।

जाम्बे
के रंगकर्म की विविधता और उनके रंगकर्म के सामाजिक सरोकारों का अंदाज़ा उनके द्वारा संचालित रंगशिविरों से लगाया जा सकता है। उन्होंने दक्षिण कर्नाटक के गंगोली के मछुआरों और उत्तरी कर्नाटक के मंचिकेरी के सिद्दी आदिवासियों के लिए कई रंगशिविरों का आयोजन किया है और उन्हें प्रशिक्षण दिया है। कर्नाटक में दावणगेरे और कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी के अलावा सतारा ( महाराष्ट्र) और इम्फाल ( मणिपुर) में भी जाम्बे ने रंगषिविरों का संचालन किया है। एक दर्जन से ज़्यादा बच्चों के नाटकों को निर्देशित करनेवाले जाम्बे ने कर्नाटक के सिमोगा, मंचिकेरी, सुल्लिया तालुक, हेग्गोडु, दावणगेरे, भारतानहल्ली जैसे छोटे नगरों-कस्बों के बच्चों को प्रशिक्षित कर उन्हें रंग संस्कार दिया है। श्रीराम सेन्टर रंगमंडल (नयी दिल्ली) और भारतेन्दु नाटक अकादमी (लखनऊ) ही नहीं, कर्नाटक के छोटे नगरों-कस्बों, सिमोगा के अभिनय थियेटर ग्रुप, मंचिकेरी के रंगविभागा, रंगसमूहा और सिद्दी आदिवासी ग्रुप सिद्दी रंगा, चित्रदुर्गा ज़िले के शमानुर गाँव के निवासियों, हम्पी के निवासियों के लिए भी नाटकों को निर्देशित किया है।

समकालीन रंगमंच को लेकर अपनी चिंताओं को जाम्बे समय-समय पर प्रकट करते रहे हैं। रंगमंच की समस्याओं को वह भारतीय समाज और वर्तमान समय के साथ जोड़कर विश्लेषित करते हैं - ‘‘हर राज्य की भूमि...जल..वन...भाषा-संस्कृति...ये सब मिलकर राष्ट्र बनता है। राष्ट्र को देश के नक्शे में कहीं एक स्थान पर आप चिह्नत नहीं कर सकते। आप देश के किसी एक भू-भाग को...समाज के किसी एक हिस्से को, दूसरों की अपेक्षा कमज़ोर मानकर उपेक्षित नहीं कर सकते। भाषा के कारण...भूमि के कारण एक राष्ट्र की अवधारणा पर संकट आते रहे हैं। ऐसे संकट ग़ैरबराबरी से पैदा होते हैं। आप किसी दूसरी भाषा का अपमान नहीं कर सकते। यह असंवैधानिक है।’’

‘‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आज हिन्दी स्कूल बनकर रह गया है। आज तक यह बात लोग समझ नहीं सके। राष्टीय नाट्य विद्यालय की संरचना का यह एक बड़ा दोहै। वे लोग इसे समस्या मानने को ही तैयार नहीं जबकि यह एक बड़ी समस्या है। यह बहुभाषी देश है। यहाँ का समाज कई संस्कृतियों को अपने साथ लेकर चलता रहा है।’’

रंगप्रयोगों को लेकर जाम्बे के पास एक सुलझा हुआ वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जाम्बे कहते हैं -‘‘ रंगभाषा कई भाषाओं से मिलकर बनती है। गाना, नृत्य, संगीत, अभिनय, साहित्य आदि सब भाषाएँ ही हैं। इनका काम अभिव्यक्ति करना है और थियेटर इन सब को मिलाकर बनता है। इनके मिलने से ही बनती है एक रंगकृति। इस रंगकृति के निर्माण के लिए रंगभाषा का निर्माण ज़रूरी है। हम अगर अभिव्यक्ति के इन तमाम रूपों के बाहरी रूप को लेकर काम करते हैं, तो गड़बड़ी होती है। लिखित भाषा को दृष्यभाषा में रूपांतरित करने के लिए यह ज़रूरी है कि हम थियेटर के इन सभी तत्त्वों के भीतरी संसार के बीच उतरें...और वहाँ से अपनी प्रस्तुति के लिए रूप और संवेदना - दोनों को चुनें। मैं अगर एक नाटक कर रहा हूँ, तो मैं सम्प्रेषण के लिए किसी भी नाट्यरूप का उपयोग कर सकता हूँ...पर इस उपयोग को रचनात्मक प्रयोग में बदलने के लिए मुझे थियेटर के उस रूप के भीतर छिपी संवेदना को पकड़ना होगा।’’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘‘यहाँ शुद्धता की कोई गारंटी नहीं होती। यहाँ सम्प्रेषण की गारंटी महत्त्वपूर्ण है। हम जब बोलते हैं, तो कई बार कई भाषाएँ उसमें मिल जाती हैं और तब जाकर हमारा सम्प्रेषण पूरा होता है। थियेटर में भी यही होता है। दृष्यभाषा की यह आवश्यकता है।...हमारे महाकाव्य...हमारे मिथक, भाषा का यानी सम्प्रेषण की कला का सबसे सशक्त उदाहरण हैं।...आज एटम बम या एके ४७ जैसे महाविनाशकारी हथियार हमारे सामने खड़े हैं और सारी मानवता को डरा रहे हैं। कल भी ये थे। भस्मासुर क्या था ? इन्हीं हथियारों का मानवीकरण है भस्मासुर।...तो यह है हमारी पारम्परिक अभिव्यक्ति का...सम्प्रेषण कौशल। हमें अपनी परम्परा में गहरे उतर कर अपने लिए रूप को खोजना होगा। हमारे पास समृद्ध वाचिक परम्परा भी रही है। वाचिक परम्परा एक तरह से मूविंग यूनिवर्सिटी की तरह रही है। हमें नयी दृष्टि से इन अवधारणाओं पर काम करना होगा।’’

अपनी रचनात्मकता को विश्लेशित करते हुए जाम्बे कहते हैं - ‘‘रचनात्मकता के अनेक रास्ते हैं। आप चीज़ों को कहीं से ले सकते हैं...कहीं से भी पा सकते हैं। मैं खुला हुआ हूँ। मेरी रंगरचना की कोई निश्चित पद्धति नहीं।’’ जाम्बे के रंगसरोकार उन्हें ब.व. कारंथ, प्रसन्ना और वसवलिंगैया की रंगपरम्परा से जोड़ते हैं।
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1 comments:

jaambe ji ka yah comment ki NSD ek hindi school bankar rah gaya hai, bahut chintit & vichalit karne vaala hai. zimmedaar logon ki nigaah is vidambana par jaani hi nahin chaahiye, balki iske niraakaran ki koshishen bhi unhen karni chaahiye.
doosari or, yah bhi alakshit na kiya jaay ki kuchh bhaartiya bhaashaaon ke saahityakaaron dwara qhwaaham-qhwaah apne-apne catchment areas mein hindi ka houaa khada karke uske virodh ka maahaul taiyaar kiya jaata hai. hindi mein doosari bhaartiya bhaashaaon ke saahitya ka jitna sammaan, swaagat & anuvaad kiya jaata hai, utna kisi bhi bhaartiya bhaasha mein hindi ke liye sadbhaav ka vaatavaran nahin hai.
is par bhi kuchh kahiye jaambe ji & sulabh ji !
-----pankaj chaturvedi
kanpur


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