Wednesday, April 15, 2009

बूथ पर लड़ना


( आगे व्योमेश शुक्ल की दो कविताएं दी जा रही हैं। दूसरी कविता कहीं भी पहली बार छप रही है, जबकि पहली कविता को लोकतंत्र के पर्व, चुनाव, में कवि और उसकी कविता के माध्यम से हम अपने मोर्चे से एक ज़रूरी कार्रवाई मान रहे हैं। एक ऐसे समय में जब यह मान लिया गया हो कि कविता या या सरल-मति में साहित्य ही, हमारे समय के संघर्षों में हमारा बहुत साथ देने लायक नहीं रहा है, हालाँकि उससे कमतर-बदतर चीजों और लोगों से हम आस लगाये बैठे हैं, ''बूथ पर लड़ना'' सरीखी कविताएं बोध,विचार, विवेक और अनिर्णय की हमारी दुविधाजनक स्थिति को बदलती है। वह अपने भीतर जिस अन्यथा विवादस्पद तथ्य को अपना आत्म-सत्य स्वीकार कर आगे बढ़ती है, और उसके जितने आयामों को उद्घाटित करने में सफल हुई है, उसकी अपेक्षा हम हर अच्छी कविता से करते हैं, जो असल में बहुत कम मौकों पर पूरी होती दिखती है। इस लिहाज़ से वह इधर लिखी जा रही कविताओं में अपने तरह की अकेली है। हालाँकि बूथ जैसी सबसे छोटी इकाई पर भी प्रतिबद्ध होकर लड़नेवाले इस कवि में इस बात का भी बहुत तीखा एहसास है कि ''बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं''। )


बूथ पर लड़ना

पोलिंग बूथ पर कई चीज़ों का मतलब बिल्कुल साफ़
जैसे साम्प्रदायिकता माने कमल का फूल
और साम्प्रदायिकता-विरोध यानी संघी कैडेटों को फर्जी वोट डालने से रोकना
भाजपा का प्रत्याशी
सभी चुनाव कर्मचारियों
और दूसरी पार्टी के पोलिंग एजेंटों को भी, मान लीजिये कि आर्थिक विकास के तौर पर एक समृद्ध
नाश्ता कराता है
इस तरह बूथ का पूरा परिवेश आगामी अन्याय के प्रति भी कृतज्ञ
ऐसे में, प्रतिबद्धता के मायने हैं नाश्ता लेने से मना करना

हालाँकि कुछ खब्ती प्रतिबद्ध चुनाव पहले की सरगर्मी में
घर-घर पर्चियां बांटते हुए हाथ में वोटर लिस्ट लिए
संभावित फर्जी वोट तोड़ते हुए भी देखे जाते हैं
एक परफेक्ट होमवर्क करके आए हुए पहरुए
संदिग्ध नामों पर वोट डालने आए हुओं पर शक करते हैं

संसार के हर कोने में इन निर्भीकों की जान को खतरा है
इनसे चिढ़ते हैं दूसरी पार्टियों के लोग
अंततः अपनी पार्टी वाले भी इनसे चिढ़ने लगते हैं
ये पिछले कई चुनावों से यही काम कर रहे होते हैं
और आगामी चुनावों तक करते रहते हैं
ऐसे सभी प्रतिबद्ध बूढ़े होते हुए हैं
और इनका आने वाला वक्त खासा मुश्किल है

अब साम्प्रदायिक बीस-बीस के जत्थों में बूथ पर पहुँचने लगे हैं
और खुलेआम सैफुनिया सईदा फुन्नन मियाँ जुम्मन शेख अमीना और हामिद के नाम पर वोट डालते हैं
इन्हें मना करना कठिन समझाना असंभव रोकने पर पिटना तय

इनके चलने पर हमेशा धूल उड़ती है
ये हमेशा जवान होते हैं कुचलते हुए आते हैं
गालियाँ वाक्य विन्यास तय करती हैं चेहरे पर विजय की विकृति
सृष्टि में कहीं भी इनके होने के एहसास से प्रत्येक को डर लगता है

एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के अंतराल में
आजकल
फिर भी कुछ लोग इनसे लड़ने की तरकीबें सोच रहे हैं
****

बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं
( प्रणय कृष्ण के लिए )

जगह का बयान उसी जगह तक पहुँचता है। वहीं रहने वाले समझ पाते हैं बयान उस जगह का जो उनकी अपनी जगह है।

अपनी जगह का बयान अपनी जगह तक पहुँचता है।

एक आदमी सुंदर आधुनिक विन्यास में एक खाली जगह में चकवड़ के पौधे उगा देता है तो रंगबिरंगी तितलियाँ उस जगह आने लगती हैं और उस आदमी को पहचान कर उसके कन्धों और सर पर इस तरह छा जाती हैं जैसे ऐसा हो ही न सकता हो। ऐसा नहीं हो सकता यह जगह के बाहर के लिए है और ऐसा हो सकता है यह जगह के लिए।

तितलियों के लिए तो ऐसा हो ही रहा है।

किस्सों-कहानियों में ख़तरनाक जानवर की तरह आने वाले एक जानवर के बारे में जगह के लोगों की राय है कि वह उतना ख़तरनाक नहीं है जितना बताया जाता है। जबकि जगह के बाहर वह उतना ही ख़तरनाक है जितना बताया जाता है।

जगह के भीतर का यह अतिपरिचित दृश्य है कि गर्मियों की शाम एक बंधी पर सौ साँप पानी पीने आते हैं। जगह में जब साँप पानी पी रहे होते हैं तो जगह के बाहर से देखने पर लगता है कि बंधी से सटाकर सौ डंडे रखे हुए हैं। जगह एक ऐसी जगह है जहाँ साँप को प्यास लगती है। जगह के बाहर न जाने क्या है कि साँप को प्यास नहीं लगती और वह डंडा हो जाता है। जगह के बाहर लोग डंडे जैसी दूसरी-तीसरी चीज़ों को सांप समझ कर डरते रहते हैं।

जगह के बाहर एक आदमी के कई हिजड़े दोस्त हैं। वे उससे पैसा नहीं मांगते, उसे तंग नहीं करते, उसे हिजड़ा भी नहीं मानते, फिर भी उसके दोस्त हैं। वे उससे कभी-कभी मिलते हैं लेकिन जब मिलते हैं दोस्त की तरह। जगह में लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, मुलाकात न हो पाने पर एक-दूसरे को याद करते हैं और एक-दूसरे के दोस्त होते हैं। जगह के बाहर मुलाकातें नहीं हो सकतीं। न दोस्त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है।
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8 comments:

श्यामल सुमन said...

सही लड़ाई बूथ पर खूब कहा श्रीमान।
सफल तभी जो रोक दें सब फरजी मतदान।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com:

डॉ .अनुराग said...

कविता से अधिक प्रभावित गध ने किया .....
'बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं" अपने आप में एक महाकाव्य है..हर सदी में जीवित रहने वाला

रागिनी said...

बूथ पर लड़ना बहुत अच्छी कविता है!
http://raginisinghrathaur.blogspot.com/

pankaj said...

vyomesh ki nayi kavita bahut achchhi hai.globalisation ke daur & shor-sharaabe mein ek kavi hi hai, jo jagah ki ahamiyat ko pahchaan paane ki hi nahin, balki use visualise kar paane ki antardrishti se sampanna hai.
aap donon ko badhaayi & shukriya !

-----pankaj chaturvedi
kanpur

शिरीष कुमार मौर्य said...

बूथ पर लड़ना को जितना पढ़ो वह उतना खुलती और अपनी होती जाती है! यह व्योमेश का काव्यसामर्थ्य ही है - उसे मेरा सलाम !

भारत भूषण तिवारी said...

मैं सोच रहा हूँ क्या 'बूथ पर लड़ना' कविता को लोकतंत्र की सबसे छोटी (और संभवतः सबसे हिंसक इकाई) पर देखे जाने वाले सबवर्ज़न का 'सबवर्ज़न' कहा जा सकता है? जो भी हो, प्रतिबद्धों के खब्तीपन को सलाम.

prabhatranjan said...

vyomesh ji ki donon kavitaon men jis tarah ka narrative hai wah prabhavit karta hai. booth par larna kitni chhoti kavita hai aur kitne sharp dhang se loktantra ki vidruptaon ko to dikhati hi hai lekin uske prati aastha bhi jagaati hai. bahut achhi kavita hai.

tanmay said...

comment karna bhi dussahas hi hai mera ...dono hi kavitayein bahut achchi hai subhakamnayein