Friday, April 10, 2009

बही - खाता : ६ : प्रभात रंजन


ऐसा
लिख सकूं जो पढ़नेवालों को अपना-अपना सा लगे


लफ़्जों
में बोलता है रगे-अस्र का लहू
लिखता है दस्ते-गैब कोई इस किताब में


लिखने के बाद जब अपनी रचना को पढ़ता हूं तो कई बार नासिर काज़मी के इस शेर की तरह मुझे खुद ऐसा लगता है जैसे मैं किसी और की कहानी पढ़ रहा हूं। बार-बार अपनी कहानियों के माध्यम से मैं वास्तव में अपने आपको, अपनी पहचान को कोई रूपाकार देने की कोशिश करता हूं, मगर पाता हूं कि हर बार वह कुछ और, कुछ और ही हो जाती है। हमारे दौर का शायद यही यथार्थ है... सब कुछ गड्डमड्ड...

मेरी कहानियों में कस्बे का जीवन विस्तृत रूप में आया है, मगर वास्तविकता यह है कि मैं ज्यादातर उस कस्बे ( सीतामढ़ी) से दूर ही रहता आया हूं जहां का लोकेल अक्सर मेरी कहानियों में आ जाता है। पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी के कारण अपनी जन्मभूमि में मैं रह नहीं पाया। मैं यह जानता हूं कि इसके अलावा मेरी और कोई पहचान नहीं हो सकती कि मैं सीतामढ़ी का रहनेवाला हूँ, मैं उसकी पहचान से अपने आपको ठीक से जोड़ नहीं पाता। लेकिन मेरे कथा-पात्रों की पहचान अक्सर उस कस्बे से जुड़ जाती है। मुझे भले अपने कस्बे के जीवन का विस्तृत अनुभव न हो, मेरे पात्रों में उस कस्बे के जीवनानुभव भरपूर हैं।

अपनी स्मृतियों में बसी (जन्म) भूमि को मैं अपने लेखन में साकार करने की कोशिश करता हूं।

बाद में रोजी-रोटी के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग स्तरों पर काम करने के अवसर मिले। संपादन, पत्रकारिता, अनुवाद, पटकथा-लेखन से लेकर प्रूफ-पठन तक अनेक स्तरों पर, अनेक रूपों में काम किया। इसका और कोई लाभ हुआ हो या न हुआ हो कथाकार के तौर पर लाभ जरूर हुआ। इससे मेरा अपना अनुभव-संसार समृद्ध हुआ, जटिल होते जाते समाज के अलग-अलग स्तरों की समझ विकसित हुई। मेरे जीवन के यही अनुभव मेरी कथाभूमि हैं। कभी कोई बात याद आ जाती है, कभी कोई सूत्र ध्यान आ जाता है और मेरी कहानी शुरू हो जाती है। जब भी किसी कहानी की शुरुआत करता हूं तो अक्सर मुझे खुद नहीं पता होता कि आगे यह कहानी किस रूप में सामने आएगी। सब कुछ धुंधला-धुंधला सा होता है।

जिन दिनों हवाओं में इंडिया शाइनिंग के नारे की गूंज थी, मुझे एक दिन ध्यान आया कि करीब 20 साल पहले मेरे गांव में एक पुल का शिलान्यास हुआ था-कहानी की शुरुआत यहीं से हुई, जो बाद में जानकीपुल के रूप में सामने आई।

कभी लेखक बनने के बारे में सोचा नहीं था, लेकिन कहानियों के जादुई आकर्षण का अनुभव मुझे बचपन में ही हुआ था। बचपन की यादों में एक गांव में अपने दादाजी के किस्से सुनाने की है। सर्दियों की रात बाहर दरवाजे पर घूरे(अलाव) के ढेर के आगे वे कुर्सी पर बैठ जाते थे। चारों ओर खेत-खलिहानों में काम करने वाले जन-मजदूर... और उनकी लंबी-लंबी कहानियों का दौर चलता। आग तापने के बहाने मैं भी अक्सर वहां बैठता था। आजादी के पहले के दौर की अनेक ऐसी कहानियां मुझे आज भी याद हैं जो स्थानीय परंपरा के उन नायकों की होती थीं जिनका इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं आता, लेकिन अंग्रेजों से मोर्चा लेने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।

सेठ हरसुखलाल, जिन्होंने अंग्रेजी राज के खिलाफ छंद लिखने वालों के लिए ईनाम मुकर्रर कर रखा था। बखरी मठ के महंथ की रखैल सोना कहारिन, जिसने पांच हजार के इनामी क्रांतिकारी भोगेन्द्र पाठक को महीनों अपने घर में पनाह दी थी। ऐसे न जाने कितने किस्से वे सुनाते थे जिनके आकर्षण में रात होते ही घूरे के पास लोग आ जुटते थे। उनके मरने के बाद गांव के बड़े-बूढ़े कहते, उनकी कहानियों में नशा होता था। कुछ तो भांग की पिनक होती थी कुछ बयान की रवानी। जब कहानी लिखना शुरू किया तो मैंने पाया कि उसी तरह रोचक शैली में मैं लिखने की कोशिश करता हूं जिस अंदाज में मेरे दादा कहानियां सुनाया करते थे।

दिल्ली आने के बाद लेखक मनोहर श्याम जोशीजी के संपर्क में आया। उन दिनों टेलिविजन धारावाहिकों के लेखक के रूप में उनकी धूम थी। मैं भी फिल्मी लेखन के गुर सीखने की आस में उनके यहां जाने लगा, लेकिन आज अगर इल्मी लेखक के रूप में मेरी थोड़ी बहुत पहचान बनी है तो इसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है। उनसे मैंने सीखा कि बहुत रोचक और पठनीय अंदाज में भी ज़बर्दस्त साहित्यिक रचनाएं लिखी जा सकती हैं।

अपने दादाजी की कहानियों से अगर मुझे कथा-लेखन की आरंभिक प्रेरणा मिली तो जोशीजी के प्रोत्साहन ने मुझे लेखक बनाया। वे परफेक्षनिस्ट थे। अपनी कोई रचना तभी प्रकाशन के लिए देते थे जब वे उसके बेहतर होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते थे। आरंभ में मैं कोई कहानी लिखकर उनको दिखाता तो वे उसे पढ़ते और अगर अच्छी नहीं लगती तो वहीं फाड़कर डस्टबिन में फेंक देते थे। उनसे मैंने सीखा कि अपने लेखन को लेकर निर्मम होना चाहिए, लेखक के रूप में ग्रो करने के लिए यह बहुत आवश्यक होता है।

प्रसिद्ध लेखक मार्खेज ने लिखा है कि वे इसलिए लिखते है कि उनको पढ़कर अधिक से अधिक लोग उनको प्यार करें। हिन्दी के लेखक को और कुछ तो मिलता नहीं है, मेरी रचनाओं को कुछ पाठकों का प्यार मिल सके यही मेरी कोशिश होती है। मैं बार-बार कोशिश करता हूं कि कुछ ऐसा लिख सकूं जो पढ़नेवालों को अपना-अपना सा लगे। अपने लेखन की सार्थकता मैं इसी में मानता हूं। आखिर में कतील शिफाई का यह शेर--

यूँ ही नहीं मैं कहता रहता ग़ज़लें, गीतें, नज़्म कतील,
यह तो उनकी महफिल तक जाने का एक वसीला है।

****
( प्रभात से सबद के पाठक उनके स्तम्भ 'अनकहा-कुछ' से पूर्व-परिचित हैं। वे हिन्दी के महत्वपूर्ण युवा कहानीकार हैं। 'जानकीपुल' नाम से उनका कहानी-संग्रह ज्ञानपीठ से आया है। इस स्तम्भ के लिए उन्होंने विशेष आग्रह पर लिखा है। उनका आभार। वे शीघ्र ही सबद पर अपना स्तम्भ भी नियमित लिखेंगे। )

7 comments:

Tushar Dhawal Singh said...

प्रभात रंजन की कहानियो में प्लाट से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके पात्र होते हैं. वे पात्र जो शायद आपसे किसी पान की दुकान पर मिले थे या फिर किसी नुक्कड़ पर ताश खेलते रहते थे, शादी ब्याह के मौकों पर जिनकी सनक - पिनक आपकी ताज़ा स्मृतियों का हिस्सा हो गए हैं. फिर चाहे वह कोचिंग सेंटर में पढाने वाला कोई अलक्षित आशिक हो या छत पर किसी की राह देखती कोई हिरोइन के अवतार में कोई मध्य वर्गीय अर्ध शिक्षित तरुणी. एकाएक सब आपके रोम छिद्रों से आँखों के आगे उग आते है और आपके सन्नाटों में आपसे कानाफूसी करते हैं. यही बात, मेरी समझ में , कहानी की जान होती है. दूसरी बात, जिसका मैं किसी भी साहित्यिक कृति में कायल होता हूँ, वह यह कि रचना में सादगी कितनी है. कहीं रचनाकार जाने अनजाने अपने ज्ञान या अपनी सृजनशीलता के दंभ में तो नहीं घिर गया, कहीं रचना उसके 'गहरे' 'गूढ़' सत्यान्वेषणों में दब तो नहीं गयी. साहित्य का महत्त्व अपने पाठकों के सन्दर्भ में भी आँका जाना चाहिए. रचनाकार अपने सत्य को, उसकी अनुभूति और विवेक को अपने पाठकों तक सहजता से संप्रेषित कर पता है या नहीं, यह मेरी राय में बहुत ज़रूरी है. कथा का शिल्प, उसका विन्यास, अंदाज़-ए- बयां, ये सारे गुण उसके बाद आते हैं.
प्रभात की कहानियो की सहजता और सरलता मुझे बहुत प्रभावित करती है. एक रचनाकार का आत्म संघर्ष, उसकी अपने जड़ को सूंघने की तड़प इस आलेख में खुल कर आई है. बधाई.

रंजना said...

आलेख मन की मिट्टी में पानी की बौछार सा गिर उसे सोंधा कर गया...मेरा दुर्भाग्य है की आज तक प्रभात जी की कोई रचना पढने का अवसर नहीं मिला है...
कृपया यदि वस्तृत ब्यौरा दे दें इसे खरीदकर पढने में सफल हो पाऊँगी....इसके लिए आपकी आभारी रहूंगी..

शिरीष कुमार मौर्य said...

प्रभात जी आपकी कहानियाँ लगातार अच्छी लगती रही हैं ! तुषार के कविता संग्रह में भी आपका ज़िक्र पढ़ा है. इस बही- खाते में भी काफ़ी कुछ सोचने महसूसने को है. जैसे यह कि आपके जैसा एक लोकेल हम सबके पास है -

वह कहानियों में आता है ! वह कविताओं में आता है ! वही कहीं न कहीं हमारे लेखक को जागता है !

शुभकामनाएँ !

Geet Chaturvedi said...

प्रभात जी कहानियों की तरह सरल, आत्‍मीय और गहरी. बिना किसी शोर-शराबे के. लेखक के क़रीब पहुंचाते हुए.

रागिनी said...

प्रभातरंजन जी का कहानी संग्रह खरीदा है. अच्छा लगा. बधाई !

vyomesh said...

प्रभात की कहानियों की सहजता अपने पाठक को यथार्थ के कठिनतर-व्यापकतर सूत्रों से उलझा देने का बेहद अहम् काम करती हुई आती है - और जैसा गीत कहते हैं, " बिना किसी शोर-शराबे के " आती है. वह एक सारवान और जनप्रिय विन्यास से प्यार करते, और ज़्यादा उसकी ओर जाते लेखक हैं.

pankaj said...

prabhat ranjan ka yah aalekh bahut saaf-suthara, samvedanaksham, sundar, aatmiya & arthagarbh hai. iske alaawa yah kaafi revealing & enlightening bhi hai, unki kahaaniyon ki hi maanind ! yahi wajah hai ki mere jaise unke samkaaleenon ke liye ismein seekhane-jaanne ko moolyavaan bahut-kuchh hai.
bahut qhushi & taazagi jagaane vaale is aalekh ke liye prabhat ji ko abhivaadan & anurag ji ka shukriya !
---pankaj chaturvedi
kanpur