Friday, April 03, 2009

जो दृश्य में नहीं...


( एक अच्छे कवि की तरह व्योमेश शुक्ल भी अपनी कविता की बनाई हुई लीक पर चलने, उसे पीटने और उससे ''अभी कुछ और'' वसूलने का मोह छोड़, उसे बहुत सार्थक ढंग से तोड़ रहे हैं। यह प्रौढ़ता उनकी कविता में बहुत कुछ अप्रत्याशित की समाई के लिए जगह बनाती है। बल्कि यह ज़्यादा सही कहना होगा कि ''अप्रत्याशित'' ( उसके महज चौंकानेवाले अर्थों में नहीं, हालाँकि वह भी ) उनके यहाँ एक काव्य-मूल्य की तरह उपस्थित है। दृश्य, जो पहले इस तरह नहीं दिखे थे, को उनकी कविता की केंद्रीय शक्ति कहा जा सकता है। दिलचस्प यह है कि कविता और वैचारिक गद्य के लिए वह लगभग एक जैसी भाषा का इस्तेमाल करते दिखते हैं और उसके प्रति कैसी बहुमुखी सजगता बरतते हैं, उसका जीता-जागता प्रमाण है यह कविता। सबद के लिए यह गौरव की बात है कि उसे इस युवा कवि की एक और महत्वपूर्ण कविता को पहलेपहल प्रकाशित करने का अवसर मिला, वह भी बतौर १०० वां पोस्ट सबद अपने तमाम लेखकों-पाठकों और प्रेरणाओं के आगे नतशिर है। )


वक़्त का कि साइकिल का पहिया

कविता की भाषा क्या हो ? क्या यह तय करने की ज़रूरत है ? क्या यह तय करना उचित या नैतिक है ? या क्या इस तरह, कविता के बाहर उसे तय किया जा सकता है ? कविता की भाषा और दूसरी भाषाओं में क्या फ़र्क़ होते हैं ? फ़र्क़ होते भी हैं या नहीं ? अगर होते ही हैं तो इन दो फ़र्क़ भाषाओं के आपसी रिश्ते क्या होते हैं ? ऐसे सवालों के जवाब जानने के लिए ज़रूरी है कि हम जानें कि फ़िलहाल कविता की भाषा क्या है ? क्या वह कोई एक ही भाषा है ? या अनेक भाषाएँ हैं जिन्हें हम एक ही मानते रहते हैं ? क्या कविता की भाषा का वर्गीकरण संभव नहीं रह गया है ? और ऐसे वर्गीकरणों से साबित क्या होता है ? हिंदी साहित्य संसार का हाल यह है कि यहाँ कुछ कवियों को अभिधा, कुछ को लक्षणा और कुछ को व्यंजना का कवि माना जाता है, ख़ैर।

यही सब सोच-सोच कर ज़िन्दगी बीत रही थी कि एक दिन उसकी बेटी की साइकिल का पहिया बीच रास्ते में टेढा़ हो गया। धीमी सड़क पर औसत गति से चलती हुई दसवीं कक्षा में पढ़ रही बेटी की साइकिल पर पीछे से रिक्शे ने धक्का मार दिया था। शुक्र है कि बेटी को ज़्यादा चोट नहीं लगी। लेकिन दिक़्क़त यहीं से शुरू होती है। बेटी की साइकिल का पहिया पिता की कविता की भाषा में वक़्त के पहिये की तरह आता था और कवि-पिता की कविता में वह पहिया बेटी की साइकिल का पहिया टेढा़ होने के बहुत पहले से ही असाध्य रूप से टेढा़, विकृत और बेडौल वगैरह हो चुका था। आज जब भीड़ भरी सड़क पर हुई दुर्घटना में वाकई उसकी बेटी की साइकिल का पहिया टेढा़ हुआ है तो कवि-पिता को यह बात पता ही नहीं है और वह अपने थके हुए शरीर और टेढे पहिये वाली चेतना के साथ नौकरी कर रहा है। इधर लड़की के पास फ़ोन करने के पैसे भी नहीं हैं। वह अपनी टेढे पहिये वाली साइकिल को घसीटती हुई टेली़फो़न बूथ पहुँची। टेलीफो़न बूथ के मालिक ने उससे कहा कि तुम अपनी साइकिल में ताला लगाकर चाबी मुझे दे दो और साइकिल को घसीटती हुई या रिक्शे पर लादकर घर लेती जाओ। जब दो रुपये लेकर आओगी तो चाबी वापस कर दूंगा। बेटी अपनी बंद साइकिल के पिछले टेढे और तालाबंद पहिये को हाथों के ज़ोर से उठाये हुए और अगले पहिये को ज़मीन पर चलाती हुई दूर अपने घर की ओर जा रही है। यह एक अजीब दृश्य है। एक किशोरी का तालाबंद और टेढे पहिये वाली साइकिल को घसीटते हुए जाना। कवि जी ! आपकी बेटी की साइकिल का पहिया, यानी आपकी कविता में आने वाला वक़्त का पहिया टेढा़ हो गया है और आपको यह सब मालूम ही नहीं, हद है, दूर दफ़्तर में बैठे फाइलों में सर खपा रहे हैं। अगर आपको जल्द-से-जल्द यह सब न पता चला तो इस घटना के प्रतीकार्थों का क्या होगा ?

इतने में ही टेढे पहिये वाली तालाबंद साइकिल को घसीटती हुई घर की ओर जा रही बेटी के सामने एक बलिष्ठ आदमी आकर खडा हो जाता है। कवि जी ! अपनी टेढे पहिये वाली चेतना में इस आदमी को दाखिल कीजिये। वहाँ इसकी बहुत ज़रूरत है। यहाँ तो वह आपकी बेटी से पूछ रहा है कि ''क्या हुआ ? साइकिल लेकर कहाँ जा रही हो ?'' बेटी संक्षेप में सारी घटना बताती है। बलिष्ठ आदमी उसे दो रुपये देकर टेलीफो़न बूथ वाले से चाबी ले आने को कहता है। पहले तो बेटी रुपये लेने से इनकार कर देती है, फिर अत्यंत झिझक के साथ ले लेती है और साइकिल बलिष्ठ आदमी को पकड़ाकर टेलीफो़न बूथ वाले आदमी को दो रुपये चुकाने चली जाती है। कवि जी ! ध्यान दीजिये ! आपकी कविता को इस दृश्य की ज़रूरत है। लेकिन इतनी देर में बलिष्ठ आदमी साइकिल को ज़मीन पर लिटा देता है और टेढे पहिये को एक पैर और एक हाथ से दम लगाकर सीधा कर देता है। बेटी भी तब तक चाबी लेकर आ गयी है।

अब सीधे पहियों वाली साइकिल पर बेटी लहराती हुई घर जा रही है।

आप जानते हैं कवि जी ने अगले दिन क्या किया ? कवि जी अगले दिन बेटी को स्कूटर पर बिठाकर दुर्घटनास्थल पहुँचे और बलिष्ठ आदमी को ढूँढकर उसे साइकिल का पहिया, जो उनकी चेतना में वक़्त का पहिया था, सीधा करने के बदले मुस्कराकर कुछ रुपये देने की कोशिश करने लगे। बलिष्ठ आदमी ने बिना मुस्कराए रुपये नहीं लिए।

फ़िलहाल कवि जी ने वक़्त पर कविताएँ लिखना बंद करके साइकिल पर कविताएँ लिखना शुरू कर दिया है और बलिष्ठ आदमी अपने रोज़मर्रा के काम तो कर ही रहा है, ज़रूरत पड़ने पर सड़क पर लोगों की साइकिल का टेढा पहिया भी सीधा कर दे रहा है।
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24 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

अप्रत्याशित ही है !
पूरी कविता ही अप्रत्याशित है !
तुम्हें 100 वीं पोस्ट बधाई अनुराग और व्योमेश को नयी कविता की !
और हाँ .........वो क्या शीर्षक हैं -
..........और साइकिल !

giriraj kiradoo said...

व्योमेश की सबद पर प्रकाशित पिछली दोनों कवितायेँ पढ़कर कुछ चिंता हुई कुछ निराशा हुई - विद्या सिन्हा वाली कविता लगभग इस तरह घटित होती है कि एक खबर को कविता में किसी तरह एकोमोडेट, एप्रोप्रियेट करने की कल्पना की हिंसा (सबवर्ज़न) हो जाती है. किन्तु वह कविता मेरे लिए कम चिंताजनक थी - युवा ही क्यों अधिकांश समकालीन कविता में यह फोर्स्ड काव्यान्तरण एक बहुत आमफहम घटना है. लेकिन यह कविता अधिक चिंताजनक है क्योंकि यहाँ कविता मूलतः उस पोलेमिक्स बल्कि पॉलिटिक्स को काउंटर करने के लिये, उसके प्रति-शोध के लिये आयत की गयी है जो उनको लेकर हिंदी में हो रही है - पहला पैराग्राफ जहाँ सीधे सीधे यही करता है, वहीँ पूरी कविता ही जाहिर/कम जाहिर ढंग से - पर यह भी स्वाभाविक है कि एक कम-अनुभवी युवा कवि ऐसी प्रतिक्रिया करे. जो चिंताजनक है वो यह कि यह कविता यथार्थ को एक बहुत सरल भावुक फेबल में रिड्यूस करती है - उस सरल फार्मूले की तरह जो साईकिल और वक्त के पहिये को समानाधिकरण में रखता है - हर वो रचना - आलोचना जो दूसरों का कैरीकेचर करके अपने पक्ष में एक भावुक कथा/अनुभव/गल्प/झूठ/फेबल करती है उससे खुद अपनी और उस कविजी की आत्मा की एम.आर.आई. भी मांगी जा सकती है जो खुद 'इस 'आख्यान' को लिखने वाला है.

यह एक उदास करने वाला वातावरण है जिसमें एक निश्चित रूप से प्रतिभाशाली कवि के साथ हम - समर्थक और विरोधी दोनों- ठीक आलोचकीय सम्बन्ध नहीं बना पा रहे (वैसे यह हमने किसके साथ बनाया - हिंदी में ठीक, उचित मूल्यांकन न होने की शिकायत किसके बारे में, मुक्तिबोध समेत, नहीं की गयी है?) उनकी कविता के प्रसंशक बिना उनकी कविता पर बात किये उन्हें बहुत महत्वपूर्ण आदि घोषित करते हैं (जो विश्लेषणात्मक प्रमाण के अभाव में कुछ लोगों को अतिरंजित प्रचार और कुछ को संगठन का प्रश्रय लग रह रहा है) उनकी कविता के विरोधी बिना प्रमाण के उन्हें मौलिक तो क्या कवि ही नहीं मानते. दोनों में ही कवि से अधिक नहीं तो उसके बराबर तारीफ या निंदा उनके व्यक्ति की है. विश्लेषण के अभाव में सब कुछ निरे विशेषणों या उद्घोषनाओं में घट गया है - शायद यह उस 'आक्रामक' 'ऑफेंसिव' आलोचना की भी एक कीमत है जिसमें अपने लिखे २-३ लेखों में व्योमेश ने ऐसे सामान्यीकरण किये हैं - "हिंदी में धंधे चल रहे हैं"; "प्रेम मृत्यु आदि के सरलीकरण की दुकानें खुली हुई हैं' - और यहाँ भी ऐसे सामान्यीकरणों को एक आमफहम दुर्घटना मानकर शायद इग्नोर किया जा सकता है लेकिन प्रमाण के अभाव में बहुत सीरियस बयान देना जैसे कि देवी प्रसाद मिश्र की कविता छंद और अछंद और ऐसे कई युग्मों के भेद को 'निरर्थक' कर देती है - यह एक बहुत बड़ा काम्य है साहित्य का लेकिन इसे सिद्ध करना अत्यंत कठिन कविता और आलोचना दोनों के लिये.
सबसे विचित्र है यह जल्दबाजी जो लगभग पचास कविता पुराने इस कवि के विषय में इसके कुछ प्रशंसकों में दिखाई दे रही है - हो सकता है यह प्रशंसा किसी अन्य रणनीति का हिस्सा हो पर कवि और कविता पर उसका क्या प्रभाव है, यह इन दो कविताओं से प्रकट है – एक अच्छे कवि को हम दूसरों जैसा कवि बना देने की दिशा में हैं.
व्योमेश-प्रसंग में और अन्यथा भी जो कीचड़युद्ध हिंदी में एक अर्से जारी है वो हिंदी प्रगतिशील आलोचना को संदेहास्पद बना रहा है (यह सब प्रगतिशीलों के बीच ही हो रहा है) – महान सामाजिक उद्देश्यों और कारवाईयों का पोस्टर जब खुद ही फाड़ डाल रहे हैं यह बाँकुरे तो क्या प्रगतिशील आलोचना यह निर्मम सच स्वीकार कर सकती है कि उसका मुख्य काम कैननाइज़ेशन और साहित्यिक सत्ता के संतुलन हैं, कुछ लेखकों और आलोचकों को महत्त्वपूर्ण सिद्ध करना भर है? बाकी सब विंडो ड्रेसिंग है?

anurag vats said...

आदरणीय गिरिराज जी,

सिर्फ कुछ बातें संक्षेप में...पहली तो यह कि मुझे नहीं पता कि आपने कवि व्योमेश शुक्ल पर लिखा विष्णु खरे का लम्बा निबंध देखा है या नहीं...यही बात मैं मंगलेशजी द्वारा उन पर लिखे लेख के सन्दर्भ में भी कह सकता हूँ...पंकज चतुर्वेदी ने भी उन पर लिखा है...और इन सब ने पर्याप्त आलोचनात्मक समझ से लिखा है...विशेषण नहीं गहन विश्लेष्णात्मक दृष्टिकोण से...मैं जब तब व्योमेश के बारे में कुछ उत्साहजनक बोलता रहा हूँ...हालाँकि इसके पीछे भी कविता की मेरी अच्छी-बुरी समझ ही सक्रिय है...यह और बात है कि पचासेक कविता पुराने इसी महत्वपूर्ण कवि के बारे में अपनी चिंता प्रकट करते हुए आप इन तमाम आलोचनात्मक उद्यम की अवज्ञा कर गए...बहरहाल...व्योमेश इस वसुंधरा के आखिरी विलक्षण कवि नहीं हैं...यह मेरी तरह आप भी मानते होंगे...आपने जिस नुक्ते से उनका लेखन पढ़ा है, उसमें मेरी दिलचस्पी है...हाँ, प्रगतिशीलों के शील पर मैं आपकी तरह बौखलाहट में कुछ नहीं कहना चाह्ता, क्योंकि मैं व्योमेश की कविता या गद्य तक उस रास्ते नहीं पहुंचा...और हालाँकि यह सायानी समझ अब किसमें नहीं कि स्वयं प्रगतिशीलों ने प्रगतिशीलता का कितना नुकसान पहुँचाया, इससे सीख लेना हम नई पीढी के लेखकों को ही है...आप में सीखने की तत्परता हम सबसे ज्यादा है...और इस सिखावन के कुछ अनिवार्य नुकसान भी हैं...जिससे ज़ाहिर है आप भी नहीं बचे हैं...फिर भी मैं आपकी बेबाकी का कायल हूँ जिसने मुझे अपने ही ब्लॉग पर पलटकर लिखने को बाध्य कर दिया...

Dhiresh said...

Shatakveer.

pankaj said...

kiradoo ji sab-kuchh ke baavujood vyomesh ko achchha kavi maan rahe hain. shirish ji bhi anurag ji ke 'apratyaashit' visheshan ka anumodan kar rahe hain. meri samajh mein nahin aa raha ki asahmati kis baat par hai ? sabse zyaada pyaar to vyomesh ko kiradoo karte hain, kyonki unki chinta yah hai ki kathit pragatisheel aalochana se vyomesh ka koi nuqsaan na ho jaaye. haan, ek common baat zaroor hai ki pragatisheelta se saawdhaan ho jaaiye ! to saawdhaan ho jaaiye dosto ! shaayad isi ran-neeti se aapki koi nayi shuruaat ho !
-----pankaj chaturvedi
kanpur

dhiresh said...

yun to Majaz ke liye bol diya tha kisi ne ki use pragatisheel bhediye utha le gaye....
Kiradu ji rah bata deejiye

giriraj kiradoo said...

प्रिय अनुराग,

मेरी टिप्पणी के कहन से ही यह संकेतित हो सकना चाहिए था कि वह विष्णुजी या मंगलेशजी के पठन को नहीं(इनमें से विष्णुजी का मैंने पढ़ा है), व्योमेश शुक्ल की कविता के सब प्रशंसकों को नहीं (उम्मीद है टिप्पणी से यह तो संकेतित हो ही गया कि मैं उनमें से हूँ) उनके 'कुछ' प्रशंसकों और उनके विरोधियों को (उनकी प्रशंसा में जिन दो मजमूनों का ज़िक्र हुआ उनके जैसे मज़मून उनके विरोध में नहीं हैं - क्योंकि वे मूलतः कविता के पठन ही नहीं हैं) संबोधित थी. आपकी टिप्पणी से लगा यह संकेत नहीं हुआ इसलिए अब मैं ज्यादा स्पेसिफिक हो कर बात करता हूँ. जिन प्रशंसकों को यह संबोधित थी उनमें पंकज चतुर्वेदी का निबंध, और जैसा आपने ठीक ही पकडा आपकी संपादकीय पूर्व-टिप्पणियां या शिरीष भाई की ऐसी ही एक-आध टिप्पणी थीं हालाँकि बाद में शिरीष का स्वर अधिक संयत रहा है व्योमेश को प्रस्तुत करते हुए. शेष चूंकि आपने मेरे पठन पर टिप्पणी नहीं की है सिवाय इसके कि उसमें आपकी दिलचस्पी है, मैं दूसरे सिरे पर आता हूँ.

यह सयानी समझ जैसा आपने उसे कहा है अब कुछ सक्रिय तो लग रही है लेकिन प्रगतिशीलों के शील (उसमें मेरी दिलचस्पी नहीं श्लेष में) के बारे में जो कुछ कहा है वह बौखलाहट में नहीं, धूमिलीय बौखलाहट में भी नहीं कहा है. मुझे उनसे बौखलाहट क्यों हो? यदि आप मेरे कर्म को - लेखन, संपादन आदि को - ध्यान में रखें तो इसकी कोई वज़ह नज़र नहीं आएगी, ऐसा मेरा विश्वास है. बौखलाहट नहीं उदासी है - और वो यह कि प्रगतिशीलता/वामपंथ के सुविधाजनक अम्ब्रेला के नीचे तमाम तरह के लोग हैं जो सब अपने को प्रगतिशील कहते हैं और पिछले कुछ अरसे से वे एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप (जिनमें निजी टिप्पणियां और व्यक्तित्व-हनन भी शामिल है) कर रहे हैं और वो सब साहित्यालोचना के नाम पर हो रहा है. प्रगतिशीलता के नहीं प्रगतिशीलों के पराभव से बहुत कुछ सीखने की ज़रुरत है, दूसरों (गैर-प्रगतिशील तो इस सब में है ही कहाँ? उनको तो प्रगतिशीलता 'आलवेज़ , आलरेडी' पतित ही मानती है) के गौरव/पराभव से कहीं ज्यादा. शायद शीतयुद्धीय एक्स्लुजिवनेस से आगे सोचने की ज़रुरत है - साहित्य में प्रतिरोध के वामपंथ के साथ साथ और भी विकल्प हैं (जैसा रघुवीर सहाय एक तरह से अपनी कविता में करते हैं) और शिविरबद्ध एक्स्क्लुजिव्नेस की बजाय लोकतान्त्रिक संवाद और सहयोग से कुछ राह निकलेगी. मुश्किल काम है करियरिज्म, प्रतिष्ठानपरकता, असंतुलित व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आत्ममुग्धता और वर्चस्व-कामना से लड़ पाना वह कहीं भी हो प्रगतिशीलों में या उसके बाहर. आपकी टिप्पणी में और इस सिखावन के कुछ अनिवार्य नुकसान भी हैं को समझ नहीं पाया.

प्रिय पंकजजी,

प्रगतिशीलता से नहीं, सावधान होने की ज़रुरत जिससे है वह ऊपर लिख चुका. यह सहमति तो है ही कि वह एक अच्छा प्रतिभाशाली कवि है. आपके लेख के बारे में मेरी राय आपके समूचे लेखन के बारे में नहीं है. उम्मीद है हम इस लेख पर बहस करेंगे शीघ्र ही रूबरू.

Geet Chaturvedi said...

किसी भी कविता के बारे में यह कहना कि उसमें यह होता, तो बेहतर होता और यह न होता, तो और बेहतर होता.. मुझे कविता और कवि के साथ अन्‍याय ही लगता है. फिर भी ऑब्‍ज़र्वेशन नुमा एक पाठकीय राय हर कविता को लेकर बनती है और चर्चा के लिए उसे ज़ाहिर करना कई बार ज़रूरी भी हो जाता है. 'कोई बनाम कोई' में न जाते हुए कविता पर अपनी बात ऐसे कहना चाहूंगा कि कविता में पहला और आखि़री पैराग्राफ़ पूरी कविता के प्रभाव को संकुचित कर देता है, उस एक ग़ैर-ज़रूरी जनरलाइजे़शन की तरफ़ ले जाता है, संभवत: जिसकी ओर गिरिराज ने इशारा किया है.

इन दोनों पैराग्राफ़ से कविता को एक पॉ‍लिमिकल वैल्‍यू मिलती है (ज़ाहिर है कि मिली भी है), लेकिन जब भी कविता पॉलिमिकल वैल्‍यूज़ की तरह असहज होकर जाती है, उसकी पोएटिक वैल्‍यूज़ फ़ोरग्राउंड से हट जाती हैं. जब हम कविता के भीतर कविताई की बात करते हैं, तो अजीब स्थिति बनती है, जिसमें कहीं न कहीं ख़ुद कविता, कविता को लेकर ही एक निर्णय देने की स्थिति में चली जाती है. कविता में निर्णय (मेरा तात्‍पर्य जस्टिस के आसपास है) होते हैं, लेकिन उस समय यह जस्टिस एक आवाज़ होती है, कोई विमर्श, डिस्‍कोर्स या प्रवचन नहीं होता. ठीक यही स्थिति है, जब जनरलाइज़ेशन की आशंका सबसे गहरी हो जाती है. हम यथार्थ की समस्‍यामूलकता से हट जाते हैं. जब हम पहले पैरा में ऐसी चिंताओं को ले आते है जिनसे कविता के भीतरी तत्‍त्‍व, जो कि अगले पैरा में खुलते हैं, बाधित होते हैं. बीच के पैरा में यह कविता व्‍यापक मनुष्‍यता से जुड़ती है, एक आइरनिकल स्थिति बनाती है, लेकिन दो चीज़ें उसे संकुचित भी कर देती हैं. और इससे एक नुक़सान यह होता है कि बात कविता पर नहीं हो पाती, वैसे पेरिफ़ेरल एलीमेंट्स पर ज़्यादा होने लगती है.

कविता में बलिष्‍ठ व्‍यक्ति अक्‍सर सत्‍ता के प्रतीक में आता है, लेकिन इस कविता में ऐसा नहीं है. भले कवि ने बलिष्‍ठ व्‍यक्ति को या बाक़ी सबको प्रतीकों की तरह इस्‍तेमाल न किया हो, लेकिन कविता में आने वाली हर चीज़ अंतत: एक प्रतीक बन जाती है, उसके कई तरह के पाठों से गुज़रने के बाद, (sign की थ्‍योरी के बाद), तो यहां आया हुआ बलिष्‍ठ आदमी कविता में पहली बार इस तरह आता है, इस तरह प्रतीक अपना अर्थ बदल लेता है, जैसे बल के कारख़ानों में खड़ा हुआ कमज़ोर शरीर वाला आदमी, जो कि दरअसल कमज़ोर नहीं है, लेकिन उसकी ताक़त को तमाम बेजा इस्‍तेमालों के बाद भी उपेक्षित किया जाता है, जो शरीर और मन के तमाम बल के बाद भी, बहुसंख्‍या में होने के बाद भी अल्‍पसंख्‍यकों की तरह पीडि़त, हाशियानिवासी है, और दुखांत यह है कि वह सिर्फ कवि की कविता से ही ग़ायब नहीं, राजनेताओं के घोषणापत्र उसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं, लेकिन वह वहां से भी ग़ायब है, सरकारी-अर्ध सरकारी-ग़ैर सरकारी बुद्धिजीवियों की योजनाओं-परियोजनाओं के आवरण पर उसका सिलुएट होने के बावजूद वह वहां से भी ग़ायब है, लेकिन जो पीसीओ वाला है, जो साइकल को गिरवी रखता है, जो दरअसल, दृश्‍य में कहीं न होते हुए भी प्रधान आर्थिक शक्ति की तरह आ जाता है. ले‍किन जब कवि ज़ोर देकर कहता है कि दृश्‍य में तो इस बलिष्‍ठ को होना चाहिए था, जो दरअसल, मनुष्‍यता की संचालन शक्‍ित है, जो पहिए को सीधा कर रहा है, जो कि पहिए के टेढ़ेपन का विरोध कर रहा है, जो कि हस्‍तक्षेप भी कर रहा है. यहां कविता विस्‍तार लेती है, और पाठक को यह छूट देती है कि वह अब इसके आगे की कविता, अगर कहीं है, तो वह ख़ुद बना ले. यह छूट हर अच्‍छी कविता अपने पाठक को देती है, क्‍योंकि, ज़ाहिर-सी बात है, व्हिटमैन के यहां से ही, पाठक कविता का सह-सृजक होता है.

मुझे ऐसा लगता है कि जब व्‍योमेश्‍ा इससे आगे बढ़ते हैं, और पाठक को स्‍टीयर करते हैं कि इसे सिर्फ़ यहीं तक न पढ़ा जाए, इससे आगे मैं यह बताना चाहता हूं कि इसे कविता में भी लाया जाए, तो यह संकुचन है. सिर्फ कविता की चिंता क्‍यों करते हैं, यह छोटी-सी स्थिति कविता से भी बहुत आगे तक जा सकती है, उसे जाने दिया जाए. लेकिन ऐसा नहीं होता. पहले पैरा में बनाई गई भूमिका से आखि़री पैरा को ऑर्गुमेंटाइज़ किया जाता है. मुझे नहीं लगता कि इससे हर बार कविता को कोई संरचनागत लाभ मिलता हो, पर हां, ब्लिंकर ज़रूर लग जाता है. कविता के भीतर यह सब कितना हो, यह हमेशा एक कवि के विवेक पर निर्भर होता है. उसे इसका अधिकार होना भी चाहिए. सो, अगर कवि इस जनरलाइज़ेशन को भी विवेक के साथ स्‍वीकार कर लेता है, तो उसे इसका अधिकार है.

(और एक फ़नी क्षेपक भी- कि जब रिम्‍बो ने सीयर होने की घोषणा की थी, तो कहा था कि एक कवि को दूसरे कवि को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. जो वक़्त पर लिखता हो, साइकिल पर या पहिए पर.) a smiley is badly needed here :-)

बाक़ी, यह बहस तो कभी ख़त्‍म न होगी. जितना चाहे, खींचा जा सकता है. जो कि कविता के पहले पैराग्राफ़ से शुरू होकर टिप्‍पणी के अंत तक दिखाई देगी.

giriraj kiradoo said...

गीत ने एक अच्छे टेक्स्चुअल रीडिंग की है पहले और आखिरी पैरा के बारे में और उनके मध्य से - जहाँ उनके मुताबिक "यह कविता व्‍यापक मनुष्‍यता से जुड़ती है, एक आइरनिकल स्थिति बनाती है, लेकिन दो चीज़ें उसे संकुचित भी कर देती हैं. और इससे एक नुक़सान यह होता है कि बात कविता पर नहीं हो पाती, वैसे पेरिफ़ेरल एलीमेंट्स पर ज़्यादा होने लगती है" - के संबंध पर लिखा है. मित्रों, मैं यह याद दिलाना चाहूँगा कि मेरी रीडिंग में चिंता का स्रोत जितना यह पहला पोलेमिकल पैरा है उतना ही वह मध्यप्रदेश भी है जिसमें "यथार्थ" को एक फेबल में रिड्यूस किया जाता है: कविजी का यथार्थ से कोई जीवंत सम्बन्ध नहीं है - वह एक रूपकात्मक सम्बन्ध है जो एक मृत रूपक (वक्त का पहिया) के अनुरूप ही 'मृत' है; भावुक अपील के लिए बच्ची है; और कविजी के यथार्थ बोध को शॉक देने के लिए एक विलक्षण बलिष्ठ है, पूरा ढांचा एक नीति कथा का है जिसके अंत में कविजी को 'सीख' भी मिल जाती है और अब वे वक्त के मृत रूपक की बजाय यथार्थ के एक सरल अनार्जित रूपक साइकल पर कविता लिखने लग जाते हैं. वक्त पे लिखे या साइकल पर उनका लिखना लिखना भर है - बलिष्ट की शक्ति की तरह उसकी कोईसामाजिक उपयोगिता नहीं. हर नीति कथा की तरह इस कविता के मूल में एक बहुत सरलमति विचार है - कविजी और कविता का वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है = समकालीन कवि कविता का ऐसा सम्बन्ध नहीं रहा - क्या इस सरलमति विचार के लिए हम एक नए कवि की प्रसंशा करेंगे? चूँकि कविता की मुख्या चिंता कविजी और कविता है खुद यह कविता भी इस घटना के तथाकथित व्यापक जीवन में प्रतिफलनों की बजाय "इस घटना के प्रतीकार्थों" - उसके काव्यफलन - की चिंता ही है क्योंकि जैसा गीत ने कहा है "सिर्फ कविता की चिंता क्‍यों करते हैं, यह छोटी-सी स्थिति कविता से भी बहुत आगे तक जा सकती है". कविता की यह विडम्बना कि इसे लिखने वाला कवि भी इसमें कैरीकेचर किये गए कवि से और खुद यह कविता इसमें कैरीकेचर की गयी कविता से भिन्न नहीं है हो सकता है इसे भविष्य में दूसरों की नहीं अपनी आत्मा की एम आई आर करने के लिए प्रेरित करे.हे मुक्तिबोध!

vyomesh said...

यह अपने दोस्तों के बीच कुछ कहने का मौका और कुछ भी कहने की आज़ादी है. इसलिए मैं भी कुछ.

अपनी पहली प्रतिक्रिया में गिरिराज किराडू ने मेरे लेखों के कुछ वाक्यों को उद्धृत करते हुए माना है कि वे एक "आक्रामक" "आफेंसिव" आलोचना में से निकलकर आए "सामान्यीकरण" हैं. उनके द्वारा उद्धृत मेरा पहला वाक्य है : " हिंदी में धंधे चल रहे हैं." यह वाक्य असद ज़ैदी के कविता-संग्रह "सामान की तलाश" की समीक्षा करते हुए मूलतः ऐसे लिखा गया है : " उन्होंने हिंदी में चल रहे धंधों को पहचान लिया है इसलिए लोग हमलावर हो गए हैं." ज़ाहिर है कि यह वाक्य असद ज़ैदी के कवि-व्यक्तित्व के बारे में है. इसे लिखते हुए उनकी एक कविता मेरे लिए पृष्ठभूमि की तरह काम कर रही थी. "हिन्दी साहित्य विमर्श" शीर्षक कुल 7 पंक्तियों की वह कविता इस प्रकार है : " इस मंच पर विराजमान ये सभी लोग / खोये हुए लोग हैं / इनके नाम के बातस्वीर इश्तिहार भी / शायद निकले हुए हों / जो मनुष्य अभी अध्यक्षता कर रहा है / सबसे ज़्यादा खोया हुआ पुरुष है / उसका सब कुछ उससे खो गया है." हिन्दी साहित्य के भाँति-भाँति के मंचों पर चिरकाल से विराज रहे लोग इन पंक्तियों के लेखक के साथ वैसा ही व्यवहार कर सकते थे जैसा बीते दिनों उन्होंने किया है. इसके अलावा असद ने हिन्दी की अकादमियों, संस्थाओं, मठों, गढों और पीठों में चलती रहती कारगुज़ारियों को भी अपनी कविताओं का विषय बनाया है. एक कवि की इसी निस्संगता और निर्भीकता से प्रेरित होकर मैंने वह वाक्य लिखा था. मुमकिन है कि यह वाक्य एक सामान्यीकरण हो, लेकिन सच है. गिरिराज जी ! बहुत सारे सच सामान्यीकृत होते हैं. क्या उन्हें "आमफ़हम दुर्घटना" मानकर "इग्नोर" कर देना चाहिए ? और अगर यह "सामान्यीकरण" "दुर्घटना" हैं तो जो नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसी संस्थाओं और तमाम विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में जो हो रहा है, होता रहा है, वह क्या है ? क्या एक भिन्न स्तर पर समाज भी व्यक्ति की आदतों, लक्ष्यो, संकल्पों, उसके कृत्यों का सामान्यीकरण नहीं है. आप क्या इसे भी दुर्घटना मानेंगे ? और अगर आपको "सामान्यीकरण" से इतनी दिक्क़त है तो इस सामान्यीकरण को उलटते हुए मैं आपसे एक "स्पेसिफिक" सवाल पूछना चाहता हूँ : वह कौन सा धंधा है जो हिंदी में नहीं चल रहा है ? क्या हिंदी की दुनिया की पॉलिटिकल इकोनोमी हमारे लिए, हिंदी की कविता और आलोचना के लिए, जांच का प्रमुख, बल्कि अनिवार्यतम मुद्दा नहीं है ? क्या एक समाजवैज्ञानिक जाँच-परख अविलम्ब उसकी नहीं की जानी चाहिए ? अगर इतने बड़े सार्वजनिक क्षेत्र में जनता के पैसे के दम पर चल रहे अन्याय पर मेरी राय को आप "आमफ़हम दुर्घटना" मानते हैं तो मैं फिर वही पूछूंगा कि जो दुर्घटना वाकई घट रही है, उसे क्या मानते हैं ?

दूसरी आपत्ति आपने प्रेम और मृत्यु के सरलीकरणों वाली बात पर की है. क्या आप यह कहना चाहते हैं की हिंदी कविता में प्रेम और मृत्यु के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है वह उच्च कोटि का काव्य है ? ऐसा कहकर किन्हें बचाना चाहते हैं बन्धु ? ज़ाहिर है आप उन्हें कतई नहीं बचाना चाहते होंगे जिन्हें जिलाए रखने के राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय "सांस्थानिक प्रयत्नों" में देश के करोड़ों रूपये बर्बाद हुए, फिर भी जिनकी कविता का शरीर वेंटिलेटर पर रखा हुआ है. तब कौन ? मैं एक जीवन-अनुभव को अनेक काव्य-सरंचनाओं में विघटित कर वाक्य पर वाक्य और कविता पर कविता लिखते चले जाने के कई उदाहरण दे सकता हूँ . ऐसी कवितायेँ अन्य चीज़ों के साथ मानवीय अनुभव को भी उपभोग की वस्तु मानती हैं और हरेक मौके पर अनुभव को एन्जॉय करना चाहती हैं. यह और बात है की अक्सर वहाँ अनुभव होता ही नहीं, अभ्यास और स्फीति से अनुभव का काम निकाला जाता है. अब आप ऐसी सभी कविताओं के लिए यह सिद्ध करके दिखाइए की इनमे प्रेम और मृत्यु के सरलीकरणों की दुकानें नहीं खुली हुई हैं और फिर यह भी आप ही बताइए कि "प्रमाण के अभाव में सीरियस बयान" कौन दे रहा है, मैं या आप ?

तीसरी आपत्ति देवीप्रसाद मिश्र की कविता पर मेरी स्थापना के सिलसिले में की गयी है : कि मैं बिना प्रमाण के ऐसे सीरियस बयान दे रहा हूँ कि देवीप्रसाद मिश्र की कविता ने छंद और अछंद का भेद निरस्त कर दिया है. जिस लेख से आपने यह स्थापना उद्धृत की है बंधु, उसी में मैनें प्रमाण भी दिया है. यह तो आपके आचरण से मैंने जाना कि सामान्यीकरण की हड़बड़ी में प्रमाण की परवाह नहीं करनी चाहिए. बहरहाल, उस लेख में देवीप्रसाद की लम्बी कविता के एक हिस्से का उदाहरण देते हुए मैंने यह प्रस्तावित किया था की ऐसी कविताएँ अध्ययन-अध्यापन की सुविधा के लिए किये गए गद्य-पद्य, लम्बी-छोटी इत्यादि के स्थूल अंतरों का अतिक्रमण कर जाती हैं. मेरे द्वारा उद्धृत कवितांश इस प्रकार है :
" मैं भी क्यों इस तरह लिखना चाहूं. मैं भी क्यों उस तरह कहना चाहूं.तू मुझे देखकर अफ़सोस कर रहा होगा. मैं तुझे देखकर वल्लाह न कहना चाहूं.
मैं जो हिंदी में ही हिंदी में लिखा करता था. मैं वो हिंदी में ही उर्दू में ही लिखना चाहूँ. ये मेरा रास्ता है और मेरा वास्ता है. तू मुझे रोकता है क्यों जो मैं सहना चाहूँ .
मैं जो दरिया हुआ तो और भी क्या हो पाता. तू मुझे रास्ता क्या दे जो मैं बहना चाहूँ. तू मुझे हद में रखेगा तो तेरी हद होगी. तू मुझे दे जो कलम तो मैं क्या लिखना चाहूँ."
इस ग़ज़ल को देवी ने गद्य के विन्यास में लिखा है. यानि इस कविता का प्रकाशित रूप गद्य का है और सुनाये जाने पर वह ग़ज़ल है. यह रचनात्मक युक्ति क्या हिंदी के सत्ता-प्रतिष्ठान द्वारा छंद की वापसी के नाम पर कभी गुपचुप और कभी मुखर ढंग से चलाये जा रहे षड्यंत्र की पोल नहीं खोल देती ? एक ओर हिंदी का सत्ता प्रतिष्ठान कह रहा है की काव्यत्व सिर्फ छंद में ही महफूज़ रह सकता है तो दूसरी ओर देवी की पंक्तियाँ ऐसी घोषणाओं में निहित द्वैत को निरस्त करती हुईं, गद्य और पद्य को एक ही मानती हुईं, एक अपूर्व विन्यास में खुद को व्यक्त कर रही हैं. मैं यही बताना चाहता हूँ. गिरिराज जी ! मैं क्या बिना प्रमाण के ऐसा कह रहा हूँ ?

एक बात और. हिंदी की प्रगतिशील आलोचना में जारी कीचड़युद्ध का गिरिराज जी को दुःख है. लेकिन किस बात का दुःख है - "कीचड़युद्ध" का या "ये सब प्रगतिशीलों के बीच ही हो रहा है" इसका. प्रगतिशीलता की बड़ी मैस्सिव परंपरा है मित्र. मुक्तिबोध भी उसके हिस्से हैं. और अगर पराभव पर बात करनी है तो सिर्फ प्रगीतिशीलों के पराभव पर ही क्यों ? और अगर वह दुःख ही है तो इतना खुश होकर क्यों आया है ?

कविता पर कुछ कहना अश्लील होगा. हो सकता है मेरी यह टिप्पणी भी बहस को कविता की बजाय कहीं और ले जाए. इस विषयांतर का मुझे अफ़सोस रहेगा लेकिन जो बातें ज़रूरी लग रहीं थीं उन्हें कहना ही था. पंकज चतुर्वेदी, गिरिराज किराडू, शिरीष मौर्य, गीत चतुर्वेदी, धीरेश और अनुराग - सबके प्रति आभार.

"इसके बाद जब हम विदा हुए बहुत दोस्त बनकर विदा हुए." (मुक्तिबोध )

giriraj kiradoo said...

प्रिय व्योमेश जी (बतर्ज कविजी और गिरिराजजी),
१. आपको इस पर आपत्ति नहीं कि ' हिंदी में धंधे चल रहे हैं' एक सामान्यीकरण है लेकिन आपका बचाव यह है कि यह सामान्यीकरण एक "सच" है - और अगर सामान्यीकरण एक दुर्घटना है तो सच खुद भी एक दुर्घटना है.
यह तो सामान्यीकरण में निहित ही होता है कि वह सच हो सकता है; लेकिन वह अन्यायपूर्ण सच हो सकता है - सामान्य में अंतर्भुक्त किन्ही विशिष्टों के बारे में. अगर हम एक कवि/आलोचक से ऐसी बारीकी की उम्मीद नहीं करेंगे तो किनसे? हिंदी संस्थानों के बारे में - वहां अगर यही सब - धंधा- चल रहा है, चलता रहा है तो हिंदी का लगभग हर लेखक (कुछ अपवाद होंगे शायद) इस में शामिल है कुछ थोड़े से लोग भर नहीं - क्योंकि इन अकादमियों, विश्वविद्यालयों, प्रकाशकों में सब गए, छपे हैं. फिर हम एक सामान्यीकृत के मार्फ़त स्पेसिफिक पर ही क्यों एकाग्र हो रहे हैं? और अगर कोई पतन किसी सार्वजनिक संस्था में आता है तो उसका कारण भी महज कुछ लोग नहीं होते, वे समाज में चल रही प्रक्रिया का ही एक फलन होते हैं. हाँ, इस पर मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि " क्या हिंदी की दुनिया की पॉलिटिकल इकोनोमी हमारे लिए, हिंदी की कविता और आलोचना के लिए, जांच का प्रमुख, बल्कि अनिवार्यतम मुद्दा नहीं है ? क्या एक समाजवैज्ञानिक जाँच-परख अविलम्ब उसकी नहीं की जानी चाहिए ?"
और याद रहे मेरी एक पूर्व टिप्पणी में प्रतिष्ठानपरकता को उन चीज़ों में शामिल किया गया है जिनसे सावधान रहने की बात की गयी है.

२.
'प्रेम और मृत्यु के सरलीकरण की दुकानों' वाले वाक्य में जो लोग इंगित हैं आप उनका नाम लीजिये - मेरा इरादा किसी को बचाने का नहीं है - हिंदी में मृत्यु और प्रेम पर एकाग्र कवि लेखक कौन हैं? यदि आप निसंगता और निर्भीकता से "जिन्हें जिलाए रखने के राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय "सांस्थानिक प्रयत्नों" में देश के करोड़ों रूपये बर्बाद हुए, फिर भी जिनकी कविता का शरीर वेंटिलेटर पर रखा हुआ है उनके नाम ले लें तो पाठकों को सुविधा रहेगी- इधर प्रेम और मृत्यु पर पूर्णतः एकाग्र एक कवि को आपने एक तरह से, एक तरह का निराला का उत्तराधिकारी बताया है - पर चूँकि मुझे यह विश्वास है कि सामान्यीकृत सच अन्यायपूर्ण होते हैं इसलिए मैं यह मान सकता हूँ कि हो सकता है यह कवि विशेष उन कवियों में नहीं हो जिन्होंने 'प्रेम और मृत्यु के सरलीकरणों की दुकानें खोल रखी है".
3
देवी प्रसाद मिश्र की कविता के बारे में आपका एक मात्र प्रमाण कविता को उद्धृत कर देना है. इस स्वतःसिद्ध "प्रमाण" पर मैं टिप्पणी नहीं करूँगा. अगर कोई विश्लेषण हो सिवाय प्राईमा फेसी नज़र आने वाले तथ्य के कि इस कविता का प्रकाशित रूप गद्य का है और सुनाने का ग़ज़ल का तो बात आगे बढायेंगे. देवी प्रसाद की कविता "सत्ता प्रतिष्ठान" के विरुद्ध जारी लड़ाई में (जो कुछ मित्रों की राय में एक व्यक्तिगत जंग भी है) एक उपकरण ज़रूर बन गयी है. आपकी टिप्पणी का यह स्वर दुर्भाग्यपूर्ण है कि "यह तो आपके आचरण से मैंने जाना कि सामान्यीकरण की हड़बड़ी में प्रमाण की परवाह नहीं करनी चाहिए."
४.
मुझे दुःख कीचड़युद्ध से है - अभी वह प्रगतिशीलों के मध्य हो रहा है तो यह मेरी राय नहीं एक तथ्य है - छंद में काव्यत्व के पुनर्जन्म वाले जिन 'सत्ता प्रतिष्ठान" पर आप "हमलावर" हैं क्या वे "प्रगतिशील" नहीं? यह एक दुखद तथ्य है कि आप इसे मेरा खुश होना मान रहे हैं. मैं यहाँ दो लेखकों को उद्धृत करता हूँ:
४.१

एजाज़ अहमद (स्मृति के सहारे, पहल व्याख्यान):

स्तालिनियत का तरक्कीपसंद तहरीक को सबसे बड़ा तोहफा यह है कि तरक्कीपसंदी के नाम पर हुए हर गुनाह को जायज़ ठहराया जाए.

४.२

असद ज़ैदी(http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/):

सत्तर के दशक में जवान हुए लोगों की ट्रेजेडी यही है कि उनमें से बहुत से लोग लड़े थे, उन्होंने बड़े सपने देखे थे, फिर उनमें से कुछ सिस्टम में जज़्ब हो गए, उसकी खाद बन गए, बाक़ी का अधिकांश क्रिकेट की भाषा में कहें तो 'रिटायर्ड हर्ट', यानी थक कर या चोट खाकर बैठ गया. उनके पास अगली पीढ़ी से कहने के लिए कुछ नहीं था. अगली पीढ़ी ने भी उनसे कुछ नहीं लिया, अगर लिया भी तो उत्तरकालीन अवसरवाद.

क्या यह दोनों मित्र यह कह कर खुश हो रहे हैं? बहस में नीयत पर शक करना एक तरह से बहस न करना है. मुक्तिबोध मेरी टिप्पणी में है - अगर मुक्तिबोध के होने भर से सब पतन थम जाता तो आप किसके विरुद्ध लड़ते?

anurag vats said...

कल संयोगवस मुझे व्योमेश शुक्ल पर प्रकाशित उद्भावना पुस्तिका मिल गई...मुझे उसमें व्योमेश शुक्ल के गद्य-पद्य के अलावा विष्णु खरे के एक नहीं दो लेख और उन्हीं की कविताओं पर एकाग्र मंगलेश डबराल और योगेन्द्र आहूजा का भी गद्य देखने को मिला...विष्णु खरे के व्योमेश पर लिखने की बात सुनी थी, और उसका हवाला भी मैंने अपनी पहली टिपण्णी में दिया है...दूसरा लेख लिखने को विष्णुजी ने कुछ कविताओं पर केन्द्रित अपने प्रथम पाठ को ''पचासेक कविता पुराने'' इस कवि-प्रतिभा के साथ न्याय करने की गरज से लिखा बताया है...इसलिए हम कई मित्रों का यह भ्रम भी अब दूर हो जाना चाहिए कि उन्होंने अपनी राय को कुछ कविताओं तक सीमित रखा...दूसरे, मुझे यह देखकर प्रीतिकर संतोष हुआ कि उन्होंने इस कवि के मूल्यांकन का परिप्रेक्ष्य बनाते हुए उन्हीं मुक्तिबोध और रघुवर सहाय का सन्दर्भ दिया है, जिनका उल्लेख ''तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो'' शीर्षक कविता के प्रकाशन के वक़्त मैंने किया था... ''मुझ नए छोटे''को पूर्वाचार्यों से इस साम्य का कतई अनुमान नहीं था...पूर्वाचार्यों का कहा आँखें खोलता भी है और अँधा भी करता है...यह मेरे हक में रहा कि मैंने अन्य कवियों की तरह व्योमेश के सन्दर्भ में भी अपनी अच्छी-बुरी राय इन कथनों के आलोक में जाने से पहले बना ली थी...इसके पीछे की आलोचनात्मक अंतर्क्रिया को लक्षित किये बगैर,मेरी टिप्पणियों पर गिरिराज का असंतोष मुझे चकित करने वाला है...मैंने सबद पर लेखकों को प्रकाशित करते हुए बहुत सख्त और वस्तुपरक पैमानों का सहारा लिया ...इसलिए विशेष रूप से सबद पर लिखनेवाले लेखकों के अलावा जिन लेखकों की सामग्री का चयन जब तब यहाँ आया है...उनके लिए भी छोटे मुंह से उतने ही बड़े बोल बोले गए हैं...मिसाल के तौर पर गिरिराज ने वागीश शुक्ल और साही के सन्दर्भ में इसे चतुराई से लक्षित किया है...और आनेवाले दिनों में सबद पर अज्ञेय, अशोक वाजपेई और मदन सोनी के शीघ्र प्रकाश्य पोस्ट्स में शायद पुनः लक्षित भी करें, सहमत हों ( या रणनीति बदलें, मैं पक्का नहीं हूँ...)

...कुल मिलाकर मुझे यही ज्ञात हुआ कि २९ बरस और महज पचास कविता पुराने इस कवि पर इतना बढ़-चढ़ कर क्यों बोल रहा हूँ मैं, यह गिरिराज को खटका और उन्होंने यहाँ से चलना शुरू किया...पहुंचे कहाँ ? ...ध्यान आता है कि मेरे अलावा उन्हें पंकज में भी यह खटकता है...मेरे सामने पंकज का लेख नहीं है...और अपना पक्ष वही ज्यादा अच्छी तरह रखेंगे, पर इससे मेरी यह समझ बन रही है कि कवि के प्रशंसक होने की पोजीशन बना लेने के बाद अपनी तीसरी टिप्पणी तक आते आते वे जिन निष्कर्षों के साथ कविता की शल्य-क्रिया संपन्न करते हैं, वे भयानक हैं...

अब बात सीधे-सीधे कुछ ठोस बिन्दुयों पर...

क्योंकि मेरी समझ में कविता की पिच पर अविजित हाफ-सेंचुरी पूरा करने वाले व्योमेश पर बोलने वालों ने कोई पांच सैकडा नहीं जमाया हुआ है और उनके कवित्त-विवेक की पहचान-परख अभी होनी है, मैं एक नए कवि को काव्य-गणना करके देखने का विरोध करता हूँ...(यह बहुसंख्यक हिन्दूवाद का मामला है क्या भाई ?...)...

दूसरी बात, कविता का कुपाठ करने का हक हालाँकि सबको है...गिरिराज इसमें कब और कितनी दूर तक फंसते जाते हैं, यह बताना अब उनकी शल्य-क्रिया को देखने के बाद ज़रूरी नहीं लगता...फंसाव ऐसा है कि ''फेबल''बताकर कविता के आदि, मध्य और उत्तम प्रदेश में विचरने के बाद उन्हें यह सुबोध मिला कि "कविजी का यथार्थ से कोई जीवंत सम्बन्ध नहीं है - वह एक रूपकात्मक सम्बन्ध है जो एक मृत रूपक (वक्त का पहिया) के अनुरूप ही 'मृत' है"...यह क्या कविता नहीं कह रही गिरिराज जी ?...आप कौन-सी दूर की कौडी लाये...खैर,आप दूर तो गए पर कविता में नहीं,अपनी अवधारणाओं में जो आपको इस पर मढ़नी थी...

तीसरे, क्या कविजी के भीतर इसी यथार्थ के द्वैत को उभारने की चेष्टा यह कविता नहीं करती ?...पर यह भी आपसे अलक्षित गया...कविता के पूर्वपक्ष में जिस भाषिक द्वंद्व से कविजी का सामना होता है...और बच्ची के साथ की दुर्घटना, जिसे आपने कविता में एक भावुक उपस्थिति भर माना है ( किस काव्य-विचार से प्रतिश्रुत होकर आपने विचार की यह हिंसा पाई दोस्त ?...) वह कविजी के भीतर यथार्थ-बोध का एक तीखा अहसास कराती है, विलक्षण बलिष्ट नहीं...बलिष्ट अपने अर्थ विपर्यय में इस कविता में है...और आपने चूँकि इस कवि की पहले की कविताएं पढ़ी हैं...अपने को प्रशंसक भी कह रहे हैं, यह लक्षित करना आप कैसे भूले होंगे कि व्योमेश में यह सब एक अप्रत्याशित काव्य-मूल्य की तरह उपस्थित है...आपके प्रिय साही ने आप बंधुओं के इसी शाक्त फिसलन के लिए कहा है : ''क्रतो स्मर...'' ....बहरहाल, सरल मति की दूसरों में तलाश करते हुए, हम अपने को बख्सते चलते हैं...आप अपने निर्णय सुनाते हुए ऐसा करने के अलावा कविता के बाहर भी कुछ मुकद्दमों में फैसला सुनाते गए हैं...प्रगतिशीलता का मुकद्दमा कइओं की तरह आपकी अदालत में भी चल रहा मालूम पड़ता है, जिसके कि जज भी आप और वकील भी, कटघरे में पूरी प्रगतिशील बिरादरी...आपको इस बात का भी मलाल कि प्रगतिशीलता की अपनी कचहरी क्योंकर है और वहां इतने पतन के बावजूद ज़िन्दा बहसें क्यों हो रही हैं...यानि उन्हीं के बीच...और देखिये न, उन्हीं के बीच से बीच बहस में पड़े व्योमेश शुक्ल भी आते हैं...( और भी ढेरों नाम हैं...गणना की ज़रूरत है क्या ?...)...

कुछ बातें गीत से...

आप एक बहुप्रभावक्षम कविता का टुकड़-पाठ करते हैं तो आपको कविता का आदि और मध्य या मध्य या अंत या इसी तरह से सिर्फ आदि या मध्य या अंत संभावनाशील और शेष अर्थ-संकोचों से भरी और कवि की भूल-गलती से भरी हुई जान पड़ती है...

आपकी अन्यथा गंभीर विवेचना में पोएटिक वैल्यू के क्षरण की बात उठाई गई है...व्योमेश ने कविता के भीतर कवि जी की चेतना, बोध और उसकी परिणति के जिन स्तरों और उनके भीतर के अंतर्विरोधों को उभारने की कोशिश की है उसमें आपको काव्यात्मक मूल्य के क्षरण का खतरा दीखता है, तो आप देखें...मुझे यह अभिव्यक्ति के खतरे उठानेवाली बात लगती है...ये मुक्तिबोध की परंपरा का ही कवि कर सकता था...मैंने व्योमेश की कविताओं के निकट अवलोकन से पाया था कि इस कवि में यह ज़रूरी साहस है...बलिष्ट का प्रतीकार्थ आपने उचित ही समझा और कुछ विस्तार से समझाया, पोलिमिक्स के मामले में चूक हो गई लगता है...

प्रथमतः कवि हैं व्योमेश इसलिए अपने मोर्चे से पोएटिक ही नहीं पॉलिमिकल वैल्‍यूज़ भी बदल रहे हैं...यहाँ पलट कर पूछा जा सकता है कि क्या पॉलिमिकल वैल्‍यूज़ को बदले बिना पोएटिक वैल्‍यूज़ बदल जायेंगे क्या...
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मित्रों कविता को मूलतः पढ़ने और उसके प्यार में पड़ने की वजह से मैं यहाँ तक खिंच गया...कविता मेरी प्रेमिका की दो जुड़े वाली कस कर बंधी चोटी नहीं है कि उससे ( प्रतीकार्थ में कवि से ) कहूँ, '' तुम खुले बालों में ज्यादा अच्छी लगती हो''...मैंने इस पोस्ट का शीर्षक रखा था : जो दृश्य में नहीं...ऑस्कर वाइल्ड ने कहीं कहा है कि चीजों का असली रूप दृश्य में निहित है, अदृश्य में नहीं...{पूरे उद्धरण के लिए निर्मलजी की डायरी का पृष्ट १४ देखें} (आशा है सरलमति से इसका यह अर्थ नहीं लिया जायेगा कि मेरा इशारा, दृश्य में नहीं = अदृश्य, की ओर है...)...व्योमेश की कविता हमारे सामने जो दिख रहा है उसी दृश्य को अपने हिसाब में लेकर हमें कुछ नया दिखाती है...हालाँकि इसका भाष्य तो हम जो उसमें देखते हैं वही है, मैं भी इसका अपवाद नहीं हूँ...

भारत भूषण तिवारी said...

कविता को लेकर ऎसी पोलेमिक्स शरद जोशी के 'झरता नीम -शाश्वत थीम' और परसाई के 'घायल वसंत' में अत्यंत मुखर है. पर क्या सिर्फ इसलिए यह हमें परेशान नहीं करती क्योंकि ये रचनायें अकादमिक व्याख्याओं के हिसाब से कविता नहीं हैं? मगर सबद पर ही ज्ञानरंजन वाली पोस्ट पर दी गयी अपनी विस्तृत टिप्पणी में पंकज चतुर्वेदी ने गद्य और पद्य के विभाजन को लेकर बेहद ज़रूरी सवाल खड़ा किया है.
मुझे तो रघुवीर सहाय की कविता ' सुकवि की मुश्किल' में भी एक पोलेमिक अंडरकरंट की अनुभूति होती है. कविताई का ही पोलेमिक्स उनकी एक और कविता 'अरे अब ऐसी कविता लिखो' में भी ज़ाहिर तौर पर मौजूद है.

अपनी बहुचर्चित कोलाज कविता 'कैपिटलाईज़ेशन' में मार्क नोवाक मारग्रेट शेर्त्जेर की व्याकरण पुस्तक 'दि एलीमेंट्स ऑफ़ ग्रामर' के वाक्यों और रोनाल्ड रेगन द्वारा एयर ट्रैफिक कण्ट्रोलर्स की हड़ताल तोड़े जाने की अखबारी रिपोर्ट का ताना बाना रचते हैं. इस उद्धृत की गयी व्याकरण की पोलेमिक्स के दौरान ही नोवाक कविता की पंक्तियों में व्याकरण के नियमों की तोड़ते जाते हैं. इस कविता में पोलेमिक वैल्यूज़ के साथ साथ पोएटिक वैल्यूज़ भी पूरे औद्धत्य के साथ फोरग्राउंड में बनी रहती हैं.

giriraj kiradoo said...

प्रिय अनुराग, आप एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर पलट कर टिप्पणी करने को बाध्य हुए यह अच्छी बात है. प्रेरक शक्तियां चाहे कोई भी रही हों.
आपने अपनी टिप्पणियों में दोनो बार कुछ अथॉरिटीज -पूर्वाचार्यों - की राय को उद्धृत किया है - यह उन पाठकों को प्रभावित करने के तो काम आ सकता है जो बड़ी अथॉरिटीज के जिक्र से कुछ ऐसा कहने लगते हैं कि अरे भाई इतने बड़े लोगों ने कुछ कहा है तो कुछ तो अच्छा होगा ही. उद्भावना पुस्तिका को प्रकाशित हुए कुछ समय हो गया और हो सकता है आपको "संयोगवश" कल ही मिली हो पर बिना पढ़े भी कुछ सम्माननीय अग्रजों की (अथोरिटीज? की) "अवज्ञा" ("अवज्ञा" जैसे शब्दप्रयोग को भी एक मनोवैज्ञानिक पठन के अधीन लाया जा सकता है) को लेकर आप चिंतित थे. यदि आलोचनात्मक अंतर्क्रिया यह है कि मैं वही तो कह रहा हूँ जो कुछ सम्माननीय अग्रज (अथोरिटीज?) कह रही हैं तो इस पर मैं टिप्पणी नहीं करूँगा.
साही और वागीश जी के सबद पर आने का मैंने इस 'चतुराई' से स्वागत किया था कि मैं हिंदी में व्यापक इस प्रवृति से लगभग आजिज़ आ गया हूँ कि हमारी पत्रिका में हमारे लेखक उनकी पत्रिका में उनके - अपने प्रतिपक्ष से संवाद न करने की, उसे देहरी से बाहर रखने की यह एक्स्क्लुजिवनेस (भड़काने के लिए इसका अनुवाद 'छुआछूत' भी किया जा सकता है) मेरी समझ में कभी आयी नहीं. मैं जिस पत्रिका का संपादन करता हूँ उसके पहले छः अंकों में २१० लेखकों का काम है और उसमें 'चतुराई' से कौन कौन है यह गणना उन मित्रों के लिए छोडता हूँ जिनकी इसमें दिलचस्पी हो.
आनेवाले दिनों में सबद पर अज्ञेय, अशोक वाजपेई और मदन सोनी के शीघ्र प्रकाश्य पोस्ट्स में शायद पुनः लक्षित भी करें, सहमत हों ( या रणनीति बदलें, मैं पक्का नहीं हूँ...)
इसमें शामिल लेखकों और बाकी दोनों को जोड़ कर देखा जाय तो यह देखना मुश्किल नहीं कि हिंदी की प्रगतिशीलता-रूपवाद/कलावाद की विभाजन रेखा का दबाव है इस तर्क पर - इस पर टिप्पणी यही कि फिर से आपको www.pratilipi.in पर आमंत्रित करता हूँ
यह एक तथ्य है कि व्योमेश शुक्ल ने पचासेक कवितायेँ लिखी हैं (यह हिन्दू बहुसंख्यकवाद का नहीं तथ्यपरकता का मामला है – क्या यह पूछा जाय कि संख्या का एक तथ्यात्मक संदर्भ एक राजनीतिक रूप से चार्ज्ड संदर्भ की ओर किस ट्रेनिंग के तहत ले जाता है और उससे लगभग मुफ़्त में तर्क के विषय – यानि प्रतिपक्ष- को एक निंदनीय संघटना के साथ कम से कम मेटाफरिकली जोड़ देने का सुख भला क्यों छोड़ा जाय)- और किसी भी लेखक के काव्य-विवेक की परीक्षा अगर 'किन्ही' अथोरिटीज के हाथों होने से ही होंगी तो फिर इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।
यह पूछना कितना खराब होगा कि क्या टिप्पणीकार के आलोचना विवेक की कोई 'प्रमाणिक' जांच हो चुकी है? (सैम्युएल हटिंगटन के निधन पर आपकी श्रद्धांजलि को यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ, पाठकों की सुविधा के लिए)
हंटिंगटन को विचार-विमर्श की दुनिया में उनकी पुस्तक , '' The clash of civilizations and the remaking of world order'' की अत्यन्त मौलिक और विचारोत्तेजक स्थापनाओं के लिए याद किया जाता है। हंटिंगटन ने यह पुस्तक उस दौर में लिखी जब यह प्रश्न जिज्ञासा और आशंका के मिले-जुले स्वर में पुछा जा रहा था कि क्या आने वाले समय में सभ्यताओं का संघर्ष वैश्विक राजनीति के केन्द्र में होगा ? अपनी पुस्तक के ज़रिये उन्होंने इस सवाल का जवाब देने के अलावा सभ्यताओं के संघर्ष के बीच वैश्विक शान्ति और सहअस्तित्व कायम रखने के रास्ते भी बताए…. हंटिंगटन की तरह हमें भी तेजी से बदल रही दुनिया में इन सवालों का जवाब ढूंढते रहना होगा।
वैसे आप जो ब्लॉग पर लिखते हैं उसके गद्य में निहित संभावनाएं मुझे अच्छी लगती रही है, अन्यत्र प्रकाशित काम भी पढ़ना चाहूंगा
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अब कुछ ठोस बातें ...

क्योंकि कुपाठ करने का हक सबको है इसलिए आपको भी मेरे पाठ का ही नहीं, नियत (जिस रहेटरिक में आप मुझे संबोधित हैं और जिस रहेटरिक में गीत से उसके आधार पर पठन- या कुपठन करते हुए ऐसा कह रहा हूँ).और राजनीति आदि सब का कुपाठ करने का हक है -
मेरा पठन एक शल्य-क्रिया है यह आप विश्लेषण से नहीं कहते क्योंकि यह एक शल्य क्रिया है यह एक प्रदत्त की स्वीकार कर लिया गया है शुरू में ही (इस रूपक के समर्थन से तो हम किसी रुग्ण वस्तु की बात कर रहे हैं जिसकी शल्य क्रिया की गयी है - व्याधि से छुटकारे के लिये)
फंसाव ऐसा है कि ''फेबल''बताकर कविता के आदि, मध्य और उत्तम प्रदेश में विचरने के बाद उन्हें यह सुबोध मिला कि "कविजी का यथार्थ से कोई जीवंत सम्बन्ध नहीं है - वह एक रूपकात्मक सम्बन्ध है जो एक मृत रूपक (वक्त का पहिया) के अनुरूप ही 'मृत' है"...यह क्या कविता नहीं कह रही गिरिराज जी ?...आप कौन-सी दूर की कौडी लाये...खैर,आप दूर तो गए पर कविता में नहीं,अपनी अवधारणाओं में जो आपको इस पर मढ़नी थी...
मित्र यही तो मैंने भी कहा है कि यह कविता ही का कहना है मेरा नहीं कि
कविजी और कविता का वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है = समकालीन कवि कविता का ऐसा सम्बन्ध नहीं रहा - क्या इस सरलमति विचार के लिए हम एक नए कवि की प्रसंशा करेंगे?
यह दूर की कौडी नहीं, पास की है. खुद कविता में. यही विडम्बना है जिसके बारे में मैंन पहले इशारा किया है. यह स्पष्ट नहीं है कि आपके मुताबिक मेरी अवधारणाएं क्या हैं पर निश्चय ही मेरी एक अवधारणा यह है कि मध्य की कथा एक फेबल है - यह कैसे है यह मैंने बताया है - यह कैसे नहीं है फेबल यह आपने नहीं बताया है- बलिष्ठ विलक्षण अन-कैरेक्टेरिस्टिक और अन-कन्वेंशनल के अर्थ में है जिसकी ओर गीत भी ने इशारा किया है. विपर्यय एक से अधिक हैं. कवि और बलिष्ठ, पीसीओ वाला और बलिष्ठ, बच्ची और बलिष्ठ आदि इसका भी कुछ संकेत गीत ने किया है।

बहरहाल, सरल मति की दूसरों में तलाश करते हुए, हम अपने को बख्सते चलते हैं...
यह “अपनों” और “दूसरों” का संबंध जितना समस्या भरा है सो तो है ही, पर मैंने सरलमति निष्कर्ष ‘कविता’में पाया है, कवि में नहीं यह आप पढ़ना नहीं चाहते हैं और जिसे सरलमति निष्कर्ष कहा गया है वह सरलमति है कि नहीं इसका कोई खंडन नहीं है, “निर्णय” बहुत हैं

आपको इस बात का भी मलाल कि प्रगतिशीलता की अपनी कचहरी क्योंकर है और वहां इतने पतन के बावजूद ज़िन्दा बहसें क्यों हो रही हैं...यानि उन्हीं के बीच...
यह मैंने नहीं कहा (देखें मेरी पूर्व टिप्पणियाँ) इसलिये इस पर कोई टिप्पणी नहीं



प्रगतिशीलता का मुकद्दमा कइओं की तरह आपकी अदालत में भी चल रहा मालूम पड़ता है, जिसके कि जज भी आप और वकील भी, कटघरे में पूरी प्रगतिशील बिरादरी...
मुकद्दमा, अदालत मेरे कहे के संदर्भ में तभी वैध हैं जब मेरा कहा वाकई फैसला सुनाने की प्रक्रिया हो (जो कि आप की प्रतिक्रिया अपने ‘फिसलन’ जैसे प्रयोगों से कभी कभी लगती है) दोनों बार यह एक चिंता की तरह व्यक्त हुआ है और जिस कीचड़युद्ध के कारण दोनों बार ऐसा कहा गया है – उस पर क्योंकि (क्या चतुराई से?) चुप्पी रखी गयी है इसे आपकी प्रतिक्रिया के अधिकांश की तरह अव्याप्त और प्रछन्न ढंग से ‘पर्सनल’ होने के एक और दुखद अवसर की तरह लेने के अलावा और क्या कहा जाये? यह सुखद है कि यह आपको याद है “ हालाँकि इसका भाष्य तो हम जो उसमें देखते हैं वही है, मैं भी इसका अपवाद नहीं हूँ...”
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किस काव्य-विचार से प्रतिश्रुत होकर आपने विचार की यह हिंसा पाई दोस्त ?...

आपका कथन भी वैसी ही अभ्यर्थना करता है जिसका पठन कविता के सन्दर्भ में क्या गया है - देखो बच्ची के कविता में आने को 'भावुक अपील की युक्ति बता रहा है, छिः छि: कितना ‘हिंसक’ है!"
यह अगर हिंसा है तो कविता में पेड़, चिड़िया, माँ, घरेलू उपस्थितियों को 'फार्मूला' कहना या 'प्रेम, मृत्यु आदि के सरलीकरणों की दुकान' कहना; किसी के अनुभव और जीवन और कविता को 'उपभोग' की वस्तु बताना क्या अहिंसा है? (प्रेम और मृत्यु ही नहीं यथार्थ ओर 'प्रतिबद्धता' आदि को भी कविता में उपभोग्य वस्तुएं बताया गया है और लोगों के साथ साथ प्रच्छन्न ढंग से व्योमेश के भी द्वारा)
लेकिन इस तर्क में मेरा विश्वास नहीं (हाल्फ सेंचुरी के जवाब में ५०१ वाले अंदाज़ में)। मेरा तर्क यह है कि ‘इस हिंसा’ के स्रोत भी कविता में हैं। कविता के पहले पैरे द्वारा सेट किये गए पोलेमिकल टोन से संबद्ध है - जहाँ कुछ कवियों को अभिधा आदि वाली बात कही गयी है – यह टोन मध्यप्रदेश में जारी रहती है जहाँ कविजी का कैरीकेचर शुरू होता है (वहां अगर यह पूछा जाय कि यह कविजी हिंदी का कैसा कवि है - वह जिसने किसी तरह के सरलीकरणों की दुकानें खोल ली है या वह जिसने हिंदी में जारी धंधों की एजेन्सी या डीलरशीप ले रखी है? या वह जो उन ‘हीनतर’ कवियों में है जो आत्मसंघर्ष से कतराते है - यह वाक्य भी व्योमेश शुक्ल का ही है, स्मृति के सहारे- तो क्या जवाब संभव है? खुद कविता में एक संकेत यह है कि इन कविजी की "कविता में वक़्त का पहिया काफी पहले से ही असाध्य रूप से टेढा, विकृत हो चुका था" –इन संकेतों से जैसी कविता संकेतित होती है क्या वह वही कविता नहीं है जिसे प्रगतिशील कहा जाता है? मित्र क्षमा करें यह कविता शायद एक ‘प्रगतिशील कविजी' , (उच्चतर नहीं, 'हीनतर’?) का ही कैरीकेचर प्रतीत होती है.) वहीं ‘प्रतीकार्थ’ के बारे में जो व्यंग्य है वह एक दुतरफे चिन्ह की तरह खुद इस कविता को इसममें उपस्थित पात्रों, वस्तुओं के प्रतीकार्थों पठन के लिये खुला करती है- मेरे पठन में नीतिकथा के ढांचे में बच्ची भावुक अपील के लिये है, वैसे ही जैसे बलिष्ठ शक्ति के उपयोग के समाजोपयोगी आदर्श के लिये।
मुझे दिली खुशी है कि थोड़ा बहुत पर्सनल हो जाने के बावज़ूद एक बहुत ओपन बहस यहाँ हो रही है

शिरीष कुमार मौर्य said...

यह हमारे दोस्तों का साहस, समर्पण और सदभावना है कि इस तरह की स्वस्थ बहस एक सार्वजनिक माध्यम में चल पाई है. अनुराग ये आपकी उपलब्धि है कि आप अंत तक अपने कहे पर डटे रहे और अपनी टिप्पणियों में उसे सिद्ध भी किया. कितने संतोष की बात है कि हमारे समय में यह संभव हो पा रहा है. इस पीढ़ी से पहले पिछ्ले बीस-तीस साल में क्या कभी कोई ऐसा विवादपूर्ण संवाद हुआ था? मेरी स्मृति तो धोखा दे रही है! इस पारदर्शिता को मेरा सलाम! इतना ज़रूर कहूँगा किसी भी कविता की मार्क्सवादी व्याख्या ही फिलहाल मेरे लिखने और समझने की सीमा है (या कह लो फितूर है!) और व्योमेश खुद समझ सकता है कि उसकी इस कविता पर "अप्रत्याशित" कह चुकने बाद भी मेरी क्या राय होगी. प्रगतिशील शब्द से जो भ्रम होता है उसके खिलाफ मैने मार्क्सवाद कहा है! एक कारण यह भी था कि मैने खुद को इस बहस में सीधे कूद पड़ने से रोका पर अब रुका नही गया और एक लपकी हुई और आधी अधूरी ही सही पर अपनी प्रतिक्रिया तो दे ही रहा हूँ. अभी देखा कि गिरिराज ने हटिंगटन वाली टिप्पणी का पुनर्शोध कर लिया है, जाहिर है मेरे भीतर भी उसे लेकर एक आपत्ति उठी ही होगी - इसे एक बार फिर मेरी वैचारिक प्रतिबद्धता का परिणाम समझ सकते हो! मैं तो व्योमेश की इस कविता पर उसके हमले को इस्लाह की तरह लेने के बारे में सोचने लगा हूँ - ऐसी इस्लाह जिसे उसने सार्वजनिक माध्यम में देने का जोखिम उठाया- और जोखिम तो जोखिम ही होता है ! वीरेन दा की पंक्तियाँ है - मैने प्रेम किया/ इसलिए मुझे भोगने पड़े/ इतने प्रतिशोध ! तो मेरे हिसाब से इसे 'गिरि' और 'व्योम' के आपसी प्रेम की तरह भी देखा जाए!
बहरहाल, इस बहस के लिए एक बार फिर मुबारक़बाद !

Geet Chaturvedi said...

अनुराग,
अपनी टिप्‍पणी में आपने मुझसे जो बातें की हैं, उन सारी बातों का जवाब या उन पर राय मैं अपनी पहली टिप्‍पणी में दे चुका हूं. हालांकि आपने दो टूक यह लिखा है कि 'आपको जो समझना हो, समझें, मैं तो इसे इस तरह समझूंगा' वाले अंदाज़ में, तो इस पर यही कि हर कोई स्‍वतंत्र होता है, अपने तरीक़े से समझने के‍ लिए. मैंने तो उसी टिप्‍पणी में कवि के भी स्‍वतंत्र होने की बात कही है. इसलिए मैंने अपनी बात किसी फ़ैसलाकुन तरीक़े से न कहते हुए सिर्फ अपना ऑब्‍ज़र्वेशन-भर बताया, जिस पर कि आपने समझाइश दे दी कि ' कुछ-कुछ समझ गए हो, कुछ-कुछ में चूक गए हो' . मेरी 'चूक' पर आपकी समझाइश और फ़ैसले पर एक भली-सी मुस्‍कान.

दूसरी बात- आपको लगा कि मैं पोएटिक वैल्‍यू के 'क्षरण' की बात कर रहा हूं... ऐसा नहीं है, मैंने सिर्फ उसके फ़ोरग्राउंड से हट जाने की बात कही. व ह हटकर कहां चली गई या किसमें रिड्यूस हो गई, यह तलाश कवि और पाठक दोनों को होनी है. ऐसा लगा कि आपने यह भी समझ लिया, जैसे मैं कह रहा हूं कि कविता में पॉलिमिकल वैल्‍यूज़ होती ही नहीं. ऐसा नहीं है. उसमें होती है, कितनी, मैंने पहले भी कहा, यह कवि के विवेक पर है कि वह इसे कविता के नीचे बिछाता है या फिर उसे ओढ़ाता है. कविता किस बिंदु पर जाकर कविता होती है और कहां जाकर कविता होते-होते रह जाती है, इस पर कोई एकराय नहीं बन सकती, क्‍योंकि हर रीडिंग का 'इमेजिनेटिव एक्‍सपीरियंस' अलग होता है. यहां अनुरोध है कि जिसे मैंने अपनी टिप्‍पणी में पोएटिक वैल्‍यू कहा है, उसे पोएटिक वर्थ या पोएटिक वर्चू जैसा न समझा जाए.

जिन कविताओं का जि़क्र श्री तिवारी ने किया है, उनमें कहीं से असहजता नहीं है और न ही कुछ भी आरोपित. बहुत बारीकी से बुनी गई हैं. इसी क्रम में मंगलेश जी की छोटी सी कविता 'बाहर' भी रखी जा सकती है. यह उस असर्टिव पोएटिक पर्सोना की मिसाल है, जिसकी तलाश अंतत: हर कवि को होती है. इसलिए इन कविताओं का पाठ वैल्‍यूज़ को समझने के लिए बेहतर हो सकता है. इसीलिए मैंने ऊपर की टिप्‍पणी में पॉलिमिक्‍स वाली बात के साथ -असहज- का प्रयोग किया.

और हां, कविता के 'बहुप्रभावक्षम' को समझने के लिए ही उसका अलग-अलग पाठ किया जाता है, जिसमें टुकड़-पाठ भी है, लेकिन मेरे जो ऑब्‍ज़र्वेशन हैं, वह सिर्फ एक टुकड़-पाठ पर नहीं, बल्कि संपूर्ण पाठ पर हैं, जिसे देखने के लिए आपको फिर स्‍क्रोल करके ऊपर जाना होगा. बहु-पाठ भी इसीलिए ज़रूरी हो जाता है. लेकिन यहां मक़सद कवि की 'भूल-ग़लती' पकड़ने का नहीं था, कविता तक जाने का ही रहा.

रिम्‍बो के हवाले से ऊपर कहा भी कि मैं नहीं चाहता कि किसी कवि को बदलूं, इसीलिए मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं को अत्‍य‍धिक महत्‍वपूर्ण भी नहीं मानता, क्‍योंकि उससे बड़ी चीज़ कवि का आत्‍मसंघर्ष होता है, उसका विवेक होता है, और यदि कवि ख़ुद इन सब चीज़ों से संतुष्‍ट हो, तो दूसरा कोई क्‍या बोले...

giriraj kiradoo said...

शुक्रिया शिरीष यह सब को याद दिलाने के लिए कि अगर यह "हमला" है भी तो व्योमेश की "इस" एक (बल्कि दो) कविताओं पर है, न तो उनकी सारी कविताओं पर न खुद उन पर. व्यक्तिगत हमलें देखने हों तो बनारस से ही प्रकाशित एक पत्रिका देखें जिसका सम्पादकीय व्योमेश ने मुझे स्कैन करके भेजा था.

और दोस्त इस्लाह आजकल आउट ऑफ़ फैशन है; लेकिन तमाम चीज़ों के बावजूद आज भी किसी कवि - अन्यथा एक अजनबी - को प्रेम करना संभव है यह कितनी सूकून देने वाली बात है!

pankaj said...

priy dosto,
is beech ek yaatra karni padi & mera mobile bhi chori chala gaya, par in niri vyaktigat baaton ka sabad par jaari bahas se koi lena-dena nahin hai. sirf yah ki mujhe afsos hai ki mere priy kavi-mitra giriraj kiradoo ji ne mera naam lekar likha hai ki main 'careerism, pratishthaanparakta, asantulit vyaktigat mahatvaakaanksha, aatmamugdhata & varchasva-kaamna' ke tahat aalochana-karm mein lipta hoon ya kahen ki jis kavi vyomesh ki jin pachaasek kavitaaon-----jinke aadhaar par qhud kiradoo unhen antatah ek 'achchha pratibhashaali kavi' kah rahe hain----------mein-se yaadrichchhik dhang se chuni gayi bees-pachchees kavitaaon ke aadhaar par maine 'tatha' mein chhape apne jis lekh mein unki prashansha ki hai, usmein uparyukta samasyaayen unhen nazar aati hain. tamaam paathak mera wah lekh dekh sakte hain & meri saarvajanik appeal hai ki kripya use dekhkar vastuparak dhang se
likhen-bataayen ki usmein kahaan vyomesh ki kavitaaon ka vistrit vishleshan nahin kiya gaya hai ya ki aisa kiye bina unhen mahattvapoorna kavi bata diya gaya hai ? agar yah saabit ho jaay to bahas mein shaamil aap sabhi mitra mere liye jo saza nishchit karen, use sweekaar karne ke liye baaqhushi prastut hoon. apni or se bas itna kahna hai ki maine ab tak apne aalochanaatmak jeevan mein kisi bhi kavi ki taareef karna to door raha, is maqsad se uska naam tak nahin liya hai ki aisa karne se mera 'career' ban jaayega ! agar aisa kabhi socha ya kiya hota, to mera career wah na hota, jo aaj hai & aap sabke saamne hai. yahi wajah hai ki vyomesh ke vyakti ka nahin, unke kavi ka vastuparak vishleshan & saraahna karne ke liye aap sirf mere oopar hamla kar rahe hain, kyonki is poore saahityik drishya mein kewal main hi hoon, jo aapke sammukh sarwaadhik vedhya hoon, sabse aasaan victim hoon & darasal aap bhi baqhoobi jaante honge ki mujh par hamla karne se aapka koi nuqsaan nahin ho sakta ! fir bhi main aapke 'shar-kshep-kaushal' ke liye aapke prati saraahna ki bhaavanaa rakhta hoon.

-----pankaj chaturvedi
kanpur

शिरीष कुमार मौर्य said...

इस बहस में मुझे सबसे अधिक चिंता जिस बात की थी (और जिसे मैं घटने से पहले ही सोचने तक से डर रहा था) अंततः वह हो गयी - पंकज चतुर्वेदी जैसे संवेदनशील मनुष्य, समर्पित और निर्भ्रान्त आलोचक तथा सच्चे कवि का दिल दुख गया. यह इस बहस की सबसे बड़ी दुर्घटना है. आइए एक बार तमाम बुद्धिबल एक तरफ रख सच्चे दिल से इस बारे में भी सोचें. और क्या कहा जा सकता है इस मोड़ पर !

anurag vats said...

यह जिज्ञासा प्रकट की गई है कि मेरे लिखने की प्रेरक शक्ति कौन है...कहना न होगा कि वह कविता प्रथमतः और उसके इर्द-गिर्द लिखी गई कुछ बहसतलब बातें हैं, गिरिराज भी हैं...जैसे मेरे यहाँ हंटिंगटन हैं...उन पर मेरी राय है...सिर्फ इसलिए उन जैसे बौद्धिक के अवसान को नज़रअंदाज़ करना मुझे सही न जान पड़ा कि उनसे मार्क्सवादियों ने गंभीर बहसें की थीं...हंटिंगटन मार्क्सवादियों के लिए त्याज्य नहीं थे...उन्हें हिसाब में लेकर बात की गई थी...और इसमें क्या शक है कि विरोधी अगर कुछ तात्विक बोल रहा हो, तो उसे अनसुना न किया जाये...संयोग ही है कि हंटिंगटन के निधन के दिनों में हमास के ठिकानों पर इस्राइल की तरफ से १९६६ के बाद सबसे बड़े हमले हुए...हजारों जानें गईं...गाजापट्टी में जारी यह संघर्ष मुझे साभित्यिक संघर्ष के ज्वलंत रूपक लगते हैं...( किसी को कुछ और लगता होगा )...खैर यह बात और है कि साभ्यितिक संघर्ष के होमोजिनेटिक होने की बात जो हंटिंगटन कह गए हैं, समेत इसके, और इस्लाम पर भी उनके पूर्वग्रह्ग्रस्त विचार, मुझे अस्वीकार है...पर हंटिंगटन ने बीसवीं शताब्दी के ढलते वर्षों में वैश्विक संघर्षों के बारे में विचार करने का एक परिप्रेक्ष्य दिया...जैसा की असमाप्य असहमतियों के बावजूद हमारे यहाँ निर्मल वर्मा ने एक बहसतलब परिप्रेक्ष्य दिया...

तो क्या इनके निधन पर दो पंक्ति लिखने से मेरी प्रतिबद्धता दूषित हो गई...मेरे लिखे हुए से किसी तथ्य को अलागने की इस चयन दृष्टि की मैं दाद देता हूँ और उस पर पुनर्शोध-लाभ कर लेने वाले को बधाई ! ...इन्हीं स्नेही बंधुओं का ध्यान सोल्झेनित्सिन के निधनोपरांत लिखी इसी प्रकार की अपनी टिप्पणी और हिंदी में अछूत मान लिए गए शंकर शरण के लेख की ओर दिलाना चाहता हूँ...और कृष्ण बलदेव वैद की डायरिओं पर लिखी अपनी टीप की तरफ तो खासकर...इससे अगर मेरी समझ और आलोचना-दृष्टि के साथ-साथ मेरी प्रगतिशीलता आदि को संदेह के दायरे में देखा जाता है तो उसमें मैं क्या बदल सकता हूँ...

यहाँ तक आते-आते यह स्पष्ट हो गया होगा गिरिराज कि प्रकारांतर से इस बहस में आपको अपनी समझ से मैं उसी हंटिंगटन सरीखा प्रतिपक्षी का सम्मान देकर ही बढा रहा हूँ, जिसे आदतन मिस्कोट कर आप संतुष्ट हैं...आप हमसे भिन्न कह रहे हैं, तो भी हमारे लिए अनिवार्य हैं...कोई दूसरी प्रेरणा क्या होगी इससे इतर...

बहस शुरू हुई थी कविता से...पर पूर्वाचार्यों का सन्दर्भ देते हुए आपने उसे क्रिकेट मैच जैसा बना दिया है...आपमें कुछ तेंदुलकर सरीखा खेल जाने का भ्रम बरकरार है...और मेरी तो खैर मैदान पर आपके लेखे ट्रायल ही चल रही है...अव्वल तो पूर्वाचार्यों का सन्दर्भ मैंने सबद में प्रकाशित व्योमेश की कविअताओं पर अपनी टिप्पणी का साम्य पाकर दिया ( एजाज़ अहमद और असद पर आपकी मिस्कोट याद आ रही है...कितना मुफीद पाया आपने इन्हें अपने लिए !... )मैं व्योमेश की कविता तक अपनी समझ से पहुंचा यह पहले भी कह चूका हूँ...पूर्वाचार्यों का लिखा मेरे लिए एक सूचना भर था, जिसे आपके स्पेसिफिक न होने तक मैंने सूचनात्मक तरीके से ही इस्तेमाल किया था...अगर मेरी नियत में खोट होती तो दूसरी टिप्पणी में उनमें से कुछेक का लेखन संयोगवस उपलब्ध होने की बात पचा जाता...इस ईमानदारी को आपने दुर्लक्ष्य कर इसे संदेह से देखा है, इस पर क्या कहूँ आपको ?...देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह में आये उद्भावना संपादक से ही मैंने यह पुस्तिका प्राप्त की...जिन पर यह पुस्तिका है, उन कवि को हज़ार तगाते किये, वो अब तक भेजते हैं...तो यह है संयोग...इस सूचना को शेयर करने का मकसद आपकी बिना स्पेसिफिक हुए की गई पहली टिपण्णी में अवज्ञा की सारहीनता बताना भर था...हालाँकि दूसरी टिप्पणी में आप स्पेसिफिक होकर सारवान भी बन गए थे...और पंकज ने उचित ही लक्ष्य किया है, शर-क्षेप कौशल में प्रवीण भी...

पुनः कहूँ कि किसी पर मनोवैज्ञानिक बढ़त पाने की गरज से पूर्वाचार्यों का सन्दर्भ नहीं दिया गया...दूसरे, उनके द्वारा किये गए मूल्यांकन को लेकर कुछ भ्रमपूर्ण बातें भी फैली हुईं थीं, वह भी दूर होना ज़रूरी था...तीसरे, पूर्वाचार्यों के लेखन से मेरे संबंध बहुत तनावपूर्ण रहे हैं...वह तनाव अभी आपको उन पर लिखे मेरे किंचित आशंसापरक लेखन में संभवतः नहीं दिखता होगा ( जो कि परिमाण में अत्यल्प है...और यह उसका कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि वह ब्लॉग पर ही है...)...बहरहाल...

कविता के बारे में आपने प्रमेय सिद्ध करने की तर्ज पर यह मांग की है कि यह सिद्ध करें कि गिरिराज किराडू के द्वारा फेबल घोषित किये जाने के बाद उपर्युक्त कविता फेबल नहीं रह गई है...मेरा ख़याल है आपके इस आग्रह को ठुकराने के अलावा मैं कविता के बारे में अपनी राय दूसरी टिप्पणी के उत्तरार्ध में व्यक्त कर चूका हूँ, ( गीत से मुखातिब बातों को भी इसमें शामिल मानें, )...आपको उसमें निर्णय की अधिकता से समस्या है...जैसे की फेबल के आपकी अवधारणा मढ़ने से मुझे...यह कविता अगर फेबल है तो एकांत रुदन कर पाठकों पर डोरे डालनेवाली कागजी बिम्बों ( मुझे ''दुःख चिट्ठीरसा है''...तत्काल याद आ रहा है...) और वायवीय अनुभवों में अपने ही बसाव पर इतराती, राजनीतिक चेतना से शून्य कविताओं में आपको यथार्थ दर्शन होता होगा...प्रतिलिपि में इसके ''कुछ बहुत अच्छे नमूने'' आपने जुटाए हैं...( आशा है आप यह मानते होंगे कि प्रतिलिपि में छपे लेखक मेरी निगाह से ओझल नहीं हैं, और यहाँ स्पेसिफिक होने की बजाय कोष्ठक से पहले की मेरी उक्ति के सत्यापन के लिए आप अपनी ही प्रतिलिपि के पुनरवलोकन की मेरी सलाह मानेंगे, आपको निराशा नहीं होगी...)...

गीत को मेरी समझाइश से दिक्कत...इसलिए उनके सामने अब खुद को चुप करता हूँ...मुझे व्योमेश की ही ''चुप भी'' शीर्षक कविता की यहाँ पुरजोर याद आ रही है...

और अंत में प्रार्थना की तरह...हे प्रभु, कवियों की दोस्ती बनी रहे...

कथानुसार उनमें से एक कवि, दूसरे के बारे में महज प्रेम या दिखावे में नहीं...आलोचनात्मक अंतर्क्रिया से गुजर कर...यह कहते पाए गए कि ''पचासेक कविता पुराने'' इस कवि की सिर्फ २ कविताएं ही फेबल या कल्पना की हिंसा का शिकार हैं...शेष ४८ के क्या कहने...तो इस कथा को ही साक्षी मानकर एक और निर्णय अपनी छुद्र बुद्धि से देने की अनुमति चाहूँगा...वह यह कि जिस युवा कवि की पिछले पांचेक साल में लिखी गई कविताओं को मूल्यांकन की विभिन्न सरणियों से गुजारकर यथोचित मूल्यांकन के पश्चात इतनी बड़ी मात्रा में वैध महत्वपूर्णता प्रदान की गई है, हाँ, वही कवि, इन वर्षों में लिखी गई कविता का ''काव्य-पुरुष'' ( इस शब्द युग्म की विस्तार से व्याख्या के लिए मदन सोनी की पुस्तक ''कविता का व्योम और व्योम की कविता'' भी द्रष्टव्य ) है...

giriraj kiradoo said...

प्रिय पंकज जी,

मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि आपको जहाँ मैंने संबोधित किया है वहां आपके 'सावधान प्रगतिशील आलोचना से सावधान हो जाइये' पर रेस्पोंड करते हुए कहा था - और मेरा अभिप्रेत यही था कि हिंदी में अगर किसी चीज़ से बचे जाने की ज़रुरत है तो वो करियरिज्म, प्रतिष्ठानपरकता, असंतुलित व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आत्ममुग्धता और वर्चस्व-कामना है चाहे वो वह कहीं भी हो प्रगतिशीलों में या उसके बाहर. यह टिप्पणी आप पर कहीं से नहीं है, न इसका मंतव्य ऐसा था - मेरी आपसे गुजारिश है आप प्रासंगिक हिस्से पर मेरे आग्रह पर फिर से नजर डालें. मेरे पास आपके बारे में व्यक्तिगत स्तर पर कुछ भी बुरा कहने का कोई आधार नहीं है.लेकिन आप आहत हुए हैं, इसका मुझे बहुत दुःख और अफ़सोस रहेगा.

शेष मित्रों,

क्योंकि आर्गुमेंट तब से आगे नहीं बढा है -इसलिए और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है सिवाय एकाध बात के. यह मेरे समझने का पहला व्यक्तिगत अनुभव ज़रूर बन गया है जिसमें पठन एक 'हमला' है. और 'आलोचनात्मक संवाद' इस लगातार मंडरा रहे रूपक के सहारे से, उसकी छाया में एक 'युद्ध' है.
बहरहाल, बहस शुरू हुई थी कविता से...पर पूर्वाचार्यों का सन्दर्भ देते हुए आपने उसे क्रिकेट मैच जैसा बना दिया है...आपमें कुछ तेंदुलकर सरीखा खेल जाने का भ्रम बरकरार है...
ऐसे पर्यवेक्षणों का जवाब न देने से इस बहस पर फर्क नहीं पड़ेगा (यद्यपि क्रिकेट का रूपक धीरेश के शतकवीर और आपके हाल्फ सेंचुरी के बाद फिर आपके यहाँ ही लौटा है)
यह कविता अगर फेबल है तो एकांत रुदन कर पाठकों पर डोरे डालनेवाली कागजी बिम्बों ( मुझे ''दुःख चिट्ठीरसा है''...तत्काल याद आ रहा है...) और वायवीय अनुभवों में अपने ही बसाव पर इतराती, राजनीतिक चेतना से शून्य कविताओं में आपको यथार्थ दर्शन होता होगा...प्रतिलिपि में इसके ''कुछ बहुत अच्छे नमूने'' आपने जुटाए हैं...
इससे फिर प्रकट होता है कि इस तर्क पद्धति पर हिंदी की प्रगतिशीलता वर्सेज़ रूपवाद/कलावाद वाले समीकरणों का दबाव है.. जिस कवि का आपने जिक्र किया है उसके बारे में मेरी राय ज्ञात होने का कोई आधार नहीं होना चाहिए -मैंने उस कवि को अब तक न प्रकाशित किया है न उसके बारे एक शब्द “कभी” “कहीं” लिखा कहा है. ऐसे में यह जो लेखकों को अनिवार्यतः इस या उस तरफ देखने वाला पहले से बना हुआ फ्रेमवर्क है और हमला, युद्ध आदि की यह जो संकेतन व्यवस्था है उन लोगों को और निराश ही कर सकती है जो इस माहौल में लोकतान्त्रिक मान्यताओं के साथ हैं. आप के यहाँ भी ऐसे प्रयत्न यत्किंचित हैं इसलिए आपका ऐसा कहना और दुर्भाग्यपूर्ण है -

शेष यह कि 'एकांत रुदन' मेरे लिए इस हिंसा और शोर और युद्ध से भरे समय में ध्यान से सहानुभूति से सुनने की चीज़ है ("डोरे डालने" जैसे प्रयोग से कुछ और दिलचस्प पठन के रस्ते भी खुलते हैं जिनको मैं अब रेजिस्ट करता हूँ) - एकांत का इतना भय (एकांत=व्यक्तिवाद? के कारण तो नहीं?) क्यों? पत्रिका के २१० लेखकों में जिस 'अल्पसंख्यक' बिरादरी की ओर आपका संकेत है वह हिंदी में एक साहित्यिक अल्पसंख्यक ही है - आपके संख्या-विमर्श की तर्ज़ पर.
वैसे यह मेरा एक प्रस्ताव है जितनी विविधता भाषाओँ, विचारधाराओं और कलारूपों की प्रतिलिपि में है उतनी तरह की विविधता वाली किसी और ऐसी पत्रिका के बारे में जानते है जिसका संपादन कोई "हिंदी" लेखक करता हो तो मुझे ज़रूर बताएं – भारत से प्रकाशित होने वाली कोई गैर-संस्थानिक पत्रिका जो बिना सरकारी विज्ञापनों की कृपा के निकल रही हो।
आपके अंतिम पैरा से और हमले के लगातार बज रहे रूपक से भी यह लगता है कि मेरा पठन बतौर कवि व्योमेश की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाने की कोशिश थी तो मैं और निराश ही हो सकता हूँ. कैननाईजेशन एक जटिल और सत्तामूलक प्रक्रिया है और सब की तरह व्योमेश के मामले में भी और वे "काव्य-पुरुष" (मेरे ख्याल से इसका प्रस्तावित अर्थ है पिछले ५ साल का सबसे महत्त्वपूर्ण कवि पर मेरा मंतव्य पंचवर्षीय योजना से अधिक बड़े सामान्य कालखंड से है) हैं कि नहीं यह अभी एक खुला प्रश्न है – इसे एक क्लोज्ड निर्णय मत बनाईये।

pankaj said...

ab, jabki kiradoo ji yah kah rahe hain ki vyaktigat mere baare mein unhone koi aakshep nahin kiya hai, to maine unki baat par vishwaas karke use maan liya hai. magar unka aagrah yah bhi tha ki is sambandh mein unke pahle likhe gaye ko main fir se dekhoon, so wah bhi maine kar liya hai. paathakon, jo ki yahaan sab dost hi hain, se mera nivedan hai ki kripya unke 4 april ko post kiye gaye comment ko unka hi buniyaadi aagrah maante hue kripya fir se dekhen
! main misquote nahin kar raha hoon. kiradoo ji likhte hain ki wah vyomesh ke 'sab prashansakon' se nahin, 'kuchh prashansakon' se sambodhit hain
& jab unhen 'specific' hona hua, to sabse pahle wah likhit ullekh karte hain----'pankaj chaturvedi ka nibandh.' mere 'tatha' mein prakaashit nibandh ko wah yahaan 'sabad' naamak blog par vyomesh ki mahaz do taaza kavitaaon par likhi gayi anurag ji ki sampaadkeeya poorva-tippaniyon & kuchh shirish ji ki tippaniyon ( jo sanyogwash maine dekhi nahin hain ) ke saath rakhte hue likhte hain ki in 'kuchh' prashansakon mein 'baad mein shirish ka swar adhik sanyat raha hai, vyomesh ko prastut karte hue-----.' is uddharan se saaf hai ki 'pankaj chaturvedi ka nibandh' 'kam sanyat' lekhan ki koti mein shaamil kiya gaya hai.
dilchasp hai ki kiradoo ji itna gambheer aarop lagaate samay ukta nibandh ki kisi bhi sthaapana ko quote karna zaroori nahin samajhate ! shaayad isiliye walter benjamin ne likha hai ki 'ham jiski bhi aalochana karen, uska kam-se-kam ek vaakya apne lekhan mein zaroor quote karen'. isse hamaari aalochana mein saafgoi & sharpness ke saath-saath ek minimum vastuparakta ke aane ki ummeed ki ja sakti hai, shaayad !
meri jaankaari mein vyomesh ki kavita ke 'kuchh prashansak', jinhone un par vistrit aalochanaatmak lekhan kiya hai, abhi tak
sirf chaar hi hain---sarvashri vishnu khare, mangalesh dabral, yogendra aahooja & ek bechaara main, isliye ki main hi wah shaqhsa hoon, jise kiradoo ji ne aarop lagaane ke liye 'select' kiya------kya 'exclusiveness' hai ! yahi wah 'shar-kshep-kaushal' hai, jiski maine munaasib hi taareef ki thi. ghaurtalab hai ki 'tatha' mein chhape mere jis lekh par yahaan hamla kiya gaya hai, usmein vyomesh ki kavita ko lekar jitna bhi critical main hoon, shri vishnu khare , shri mangalesh dabral & shri yogendra aahooja utne bhi critical nahin hain, lekin 'vadh' ke liye sirf mujhe hi suyogya paaya gaya, to is adbhut 'exclusiveness' ke peechhe chhupe kaaranon ki paathak & mitra kalpana kar sakte hain! baharhaal, mangalesh ji ke aalekh par kiradoo ji kuchh nahin kahte, kyonki wah unhone parha hi nahin hai & yogendra ji ka wah zikra hi nahin karte, kyonki shaayad unhen vyomesh ki kavita ke 'prashansak' ya aalochak se zyaada
ek aham kathakaar bhar maante honge ya kaun jaane ki kya wajah hai ! maza yah hai ki mangalesh ji ya yogendra ji ke utkrishta aalochanaatmak evam vaichaarik gadya ki bajaay unhen mera likha zyaada pathaneeya laga, kyonki wah 'aapattijanak' tha. agarche vishnu khare ji
ke aalekh se wah poornataya sahmat hain, jismein unki bataayi gayi vyomesh ki ab tak ki kavitaaon ki sankhya 'pachaasek' se sambhavtah saat zyaada------yaani 58 kavitaaon ki nirbhraant saraahna ki gayi hai. is tarah ek aisa yuva kavi, jo kiradoo ji ki nigaah mein 58 shreshtha kavitaaon ka rachayita hai, unke hi shabdon mein ek 'achchha pratibhashali kavi' hai, wah unke mutaabiq 'sabad' par aayi apni kewal do nayi kavitaaon mein bhatak gaya hai
aur yah unhen itni sanjeeda & maaniqhez baat
lagti hi ki wah uski raksha mein daud padte hain aur lage haath, hindi ki 'pragatisheel aalochana' ko kosne, uske 'parabhav' ki ghoshana
karne ka naayaab mauqa bhi unhen mil jaata hai------kyonki unke anusaar yahi wah aalochana hai, jisne kavi ko uski in do taaza kavitaaon mein bhatka diya hai ! kaarya-kaaran-sambandha ke aise achook vivek se kisi ko bhi rashka ho sakta hai.
vaise agar kisi kavi ki 60 mein-se 58 kavitaayen achchhi hain & shri vishnu khare se apni sahmati jataakar qhud kiradoo ji bhi is baat ki tasdeeq kar rahe hain, to hindi ke ek aham kavi ne abhi phone par mujhse yah bahut achchhi & man-ranjan karnevaali baat kahi hai ki kaamyaabi ka yah pratishat to ghalib & shakespeare jaise kaviyon ko bhi haasil nahin tha ! fir sirf do nayi kavitaaon mein kavi ki kathit bhatkan se kiradoo ji is qadar vichalit hain ki dekhkar hairat hoti hai ! itne pareshaan
to ve bhi nahin hote honge, jinke apne ghar mein aag lagi ho !
ab kiradoo ji ka prastaav hai ki 'tatha' mein chhape mere lekh par wah mujhse roobaroo hone par baat kar lenge. yaani aarop saarvajanik taur par lagaaye jaayenge & unpar bahas ekaant mein hogi ! mera unse nivedan hai ki us lekh par ve bahas bhi isi 'sabad' blog ke manch par karen, jahaan aarop lagaana unhen suvidhajanak laga hai & agar blog ka maadhyam unhen iske upyukta na lagta ho, to kisi bhi patrika ke manch se wah is bahas ko aage barha sakte hain, lekin choonki is prasang mein ab tak sab-kuchh likhit hi hota aaya hai, isliye aage bhi likhit hi ho, vaachik nahin.
mujhe dukh hai ki kaise giriraj ji jaisa prabuddha kavi-aalochak-sampaadak 'hamle' ko theth abhidhaatmak artha mein grahan karke us 'roopak' ki maarfat 'yuddha' tak pahunch jaata hai & us par pragatisheel banaam kalavaadi kalah ki chhaaya ki kalpanaayen karta rahta hai. is hang-over se ubarne ki zaroorat hai, priy mitra ! gramsci ne jab kaha tha ki buddhi ke kshetra mein dushman ke sabse mazboot morche par hamla karna chaahiye, na ki kamzor morche par, tab aap bhi bhali-bhaanti jaante hain ki 'dushman', 'morcha', 'hamla' waghairah ke yahaan vaise aashay nahin hai, jaise abhipraay mere sandarbh mein jaan-boojhakar grahan karte hue aap qhwaaham-qhwaah apne pratipaksha ko ek qisma ke naitik kathghare mein khara karne ki koshish kiya karte hain.
abhi tak ki jo bahas hai, usse ham sabhi mitron ko kuchh sabaq seekhane ki zaroorat hai, filhaal ye teen mere dhyaan mein aa rahe hain------
1. out of context kisi ko quote mat karen, kyonki aisa quotation mis-interpretation ke liye baadhya karta hai.
2. kisi par vyaktigat aakshep na lagaayen, kyonki yah silsilaa agar shuroo ho gaya, to kabhi thamega nahin.
3.agar hindi ki pragatisheel aalochana ka, baqaul giriraj kiradoo, 'parabhav' ho gaya hai, to kya kiradoo ji yah bataane ki kripa karenge ki yah 'parabhav' unhen kin aalochakon ke lekhan mein nazar aa raha hai ? vaise is sweeping remark par unhen badhaai dene ki bhi ichchha hoti hai & yah kahne ki bhi ki sweeping remark se yathasaamarthya apni raksha karni chaahiye, kyonki use vyaavhaarik dharaatal par saabit karna mushkil hota hai.
4. fir bhi agar wah uparyukta 'parabhav' ko saabit kar sakenge, to yah bataane ki haalat mein nishchay hi honge ki utkarsha kis aalochana mein hua hai ? un aham aalochakon ke naam wah bata den, to ham doston par unki badi inaayat hogi !
5. aqheer mein shirish ji ke response ke liye unke prati dili shukriya zaahir karte hue yah guzaarish zaroor apne sabhi doston se karoonga ki mujhse bahas ya samvaad mein utarte hue buddhi-bal ko ek taraf rakh dene ki zaroorat hargiz nahin hai, balki mera anurodh hai ki is bahas mein apne samooche samvedanaatmak jnaan & jnaanaatmak samvedana ke saath shareek hon, jiska sandesh Muktibodh ne hamen diya hai ! jab tak baat vyaktigat aarop-pratyaarop par nahin utar aati, tab tak kisi ke buddhi-vaibhav se mujhe koi samasyaa nahin hai, balki main uske samaksha natshir hi hona chaahoonga, agar wah wahaan ho !
kiradoo ji ne kah diya hai ki jo aarop unhone lagaaye the, unka maqsood mujhse nahin tha, to unka yahi kahna mere liye paryaapta hai. rahi baat dosti ki, to wah hai, thee & rahegi, kisi bhi tarah ke bahas-mubaahase ke baavujood ! uske liye kisi ko bhi chintit hone ki qatai zaroorat nahin hai. aur haan, oopar jo 5 bindu maine aapke vichaaraartha rakhe hain, unhen vichaar ki hi saamagri maaniyega !
kripya inhen 'islaah', 'samajhaaish' ya 'sikhaawan' mat maaniyega !

-----pankaj chaturvedi
kanpur





















mitron ki jaankaari ke liye bata doon ki shri vishnu khare ke lekh mein vyomesh ki 58 kavitaaon ke uddharan milte hain, yaani unka vishleshan milta hai

Tushar Dhawal Singh said...

एक स्वस्थ बहस छिडी हुई है. बात व्योमेश की कविता पर गिरिराज की चिंता से शुरू हो कर कविता के तत्त्व, सरलीकरण, सामान्यीकरण और प्रगतिशील आलोचना तक आ गयी है. जैसा कि गीत ने कहा है कि किसी कविता के बारे में यह कहना कि यूं होता तो अच्छा होता, कवि और कविता के प्रति एक तरह का अन्याय है. फिर भी, कुछ तो बात कही ही जायेगी. यह भी एक सच है और बकौल गिरिराज, क्योंकि यह एक सच है इसलिए अन्यापूर्ण भी. लेकिन क्या सच हमेशा अन्यायपूर्ण ही होता है ? यदि ऐसा है तो सच दरअसल किसे कहा जा रहा है ? ठोस यथार्थ में भी कितना सच होता है इस पर बहस हो सकती है. यूँ तो हर किसी का अपना अपना सच होता है और एक सच वह होता है जो सत्ता बताती है कि यही सच है. एक और सच वह है जो दर्शन बताता है. हम इसकी व्याख्या कैसे करते हैं, यह हमारी मानसिक, सामाजिक और वस्तुस्थिति पर निर्भर करता है.
फ़िलहाल पोलेमिक्स की अनिवार्यता अथवा उसके भेद पर जो बहस हुई वह खुद भी अपने आप में एक पोलेमिकल टेक्स्ट हो गयी है.
गिरिराज ने ठीक कहा है कि प्रकारांतर से हिंदी साहित्य में 'प्रगतिशील' होना फैशनेबल हो गया है और हर कोई खुद को इसी अम्ब्रेला के नीचे रखना चाहता है. प्रगतिशीलों के शील पर भी कई प्रश्न उठते है जो वाजिब भी हैं. यह समय अपने गिरेबान में झाँकने का है.
बात अगर व्योमेश की कविता से शुरू हो कर कविता तक पहुंची और फिर उसकी समझ और आलोचना के paradigm से होते हुए कुछ व्यक्तिगत स्पस्टीकरण, क्षेप - आक्षेप तक आ गयी है तो यहाँ एक बात स्पष्ट हो जाती है, human constructs में objectivity भी subjective ही होती है. हम सच और उसके सरलीकरण और सामान्यीकरण के मुद्दों पर देर तक बहस करते रहे हैं लेकिन क्या सच सामान्य या सरल नहीं होता ? सच कभी भी इतना क्लिष्ट नहीं होता की उसे समझने के लिए किसी intellectual discourse की ज़रूरत पड़े. अगर व्योमेश ने कुछ 'अति सरल' लिख भी दिया है तो क्या वह कोई कमतर कविता मानी जायेगी ? ऐसा करते हुए हम अपने evaluative constructions और उसकी subjective objectivity का आरोपण किसी स्वायत्त रचना पर करने की हिंसा कर रहे होते हैं. साहित्य में समीक्षा का बहुत महत्त्व है और उसे कम नहीं किया जा सकता. लेकिन मुश्किल तब आती है जब स्थापित मापदंडों के चश्मे से हर कविता को देखा जाये. जिस तरह हर व्यक्ति अलग होता है उसी तरह हर कविता भी अलग होती है और यहाँ 'सब धान २२ पसेरी ' वाली बात लागू नहीं हो सकती.
लेकिन क्या निर्धारित मानदंडों पर खरी उतर कर ही कोई कला उत्कृष्ट हो सकती है ? चन्द स्थापनाएं कैसे सिद्ध करेंगी कि कला का चेहरा, उसका मस्तिष्क और ह्रदय कैसा होना चाहिए ? क्या यह जिद उस मुक्त उजास को धूमिल नहीं कर देती ? क्या कोई आग्रह कलाओं की विशिष्टता को बौना बना कर एक फैशन के तहत एक ‘शैडो आर्ट’ को जन्म नहीं देता और क्या फिर उन्हीं मानदंडों पर उसकी व्याख्या कर के हम प्योर आर्ट की अनदेखी नहीं कर देते हैं ? यहाँ 'प्योर आर्ट' की मेरी बात को कलावाद से जोड़ कर नहीं देखा जाये. प्योर आर्ट से मेरा तात्पर्य कला की मौलिक अभिव्यक्ति से है जो किसी मानदंड की छाया से प्रेरित या अभिशप्त न हुई हो. सरलीकरण से हमारे परहेज ने (जो एक हद तक उचित भी है ) हमें संश्लिष्ट और दुरुहता की ओर धकेल दिया है. मसलन, कोई कवि जी कविता के बजाय पहेली लिख देते हैं कि देखो मैंने कितना गूढ़ चिंतन किया है और कितनी बड़ी बात कही है. अब इसे बूझो तो जाने ! कोई प्रखर बुद्धि का पाठक उसमे से अपने कुछ अर्थ ढूंढ लाता है कि देखो मैंने ढूंढ लिया ! ज्ञान के अंहकार से फैला विभ्रम अंततः कला विवेक को ग्रसता चला जाता है और हम शिकायत करते हैं कि आज पाठकों की कमी हो गयी है. क्यों हमारी कविताओं को 'महान' कहलाने के लिए समीक्षक की ज़रूरत होती है ? हमारी कविता पाठकों तक क्यों नहीं पहुँच रही है ? क्या कवितायेँ सिर्फ समीक्षकों के तोष के लिए लिखी जाएँगी या फिर अपने पाठकों तक पहुँचने के लिए ? हम कविता क्यों लिखते हैं, कविता में किसकी बात करते है और हमें किस तक पहुंचना है ?
कविता में ऐसा क्या है कि उसे गूढ़ ही होना चाहिए ? बल्कि गूढ़ से गूढ़ रहस्य को हम सरलता से संप्रेषित कर सकें यह एक चुनौती है.
व्योमेश ने यदि आज के कवि के द्वंद्व, उसकी यथार्थ से निर्लिप्तता, उसके निरीह जीवन को सरलीकृत कर के पेश किया है तो मेरी समझ में यह उस कविता की शक्ति है. साथ ही किसी बलिष्ट व्यक्ति का सदमानव होना जहाँ आज के युग में चौंकता है वहीँ यह कवि कामना का अभिप्रेत भी है. इसमें शुरूआती पैरा में अगर कुछ पोलेमिकल भी है तो वह सिर्फ दूसरे पैरा के सन्दर्भ में ही है. हम तो बौद्धिक जुगाली में अहमन्यता की हद तक लगे हुए हैं और वहां एक आम आदमी अपने संघर्षों में लगा हुआ है और उसे उबार भी वही सड़क का आदमी रहा है. वह न खुद इस कविता का कवि है और न इस कविता में जो कवि है, वह है. इस लिहाज से मेरी समझ में यह पोलेमिकल कंटेंट जरूरी भी है. पोलेमिक्स रेटोरिक्स का अपना महत्त्व है और यह इसलिए की कविता को अपना असर छोड़ना होता है पाठक के मन पर. वह उसके सापेक्ष cognitive categories का हिस्सा बन कर रहती है.
हो सकता है कि बहस की दिशा से भिन्न कुछ सामान्य सी बातें ही मैंने भी कही है और हो सकता है कि सामान्य व्यक्ति होने की तरह ही विचारों के सामान्य होने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़े. लेकिन यह भी एक सरलीकृत और सामान्य सच है की सामान्य का सम्मान नहीं होता क्योंकि यह हमारे ग्रे मैटर्स को गुदगुदाता नहीं है. जिसे हम संसार कहते हैं वह हमारा ही mental construct है.

aparna Bajpai said...

Naya gyanoday ke prem visheshank 3 me Giriraj kiradoo ji ki kavita ke bimb ekdam naye hai . aur kavita ki Bhasha kavita lekhanke naye dwar kholti hai . Ye kavita mujhe bahut achchhe lagi.
Bilkul nayee lekhika hun. Kavita ki jyada samajh nahi hai. Kavita jaisa hi kuchh likhne ki koshish ki hai . SABAD ko bhejkar ray janana chahti hu.

भूख और रोटी
सब कहते है रोटियां आटे से बनती है
मै कहती हू रोटियां आटे से नही इच्छा , सपने और मेहनत से बनती है
और भूख ही जन्म देती है आटे को , रोटी को और आग को .
भूख ही है वह इच्छा
जो बना देती है घर , रिश्ते , दोस्त , दुश्मन और बाजार
जंहा , रोटी और भूख दोनी ही बिकती है
बस कीमत अलग अलग है और रोटी के आकर भी
रोटी कभी जिन्दा होती है , कभी मुर्दा
कभी गीली कभी सुखी
कभी जवान कभी बूढी
बस बिकती है
और अपने अपने खरीददारों में अपनी किस्मत ढूढती है
दोस्तों , कभी भूख लगे तो सिर्फ रोटी को मत खोजना
खोजना उस बाजार को जंहा हर रात किस्मत बदलती है
हो सकता है ,
तुम्हारी भूख किसी रोटी कि किस्मत बदल दे .