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Showing posts from April, 2009

कवि कह गया है : ४ : गिरिराज किराड़ू

जिसका ब्याह काल और अकाल से हो गया हो

''A
plague on both your houses.''
(MERCUTIO in Romeo and Juliet by William Shakespeare)

रोमियो एंड जूलियट शेक्सपीयर का पहला नाटक था जिसमें ट्रेजेडी और कॉमेडी के तत्व एक दूसरे में मिल गए थे. उस से पहले उनके नाटक भी या ट्रेजेडी होते थे या कॉमेडी और सबको, खासकर उस ज़माने के 'यूनिवर्सिटी विट्स' को आसानी रहती थी चीज़ों को समझने में. मर्क्युशियो नामक जिस पात्र के मुँह से यह वाक्य शेक्सपीयर ने कहलवाया है वह रोमियो और जूलियट के परिवारों की खूनी लडाई में एक पक्ष होते हुए भी कोई पक्ष नहीं है. उसे 'वफादारी' के किसी विवरण में गर्क नहीं किया जा सकता. वह मरते हुए कहेगा ही कि 'कहर टूट पड़े तुम्हारे दोनों खानदानों पर'. क्योंकि हिंसा की इस अर्थ-व्यवस्था में किसी एक के मंगल की कामना करना हिंसा के मंगल की कामना है.

कवि मर्क्युशियो की तरह जीते भी शायद हों, मरते तो निश्चय ही उसी की तरह हैं - दोनों घरों को शाप देते हुए.
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जिन लोगों ने शेक्सपीयर इन लव (१९९८) नामक फिल्म देखी है वे और कुछ नहीं तो इस बात के लिए फिर से समकालीन पश्चिम के …

पोथी पढि-पढि : २ : मारीना त्स्वेतायेवा

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जीवन जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं
हर पुस्तक अपने ही जीवन से एक चोरी की घटना है। जितना अधिक पढ़ोगे, उतनी ही कम होगी स्वयं जीने की इच्छा और सामर्थ्य। यह बात भयानक है ! पुस्तकें एक तरह की मृत्यु होती हैं। जो बहुत पढ़ चुका है वह सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बाहर रहता है, सुख काल अज्ञानता है।

लिखो, और लिखो ! हर क्षण, हर इशारे, हर आह को अंकित करो ! सिर्फ इशारों को ही नहीं, उन्हें देते हुए हाथों को भी, आहों को ही नहीं बल्कि होठों के आकार को भी, जिनके बीच से वे इतनी आसानी से निकली हैं।

सपने में देखना और लिखना तब संभव नहीं होता जब ऐसा करने की इच्छा न हो बल्कि तब संभव होता है जब (कुछ) लिखा जाना चाहता हो, और सपना देखा जाना... लेखक के जीवन में मुख्य चीज़ है लिखना...लिखने में सफल होना नहीं बल्कि कुछ लिख सकना...तुम्हारे भीतर जो चीज़ छिपी और दबी हुई है और कविताओं में खुली और प्रकट हुई है, वही तुम्हारी कविता का 'मैं' है, सपने का 'मैं' है। दूसरे शब्दों में, कविता का 'मैं' उन शक्तियों के प्रति कवि-मन का समर्पण है...

समकालीनता
का मतलब पूरे का पूरा अपना समय नहीं होता, …

बही - खाता : ७ : कुंवर नारायण

( यह एक ज्ञात किंतु कम चर्चित तथ्य है कि कुंवरजी का 'आकारों के आसपास' नाम से एक कहानी-संग्रह भी है, जिसकी कहानियों के बारे ऐसा कह कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि वे एक कवि की कहानियां हैं। उसके पीछे कवि-दृष्टि ज़रूर थी, पर उसे विशिष्टता फैशन, आन्दोलन और प्रतिमानों में बंधकर न लिखने की रचनेवाली मनीषा ने प्रदान की थी। बही-खाता में इस बार उसी जाग्रत मनीषा से संवाद कीजिए। कुंवरजी ने इस संग्रह की भूमिका स्वरुप जो विचार पैंतीस बरस पहले व्यक्त किए थे, उसकी मूल्यवत्ता अब भी जान पड़ती है। भूमिका को किंचित संपादन के साथ यहाँ दिया जा रहा है, इस बात को नोट करते हुए कि कथा-पट इधर फिर से गुलज़ार है और पिछले पाँच वर्षों में पचास के करीब तो कहानी-संग्रह आए हैं ! )

यथार्थ से रोमांस

इन कहानियों में वैसे रोमांचकारी और सनसनीखेज़ तत्व नहीं मिलेंगे जैसे कि आम तौर पर कहानियों में होना लाजिम समझा जाता है। न इनमें कड़वे यथार्थ की झांकी है, न मीठे प्रेम की कल्पना, न पहेली बुझानेवाली चारित्रिक दाँवपेंच, न मनोवैज्ञानिक तिकड़मों में उलझाया हुआ सेक्स और क्राइम...सच पूछिए तो इन सबको ठंडे दिल-दिमाग से सोचते हुए …

सबद निरंतर

कुंवरजी जितनी रुचि से पुस्तकें पढ़ते हैं, उतनी ही रुचि से फिल्में भी देखते हैं। यही वजह है कि अस्सी पार, घुटनों और आंखों में तकलीफ के बावजूद, वे फिल्में देखने अब भी निकल लेते हैं। मुझे कल सुबह-सुबह बताया, ''आज चलना है, राजुला की फ़िल्म है'', तो इस संगत का लाभ लेने से भला कैसे चूकता। राजुला की एक और फ़िल्म, बियोंड द व्हील, दो साल पहले आईआईसी में ही देखने की याद भी ताज़ा हो आई। तब अकेले गया था, पर कुंवरजी के साथ फ़िल्म देखने और उसके पहले और बाद, उस पर बात करने का अनुभव बिल्कुल अलहदा होता है। फिल्में देखने-समझने में उनके फिल्मों पर लेखन ( यह जल्द ही पुस्तकाकार आ रहा है ) और ऐसी आत्मीय मुलाकातों के दौरान फिल्मकारों और फिल्मों पर हुई चर्चा से मुझे रोशनी मिलती रही है। ऐसे कई फिल्मकार हैं जिनके बारे में मैं कुंवरजी से जान सका।

उनके लिखे या बोले हुए में विकिपीडियानुमा जानकारी नहीं है, और न उसमें आप्त वचन बोलने का कोई दर्प ही झलकता है। वे कल जब कह रहे थे कि साहित्य और सिनेमा को बहुत अलगा कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि बहुत अच्छे फ़िल्ममेकर दरअसल बहुत अच्छे लेखक ही हैं, तो अपनी…

रंगायन : ४ : ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे

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( रंगकर्म के जरिये भारत की विविधता कई स्तरों पर उद्घाटित हुई है, यह और बात है कि हम उसका ठीक ढंग से नोटिस लिए बिना उसकी अखिल भारतीय व्याप्ति की व्याख्या करते हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों की अनेक भाषाओं और शैलियों में अपने को व्यक्त करती इस समृद्ध रंग-परंपरा को शिखर रंग-व्यक्तित्वों के बहाने जानने-समझने के आग्रह को वरिष्ठ कथाकार, नाटककार और रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ के सामने रखने का ही सुफल रंगायन है। इस स्तम्भ में आप अब तक हबीब तनवीर, नेमिचंद्र जैन और ब.व. कारंथ के रंग- योगदान पर एकाग्र सुलभजी का गद्य पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में अब ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे। )


खुले मन का सर्जक

हृषीकेश सुलभ
ब. व. कारंथ द्वारा स्थापित रंगायन के निदेशक ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बेराष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जाने से पूर्व उन्होंने यक्षगान केन्द्र, उडुपी में पारम्परिक यक्षगान के लिए प्रशिक्षण प्राप्त किया था। रंगायन का निर्देशक बनने से पूर्व लगभग बाईस वर्षौं तक जाम्बे निनासम थियेटर इन्स्टीट्युट, हेग्गोडु के प्राचार्य रहे। रंगशिक्षण के इस दीर्घ अनुभव ने उनके रंगकर्म को नयी समझ द…

बूथ पर लड़ना

( आगे व्योमेश शुक्ल की दो कविताएं दी जा रही हैं। दूसरी कविता कहीं भी पहली बार छप रही है, जबकि पहली कविता को लोकतंत्र के पर्व, चुनाव, में कवि और उसकी कविता के माध्यम से हम अपने मोर्चे से एक ज़रूरी कार्रवाई मान रहे हैं। एक ऐसे समय में जब यह मान लिया गया हो कि कविता या या सरल-मति में साहित्य ही, हमारे समय के संघर्षों में हमारा बहुत साथ देने लायक नहीं रहा है, हालाँकि उससे कमतर-बदतर चीजों और लोगों से हम आस लगाये बैठे हैं, ''बूथ पर लड़ना'' सरीखी कविताएं बोध,विचार, विवेक और अनिर्णय की हमारी दुविधाजनक स्थिति को बदलती है। वह अपने भीतर जिस अन्यथा विवादस्पद तथ्य को अपना आत्म-सत्य स्वीकार कर आगे बढ़ती है, और उसके जितने आयामों को उद्घाटित करने में सफल हुई है, उसकी अपेक्षा हम हर अच्छी कविता से करते हैं, जो असल में बहुत कम मौकों पर पूरी होती दिखती है। इस लिहाज़ से वह इधर लिखी जा रही कविताओं में अपने तरह की अकेली है। हालाँकि बूथ जैसी सबसे छोटी इकाई पर भी प्रतिबद्ध होकर लड़नेवाले इस कवि में इस बात का भी बहुत तीखा एहसास है कि ''बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं''। )

बू…

बही - खाता : ६ : प्रभात रंजन

ऐसा लिख सकूं जो पढ़नेवालों को अपना-अपना सा लगे

लफ़्जों में बोलता है रगे-अस्र का लहू
लिखता है दस्ते-गैब कोई इस किताब में


लिखने के बाद जब अपनी रचना को पढ़ता हूं तो कई बार नासिर काज़मी के इस शेर की तरह मुझे खुद ऐसा लगता है जैसे मैं किसी और की कहानी पढ़ रहा हूं। बार-बार अपनी कहानियों के माध्यम से मैं वास्तव में अपने आपको, अपनी पहचान को कोई रूपाकार देने की कोशिश करता हूं, मगर पाता हूं कि हर बार वह कुछ और, कुछ और ही हो जाती है। हमारे दौर का शायद यही यथार्थ है... सब कुछ गड्डमड्ड...

मेरी कहानियों में कस्बे का जीवन विस्तृत रूप में आया है, मगर वास्तविकता यह है कि मैं ज्यादातर उस कस्बे ( सीतामढ़ी) से दूर ही रहता आया हूं जहां का लोकेल अक्सर मेरी कहानियों में आ जाता है। पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी के कारण अपनी जन्मभूमि में मैं रह नहीं पाया। मैं यह जानता हूं कि इसके अलावा मेरी और कोई पहचान नहीं हो सकती कि मैं सीतामढ़ी का रहनेवाला हूँ, मैं उसकी पहचान से अपने आपको ठीक से जोड़ नहीं पाता। लेकिन मेरे कथा-पात्रों की पहचान अक्सर उस कस्बे से जुड़ जाती है। मुझे भले अपने कस्बे के जीवन का विस्तृत अनुभव न हो, मेरे पात्रों म…

जो दृश्य में नहीं...

( एक अच्छे कवि की तरह व्योमेशशुक्लभी अपनी कविता की बनाई हुई लीक पर चलने, उसे पीटने और उससे ''अभी कुछ और'' वसूलने का मोह छोड़, उसे बहुत सार्थक ढंग से तोड़ रहे हैं। यह प्रौढ़ता उनकी कविता में बहुत कुछ अप्रत्याशित की समाई के लिए जगह बनाती है। बल्कि यह ज़्यादा सही कहना होगा कि ''अप्रत्याशित'' ( उसके महज चौंकानेवाले अर्थों में नहीं, हालाँकि वह भी ) उनके यहाँ एक काव्य-मूल्य की तरह उपस्थित है। दृश्य, जो पहले इस तरह नहीं दिखे थे, को उनकी कविता की केंद्रीय शक्ति कहा जा सकता है। दिलचस्प यह है कि कविता और वैचारिक गद्य के लिए वह लगभग एक जैसी भाषा का इस्तेमाल करते दिखते हैं और उसके प्रति कैसी बहुमुखी सजगता बरतते हैं, उसका जीता-जागता प्रमाण है यह कविता। सबद के लिए यह गौरव की बात है कि उसे इस युवा कवि की एक और महत्वपूर्ण कविता को पहलेपहल प्रकाशित करने का अवसर मिला, वह भी बतौर १०० वां पोस्ट। सबद अपने तमाम लेखकों-पाठकों और प्रेरणाओं के आगे नतशिर है। )

वक़्त का कि साइकिल का पहिया

कविता की भाषा क्या हो ? क्या यह तय करने की ज़रूरत है ? क्या यह तय करना उचित या नैतिक है ? या …