Saturday, March 28, 2009

लूज़ वन्स फेस


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उसने लगभग घर से बाहर जाना बंद कर दिया। उसे दुपहरें अच्छी लगती थीं, वह अपने कमरे में बैठा रहता, खिड़की से आकाश को देखता रहता, अवसन्न और सूनी हवा में चीलें मंद गति में उड़ती रहतीं। पीला, अवसाद-भरा सूरज दिखाई देता।

खाने के बाद वह छोटी-सी नींद लेता, उठने पर आँखें धोता, फिर आलमारी से पुस्तकों को निकालने लगता। उसकी प्रिय पुस्तक थी, लाइफ ऑन अर्थ जिसे वह अक्सर पढ़ता था। उसके फोटोग्राफ भी उसे बहुत अच्छे लगते थे, कीड़े, जानवर और पक्षियों को देखता, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा था और उसे आश्चर्य होता कि मनुष्य उनके बीच कितना अकेला प्राणी है।

जैसे ही सूरज धीरे-धीरे ढलने लगता और छतों पर रोशनी मंद पड़ने लगती, वह रसोई में जाकर चाय बनाता। यह वही रसोई थी, जहाँ बरसों पहले उसकी माँ खाना बनाया करती थीं। बरामदा भी वही था, जहाँ वह कुर्सी पर बैठी रहा करती थीं। वहीं से उन्होंने उसे आखिरी बार देखा था।

जब सर्दी बढ़ जाती, वह अपना लैंप जला लेता। यह टेबुल लैंप भी उसके भाई ने उसे उपहारस्वरूप दिया था। यह ''दो वक्तों के मिलने'' की घड़ी होती, जब वह अपने मित्रों को पत्र लिखता, जो अब काफी सुदूर देशों में रहते थे। वह थक जाता। वह कमरे से निकलकर अपनी छत पर आ जाता। आकाश पर तारे छितरे होते। गली में खेलते बच्चों की आवाजें सुनाई देतीं। नुक्कड़ की दुकान में एक लूले टेलर-मास्टर, जिनकी टांग नहीं थी, अब भी अपनी सिंगर मशीन पर ध्यानमग्न होकर झुके रहते।

वह गिलास में अपनी ड्रिंक बनाता। क्या संगीत का समय आन पहुँचा ? इस तरह दिन बीत जाता है और वह रात के आने की प्रतीक्षा करता है।

यह भयानक है, जब लेखक लिखना बंद कर देता है। उसके पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं रहता, सिवा अपने चेहरे के !

कहते हैं, पहले ज़माने में जापानी अपना ''चेहरा खो'' देते थे ( लूज़ वन्स फेस ), तो आत्महत्या कर लेते थे। यदि वह लेखक, जो लिख नहीं पाता, अपने जीवन का अंत कर डाले, तो उसका कारण बिलकुल उल्टा होगा -- अपना चेहरा दिखाने के अलावा उसके पास कुछ नहीं होता !
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( निर्मल जी की डायरी से आप पहले भी एक अंश सबद पर पढ़ चुके हैं। आगामी ३ अप्रैल को उनका जन्मदिन पड़ता है। )

12 comments:

ravindra vyas said...

यह सब बातें हिंदी में दूसरा कौन सा लेखक लिख सकता है?

अनिल कान्त : said...

जिसका भी लिखा हुआ है ...बेहतरीन लिखा है .....

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

रंजना said...

Bahut bahut aabhaar ,padhwane ke liye...

सौरभ द्विवेदी said...

अच्छा अंश चुना है आपने अनुराग जी, निर्मल का होना गद्य में आत्मा के मद्दिम ताप के होने जैसा था, मगर अब सिर्फ उनके लिख शब्द ही हैं हमारे साथ, इस अनन्य लेखक को हमारी श्रद्धांजलि...

giriraj kiradoo said...

मेल में लूज़ वंस फेस शीर्षक देखते ही निर्मलजी का चेहरा कौंध गया और उनसे अपनी वो एकमात्र मुलाकात याद आयी जो पटपड़गंज वाले घर में हुई थी. मैं उनपे एक लेख यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित थाती में लिख चुका था, मुझे उनपर अंग्रेजी में काम करने के लिए एक फेलोशिप मिली थी (हिंदी में क्यों नहीं यह संस्कृति विभाग ही बता सकता है, पहले मैं ठीक उसी शोध योजना के साथ हिंदी में आवेदन कर चुका था जब वह फेलोशिप मुझे नहीं मिली). थाती वाले लेख और सिनोप्सिस की कॉपी उन्हें भेज चुकने के बाद फोन पर तय हुआ कि क्रिसमस ब्रेक में जब मैं दिल्ली आऊँ तो उनसे मिल लूं. मेरे लेख से और शोध के प्रस्ताव ' एग्जाईल, क्रियेटिविटी एंड नेशनलिज्म इन निर्मल वर्मा'स राइटिंग ' से उन्हें अंदाजा था मेरी उनके लेखन को लेकर क्या पोजिशन है; खुद मैं अपने प्रस्ताव और पहले लेख में मिली दिशा से खासा आत्म-विश्वस्त था. दरअसल मेरा शोध 'प्रति-शोध' ( प्रतिशोध में कैसे काउंटर-रीसर्च का अर्थ छुपा है इससे वाकिफ होने के लिए मैं मदन सोनी का आभारी हूँ - जिन्होंने निर्मल पर खुद अपने काम को भी 'प्रति-शोध' कहा है, प्रति-लिपि नाम तय करते हुए भी यही था मन में) था. करीब चार घंटे मैं उनके साथ रहा और एक बिंदु पर उन्होंने कहा' क्या यह सब मेरे फिक्शन में है? जाने क्यों मेरे सारे लेखन को ५-१० पोलेमिकल लेखों पर बहस तक सीमित कर दिया जा रहा है'. जो बात है वो यह कि उस दिन क्रिसमस था, मैं उनके लिए फूल लेके गया था (हिंदी में शायद ही किसी और लेखक के जीवन में क्रिसमस वैसे अर्थवान हो जैसे उनके लिए था); 'ये आप मेरे लिए लाये हैं?' उन्होंने लगभग किसी बच्चे की तरह प्रफुल्लित होते हुए कहा, उनके हाथ जिस ऊष्मा से उन फूलों को करीब दो मिनट तक थामे रहे मुझे लगा मैं निष्कवच हो गया हूँ. निर्मल का मेरा पुराना पाठक जिसकी इस नए 'सांस्कृतिक' आलोचानावादी से कोई संगत नहीं थी, मानो पूरे आवेग के साथ लौट आ रहा था, एक पुराने 'चेहरे' की तरह जिसे हम कब का भूल चुकने का वहम करते है, एक पुराने लगाव, एक पुराने प्रेत की तरह और मुझे लगा मैं उस समूचे अवसाद और आनंद और कृतज्ञता में कुछ कहूँगा जो इस लेखक की किताबों से मुझे मिले थे - मुझे एक दूसरा मनुष्य बनाने वाले कुछ लेखकों में से एक से कहूँगा कि मैं कितना कृतज्ञ हूँ, कितना खुश हूँ कि उनके साथ हूँ - पर मेरा तब का मैं कोई और ही व्यक्ति था. मैं उनसे बहस करने लगा जबकि उन्हें शुरू से संकोच था कि वे अपने पर हो रहे काम में कुछ खास उपयोगी नहीं होंगे; कहा भी कि जिस कलाकार पर आप काम कर रहे हों उस से बात करने से बचना चाहिए.

इसके बावजूद वे बहुत ध्यान और उत्सुकता से मेरी बातें सुनते रहे. २-२१/२ धंटे में थोडा थक गए तो चाय बनाके लाये और फिर शुक्र है हम कुछ और बातें करने लगे.

मैं फिर कभी उनसे नहीं मिल सका; न वो शोध पूरा कर सका न एक पैसा ही लिया. यह मेरे पुराने चेहेरे, पुराने प्रेत का प्रतिशोध था, अब अक्सर उनको पढ़ते हुए मन भारी हो जाता है - अब मेरे मन में बहुत साफ़ है उनके फिक्शन की मेरी पढ़त क्या है, नॉन-फिक्शन की क्या और एक लेखक की तरह जीने की उनकी उम्रभर लम्बी जिद की क्या यह भी कि उनके परवर्ती लेखन-जीवन को कैसे समस्यात्मक करना है. निर्मल ने सब कुछ लिख कर किया. वो सबके सामने है.उसी दोपहर उन्होंने किसी प्रसंग में कहा कि आपको पता है कभी जापान में .... मैंने कहाँ हाँ आपकी ही किताब में पढ़ा है. मैंने उनके चेहरे की ओर देखा तब नहीं अब मुझे पता है वह एक लेखक का चेहरा था, अगर मैंने अपना चेहरा तब देखा होता तो शायद आईने में अपने को मृत पाया होता. अपने ही एक दूसरे चेहेरे के हाथों मृत.

pankaj said...

priy anurag ji,

bahut saraahaneeya & praasangik gadyaansha hai, jo darasal kavita hai. yaad aate hain hindi saahitya ke kuchh gine-chune shirshastha log, jo apna chehra bhi kho chuke hain aur jinhone likhana bhi band kar diya hai,par jinmein kisi bhayaavahta ka ehsaas nahin hai. ve darasal qhud bhayaavah hain,kyonki ve apni mrityu ke baad bhi jeevit roop mein hamaare saamne aate-jaate hain.bhakt lagataar unki stutiyaan gaate rahte hain.kya aapko yah sab sochkar kabhi-kabhi dar nahin lagta ?
----pankaj chaturvedi
kanpur

सुशील कुमार छौक्कर said...

डायरी का यह एक पन्ना दिल को भाया।

ssiddhant said...

bahut hi sundar aur prashansaneeya gadya hai anurag ji, kitna jyada kathin hai ek saahitykaar ke chehre ka khona aur aisi paristhiti mein shaant aur swabhavik rahna.dhanyavaad is post ke liye, bhavishya ke liye shubhkaamnaayen.

Ssiddhant Mohan Tiwary

ravindra vyas said...

अनिल कांतजी, जिसका भी लिखा हुआ नहीं है यह। इसे निर्मल वर्मा ने लिखा है। अनुरागजी ने उनका फोटो भी लगाया है। जरा ध्यान से पढ़िए और देखिए।

मुनीश ( munish ) said...

I saw him many times at International film festivals . A few years ago when Iffi used to happen in Delhi there used to be two venues ,one Siri fort where u needed a pass and other venue comprised of commercial theaters where u got to buy tickets and i found him visiting both with equal zeal. He was a great film buff as he told me later in a page 3party thrown by M.F. Hussein where i barged in courtesy Irfan.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

अनुराग आपको आभार इतने खूबसूरत अन्श को पढवाने का, साथ ही साथ ’गिरिराज’ जी का आभार जिन्होने अपने एक सन्समरण को हम लोगो के साथ साझा किया..

बहुत अच्छा लगा बहुत अच्छा.. सच मे कितना भयानक है न अपना चेहरा खोना... :।

leena malhotra rao said...

padhkar man abhiboot ho gaya... ek mahan rachnakar ki diary ka ek panna kitni khoobsoorti se likh diya hai unhone jo har rachnakar kabhi n kabhi sochta hai...