Wednesday, March 25, 2009

बही-खाता : ५ : ज्ञानरंजन


‘यात्रा’ विचलित करती रही है

...अपनी कहानियों पर चर्चा करना...एक प्रकार से उनमें लौटना मुझे बहुत उत्साहवर्धक नहीं लगता है। वास्तव में कुछ समय के लिए भी वापस जाने की इच्छा नहीं होती है। ऐसा नहीं हुआ है कि मैंने छपकर आई अपनी किसी कहानी को पढ़ा हो। छपी कहानी दिल को एकाएक रद्द कहानी लगने लगती थी। केवल एक कहानी ‘संबंध’ को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अभी भी पढ़ सकता हूं। यह सब क्यों होता है, या कैसे होता है, इसको खोजा तो जा सकता है पर इसमें कोई बुनियादी बात निकल पाएगी, यह कहना कठिन है।

मैं बचपन से उदास और आलसी रहा हूं। यह मेरी आंतरिक बाधा और समस्या है, इसलिए जब भी मैंने कोई कहानी लिखी, मुझे विस्मय हुआ अपने ऊपर, और बहुत खुशी भी हुई। ‘संबंध’ को मैंने एक सपाटे में लिखा। ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’ कहानियों ने काफी परिश्रम करवाया, लेकिन उनको लिखते वक्त मैं अपूर्व ‘कॉमिकल’ मनःस्थिति में था। दूसरी कहानियों में आगे या पीछे साथ-साथ यातना थी, ठसपन या क्षोभ लेकिन ‘घंटा’ लिखते वक्त, मुझे विश्वास है कि मेरा दिमाग ‘मार्सिलो मॉस्त्रियानी’ के चेहरे की तरह रहा होगा जिसको देखने से लगता है कि उसने जन्म के साथ ही दुनिया को जान लिया होगा।

अपनी कहानियों के बारे में मेरा अनुभव यह है कि जब भी वे सामने आती थीं, मेरे साथियों ने चुप्पी और लगभग आतंकित हो जाने जैसा सलूक किया। मेरे अभिन्न मुझे घूरते थे और खेद अनुभव करते थे और घर में कहानी को माता-पिता लगभग छिपी जगहों में डाल देते थे। मेरे सभी भाई-बहिन वयस्क थे। आलोचक नेमिचंद्र जैन ने मेरी कहानियों के बारे में लिखा कि उनमें डरावना ‘अनंभव संसार’ है। साथी, संबंधी और आलोचक कहानियों को कहीं-न-कहीं मेरी निजी जिंदगी से जोड़ते थे।

हिंदी साहित्य संसार की यह एक अभूतपूर्व स्थिति रही है। मेरी ‘पिता’ कहानी की तारीफ में उसे पिता-विरोधी दर्शन के साथ जोड़ने की क्रांतिकारी आलोचना भी सामने आई। मैं उस तरीके को कभी पसंद नहीं कर सका, क्योंकि मेरी कहानियों में निजी मामले काफी हद तक झूठ भी थे-हां, वे सार्वजनिक के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़े जा सकते थे।

इस प्रकार के व्यवहार से मुझे संदेह होने लगा है कि मेरी कहानियों में शायद अश्लीलता मौजूद है या फिर हमारे साथ सलूक करनेवालों में साहित्य-विरोध पर्याप्त मात्रा में घुसा हुआ है।

सच्चाई यह थी कि मेरा निजी जीवन काफी सुखद, प्रफुल्ल और मित्रवादी रहा है। किसी वास्तविक कहानी की रचना के पीछे कभी-कभी यह भी हुआ है कि एक कविता ने उसका निर्माण कर दिया। ‘दिवास्वपनी’ मेरी पहली प्रकाशित कहानी है। पहली लिखी कहानी ‘मनहूस बंगला’ थी। बाद में कहानी अचानक फिल्मी लगने लगी थी। ‘दिवास्वप्नी’ को भैरवप्रसाद गुप्त ने ‘कहानी’ में छापा था। इसकी पृष्ठभूमि में ‘लोर्का’ की एक मेरी प्रिय कविता की ताकत काम करती रही। यह कविता ‘दिवास्वप्नी’ के रूप में बदल गई।

यह विचित्र बात है कि जब मैं कमरे में बैठकर जोर-जोर से कविताएं पढ़ता हूं तो कहानी कहानी लिखने की उमंग उठती है अन्यथा जैसा पहले कहा है, मैं बहुत आलसी हूं।

लेखन के किशोरपन और उसके गुरूर से मुक्त होने के बाद जो नया दौर शुरू होता है, उसमें ‘यात्रा’, ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘अनुभव’ कहानियां आईं हैं। ‘फेंस के इधर-उधर’ की जर्जर प्रति को भी संभालकर रखनेवाले मेरे बहुत से पाठकों को दूसरे कहानी-संग्रह ‘यात्रा’ की कहानियों से किंचित निराशा हुई। दृश्य-पटल इतना ज्यादा बदला कि काफी लोग उतना नहीं बदल सके।

‘यात्रा’ में वह व्यक्ति, ‘जो मृत्यु को आमने-सामने खड़ा होकर देखता है, एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में प्रकाशित हुआ है।’ मेरी यह कहानी उतना ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई जितना होता तो अच्छा था। इसमें झटका नहीं है, जलवा नहीं हैं, लेकिन यह कहानी मुझे काफी विचलित करती रही है।

...मैं लगातार इस छटपटाहट में हूं कि इसके बाद की कहानी लिखी जा सके।
****
( ज्ञानरंजन साठोत्तरी पीढ़ी के अग्रणी कथाकार और पहल के यशस्वी संपादक हैं। ज्ञानजी ने अपनी कहानियो पर यह टीप सन ८४ में राजकामल से प्रकाशित प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका स्वरुप लिखी थी। इसे यहाँ किंचित संपादन के साथ दिया जा रहा है। यह जितना इस स्तम्भ के लिए अपरिहार्य है उतना ही अपनी भाषा के एक जेठे कथाकार को उसकी कहे की '' ...मैं लगातार इस छटपटाहट में हूं कि इसके बाद की कहानी लिखी जा सके।...'' याद दिलाने का निमित्त भी ... खासकर तब जब उन्होंने पहल का प्रकाशन बंद कर दिया है। )

9 comments:

pankaj said...

priy anurag ji,

jnaanranjan ji ka yah gadyaansh prastut karke aapne ham jaise paathakon par bahut ehsaan kiya hai. hindi mein lambe arse tak jnanji isiliye itni utkrisht patrika nikaal sake, kyonki unki chetna mein kavita aur kahani ka anootha sanshleshan hai. aaj ke dour ki is sachaayi ki dhamak ko jnanji ne varshon pahle hi apni ragon mein mahsoos kar liya tha ki vidhaaon ke beech paida kiya gaya akademik farq srijanaatmak star par bemaani hai. maslan vinod kumar shukla ka upanyaas kyon kavita nahin kaha ja sakta aur unki lambi kavitaayen apne-aap mein aakhyaan kyon nahin hain ? isi tarah vishnu khare ki kavitaaon mein tamaam naayaab kahaaniyon ka sansaar milta hai, jo kam-se-kam hamaare samay ke vrihat, sanshlisht aur bahu-aayaami mizaaj aur halchal ko samajhne evam jaan paane ke lihaaz se kathit kahaaniyon ki banisbat hamaare liye kahin zyaada moolyavaan hai.
yah ghaurtalab hai ki muktibodh, ajneya, jainendra kumar, raghuvir sahay, nirmal verma, uday prakash, akhilesh, yogendra aahuja, devi prasad mishra vaghairah kya isiliye itne achchhe kahaanikaar hain ki inhone khandit chetna ke saath nahin likha, balki kavita aur kahaani ki kisi saajha zameen par rachana ki ? shaayad isi vajah se muktibodh ne kuchh is tarah ki baat likhi hai ki ek qadam rakhta hoon ki sau raahen footati hain-----kahaaniyaan aur upanyaas mil jaate------!
is bindu par hindi mein ek gambhir bahas darkaar hai ki kya vaastav mein kavita aur kahaani ya gadya aur padya mein sachche aur buniyaadi farq rekhaankit kiye ja sakte hain---kam-se-kam aaj ke rachanaatmak daur mein ? mujhe to, koi bura na maane to kahoon, shamsher bahadur singh, kedarnath singh, mangalesh dabral, asad zaidi, manmohan, rajesh joshi aur vyomesh shukla sareekhe kaviyon ka vaichaarik evam srijanaatmak gadya, akhilesh ki
kitaab--wah jo yathaarth tha----aur aalok dhanva jo kuchh bhi kahte hain, wah------kisi kavita ke paath se kam nahin lagta. yahi baat main hindi ke shreshth-tam aalochakon ki baabat bhi kah sakta hoon-----jinke naam lene ki zaroorat main nahin samajhta, kyonki samajhdaar log sab jaante hain. lage haath yah bhi yaad aaya ki hari shanker parsaai ke shreshthtam vyangya-lekhan ko koi kya kahega----kavita ya gadya ?
yon yah bahut jatil, maarmik aur challenging sawaal hai. vigat samay mein kabhi delhi mein mangalesh ji aur asad ji se mulaaqaat ke waqt maine yahi prashna rakha tha. dilchasp hai ki hamaari bhaasha ke in donon hi samarth kaviyon ne kuchh kahne ki bajaaye ek qism ke asmanjas mein hi rahna pasand kiya.
puraane zamaane mein mahakaavyon mein kahaaniyaan aur aakhyaan mil jaate the aur ab aisa hi nahin hai ki kahaaniyon mein kavita mil jaati ho, balki zyaada sach to yah hai ki sabhi raaston ka ek-doosare ko intersect kiye baghair, ek-doosre mein involve hue baghair astitva aur nirvaah hi mumkin nahin hai. in sab sawaalon ke paar sachaayi kahin yah to nahin hai ki kavita hi ultimate cheez hai, jiske bina kisi ka kaam nahin chal sakta------jaisa ki shaayad borqhez ne kaha hai------life is, i am sure, made up of poetry !

------pankaj chaturvedi
kanpur

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

संसार में मैं जिन लोगों को प्यार करता हूँ उनमें ज्ञान जी शामिल हैं. उनका गद्य अप्रतिम और सिर्फ उनका है. उस तरह की भाषा से जो निकल सकता था उन्होंने निकाल लिया.

dhiresh said...

सही ही उम्मीद लगा रहे हैं आप. कभी-कभार वाले भी ये गुजारिश कर चुके हैं

Ashok Pande said...

ज्ञानरंजन इतने बड़े लेखक हैं कि उनके बारे में कुछ कह पाना मेरे बस का नहीं.

वे हैं और हैं और सतत रहेंगे.

उन्हें यहां लाने का शुक्रिया भाई अनुराग.

Ek ziddi dhun said...

किसी तरह पंकज चतुर्वेदी के कंप्यूटर में ये जुगाड़ कीजिए कि वे अपनी टिप्पणी देवनागरी में दे सकें। रोमन लिपि में लंबा पढ़ना मुशिकल हो जाता है। कल नहीं पढ़ा था, अब मुश्किल से पढ़ पाया, मजा आ गया। उन्होंने बहुत जरूरी और दिलचस्प सवाल उठाया है। उन्होंने वाकई नाम भी सही ही गिनाए हैं। हिंदी की परंपरागत अध्यापन और आलोचना तो रघुवीर सहाय और मुक्तिबोध को महज कवि ही बताती है। पंकज जी के इसी तरह के जिक्र काम आ जाते हैं। मनमोहन से सुनकर मैंने रघुवीर सहाय और फिर मुक्तिबोध की कविताएं पढ़ीं और आश्चर्य में डूब गया। मुक्तिबोध के आलोचक पक्ष को भी नजरंदाज किया जात है।
...असद जैदी की कविता 1857 (सामान की तलाश)पढ़िए और फिर उन्हीं दिनों इसी बारे में नया पथ में आया उनका छोटा सा लेख।
...मंगलेश, मनमोहन और शुभा एक-डेढ़ साल पहले कुछ देर साथ थे और खूबसूरत गद्य के बारे में बात कर रहे थे। मनमोहन ने कई नाम सुनाए जो मेरे लिए कतई अनजान थे और साहित्य की दुनिया में बहुत शोरोगुल वाले नहीं हैं, जिन पर मंगलेश जी खुश हुए जाते थे। फिर मंगलेश जी ने ऐसे ही कई नाम याद किए। और बात निर्मल वर्मा तक पहुंची। बकौल मंगलेश जी निर्मल वर्मा ने रोमियो जूलियट और अंधेरा उपन्यास के अनुवाद के साथ सुंदर भाषा पाई।
...इसी तरह विचार की कविता वाले कह दिए जाने वाले मनमोहन की कविताओं का प्रवाह और सूफियाना रंग को छोड़ भी दें तो उनके कई लेख और फटेहाल डायरियां पढ़े जाने लायक हैं। सत्यपाल सहगल के घर से मैंने रघुवर सहाय पर एक किताब (जो अब वत्स साहब के पास है) में मनमोहन का जो लेख पढ़ा, उसके बाद मुझे उनके गद्य की तलाश होने लगी। अब इबारत में पहली बार उनकी डायरी के कुछ अंश आ रहे हैं।
...मैं इतनी अहमकाना बकवास के बाद फिर पंकज जी की बात दोहराना चाहता हूं - balki zyaada sach to yah hai ki sabhi raaston ka ek-doosare ko intersect kiye baghair, ek-doosre mein involve hue baghair astitva aur nirvaah hi mumkin nahin hai. in sab sawaalon ke paar sachaayi kahin yah to nahin hai ki kavita hi ultimate cheez hai, jiske bina kisi ka kaam nahin chal sakta------jaisa ki shaayad borqhez ne kaha hai------life is, i am sure, made up of poetry !

धीरेश said...

मनमोहन से सुनकर मैंने रघुवीर सहाय और फिर मुक्तिबोध की कविताएं पढ़ीं (इस वाक्य में कविताएं की जगह कहानियां पढ़ें)

pankaj said...

dheeresh ji ki pyaar aur vichaar ki roshani se aaplaavit yah chitthi parhkar bahut qhushi hui. meri mehnat saarthak ho gayi. main roman typing mein hi itna poor hoon ki kewal itna type karne mein hi kal mujhe 2 ghante lag gaye the. mere paas apna computer bhi nahin hai.net-cafe ki sharan mein jaata hoon. dheeresh ji ne is bahas ko aage badhaaya hai, par yah aur bhi aage badh sake to hindi ke saahitya-vimarshon ke liye wah bahut saarthak aur moolyavaan hoga.

---pankaj chaturvedi
kanpur

मृत्युंजय said...

पंकज की के खत का नागरी लिप्यांतर-
प्रिय अनुराग जी ,

ज्ञानरंजन जी का यह गद्यांश प्रस्तुत करके आपने हम जैसे पाठकों पर बहुत एहसान किया है . हिंदी में लम्बे अरसे तक ज्ञानजी इसीलिए इतनी उत्कृष्ट पत्रिका निकाल सके , क्योंकि उनकी चेतना में कविता और कहानी का अनूठा संश्लेषण है . आज के दौर की इस सचाई की धमक को ज्ञानजी ने वर्षों पहले ही अपनी रगों में महसूस कर लिया था कि विधाओं के बीच पैदा किया गया अकादमिक फर्क सृजनात्मक स्तर पर बेमानी है . मसलन विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास क्यों कविता नहीं कहा जा सकता और उनकी लम्बी कवितायें अपने -आप में आख्यान क्यों नहीं हैं ? इसी तरह विष्णु खरे की कविताओं में तमाम नायाब कहानियों का संसार मिलता है , जो कम -से -कम हमारे समय के वृहत , संश्लिष्ट और बहु -आयामी मिज़ाज और हलचल को समझने एवं जान पाने के लिहाज़ से कथित कहानियों की बनिस्बत हमारे लिए कहीं ज्यादा मूल्यवान है .
यह ग़ौरतलब है कि मुक्तिबोध , अज्ञेय , जैनेन्द्र कुमार , रघुवीर सहाय , निर्मल वर्मा , उदय प्रकाश , अखिलेश , योगेन्द्र आहूजा , देवी प्रसाद मिश्र वगैरह क्या इसीलिए इतने अच्छे कहानीकार हैं कि इन्होने खंडित चेतना के साथ नहीं लिखा , बल्कि कविता और कहानी की किसी साझा ज़मीन पर रचना की ? शायद इसी वजह से मुक्तिबोध ने कुछ इस तरह की बात लिखी है कि एक क़दम रखता हूँ कि सौ राहें फूटती हैं -----कहानियां और उपन्यास मिल जाते ------!
इस बिंदु पर हिंदी में एक गंभीर बहस दरकार है कि क्या वास्तव में कविता और कहानी या गद्य और पद्य में सच्चे और बुनियादी फर्क रेखांकित किये जा सकते हैं ---कम -से -कम आज के रचनात्मक दौर में ? मुझे तो , कोई बुरा न माने तो कहूं , शमशेर बहादुर सिंह , केदारनाथ सिंह , मंगलेश डबराल , असद जैदी , मनमोहन , राजेश जोशी और व्योमेश शुक्ल सरीखे कवियों का वैचारिक एवं सृजनात्मक गद्य , अखिलेश की किताब --वह जो यथार्थ था ----और आलोक धन्वा जो कुछ भी कहते हैं , वह ------किसी कविता के पाठ से कम नहीं लगता . यही बात मैं हिंदी के श्रेष्ठ -तम आलोचकों की बाबत भी कह सकता हूँ -----जिनके नाम लेने की ज़रुरत मैं नहीं समझता , क्योंकि समझदार लोग सब जानते हैं . लगे हाथ यह भी याद आया कि हरिशंकर परसाई के श्रेष्ठतम व्यंग्य -लेखन को कोई क्या कहेगा ----कविता या गद्य ?
यों यह बहुत जटिल , मार्मिक और चैलेंजिंग सवाल है . विगत समय में कभी दिल्ली में मंगलेश जी और असद जी से मुलाक़ात के वक़्त मैंने यही प्रश्न रखा था . दिलचस्प है कि हमारी भाषा के इन दोनों ही समर्थ कवियों ने कुछ कहने की बजाये एक किस्म के असमंजस में ही रहना पसंद किया .
पुराने ज़माने में महाकाव्यों में कहानियां और आख्यान मिल जाते थे और अब ऐसा ही नहीं है कि कहानियों में कविता मिल जाती हो , बल्कि ज्यादा सच तो यह है की सभी रास्तों का एक -दूसरे को इंटरसेक्ट किये बगैर , एक -दूसरे में इनवाल्व हुए बगैर अस्तित्व और निर्वाह ही मुमकिन नहीं है . इन सब सवालों के पार सचाई कहीं यह तो नहीं है कि कविता ही अल्टीमेट चीज़ है , जिसके बिना किसी का काम नहीं चल सकता ------जैसा की शायद बोर्खेज ने कहा है ------Life is , I am sure , made up of poetry !

पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

वंदना शुक्ला said...

...मैं लगातार इस छटपटाहट में हूं कि इसके बाद की कहानी लिखी जा सके।...'' याद दिलाने का निमित्त भी ... खासकर तब जब उन्होंने पहल का प्रकाशन बंद कर दिया है।.....सहमत |
अपने प्रिय लेखक ज्ञानरंजन जी की अपनी स्वयं की कहानियों पर चर्चा अच्छी लगी |इस उम्मीद के साथ ,कि अगली कहानी जल्दी पढ़ने को मिले ...धन्य वाद अनुराग