Friday, March 20, 2009

कोठार से बीज : ७ : साही





( विजयदेवनारायण
साही को प्रमुखतः उनके आलोचनात्मक अवदान के लिए ही याद किया जाता है। इसकी एक वजह यह रही कि जिस छठवें दशक और उसके आसपास की आलोचना के वे अनिवार्य सन्दर्भ बन गए और उसकी ओट में जितना सार्थक कवि-कर्म किया, उसे प्रकाशित करने में वे जीवनांत उतने ही संकोची रहे। उनकी बहुत सी कवितायें मरणोपरांत पुस्तकाकार आ सकीं। हालाँकि तीसरा सप्तक से एक कवि के रूप में नई कविता के सृजन परिदृश्य में वे सामने आ चुके थे, पर कवि, आलोचक और समाजवादी कार्यकर्ता की तिहरी जिम्मेदारी निभा रहे साही की कवि-छवि इसमें कहीं दब गई। साही ने अत्यन्त मूल्यवान कवितायें लिखी हैं। उसमें एक सत्याग्रही साहस और नम्रता है। इन मायनों में जिस दौर में ये कवितायें लिखी गईं थीं, उस दौर की काव्य-भाषा और भंगिमा की ये सहज विलोम भी हैं। कोठार से बीज में इस बार साही की कवितायों से ही एक चयन। )
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दे दे इस साहसी अकेले को

दे दे रे
दे दे इस साहसी अकेले को
एक बूँद।

सन्ध्या
ओ फ़कीर चिड़िया
ओ रुकी हुई हवा
ओ क्रमशः तर होती हुई जाड़े की नर्मी
ओ आस पास झाड़ों झंखाड़ों पर बैठ रही आत्मीयता

कैसे ? इस धूसर परिक्षण में पंख खोल
कैसे जिया जाता है ?
कैसे सब हार त्याग
बार-बार जीवन से स्वत्व
लिया जाता है ?
कैसे, किस अमृत से
सूखते कपाटों को चीर चीर
मन को निर्बन्ध किया जाता है ?

दे दे इस साहसी अकेले को।
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प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए

परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे।

दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख
की गांठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खायेगा।

दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इस दहाड़ते आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा।

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ।
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सूरज

साधो तुमको विश्वास नहीं होगा
रोज सबेरे अभी भी सूरज निकलता है
गोल गोल लाल लाल
उसकी बड़ी-बड़ी आँखें हैं
फूले-फूले गाल
और भोला-सा मुँह
मेरे जी में आता है
उसे गोद में ले लूँ
और स्याही से उसकी मूंछे बनाऊं।

सारी दुनिया तो उसके ताप से
जल रही है
साधो भाई
मैं अपना यह वत्सल भाव
किसको सुनाऊं ?
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चमत्कार की प्रतीक्षा

क्या अब भी कोई चमत्कार घटित होगा ?
जैसे कि ऊपर से गुजरती हुई हवा
तुम्हारे सामने साकार खड़ी हो जाय
और तुम्हारा हाथ पकड़कर कहे
तुम्हारे वास्ते ही यहाँ तक आई थी
अब कहीं नहीं जाउंगी।

या यह दोपहर ही
जो, हर पत्ती, हर डाल, हर फूल पर लिपटी हुई
धीरे-धीरे कपूर की तरह
बीत रही है
सहसा कुंडली से फन उठाकर कहे --
मुझे नचाओ
मैं तुम्हारी बीन पर
नाचने आई हूँ।

यह यह उदास नदी
जो न जाने कितने इतिहासों को बटोरती
समुद्र की ओर बढ़ती जा रही है
अचानक मुड कर कहे--
मुझे अपनी अँजली में उठा लो
मैं तुम्हारी अस्थियों को
मुक्त करने आई हूँ।

या इन सबसे बड़ा चमत्कार
हवा जैसे गुजरती है गुजर जाय
दोपहर जैसे बीतती है बीत जाय
नदी जैसे बहती है बह जाय
सिर्फ तुम
जैसे गुजर रहे हो गुजरना बंद कर दो
जैसे बीत रहे हो बीतना बंद कर दो
जैसे बह रहे हो बहना बंद कर दो।
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3 comments:

giriraj said...

हिंदी की प्रिंट दुनिया में जो स्मृतिहीनता की शिकायत (मुख्यतः सौजन्य: अशोक वाजपेयी) या उसके मुकाबले में जो अखंड जाप जैसे कि 'मुक्तिबोध महाजाप' चलता है उसकी पृष्ठभूमि में कोठार बहुत संजीदा और जिम्मेवार स्तम्भ बन गया है - ऐसी ही उम्मीद सखा पाठ वाले से भी थी :)- . पिछले २-३ पोस्ट से तुमने खुद वापिस लिखना शुरू किया है यह बहुत अच्छा लग रहा है. साही की साधो आज मेरे सत की परीक्षा है वाली कविता के भी कुछ पुनर्प्रकाशन होने चाहिए.

सुभाष नीरव said...

साही जी की कविताएं नि:संदेह मूल्यवान हैं। यह हिन्दी कविता क्षेत्र की विड्म्बना ही रही है कि जो लोग संकोची स्वभाव के होते हैं और अच्छी कविताएं लिखते हैं, कविता के विद्वान आलोचक, कविता प्रेमी उस पर एक शातिरयाना चुप्पी साध लेते हैं। ऐसे बहुत से होनहार कवि आज भी इस राजनीति के चलते गुमनामी के अंधेरे में लुप्त हो जाते हैं। साही जी की कविताएं इस बात का प्रमाण है कि वे अपने समय में कितनी दमखम वाली कविताएं लिख रहे थे। चलो, मरणोपरांत उनका कविता संग्रह तो आया। आपने उन्हें याद करके "सबद् ' को एक गरिमा प्रदान की है।

anil pandey said...

सिर्फ तुम
जैसे गुजर रहे हो गुजरना बंद कर दो
जैसे बीत रहे हो बीतना बंद कर दो
जैसे बह रहे हो बहना बंद कर दो।
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in kavitaaon ko padhne ke baad wastwiktah ye ahesas hota hai ki koi aaj bhi lagaatar kah rha ho kuchh kr pane ke lie ya kar jaane ke liye