Wednesday, March 18, 2009

कला का आलोक : ३ : धीरेन्द्र मोहन तिवारी

( धीरेन्द्र के ये कविता चित्र कलाओं की आपसदारी के सुंदर नमूने हैं। यों तो कला जीवन से गहरे प्रतिकृत होती है पर वह अपनी भगिनी विधाओं से भी उतना ही सीखने-जानने की अभिलाषा और स्वप्न संजोती है जितना जीवन से। धीरेन्द्र के यहाँ यह स्वप्न कविता की चमकदार पंक्तियाँ ढूंढकर उसे चित्र में घटाने से कुछ आगे का है। इसमें उनकी वैचारिकता और कला-पक्ष, दोनों उभरकर सामने आते हैं। बनारस में पले-बढ़े इस कलाकार का मन इन दिनों मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के काव्य-चित्र बनाने में रमा हुआ है। सबद के लिए उन्होंने अपनी कला-निधि से कुछ चित्र भिजवाए इसके लिए उनका अत्यन्त आभार। ये चित्र क्रमशः मारीना स्वेतायोवा, ज्ञानेन्द्रपति, त्रिलोचन और गोरख पाण्डेय के काव्यांशों से प्रेरित हैं। इस स्तंभ में इससे पहले आप चित्रकार हकु शाह के सृजन लोक से परिचित हो चुके हैं। )








2 comments:

जनविजय said...

बहुत ख़ूब। आज से करीब तीस साल पहले यही काम साम्प्रदायिकता के विरूद्ध आवाज़ उठाने के लिए जे०एन०यू० और दिल्ली आई०आई०टी० के कुछ छात्रों ने किया था और हिन्दी के विभिन्न कवियों की कविताओं के अंश उठाकर उन पर चित्र बनाकर उन चित्रों की प्रदर्शनियाँ दिल्ली के विभिन्न इलाकों में आयोजित की थीं। फिर कवि राजेश जोशी, नरेन्द्र जैन आदि ने भी इस तरह के कुछ कविता-पोस्टर जारी किए थे। यह एक बेहद ज़रूरी काम है, जो धीरेन्द्र भाई कर रहे हैं। मेरा एक प्रस्ताव है कि वे एक ही पोस्टर में नागार्ज़ुन की या केवल निराला की कुछ कविताएँ चित्रित करें और हम उस कविता-चित्र पोस्टर को काव्यप्रेमियों के बीच छपवाकर बाँटेंगे।

GopalJoshi said...

Bhaut khub Dheeraj bhai .. liked you way of presentation !!