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मंगलेश डबराल पर पंकज चतुर्वेदी


संगतकार
नहीं

'शायद' मंगलेश डबराल का प्रिय शब्द है। इससे जुड़ा एक दिलचस्प वाकि़आ याद आता है। हम लोगों के अग्रज मित्र वी.के.सौनकिया ने कुछ साल पहले एक नयी साहित्यिक पत्रिका निकाली थी--आशय। हालाँकि यह अनियतकालिक है, मगर पत्रिकाओं की भीड़ में आज अपनी विशिष्ट जगह और पहचान बना चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में मंगलेश जी के घर जब भी गया, अक्सर उन्होंने पत्रिकाओं के बड़े-से ढेर की ओर इशारा करके बहुत परेशान होकर पूछा--''इतनी ज्य़ादा पत्रिकाएँ आ रही हैं, बताओ, मैं इन्हें कैसे पढूँ?'' मैं कोई जवाब नहीं दे पाता। फिर उनका सवाल--''कोई इन्हें कैसे पढ़ सकता है?'' मैं सिर्फ़ एक उद्विग्न सहमति में सिर हिलाता हूँ।

बहरहाल, 'आशय' का प्रवेशांक उन्हें भिजवाया था, तो एक दिन मैंने फ़ोन पर पूछा--''पत्रिका मिली?'' उन्होंने तुरन्त कहा--''हाँ, मिली, पर तुम लोगों ने उसका नाम 'शायद' क्यों रखा है?'' दरअसल पत्रिका के मुखपृष्ठ पर सुन्दर डिज़ाइन में छपा था--'आ श य', मंगलेश जी को याद रहा--'शायद'। इससे पता चलता है कि दिल्ली जैसे महानगर में--जिसे उनके प्रिय कवि-मित्र असद ज़ैदी ने 'एक हृदयविदारक नगर' कहा है--मंगलेश कितने असमंजस, अनिश्चय, दुविधा, हिचक और अफ़सोस के साथ रहते हैं। हालचाल पूछने पर एक बार उन्होंने किसी विदेशी कवि की यह अमूल्य बात मुझे बतायी थी--''इन दिनों मैं अवसाद में हूँ, पंकज, पर उसके बारे में किसी ने कहा है कि अगर आप अवसाद में हैं, तो इसका मतलब है कि आप सही हैं।''

यही वह बात है, जो मंगलेश और उनके दौर के कवियों को बड़ा बनाती है--मसलन् आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय, वीरेन डंगवाल, असद ज़ैदी या ऐसा ही कोई नाम। यानी एक यातना, जिससे कवि गुजऱ रहा है और उसकी वजह है--मूल्यों और विचारों के लिए उसकी प्रतिबद्धता। एक ऐसे समय में, जब प्रतिबद्ध होना किसी 'आत्मघात' से कम नहीं है। १९९२ में मंगलेश ने ही अपनी मशहूर कविता 'ऐसा समय' में लिखा था--''यह ऐसा समय है/जब कोई हो जा सकता है अंधा लँगड़ा/बहरा बेघर पागल।''

१९९२ से ९५ के दरमियान मैं जेएनयू में पढ़ता था और पटना से आये मेरे मित्र इरफ़ान ने बताया था कि आलोकधन्वा कहते हैं, ''मंगलेश डबराल फूल की तरह नाज़ुक और पवित्र हैं।'' यह इतनी बड़ी बात थी कि इसे दिमाग़ से समझने की बजाए दिल से, बल्कि अपने समूचे वजूद से सत्यापित करने की ज़रूरत थी। उस समय मंगलेश जी से परिचय नहीं था, पर बाद के वर्षों में उनका जो भी थोड़ा-बहुत सान्निध्य नसीब हो पाया, उसमें मुझे यह कहते हुए एक दुर्लभ कि़स्म की खुशी है कि उनकी साहित्यिक शख्शियत के भीतर मैंने हमेशा एक बहुत सच्चे, पवित्र, संजीदा, निश्छल और संवेदनशील इंसान को महसूस किया।

विचार और संवेदना का जो तरल पारदर्शी आलोक उनकी कविता में है, वह उनके होने में भी है। महज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं कि मलयज ने लिखा था--''बौने जीवन से बड़ी कविता पैदा नहीं हो सकती'' और गद्य की अपनी ताज़ा किताब ''कवि का अकेलापन'' में मंगलेश डबराल लिखते हैं--''कवि को कविता के भीतर और बाहर एक साथ रहना होता है।...दो दुनियाओं में एक साथ उसके पैर हैं। उसका समूचा अस्तित्व। एक का चूकना दूसरे का ओझल होना है।''

प्रसंगवश, मित्रों के बीच बहस-मुबाहसे में मंगलेश अपनी पीढ़ी के कवियों के संदर्भ में कभी-कभी एक कि़स्म के आत्म-स्वीकार के लहज़े में कहते हैं--''हममें-से कोई बड़ा कवि नहीं हो पाया!'' लेकिन यह सच नहीं है। अभाग्यवश, हिन्दी में कुछ ऐसे लोग हैं, जो उनके इस बयान को अभिधा में ग्रहण करके अपने 'मत' के समर्थन में बाक़ायदा इसकी व्याख्या, प्रचार या 'इस्तेमाल' कर सकते हैं। इसकी वजह, जैसा कि रवीन्द्र त्रिपाठी ने 'कथादेश' में हाल में छपे अपने एक लेख में हिन्दी आलोचना की बुनियादी समस्या को बिलकुल सही रेखांकित किया है, यह है कि अब इस दुनिया में ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो शब्दों का ठीक-ठीक अर्थ करना भी नहीं जानते।

मुझे लगता है कि सवाल सिर्फ़ जानने का नहीं, चाहने का भी है और इस मामले में 'ज्ञान' की प्रकृति 'चाहत' के मिज़ाज पर निर्भर है। मसलन् राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि तुलसीदास में छद्म-विनम्रता थी। जैसे तुलसी का यह कहना--''कवि न होउँ नहिं बचन प्रवीनू । सकल कला सब विद्या हीनू।।'' अब इस कथन को ही आप यथार्थ मान लें, तो इसमें आपका ही फऱेब और चालाकी नजऱ आती है, तुलसी की नहीं। आख़िर अभिमान और विनयशीलता जबरदस्त द्वन्द्व भी कोई चीज़ है, जो सबसे सशक्त और खूबसूरत अंदाज़ में ग़ालिब के यहाँ व्यक्त हुई है--''हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे / बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन, आस्माँ अपना।''

अब इसे सराहने की संवेदना उसी में हो सकती है, जिसमें भाषा के अंत:सलिल संगीत की कोई समझ हो। जो लोग सिर्फ़ शोर मचाना जानते हों और शोर को ही साहित्य का पर्याय मानते हों; उन्हें क्या मंगलेश की कविता पसंद आ सकती है, जिसकी मूल प्रतिज्ञा ही है--''जो कुछ भी था जहाँ-तहाँ हर तरफ़/शोर की तरह लिखा हुआ/उसे ही लिखता मैं/संगीत की तरह।'' किसी ज़माने में दिल्ली 'साहित्यिक राजधानी' हुआ करती थी, जफ़ऱ के शब्दों में आज वह साहित्य का 'उजड़ा दयार' है। यहाँ रहनेवाले मीडिया मैनेजमेण्ट में कुशल हिन्दी के तथाकथित शीर्षस्थ एवं स्वनामधन्य साहित्यकार सत्ता से अपनी नापाक दुरभिसन्धियों, प्रतिगामी हरकतों और वक्तव्यों के चलते आम हिन्दी जन-समाज की नजऱों में अपनी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता गँवा चुके हैं।

ऐसे में, मंगलेश डबराल अपनी उत्कृष्ट कविता और वैचारिक तथा संवेदनशील गद्य के ज़रिए प्रगतिशील चेतना से सम्पन्न साहित्यिकों की बिरादरी में एक प्रमुख और अग्रगामी भूमिका में आ गये हैं। उन्हीं की चर्चित कविता 'संगतकार' का सहारा लेकर कहें, तो यह 'संगतकार' की नहीं, बल्कि 'मुख्य गायक' की भूमिका है। वैसे भी कविता में व्यक्त विचार को कवि-व्यक्तित्व पर घटित कर लेने की आसान, मगर धोखादेह सुविधा से आलोचकों को अपनी रक्षा करनी चाहिए। यह सही है कि कविता में मंगलेश अपनी बात एक ''सुन्दर कमज़ोर काँपती हुई आवाज़'' में कहना पसंद करते हैं; क्योंकि उसकी शक्ति, सुंदरता, गहनता और मार्मिकता उनके इसी लहज़े पर मुन्हसिर है। इसे आप उनके यहाँ मौजूद रूप और अन्तर्वस्तु की 'डायलेक्टिक्स' भी कह सकते हैं और लोकतन्त्र का तक़ाज़ा भी, जिससे कि उनकी कविता की संस्कृति निर्मित होती है। उनके शब्दों में कहें, तो वह ''ज़ोरों से या ठंडी डपटती आवाज़ में'' बोलना नहीं चाहते, क्योंकि इस तरह कही गयी ''बातें याद रहती हैं दिमाग़ में बजती हुईं/हम ढोते रहते हैं उनका बोझ।''

सच पूछिये, तो मंगलेश रघुवीर सहाय की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने कहा था-- ''...मैं कभी ताक़त से नहीं बोला/उम्मीद से बोला कि शायद मैं सही हूँ/ताक़त से नहीं कि चाहे सही हूँ या नहीं हूँ/बोल मैं ही सकता हूँ।'' यों हम समझ सकते हैं कि मंगलेश डबराल के अंदाज़ेबयाँ में जो संकोच, विनयशीलता और कोमलता है; वह सिर्फ़ उनकी मज़बूत, सुंदर और उदात्त विचारशीलता का दूसरा पहलू है। दिलचस्प है कि उनकी कविता इस द्वन्द्वात्मक संहति का रूपक भी मुहैया करती है--''एक स्त्री के कारण एक स्त्री/बची रही तुम्हारे भीतर।''

महाकवि भवभूति ने राम सरीखे लोकश्रेष्ठ जनों के चित्त के संदर्भ में जो बात कही थी; वह--मैंने तो यह पाया ही है और लोग अपने निजी अध्यवसाय और अनुभव से जानते होंगे--कवि और मनुष्य मंगलेश डबराल दोनों (जो दरअसल एक हैं) के सम्बन्ध में भी सच है--''वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि'', यानी वह वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल हैं, बल्कि इन दोनों में अन्योन्याश्रित नाता है।

उनकी जो सादगी, शालीनता और संवेदनशीलता है; वह सिर्फ़ एक बड़े कवि की निशानी है। उनके यहाँ जिस दुख, विवशता और अकेलेपन का बार-बार इज़हार मिलता है; वह एक मूल्यहीन होते जाते समय में उनके मूल्यनिष्ठ होने का ही नतीजा है। एक ऐसे भीषण समय में, जब कवि भी अप्रत्याशित रूप से कॅरियरिस्ट जमात में शामिल हैं, यह कहनेवाले मंगलेश डबराल शायद हिन्दी के अकेले कवि हैं--''मैं चाहता हूँ कि ...कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा।''
****

( मंगलेशजी की षष्टिपूर्ति पर उनके व्यक्तित्व -कृतित्व को ध्यान में रखकर लिखे गए इस महत्वपूर्ण लेख की ओर ध्यानाकर्षण के लिए सबद कवि व्योमेश शुक्ल का आभारी है। एक आभार पाखी पत्रिका के प्रति भी जहाँ यह लेख हाल ही में दोषपूर्ण ढंग से छपा और इस वजह से सबद को इसे पुनर्प्रकाशित करने के लिए लेखक को भेजने की प्रेरणा हुई। इसके लेखक पंकज चतुर्वेदी की ख्याति प्रमुख युवा कवि-आलोचक की है। सबद के जरिये ब्लॉग के लिए पहली बार उन्होंने कुछ लिखने की सदाशयता दिखलाई थी। अब उनका महत्वपूर्ण लेखन इस माध्यम से भी लगातार सामने आ रहा है, जो सुखद है। )

6 comments:

badhiya aalekh,badhai.


आपका लेख पढ़ा तो है लेकिन टिप्पणी के लिए कुछ समय चाहिए।


ये सब खूबियां नहीं अपराध हैं और इसीलिए इन दिनों छिछले लोग उन्हें संगसार कर देना चाहते हैं।


मंगलेश जी के व्यक्तित्व का अच्छा शब्द चित्र उकेरा है आपने मगर यह एक मुश्किल सा ही काम है - महान भौतिकविद हीजेन्बर्ग का यह नियम यहाँ भी शायद लागू होता है कि आप किसी वस्तु विशेष के दो गुणों का वर्णन समान सटीकता के साथ एक साथ नही कर सकते -फिर मंगलेश जी जैसे जीवंत और मानवीयता से ओतप्रोत जीवंत संज्ञा के एक दो नहीं कई गुणों का एक साथ वर्णन कितना मुश्किल है यह आपने भी अनुभव किया होगा -अब जैसे उनकी विनम्रता और बौद्धिक उर्वरता को साथ साथ वर्णित करना बहुत मुश्किल है -ये दोनों गुण इतना संपृक्त हैं कि अलग अलग वर्णित नहीं हो सकते !
मंगलेश जी की षष्टि पूर्ति पर मेरी उन्हें सम्मान सहित शुभकामनाएं ! जीवेम शरद शतं !


सौरभ द्विवेदी

अनुराग जी को बधाई क्योंकि आगे बढ़ने के फेर में भूल सा जाता हूं कि साहित्य का भी एक ठौर है, जहां सुस्ताया जा सकता है, बिना किसी संकोच के। बहरहाल...मगलेश जी की कविता के बारे में सुना भी था और अपने तईं कुछ जाना भी, लेकिन पंकज जी ने एक नई दृष्टि दी उनकी कविता पढ़ने के लिए, इसके लिए उन्हें धन्यवाद। पंकज जी से मेरा अजीब नाता है। मैं कानपुर में जिस स्कूल में पांच साल पढ़ा, पंकज जी उसके पड़ोस के कॉलेज में पढ़ाते हैं। जब में जेएनयू आया तो हिंदी सेंटर में उनकी और उनके समय के लोगों की तमाम दंतकथाएं सुनीं। एक बार ब्रह्मपुत्रा हॉस्टल के बाहर जिस पंकज से मिला, वो लेक्चरर कम और निराई करके लौट रहा किसान का बेटा ज्यादा लगा। ठेठ, खांटी और शहरी दिखने के आग्रह को ठेंगे पर रखता।
एक बार फिर से इस सुंदर आलेख के लिए शुक्रिया।


Aalekh upyukt samay par aayaa hai. Bhai Pankaj Chaturvedi ko badhai. Aur kavivar Manglesh Dabral ko bhi Sath ka hone par.ve Deerghayu hon.--Dr.Om Nishchal Patna/Delhi


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