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एक थीं सोनाली दास गुप्ता और एक थे...


वह साल १९५६ था। प्रधानमंत्री नेहरू के बुलावे पर प्रसिद्द इटालियन फ़िल्मकार रोबर्टो रोज़ीलिनी भारत आए थे। तब एक नए प्रजातंत्र के रूप में उभरते भारत पर फ़िल्म बनाने। इस आगमन के पीछे जितनी रोज़ीलिनी की भारत में दिलचस्पी थी, उतनी ही इटालियन नियो रियलिस्म के इस पुरोधा की तत्कालीन असफलता और निजी तौर पर अपनी दूसरी पत्नी और हॉलीवुड सुपरस्टार इंग्रिड बर्गमैन से रिश्तों में आई खटास भी थी। जिन्होंने उनकी रोम ओपन सिटी या इअर जीरो सरीखी फिल्में देखी थी और जो उनके नाजीवाद की नाक के नीचे साहसिक फिल्में बनाने के कारण मुरीद बने थे वे रोज़ीलिनी की इस नियति की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। स्वयं रोज़ीलिनी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय और अंततः दुखद और त्रासद बन गई थी। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री से हुई एक मुलाकात के बाद मिले न्योते को उन्होंने तुंरत स्वीकार कर लिया और कुछ अलग करने की मंशा लिए भारत आए। इससे पहले अपने फ़िल्ममेकर मित्र जॉन रेनुआ की कोलकाता की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म रिवर से भी रोज़ीलिनी गहरे मुत्तासिर थे।

लेकिन
रोज़ीलिनी के लिए भारत में कुछ ऐसा घटित होनेवाला था, जिससे उनकी ही नहीं कम से कम तीन लोगों की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल जानेवाली थी। आपको मैं यह सब अगर रोज़ीलिनी की भारत यात्रा पर दिलीप पडगांवकर की हालिया लिखी पुस्तक ( अंडर हर स्पेल ) के हवाले से सुनाऊंगा तो उसमें जो कबीलेलुत्फ़ है वह शर्तिया मेरे लेखन की रुखाई में गुम जाएगा। इसलिए फिलहाल दिलीप पडगांवकर के अपने मित्र और प्रिय फिल्मकार पर लिखी विद्वतापूर्ण पुस्तक के हवाले और अपनी सूत कताई बंद कर मैं आपको उस मकबूल फनकार के साथ छोड़ता हूँ जिसके हाथ में कूची और कलम एक जैसी असरदार है। आप उन्हें हुसेन के नाम से जानते हैं। इससे ज़्यादा उनका परिचय देने की काबिलियत मुझमें नहीं। आप तो बस उनकी ज़बानी आगे की कहानी सुनिए, क्योंकि ये हजरत भी पूरे फसाने में एक अहम् किरदार निभा रहे हैं।

:: इंडिया ५६ की फिल्मिंग शुरू। उनके ( रोज़ीलिनी के ) कैमरामैन मशहूर फ़िल्म वार एंड पीस के टोंटी। उनकी स्क्रिप्ट गर्ल कलकत्ता की सोनाली जो हरीदास गुप्ता फ़िल्ममेकर की बीवी थी। रोज़ीलिनी हिन्दुस्तान आते ही यह दावा कर बैठे कि उन्हें दो इंसानों से इश्क हो गया। औरत सोनाली दास गुप्ता और मर्द एम.एफ़.हुसेन। पहली बार हुसेन की पेंटिंग भोलाभाई देसाई स्टूडियो में देखी और पन्द्रह कैनवस का रोल रोम रवाना किया। फिर हुसेन को साथ ले गए मैसूर के जंगल, हाथी पर सवार फ़िल्म की शूटिंग करते रहे। 

सोनाली से इश्क का बुखार भी तेज़ हो चला। पहले 'बाम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री' में हलचल मची, फिर अंतरराष्ट्रीय स्कैंडल बना। सोनाली ने बम्बई ताज होटल में अपने पाँच साल के बच्चे को लेकर रोज़ीलिनी के कमरे में पनाह ली। हुसेन की दोस्ती के लंबे हाथ बावजूद 'धमाकाखेज़ हालत' के छोटे नहीं हो पाए।

रोज़ीलिनी
के प्लान के मुताबिक सोनाली को बुरका पहनाकर रात के अंधेरे में ताज होटल से हुसेन बम्बई सेंट्रल रेलवे स्टेशन ले गए। दो टिकट मिस्टर और मिसेज़ हुसेन के नाम से कूपे बुक किया गया, लेकिन कूपे के साथ ही लगे डिब्बे में नामालूम कैसे
'टाइम' और 'लाइफ' के लंबे-लंबे 'ज़ूम लैंस' पहुँच गए। पर मीडिया की क्या मजाल, जबकि सोनाली का बुरका उठाने की जुर्रत हवा का झोंका भी नहीं कर सका। सियाह बुर्के की बगल में सफ़ेद दाढी जो रोशन थी। 'टाइम' और 'लाइफ' ने लाख कोशिश की, कि सोनाली और रोज़ीलिनी का साथ फोटो हाथ आ जाए, इसके लिए पाँच हज़ार का चेक भी दूर से दिखाया। 

फ्रंटियर मेल तूफ़ान की तरह चली मगर बजाए दिल्ली रेलवे स्टेशन के निज़ामुद्दीन प्लैटफॉर्म पर चुपके से दोनों उतर पड़े। स्टेशन के बाहर प्लान के मुताबिक एक इमली के पेड़ तले काली अम्बेसडर गाड़ी इगनेशन ऑन किए खड़ी थी। लोगों की नज़रें सिर्फ़ दाढ़ी और बुर्के पर रही, कार की नंबर प्लेट पर नहीं। कार वहां से यह जा वह जा और पालम एयरपोर्ट पर 'अलितालिया' का हवाई जहाज ऐसे खड़ा दिखाई दिया जैसे उस पर बंगाली हुस्न का जादू चल गया है और वह सोनाली को अगवा करने पर तुला है। ::


तो ये थे हुसेन। यारों के यार। आगे का किस्सा यह है कि इंग्रिड बर्गमैन से तलाक़ के बाद सोनाली से रोज़ीलिनी ने विवाह कर लिया और सोनाली को इस तरह बाकायदा इटालियन नागरिकता भी प्राप्त हो गई। रोज़ीलिनी ने अपने ढलान के वर्षों में जिस तरह इंग्रिड बर्गमैन के साथ अपने ढंग की फिल्में बनाई और फ्लॉप रहे उसी तरह की फेलियर सोनाली के साथ भी जारी रही। पर सोनाली ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाने की अपनी महत्वाकांक्षा पर काबू पा लिया था, जिसमें ग्लैमरस बर्गमैन नाकाम रही थीं। बर्गमैन ने इसी कारण रोज़ीलिनी से अलग होकर हॉलीवुड का फिर से रुख कर लिया, जबकि सोनाली उनके साथ अंत तक रहीं।

यह विडंबना ही है कि इटली से बहू बन कर आईं सोनिया गाँधी को भारत की जनता ने प्यार और सम्मान दिया, उन्हें प्रधानमंत्री के पद के योग्य भी माना, जबकि रोज़ीलिनी के निधन के बाद जब सोनाली ने इटली में स्थानीय स्तर के चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की तो उन्हें बाय बर्थ इटालियन न होने के कारण इसकी इजाज़त नहीं दी गई। रोज़ीलिनी के बीस वर्षों के साथ के अलावा वहां सोनाली के लिए कुछ भी न था।
****


( हुसेन का अंश वाणी प्रकाशन से छपी उनकी आत्मकथा से साभार।)

Comments

MARKANDEY RAI said…
jee bahut achhi jaankaari aur.... likhane ka tarika usase bhi rochak....aap regular likhe isase mera hi kalyaan hoga.... mai bhi kuchh sikh jaauga.

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