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कवि कह गया है : ३ : चंद्रभूषण


कविता कहने से ज़्यादा जानने की विधा है

अपना खाना कच्चा-पक्का जैसा भी बना लेने का हक हर किसी को है, हालाँकि ज्यादातर लोग इस हक को छोडऩे में ही अपनी इज्जत समझते हैं। मुझे अपना खाना पकाना हमेशा अच्छा लगता है, और कोई तैयार हो तो उसे चखाना भी। ऐसा ही रिश्ता मेरा कविता के साथ भी है। यह क्या होती है, कैसी होती है, कब अच्छी और कब बुरी होती है, इससे मुझे कुछ खास मतलब नहीं है। मेरे ख्याल से तैरने, साइकल चलाने या खाना पकाने की तरह अगर अगर कविता का कौशल भी किसी के पास हो तो इससे जिंदा रहने में उसे काफी सहूलियत हो सकती है।

इस बात के बाहरी मायने जगजाहिर हैं। इसे साध कर कई लोगों ने काफ़ी इज्ज़त और रुपया-पैसा भी कमाया है। लेकिन मेरे लिए बाहरी से ज्यादा काम के इसके भीतरी मायने रहे हैं। पहले जब अकेलापन उधराई हुई मधुमक्खियों कीतरह मुझे छोंप लेता था तब मैं कोई कविता चिट्ठी में लिख कर अपनी दोस्त के पास भेज दिया करता था। अब जब मैं दुनियादारी से बिलकुल ही घिर जाता हूं और अकेलापन किसी गुम चोट की तरह भीतर ही भीतर उमड़ रहा होता है तो कविता उसे पहचानने में मेरी मदद करती है। काश, मेरे लिए यह काम आटा मांडऩे या भुर्ता पकाने जितना सहज होता। एक पंक्ति या दो शब्द भी लिख लेता तो मन बहुत हल्का हो जाता। लेकिन यह तो महीनों-महीनों, सालोंसाल नहीं हो पाता।

पुराना दुख दूर नहीं होता और एक नया दुख और जुड़ जाता है- मैं शायद कुछ लिख सकता था, उसे न लिख पाने का दुख। दुनिया को देखने, समझने के लिए इतनी मेहनत करता हूं। इतना सारा रोज पढ़ता हूं, नौकरी के लिए हर दिन कम से कम हजार शब्द लिखता भी हूं, लेकिन कविता की नजर से दुनिया जितनी पल्ले पड़ती है, उसका हजारवां हिस्सा भी और तरीकों से समझ में नहीं आती।

मेरे लिए कविता कुछ कहने से ज्यादा कुछ जानने की विधा है। यह छूने से ज्यादा छूना, सूंघने से ज्यादा सूंघना, चखने से ज्यादा चखना और याद करने से ज्यादा याद करना है। मेरे लिए मेरा कविता न लिखते हुए जीना कुछ कम समझदार, कुछ कम संवेदनशील होकर जीना है। जब भी कुछ लिख लेता हूं तो यह सपने में खुद को उड़ते हुए देखने जैसा होता है। जहाज की तरह नहीं, चिडिय़ा की तरह भी नहीं, इंसान की तरह अपने हाथ-पैरों से जमीन से बस जरा सा ऊपर बेहद मुलायमियत के साथ उड़ते हुए खुद को देखना। बाहर उतना ही हल्का, भीतर उतना ही भारी। भीतर उतना ही भरा, बाहर उतना ही खाली।

कविता लिखते हुए कुछ देर को चीजों और लोगों के साथ, अतीत और भविष्य साथ अपना रिश्ता बदल जाता है। लेकिन किसी अच्छे सपने की तरह ही यह अनुभूति भी ज्यादा समय तक साथ नहीं रहती। मेरे ख्याल से हर लिखने वाले के लिए कविता के मानी अलग होते होंगे। खुशकिस्मत हैं वे, जो आंख बंद करते हैं और नींद उन तक पहुंच जाती है, और वे भी, जो जब जी करता है, लिख लेते हैं।

मैं भी कभी उनकी कतार में खड़ा होऊं, यह मेरी महत्वाकांक्षा है। जैसे यह कि कभी विधिवत गणित की पढ़ाई शुरू करूँ, या दुबारा होलटाइमर बन कर भोजपुर चला जाऊं।
यह सब अब कभी नहीं होना, फिर भी इच्छा तो है...
****

( न तो चंद्रभूषण और न ही उनका कवि-विचारक आपके लिए अपरिचित हैं। उनके ब्लॉग पहलू में शाया कविताओं के अलावा इतनी रात गए शीर्षक से संकलित बेसंभाल शिल्प में लिखी गई उनकी कई उम्दा कविताओं के पीछे रमा कवि-मन भले यहाँ कुछ हद तक अलग स्वर में बोल रहा है। इसमें कविता के होने की प्रसन्नता और उसके न हो पाने की पीड़ा एक साथ व्यक्त हुई है। अपने तइं कविता के बारे में यह टिप्पणी उपलब्ध कराने के लिए सबद उनका आभारी है। इस स्तंभ में इससे पूर्व आप बोर्हेस और संजय कुंदन को पढ़ चुके हैं। )

4 comments:

चन्द्रभूषण जी बड़े भाई हैं उम्र में भी और कविता में भी।
उन्हें सलाम -
जिसे उन्हें समझने से ज्यादा समझना होगा।


चन्द्र्भूषण भाई,

यह आपलिखी ऐसी लगी जैसे कोई बडा बालों में हाथ फेरता किस्सा सुना रहा हो…जिसके अन्त में पूछना ना पडे '' क्या सीखा?''


प्रभु आपने ने एक बार कहा था निवृत्त होने के सुख और प्रमाण के तौर पर आंसुओं के बहाव जैसा। वह ज्यादा सटीक उपमा थी।


जब जी चाहे तब लिख लेने वाले शायद इंसान की तरह अपने हाथ-पैरों से जमीन से बस जरा सा ऊपर बेहद मुलायमियत के साथ उड़ते हुए खुद को देखना महसूस न कर पाएं। बकौल अनिल यादव `निवृत्त होने के सुख और प्रमाण के तौर पर आंसुओं के बहाव जैसा` वाकई सटीक भी और दिलचस्प उपमा है।


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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