Thursday, March 05, 2009

द रेड बलून


एक हैं छोटे। पास्कल नाम है इनका। पेरिस में रहते हैं। अपनी दादी के साथ। प्यारे और भले-भले से। कद-काठी से ऐसे कि गोद में भर लेने का जी करे। छोटे हैं, हालाँकि इतने नहीं कि ख़ुद से स्कूल भी न जा सकें। तो छोटे रोज़ की तरह उस दिन भी स्कूल चले। घर की बगलवाली गली में दाखिल होते ही देखते क्या हैं कि एक लाल गुब्बारा लैंप-पोस्ट से अटका पड़ा है। छोटे को लगा मानो वह उन्हीं की राह देख रहा है। वे बिना एक पल गँवाए लैंप-पोस्ट नाप कर गुब्बारे को उसके साथ लगे फुदने से पकड़ लेते हैं। लाल गुब्बारा भी छोटे के साथ कुछ ही देर में हिल-मिल जाता है और छोटे उसे लिए स्कूल की राह पकड़ते हैं।

पर छोटे को गुब्बारे सहित बस में सफर करने की इजाज़त नहीं मिली। उदास छोटे गुब्बारा छोड़ने की बजाय बस छोड़ देते हैं और पेरिस की गलियों में अपने नए दोस्त के साथ फुदकते हुए स्कूल पहुँचते हैं। वहां गुब्बारे को सफाई करनेवाले के जिम्मे सौंप कर अपनी क्लास जाते हैं। इधर गुब्बारे को छोटे से बड़े लोग कैम्पस से बहार करने में लग जाते हैं। घबराया गुब्बारा जब छोटे के पास पहुँचता है तो गुस्सैल मास्टरजी छोटे को इसकी सजा के तौर पर एक अलग कमरे में बंद कर देते हैं। अपने दोस्त के साथ हुई ज्यादती को गुब्बारा बर्दाश्त नहीं कर पाता और मास्टरजी को शहर भर तंग करता है। मास्टरजी चाह कर भी गुब्बारे का रंग नहीं बिगाड़ पाते।

अब छोटे घर में हैं। दादी गुब्बारे को बाहर की चीज़ समझकर बालकनी से बाहर का ही रास्ता दिखा देती हैं। छोटे फिर से उदास। दादी की नज़र बचाकर बालकनी में आते हैं, जहाँ लाल गुब्बारा उनकी बेसब्र प्रतीक्षा कर रहा होता है। उससे मीठी अरज करते हैं : बलून, यू मस्ट ओबे मी एंड बी गुड। गुब्बारा छोटे का कहा मान बाहर रहता है। घर में भी और स्कूल में भी। छोटे कभी-कभी उसे आँख बचाकर अपने पास ले आते हैं। बस में भी छोटे को अब गुब्बारे का फुदना नहीं पकड़े रहना पड़ता। बस के साथ-साथ छोटे की निगाह में गुब्बारा भी सफर करता है। शहर में जहाँ-जहाँ छोटे जाते हैं, गुब्बारा परछाई बना फिरता है। कभी-कभी दोनों एक-दूसरे से छुपम-छुपाई भी खेलते हैं। छोटे उसे आंधी-पानी से बचाए रखते हैं, गुब्बारा छोटे को दिन भर हंसाते-खेलाते रहता है।

लेकिन छोटे के कुछ हमजोलियों को उनका लाल गुब्बारा चुभता है। वे एक दिन गुब्बारे को छोटे के साथ छुपम-छुपाई के खेल के दरम्यान ही घेरते हैं। छोटे को दहशत होती है। लड़कों में जो बड़ी उमर के हैं उनके हाथों में गुलेल है। वे गुब्बारे पर निशाना साधते हैं। गुब्बारा कलाबाजियां खाते हुए ख़ुद को बचाता है। बाद में छोटे उसकी हिफाज़त में लगते हैं। उसे लिये लिये तमाम गलियों में हिरन की चाल से घुसते जाते हैं। पर गुब्बारे की जान के पीछे पड़े बच्चों का हुजूम अंततः छोटे और गुब्बारे को इस दौड़ में परास्त कर देता है। छोटे गुब्बारे का अंत निकट देख रुंधे गले से गुब्बारे से कहते हैं : बलून, फ्लाई अवे फ्रॉम हियर।

पर इस दफा गुब्बारा छोटे का कहा नहीं मानता। छोटे को बच्चे गुब्बारे के लिए नोचते हैं। उनमें से एक सयाना उनसे पार नहीं पाता तो गुलेल से गुब्बारे में सुराख़ कर देता है। गुब्बारा ज़मीन पर गिरता है तो अपनी विजय की मुहर लगाने के लिए वही सयाना उस पर एक जोरदार लात जमा देता है। गुब्बारा फट जाता है। इसी के साथ छोटे के भीतर भी कुछ फटता है, जो उनकी नन्हीं आखों की राह पकड़ उनके चेहरे पर फैल जाता है !

छोटे जिस मद्धिम स्वर में अपने लाल गुब्बारे के लिए बिलखते हैं, उससे कहीं तेज़ी से उस दिन पेरिस शहर के मार-तमाम गुब्बारे अपनी जगह से उड़कर छोटे तक आते हैं और उन्हें अपनी गोद में भर गुब्बारों के देश ले जाते हैं, जहाँ कोई मानवी क्रूरता नहीं पहुँचती।

तो ये थी छोटे पास्कल की कहानी। १९५६ में इस कहानी को फ्रेंच फ़िल्ममेकर अलबर्ट लैमोरिसे ने कही थी। महज ३४ मिनट की अवधि में। रेड बलून शीर्षक से। गिनती की ७-८ सतरें हैं इस फ़िल्म में डायलॉग के नाम पर। कैमरे से जैसा सघन दृश्य-विधान रचा गया है, और अपनी नन्हीं काया में जितना कुछ छोटे और अन्यथा गुम्मा गुब्बारा संप्रेषित कर जाता है, वहां फ़िल्म में इतने कम संवाद खटकते नहीं। आपको जान कर अचरज होगा कि बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए लैमोरिसे को उसी वर्ष ऑस्कर मिला था। साथ ही, कान के अलावा अन्य कई फ़िल्म समारोहों में भी फ़िल्म को कई पुरस्कार मिले। बच्चों की मासूम दुनिया को सेल्युलाइड पर इतनी मार्मिकता से फिल्माने के कारण द रेड बलून आज भी मील का पत्थर मानी जाती है।
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10 comments:

सौरभ द्विवेदी said...

सेल्युलाइड पर रची गई इतनी प्यारी कविता से बावस्ता कराने के लिए दिल से शुक्रिया। हम आपके सिने संसार में इसी बहाने एंट्री पा लेते हैं। क्या ये बेहतर न हो कि फिल्मों के बारे में लिखते समय उनकी डीवीडी के कवर की तस्वीर,मिलने की जगह और दाम के बारे में भी बता दिया जाए। शुभकामनाओं के साथ
और अंत में...इस पोस्ट का लेआउट भी बेहद संजीदा है। द रेड बैलून की तरह...

virendra said...

aap hume cinema ke nai dunia s parichit kara rehe hi eske liye dhanyabad. village m aaj bhi aise paskal mil jayenge jinke liye gubbara sab kuch hota hi. rota hua chota bachha aaj bhi gubbara laker chup ho jata hi.

सुभाष नीरव said...

"सबद्…" निरंतर पढ़ता हूँ। यह मेरे प्रिय ब्लॉग्स में शामिल है, इसकी हर पोस्ट मुझे अच्छी लगती है। इधर बदला हुआ लुक बेहद आकर्षक है। "सबद्" का लिंक मैं अपने हर ब्लॉग पर देने जा रहा हूँ।

ravindra vyas said...

anuragji,
aapki piछ्li teen-chaar posts bahut aछ्i hain! yah sabse marmik hai! kisi khaas manahsthiti men kuछ् padho to kai bar uska asar zyada hota hai! yah post dil ko chhu gayi!

ravindra vyas

महेन said...

रविन्द्र भाई की बात को मेरी भी टिपण्णी मानो भाई.

ssiddhant said...

अनुराग जी,
बहुत ही प्यारा है छोटे पास्कल का अपने गोल-मटोल दोस्त का इतना ख्याल रखना. ये एक ऐसी चीज़ के बारे में है जिसे हम काफी छोटा और तुच्छ समझते हैं, गुब्बारे के लिए किसी छोटे बच्चे का enthusiastic होना, गुब्बारे का फूटना और उसके लिए रोना. अलबर्ट ने निश्चय ही बहुत प्यारा चित्र बनाया होगा.

MARKANDEY RAI said...

Anuraag jee,ek chhote ko aapane apane article me jiwant kar diya hai.kaphi maja aaya. aap koi bhi article likhe to mujhe jarur massaje karen.

dhiresh saini said...

ये छोटी सी कहानी उदास कर देती है। इस रेड बेलून को कैसे बचाए रखे कोई...

deepika said...

achha aalekh.

प्रियंकर said...

फ़िल्म का,बल्कि किसी भी कृति का, परिचय ऐसे कराया जाना चाहिए .