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Showing posts from March, 2009

लूज़ वन्स फेस

...उसने लगभग घर से बाहर जाना बंद कर दिया। उसे दुपहरें अच्छी लगती थीं, वह अपने कमरे में बैठा रहता, खिड़की से आकाश को देखता रहता, अवसन्न और सूनी हवा में चीलें मंद गति में उड़ती रहतीं। पीला, अवसाद-भरा सूरज दिखाई देता।
खाने के बाद वह छोटी-सी नींद लेता, उठने पर आँखें धोता, फिर आलमारी से पुस्तकों को निकालने लगता। उसकी प्रिय पुस्तक थी, लाइफ ऑन अर्थ जिसे वह अक्सर पढ़ता था। उसके फोटोग्राफ भी उसे बहुत अच्छे लगते थे, कीड़े, जानवर और पक्षियों को देखता, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा था और उसे आश्चर्य होता कि मनुष्य उनके बीच कितना अकेला प्राणी है। जैसे ही सूरज धीरे-धीरे ढलने लगता और छतों पर रोशनी मंद पड़ने लगती, वह रसोई में जाकर चाय बनाता। यह वही रसोई थी, जहाँ बरसों पहले उसकी माँ खाना बनाया करती थीं। बरामदा भी वही था, जहाँ वह कुर्सी पर बैठी रहा करती थीं। वहीं से उन्होंने उसे आखिरी बार देखा था। जब सर्दी बढ़ जाती, वह अपना लैंप जला लेता। यह टेबुल लैंप भी उसके भाई ने उसे उपहारस्वरूप दिया था। यह ''दो वक्तों के मिलने'' की घड़ी होती, जब वह अपने मित्रों को पत्र लिखता, जो अब काफी सुदूर देशों मे…

बही-खाता : ५ : ज्ञानरंजन

‘यात्रा’ विचलित करती रही है

...अपनी कहानियों पर चर्चा करना...एक प्रकार से उनमें लौटना मुझे बहुत उत्साहवर्धक नहीं लगता है। वास्तव में कुछ समय के लिए भी वापस जाने की इच्छा नहीं होती है। ऐसा नहीं हुआ है कि मैंने छपकर आई अपनी किसी कहानी को पढ़ा हो। छपी कहानी दिल को एकाएक रद्द कहानी लगने लगती थी। केवल एक कहानी ‘संबंध’ को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अभी भी पढ़ सकता हूं। यह सब क्यों होता है, या कैसे होता है, इसको खोजा तो जा सकता है पर इसमें कोई बुनियादी बात निकल पाएगी, यह कहना कठिन है।

मैं बचपन से उदास और आलसी रहा हूं। यह मेरी आंतरिक बाधा और समस्या है, इसलिए जब भी मैंने कोई कहानी लिखी, मुझे विस्मय हुआ अपने ऊपर, और बहुत खुशी भी हुई। ‘संबंध’ को मैंने एक सपाटे में लिखा। ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’ कहानियों ने काफी परिश्रम करवाया, लेकिन उनको लिखते वक्त मैं अपूर्व ‘कॉमिकल’ मनःस्थिति में था। दूसरी कहानियों में आगे या पीछे साथ-साथ यातना थी, ठसपन या क्षोभ लेकिन ‘घंटा’ लिखते वक्त, मुझे विश्वास है कि मेरा दिमाग ‘मार्सिलो मॉस्त्रियानी’ के चेहरे की तरह रहा होगा जिसको देखने से लगता है…

पंकज चतुर्वेदी की नई कविता

आखिरी बात

अल्लाह रक्खा रहमान को
संगीत-रचना के लिए ऑस्कर मिला
तो देश के दो बड़े हिन्दी अख़बारों के
स्थानीय संवाददाताओं ने
फ़ोन पर मुझसे सवाल किया :
क्या आपको लगता है
कि "स्लमडॉग मिलियनेयर" के
निर्माता-निर्देशक ब्रिटिश थे
इसलिए यह ऑस्कर मिल गया ?

मैंने कहा :
मुझे ऐसा नहीं लगता
क्योंकि पहले सत्यजीत राय को
सिनेमा की दुनिया में
उनके जीवन-भर के अवदान के लिए
ऑस्कर मिल चुका है

दूसरे, आप इस पर विचार कीजिए
कि गाँधी पर सबसे अच्छी फ़िल्म
रिचर्ड एटनबरो बनाते हैं
शंकर-पार्वती पर सबसे अच्छी कविता
आक्तोवियो पाज़ लिखते हैं
तो क्या हम अपने इतिहास
संस्कृति और मिथकों के प्रति
उतने संजीदा, समर्पित और निष्ठावान हैं
जितने कि जिन्हें आप
विदेशी कह रहे हैं ?

आखिरी बात यह कि
रहमान की यह महान उपलब्धि है
देश के लिए गौरव की बात है
वे गैर-हिंदू हैं
इसलिए यह भी एक मौका है
जब हिंदुत्ववादियों को
भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का
सम्मान करना
उस पर नाज़ करना सीखना चाहिए

अलग-अलग बातचीत में
दोनों ही पत्रकारों ने कहा :
ठीक है, ठीक है,
आपने हमारे मतलब का
काफी कुछ कह दिया

अगले दिन दोनों अख़बारों में छपा
कि मैं भी इस बात से सहमत हूँ
कि फिल्मकार विदेशी थे
इसलिए ऑ…

कोठार से बीज : ७ : साही

( विजयदेवनारायणसाहीको प्रमुखतः उनके आलोचनात्मक अवदान के लिए ही याद किया जाता है। इसकी एक वजह यह रही कि जिस छठवें दशक और उसके आसपास की आलोचना के वे अनिवार्य सन्दर्भ बन गए और उसकी ओट में जितना सार्थक कवि-कर्म किया, उसे प्रकाशित करने में वे जीवनांत उतने ही संकोची रहे। उनकी बहुत सी कवितायें मरणोपरांत पुस्तकाकार आ सकीं। हालाँकि तीसरा सप्तक से एक कवि के रूप में नई कविता के सृजन परिदृश्य में वे सामने आ चुके थे, पर कवि, आलोचक और समाजवादी कार्यकर्ता की तिहरी जिम्मेदारी निभा रहे साही की कवि-छवि इसमें कहीं दब गई। साही ने अत्यन्त मूल्यवान कवितायें लिखी हैं। उसमें एक सत्याग्रही साहस और नम्रता है। इन मायनों में जिस दौर में ये कवितायें लिखी गईं थीं, उस दौर की काव्य-भाषा और भंगिमा की ये सहज विलोम भी हैं। कोठार से बीज में इस बार साही की कवितायों से ही एक चयन। )
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दे दे इस साहसी अकेले कोदे दे रे
दे दे इस साहसी अकेले को
एक बूँद। ओ सन्ध्या
ओ फ़कीर चिड़िया
ओ रुकी हुई हवा
ओ क्रमशः तर होती हुई जाड़े की नर्मी
ओ आस पास झाड़ों झंखाड़ों पर बैठ रही आत्मीयता कैसे ? इस धूसर परिक्षण में पंख खोल
कैसे जिया जाता है ?
कैसे सब हार…

कला का आलोक : ३ : धीरेन्द्र मोहन तिवारी

( धीरेन्द्र के ये कविता चित्र कलाओं की आपसदारी के सुंदर नमूने हैं। यों तो कला जीवन से गहरे प्रतिकृत होती है पर वह अपनी भगिनी विधाओं से भी उतना ही सीखने-जानने की अभिलाषा और स्वप्न संजोती है जितना जीवन से। धीरेन्द्र के यहाँ यह स्वप्न कविता की चमकदार पंक्तियाँ ढूंढकर उसे चित्र में घटाने से कुछ आगे का है। इसमें उनकी वैचारिकता और कला-पक्ष, दोनों उभरकर सामने आते हैं। बनारस में पले-बढ़े इस कलाकार का मन इन दिनों मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के काव्य-चित्र बनाने में रमा हुआ है। सबद के लिए उन्होंने अपनी कला-निधि से कुछ चित्र भिजवाए इसके लिए उनका अत्यन्त आभार। ये चित्र क्रमशः मारीना स्वेतायोवा, ज्ञानेन्द्रपति, त्रिलोचन और गोरख पाण्डेय के काव्यांशों से प्रेरित हैं। इस स्तंभ में इससे पहले आप चित्रकार हकु शाह के सृजन लोक से परिचित हो चुके हैं। )








मंगलेश डबराल पर पंकज चतुर्वेदी

संगतकार नहीं
'शायद' मंगलेश डबराल का प्रिय शब्द है। इससे जुड़ा एक दिलचस्प वाकि़आ याद आता है। हम लोगों के अग्रज मित्र वी.के.सौनकिया ने कुछ साल पहले एक नयी साहित्यिक पत्रिका निकाली थी--आशय। हालाँकि यह अनियतकालिक है, मगर पत्रिकाओं की भीड़ में आज अपनी विशिष्ट जगह और पहचान बना चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में मंगलेश जी के घर जब भी गया, अक्सर उन्होंने पत्रिकाओं के बड़े-से ढेर की ओर इशारा करके बहुत परेशान होकर पूछा--''इतनी ज्य़ादा पत्रिकाएँ आ रही हैं, बताओ, मैं इन्हें कैसे पढूँ?'' मैं कोई जवाब नहीं दे पाता। फिर उनका सवाल--''कोई इन्हें कैसे पढ़ सकता है?'' मैं सिर्फ़ एक उद्विग्न सहमति में सिर हिलाता हूँ। बहरहाल, 'आशय' का प्रवेशांक उन्हें भिजवाया था, तो एक दिन मैंने फ़ोन पर पूछा--''पत्रिका मिली?'' उन्होंने तुरन्त कहा--''हाँ, मिली, पर तुम लोगों ने उसका नाम 'शायद' क्यों रखा है?'' दरअसल पत्रिका के मुखपृष्ठ पर सुन्दर डिज़ाइन में छपा था--'आ श य', मंगलेश जी को याद रहा--'शायद'। इससे पता चलता है कि दिल्ली …

एक थीं सोनाली दास गुप्ता और एक थे...

वह साल १९५६ था। प्रधानमंत्री नेहरू के बुलावे पर प्रसिद्द इटालियन फ़िल्मकार रोबर्टो रोज़ीलिनी भारत आए थे। तब एक नए प्रजातंत्र के रूप में उभरते भारत पर फ़िल्म बनाने। इस आगमन के पीछे जितनी रोज़ीलिनी की भारत में दिलचस्पी थी, उतनी ही इटालियन नियो रियलिस्म के इस पुरोधा की तत्कालीन असफलता और निजी तौर पर अपनी दूसरी पत्नी और हॉलीवुड सुपरस्टार इंग्रिड बर्गमैन से रिश्तों में आई खटास भी थी। जिन्होंने उनकी रोम ओपन सिटी या इअर जीरो सरीखी फिल्में देखी थी और जो उनके नाजीवाद की नाक के नीचे साहसिक फिल्में बनाने के कारण मुरीद बने थे वे रोज़ीलिनी की इस नियति की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। स्वयं रोज़ीलिनी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय और अंततः दुखद और त्रासद बन गई थी। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री से हुई एक मुलाकात के बाद मिले न्योते को उन्होंने तुंरत स्वीकार कर लिया और कुछ अलग करने की मंशा लिए भारत आए। इससे पहले अपने फ़िल्ममेकर मित्र जॉन रेनुआ की कोलकाता की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म रिवरसे भी रोज़ीलिनी गहरे मुत्तासिर थे।

लेकिन रोज़ीलिनी के लिए भारत में कुछ ऐसा घटित होनेवाला था, जिससे उनकी ही नहीं कम से कम तीन लोगों की ज़…

कवि कह गया है : ३ : चंद्रभूषण

कविता कहने से ज़्यादा जानने की विधा है
अपना खाना कच्चा-पक्का जैसा भी बना लेने का हक हर किसी को है, हालाँकि ज्यादातर लोग इस हक को छोडऩे में ही अपनी इज्जत समझते हैं। मुझे अपना खाना पकाना हमेशा अच्छा लगता है, और कोई तैयार हो तो उसे चखाना भी। ऐसा ही रिश्ता मेरा कविता के साथ भी है। यह क्या होती है, कैसी होती है, कब अच्छी और कब बुरी होती है, इससे मुझे कुछ खास मतलब नहीं है। मेरे ख्याल से तैरने, साइकल चलाने या खाना पकाने की तरह अगर अगर कविता का कौशल भी किसी के पास हो तो इससे जिंदा रहने में उसे काफी सहूलियत हो सकती है। इस बात के बाहरी मायने जगजाहिर हैं। इसे साध कर कई लोगों ने काफ़ी इज्ज़त और रुपया-पैसा भी कमाया है। लेकिन मेरे लिए बाहरी से ज्यादा काम के इसके भीतरी मायने रहे हैं। पहले जब अकेलापन उधराई हुई मधुमक्खियों कीतरह मुझे छोंप लेता था तब मैं कोई कविता चिट्ठी में लिख कर अपनी दोस्त के पास भेज दिया करता था। अब जब मैं दुनियादारी से बिलकुल ही घिर जाता हूं और अकेलापन किसी गुम चोट की तरह भीतर ही भीतर उमड़ रहा होता है तो कविता उसे पहचानने में मेरी मदद करती है। काश, मेरे लिए यह काम आटा मांडऩे या भुर…

द रेड बलून

एक हैं छोटे। पास्कल नाम है इनका। पेरिस में रहते हैं। अपनी दादी के साथ। प्यारे और भले-भले से। कद-काठी से ऐसे कि गोद में भर लेने का जी करे। छोटे हैं, हालाँकि इतने नहीं कि ख़ुद से स्कूल भी न जा सकें। तो छोटे रोज़ की तरह उस दिन भी स्कूल चले। घर की बगलवाली गली में दाखिल होते ही देखते क्या हैं कि एक लाल गुब्बारा लैंप-पोस्ट से अटका पड़ा है। छोटे को लगा मानो वह उन्हीं की राह देख रहा है। वे बिना एक पल गँवाए लैंप-पोस्ट नाप कर गुब्बारे को उसके साथ लगे फुदने से पकड़ लेते हैं। लाल गुब्बारा भी छोटे के साथ कुछ ही देर में हिल-मिल जाता है और छोटे उसे लिए स्कूल की राह पकड़ते हैं। पर छोटे को गुब्बारे सहित बस में सफर करने की इजाज़त नहीं मिली। उदास छोटे गुब्बारा छोड़ने की बजाय बस छोड़ देते हैं और पेरिस की गलियों में अपने नए दोस्त के साथ फुदकते हुए स्कूल पहुँचते हैं। वहां गुब्बारे को सफाई करनेवाले के जिम्मे सौंप कर अपनी क्लास जाते हैं। इधर गुब्बारे को छोटे से बड़े लोग कैम्पस से बहार करने में लग जाते हैं। घबराया गुब्बारा जब छोटे के पास पहुँचता है तो गुस्सैल मास्टरजी छोटे को इसकी सजा के तौर पर एक अलग कमरे में ब…

कवि का अकेलापन

मंगलेश जी का गद्य आप जल्दी-जल्दी नहीं पढ़ सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो अपने लिए उस खतरे को भी सिरजते चलते हैं जिसकी ओट में इस विशिष्ट गद्य की अनेक अर्थ-छवियां छिपी रह जाती हैं। कहना न होगा कि उनका गद्य पठन का धीरज मांगता है। हालाँकि वह महज इसीलिए विशिष्ट गद्य नहीं है। इसलिए तो और भी नहीं कि वह कविता की खूबियां लिए एक कवि का गद्य है। एक संवेदनशील कवि के लिए कविता के बाहर इस नैसर्गिक गद्य-गुण को पाना कठिन नहीं है। कठिन है उसके भीतर सोच की उस विलंबित लय को बिलआखिर अटूट बनाए रखना जो अपने साथ आपको न सिर्फ़ सोचने पर बाध्य करती है, बल्कि आपके सोचे-जाने में कुछ इजाफा भी करती जाती है। पढ़नेवालों के मन में ऐसी खुशफैल जगह बहुत कम लेखक बना पाते हैं। उनकी नई गद्य पुस्तक कवि का अकेलापनमें भी पिछली पुस्तकों ( एक बार आयोवा और लेखक की रोटी) की तरह ही उनका सुगठित और सोचता हुआ गद्य अपने समय, कविता और कला के बारे में कुछ भिन्न नुक्ते से कहने की दोहरी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करता है। समकालीन हिन्दी कविताओं और कविओं के बारे में एक वरिष्ठ कवि के इतने प्रसन्न, चौकन्ना और बहुलार्थी लेखन से गुजरते हुए कविता और कव…