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मारियो और मासिमो

पहले कविता पढ़ने में आई। गीत चतुर्वेदी की। उन्हीं की भेजी गई कविताओं की फाइल में, पोस्टमैन शीर्षक से। नेरुदा अजाने नहीं थे। पर पोस्टमैन न सिर्फ़ अजाना था, बल्कि कविता और उसके फ़ुटनोट को पढ़कर उसकी ट्रैजिक लाइफ के बारे में जो जानकारी मिली उससे मन गहरे भिद गया।

अपने निर्वासित दिनों में नेरुदा स्पेन के एक छोटे से द्वीप में कुछ समय व्यतीत करते हैं। वहां भी उनके नाम दुनिया भर से डाक आती है। इतनी कि डाक विभाग को एक विशेष डाकिया नेरुदा तक उनकी चिट्ठियां पहुंचाने के लिए अलग से नियुक्त करना पड़ता है। डाकिये का नाम मारियो है। मारियो बहुत साधारण सा दिखनेवाला नौजवान है, जिसे एक खूबसूरत सी लड़की से प्यार हो जाता है। पर वह अपने प्रेम में इतना विश्वत नहीं कि उससे जाकर यह कह सके। इसमें स्वयं मातील्दा के प्रेम में डूबे कवि नेरुदा उसकी मदद करते हैं और वह न सिर्फ़ उस लड़की को इम्प्रेस कर उससे विवाह करता है, बल्कि नेरुदा की संगति कर कविताएं भी करने लगता है।

नेरुदा के उस द्वीप से जाने के बाद मारियो के पास उनकी बेशुमार यादें और वह सरोसामान रह जाता है जिसे वे अपने पीछे छोड़ गए थे। मारियो नेरुदा को हरचंद ख़त लिखकर अपनी याद दिलाता है, पर महाकवि की तरफ से उन खतों का कोई जवाब नहीं आता। मारियों के नाम अरसा बाद एक ख़त नेरुदा के सचिव का आता है, जिसमें नेरुदा के सरोसामान को भेजने की ठंडी गुजारिश होती है। मारियो इससे दुखी होता है। घरवाले ख़ुद को नेरुदा का मित्र कहनेवाले मारियो का उपहास करते हैं। हालाँकि कवि के रूप में स्थानीय स्तर पर प्रसिद्द हो चले मारियो की बाहर पूछ बढ़ती है और उसे माद्रित से कविता पाठ का बुलावा भी आता है। पर वहां उसके मंच तक जाते-जाते भगदड़ मच जाती है और मारियो की ज़िन्दगी भगदड़ की भेंट चढ़ जाती है। कुछ वर्ष बाद जब नेरुदा उस द्वीप पर वापिस लौटते हैं तो अपने अज़ीज़ मारियो का न होना उन्हें खलता है।

गीत ने अपने नेरुदा प्रेम के बावजूद कविता में मारियो के दुःख का वितान कुछ इस संवेदनशीलता से रचा है कि महाकवि एक अदने डाकिये के सामने ऊने दिखते हैं। गीत से ही मुझे यह मालूम हुआ कि इस कथानक पर इल पोस्तिनो नाम की एक फ़िल्म भी बन चुकी है। यह स्वीकार करना चाहिए कि फ़िल्म देखने के बाद मेरे लिए मारियो का मर्म कुछ और मायनों में भी उजागर हुआ।

मारियो की कहानी इतालवी हास्य कलाकार मासिमो त्रोइसी को जब मालूम चली तो उन्हें इस पर फ़िल्म बनाने की प्रेरणा हुई। इसमें उनका सहयोग निर्देशक माइकल रेडफोर्ड ने किया। आप यकीन करेंगे रेडफोर्ड का जन्म आज ही के दिन दिल्ली में हुआ था। बहरहाल। शूटिंग शुरू हुई। नेरुदा की भूमिका मशहूर फ्रेंच कलाकार फिलिप नूरे को दी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी। पर यह मारियो बने मासिमो थे, जिन्होंने फ़िल्म और अभिनय-कर्म को एक ऐसी ऊंचाई दी जहाँ पहुंचना किसी भी संवेदनासंपन्न कलाकार का स्वप्न होगा।

मासिमो बहुत पहले से हृदय-रोग से पीड़ित थे। अभी फ़िल्म की एक हफ्ते की शूटिंग ही हो पाई थी कि उन्हें सीवियर हार्ट अटैक आया। डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी। बीमार मासिमो ने रेडफोर्ड से पूछा, '' मैं मारियो के रूप में कैसा काम निकाल रहा हूँ। '' रेडफोर्ड ने कहा, ''फेंटास्टिक''। बस, मासिमो ने सर्जरी के लिए मना कर दिया और फ़िल्म की शूटिंग जारी रखी। मारियो में कायांतरित हो चुके मासिमो को एक-एक शॉट देने में शारीरिक तौर पर दिक्कत पेश आ रही थी। फिर भी उन्होंने कैमरे के आगे, मारियो को जीवंत बनाए रखा। उन्हें ज़्यादा तकलीफ न हो इसके लिए रेडफोर्ड ने कई सीन में उनके डबल का भी इस्तेमाल किया। सचेत दर्शकों ने लॉन्ग शॉट और शरीर के पिछले हिस्से से मारियो के फिल्मांकन में इसे मार्क किया होगा।

अपनी तमाम असहायता बोध और व्याधि को जीतकर आखिरकार मासिमो ने फ़िल्म में मारियो का किरदार पूरा किया। नियति की विडंबना देखिए, फ़िल्म में मौत के १२ घंटे बाद असल ज़िन्दगी में भी उनकी मृत्यु हो गई ! सर्जरी न कराने का फ़ैसला उनके लिए फेटल साबित हुआ। मारियो को अमर कर मासिमो कहीं पार्श्व में चले गए। मरणोपरांत उन्हें इस भूमिका के लिए ऑस्कर में बेस्ट ऐक्टर की कटेगरी में नामांकन मिला। ऑस्कर नहीं मिल सका। एक तरह से यह भी ठीक हुआ, क्योंकि जीतेजी हसोड़ समझकर दरकिनार किए गए इस कलाकार को मरणोपरांत ऑस्कर देकर अकादमी पुण्य-लाभ ही करती। ऑस्कर क्या किसी कलाकार की प्रतिबद्धता से बढ़कर है ?

मैं मारियो का दुःख गीत की कविता पढ़कर जान सका था, मासिमो को रेडफोर्ड के फ़िल्म के ज़रिये जाना। अब दोनों मेरी यादों के हिस्से हैं। उतने ही जितने अपनी उदास गरिमा में नेरुदा।
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3 comments:

anurag bhai padhker acha laga. kabhi kabhi aisa hota hi ke kisi k marne k baad uske ache kaam ko sraha jata hi. agar masimo surjery kara lete to shyad etne achi acting nahi kar pate.


masimo ke bare men jankar dukh hua. masimo par yah mario ke jewan ka hi asar raha hoga jiski wajah se unhone takleef ke bawjood film karne ki thani.is lekh ko padhkar film dekhne ki ichha ho rahi hai.

sonu


बहुत ही मारक फ़िल्म है अनुराग भाई! और पोस्टमैन मारीयो रुओप्पोलो के किरदार निभाने वाले मासिमो त्रोइसी की वास्तविक मृत्यु की खबर और भी मारक. वैसे भी मैं इस फ़िल्म को पिछले दसेक सालों में पच्चीसेक बार तो देख ही चुका होऊंगा. शुक्रिया याद दिलाने का.


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