Friday, February 20, 2009

कोठार से बीज : ६ : मलयज



कि वह बीज सुरक्षित रह जाए,उसे कीड़े न खा जाएं...

चाहता हूँ मैं खूब डटकर काम करूँ, खूब जमकर काम करूँ ( मैं कर सकता हूँ ), काम में सब कुछ भूल जाऊँ...अपनी शिकस्त और कुंठाएं ...मैं चाहता हूँ मुझे काम करने दें, वे सब जो चाहते तो हैं कि मैं काम करूँ ( क्योंकि उस काम के फल में वे शरीक होंगे) पर जो मुझे करने नहीं देते, मैं चाहता हूँ, मुझे काम करने दिया जाए, मुझे ठेला जाए, धक्का दिया जाए, मुझे तोड़ा-फोड़ा जाए, मुझे चोट पहुंचाई जाए...वहीं तक जहाँ कि मेरे हाथ से कलम न छूट जाए...मैं चाहता हूँ, मेरे हाथ में वह मेरी कलम मुझे दे दी जाए जो कभी तो कहीं और कभी तो कहीं नहीं छुपा दी जाती है, मेरे होशोहवास में, मेरी आंखों के सामने...और मैं अनकिये कामों के बोझ के नीचे दबा यह सब होने देता हूँ, क्योंकि नहीं चाहता कि वह ज़रा-सी हार्मनी, वह ज़रा-सा नाज़ुक संतुलन टूट जाए जिसके तहत मेरी ज़िन्दगी एक कामचलाऊ दहब से चलती जाती है। मैं चाहता यह ढब टूट जाए...मैं जो आधी अरक्षा में जीता हुआ सुरक्षा के आधे टुकड़े की तलाश में अपनी उम्र पर व्यर्थ के दिनों की मैली परतें चढ़ाता जाता हूँ...पूरी तरह अरक्षित हो जाऊँ...मेरे खून-पसीने में मेरी कलम डूबी हुई हो...
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हफ्ते में केवल कुछ समय को, मुझे अंकुरित होने की मोहलत मिलती है। बाकी समय मैं एक सख्त सूखे बीज की तरह पड़ा रहता हूँ। बीज के अंकुरण के लिए जो मुनासिब अँधेरा, ज़मीन के नीचे की गहराई और एकांत ज़रूरी है, वह मेरे लिए दुर्लभ है। मैं अपने आपको छूता हूँ--पीठ पर एक कर्री परत जो ताप में और भी कड़ी हो जाती है। मेरा संघर्ष -- कि वह बीज सुरक्षित रह जाए, उसे कीड़े खा जाएं। वह नष्ट न हो जाए।
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मैं दूसरों के रचे हुए को अपनी संवेदना की उंगुलियों से छूने की कोशिश करता हूँ : एक किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। मैं अपने को दिलासा देता हूँ कि मैं एक रचना के नशे में खो रहा हूँ, सिंच रहा हूँ, तप रहा हूँ। पर कहीं पर एक शक का कीड़ा छुपा रहता है जो किताब की हर पंक्ति, हर शब्द के पीछे ठठाकर हंस रहा होता है। मैं कीड़े को मसल कर मार नहीं सकता, वह एक सुरियलिस्टिक कीड़े की तरह खेल कर बड़ा होकर मुझे लील लेता है-- मैं एकाएक उचाट हो जाता हूँ, किताब एक तरफ़ रख देता हूँ...
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पद्य को पढ़ना उस केंद्र का फोड़ना है --उसे तलाश करना, उस तक पहुंचना--जिससे वह पद्य उपजा है, और इसलिए पद्य को पढ़ना गद्य को पढ़ने के बनिस्पत एक मुश्किल काम है। ख़राब से ख़राब कविता को एक नज़र में रद्द नहीं किया जा सकता, अगर आप करते हैं तो इसका मतलब है आप उस केंद्र तक जाने की दिक्कत से बचना चाहते हैं, उस केंद्र को तलाश कर और पाए बिना उसके न होने को स्वीकार कर लेते हैं। संक्षेप में किसी मानसिक झंझट में पड़ना नहीं चाहते। अक्सर 'ख़राब कविता' इस झंझट से बचने की कोशिश का शिकार होकर ही ख़राब मान ली जाती है।

किसी रचना को पढ़ना अपने को पाने का अनुभव करना भी है। पद्य में उसके केंद्र में जाकर यह अनुभव होता है और गद्य में उस केंद्र के वृत्त में।
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मैं चाहता हूँ की कविता कुछ करे, बस निस्पंद खूबसूरत पड़ी न रहे : यह इच्छा कितनी तीव्र है ! पर शायद, शायद कविता कुछ नहीं कर सकती। पर मेरी तीव्र इच्छा, जो अपने वेग के कारण 'रिबाउंड' होती है-- एक अदृश्य शीशे की दीवार से टकराकर मेरे पास लौट आती है-- और मेरे दुःख को मेरी असहायता को मेरे अकर्म को, गहराती है, दुहराती है।
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( मलयज हिन्दी के उन मूर्धन्य लेखकों में हैं जिनका न होना सालता है। अपने निधन के पूर्व उन्होंने जितनी जिम्मेदारी और लगाव से लेखन किया वह आज भी अत्यंत मूल्यवान और प्रासंगिक है। उनकी आलोचनाएँ, कविता और डायरी हमारी भाषा की निधि है। इस बार कोठार से बीज में उन्हीं की डायरियों से कुछ अंश। )

4 comments:

vidya said...

malyaj ki diary arsa pahle padhi thi.aaj is post se gujarte huye unki diaryon men jazb jivan aur rachna ki fer se yad ho aai. is bar samai nikalker diary ke teeno khand padhunga.

ravindra vyas said...

मलयज के ये डायरी अंश मार्मिक हैं और आपके ब्लॉग का रूप-रंग ज्यादा सुंदर हो गया है। बधाई।

trinetra said...

rachna padhkar mujhe yakayak Malyaj ji ki diary jaisee hee aakriti yaad aa gayee. wey ek muskarata hua chehra the aur kaheen apne hee bheetar chhupe rahte the. wahee tapish aur rachnatmak aantarikta unke is diary ansh mein dekhi ja sakti hai. Likhna aur doobkar likhna darasl apni aabhyantarikta ko apne hee andaaj mein darj karaana hai. Unke diary ke yeh uddharan jaise aapke bheetar jakar uthal-puthal machaane lagte hain. Aaj bhi sayad wey yahee kahate mujhe haath mein kalam dey dee jaaye.''mein chahata hoon ki kavita kuchh kare...

अरुण देव said...

बहुत प्यारा गद्य.मलयज अधूरे प्रेम की तरह याद आते हैं. 'मैं चाहता हूँ की कविता कुछ करे, बस निस्पंद खूबसूरत पड़ी न रहे'
क्या करे कविता...