गोरखपुर में कोई फ़िल्म फेस्टिवल होता है, यह बात तो सुनने में आई थी, पर उस फ़िल्म फेस्टिवल से निकलकर कुछ अनूठा मेरे हाथ भी लग जाएगा, यह सोचा न था। डाक से जब अपने जैसी दुबली-पतली काया की विश्व के महानतम दस फिल्मकारों पर एकाग्र पुस्तक, 'पहली किताब' हाथ लगी, तो इन दिनों इनमें से ज्यादातर की फिल्में जुनूनी ढंग से देखने के अपने निजी शगल को परे कर इसे फौरन घोखने बैठा, कुछ-कुछ इस भाव और उत्तेजना से भी कि यारा जो देखते हो, वह कितना पल्ले पड़ता है, जानो तो सही!हालाँकि हिन्दी में इससे पहले विनोद भारद्वाज की फिल्मों पर भीमकाय पुस्तक (जो कल आज और कल नाम से छपी है) को पढ़ने के सदमे से मैं अभी भी नहीं उबर पाया हूँ। फिल्मों का कथासार बतानेवाली पुनरुक्तियों से भरी इस पुस्तक को पढ़ने के पहले मेरे लिए कुंवर नारायणजी के सिनेमा पर छिटपुट लेखन से गुजरना जितना प्रीतिकर अनुभव था, उतना ही विष्णु खरे की लगभग अचर्चित पुस्तक, 'सिनेमा पढ़ने के तरीके' को गुनना शिक्षाप्रद। बहुत सी फिल्मों के बारे में फिल्मकार और लेखक के. बिक्रम सिंह की संगत और लेखन से जानकारी मिली। कहना चाहिए कि पहली किताब को पढ़ना भी पठन के इसी समृद्ध अनुभव की एक और कड़ी साबित हुई।
किताब में जिन दस फिल्मकारों का चयन किया गया है, उस पर कुछ नुक्ताचीनी किए बिना आगे की बात इसलिए होनी चाहिए क्योंकि यह प्रकाशन, जैसा कि इसके संपादक योगेन्द्र आहूजा बता रहे थे, कई खंडों में होना है। बहुत संभव है इसमें त्रुफो, गोदार, फेलीनी और अपनी पसंद से कहूँ तो तारकोवस्की, केस्लोव्सकी और वांग कर वाई उन्हीं आगामी चयनों का हिस्सा बनें। बहरहाल, इस पहली किताब में इल्माज़ गुने और जोल्तान फाबरी सरीखे फिल्मकारों पर सर्वथा नए ढंग से शुरू किया गया विमर्श है, तो अपने सत्यजीत और विमल राय की याद भी। बाकी कुरासोवा हैं, बर्गमैन हैं, चैप्लिन और वेल्स के साथ डी सिका और कियारोस्तमी भी।
फाबरी पर लिखते हुए कवि असद जैदी ने उनके कृतित्व को नज़रंदाज़ करने के निहितार्थों को भी उजागर किया है। यह लेख इन मायनों में माध्यम के रूप में फिल्म के प्रतिरोधी कला गुण की क्षमता का भी परिचायक है, जिसे हमारे यहाँ के करोड़ों कमा लेने वाले मुम्बईया फिल्मकार शायद ही हासिल कर पाएं। कुरासोवा के समग्र अवदान पर विष्णु खरे ने गहरे पैठ कर लिखा है तो योगेन्द्र आहूजा ने अर्सन वेल्स की कीर्ति का आधार रहे सिटिज़न केन के बहाने उनकी विलक्षण प्रतिभा पर रोशनी डाली है।
ईरानी फिल्मकार अब्बास कियारोस्तमी पर लिखा गया अजय कुमार का लेख कुछ रिवायती किस्म का हो चला है और इस लिहाज से वह दोनों राय पर लिखे गए सामान्य लेखों की ही श्रेणी में आता है। लगभग गैरसिनेमाई ढंग से अपनी शर्तों पर फिल्म बनानेवाले कियारोस्तमी के बारे में बहुत कुछ अनएक्सप्लोर्ड रह जाता है। यों, किसी एक लेख से ऐसी मांग ज्यादती ही कही जाएगी, पर इसके बेहतरीन नमूने भी इसी पहली किताब में हैं। इल्माज़ गुने, चैप्लिन और डी सिका पर लिखे गए विदेशी समीक्षकों के लेख, जिसे पुस्तक में अनूदित कर दिया गया है, को आगामी चयन का मानक भी माना जा सकता है।
अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में योगेन्द्र आहूजा ने लिखा है : यह किताब हम इस उद्देश्य और उम्मीद से प्रकाशित कर रहे हैं कि 'वास्तविक' सिनेमा के संबंध में, जो व्यावसायिक, छद्म सिनेमा से अलग है, जानकारी और रूचि का प्रसार होगा,...जिसका विशेषकर हिन्दी प्रदेशों में घोर अभाव है। इस लिहाज से यह प्रकाशन अपनी कतिपय सीमाओं के बावजूद प्रशंसनीय है।
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Thursday, 19 February, 2009
आभार इस जानकारी के लिए.
Thursday, 19 February, 2009
सिनेमा पर हिंदी में वैसे ही साहित्य कम है। ऐसे में इस किताब का भरपूर स्वागत किया जाना चाहिए।
Thursday, 19 February, 2009
dilchasp lagti hai...
Saturday, 21 February, 2009
abhi do pahle hi sanjay joshi ji hamen filman pdane aaye the.unhi se yeh kitab hath lgi.yah lekh padne ke bad mujhe lagta hai ki main kitab me shamil filmkaro ko aur achi tarah samajh paunga
Friday, 27 February, 2009
समीक्षा को ऐसा ही होना चाहिए. पढकर किताब पढने की तमन्ना भड़क उठी है. बधाई.
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