Tuesday, February 17, 2009

ज़बां उर्दू : ३ : ग़ालिब : पूरा ख़त और आधी ग़ज़ल

  • ख़त

    रखियो
    ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई में मुआफ़
    आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है

बंदा परवर,
पहले तुमको यह लिखा जाता है कि मेरे दोस्त क़दीम मीर मुकर्रम हुसैन साहिब की खिदमत में मेरा सलाम कहना और यह कहना कि अब तक जीता हूँ और इससे ज़्यादा मेरा हाल मुझको भी मालूम नहीं। मिर्ज़ा हातिम अली साहिब मेहर की जानिब में मेरा सलाम कहना...

तुम्हारे पहले ख़त का जवाब भेज चुका था, कि उसके दो दिन या तीन दिन के बाद दूसरा ख़त पहुँचा। सोनो साहिब, जिस शख्स को जिस शग्ल का ज़ौक हो और वह इसमें बेतकल्लुफ़ उम्र बसर करे, इसका नाम ऐश है। और भाई, यह जो तुम्हारी सुख़न-गुस्तरी है, इसकी शोहरत में मेरी भी तो नामवरी है। मेरा हाल इस फन में अब यह है कि शेर कहने की रविश और अगले कहे हुए अशआर सब भूल गया। मगर हाँ, अपने हिन्दी कलाम में से डेढ़ शेर, यानी एक मक्ता और एक मिसरा याद रह गया है। सो गाह-गाह जब, दिल उलटने लगता है, तब दस-पाँच बार यह मक्ता ज़बान पर आ जाता है -

ज़िन्दगी अपनी इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे

फिर जब सख्त घबराता हूँ और तंग आता हूँ, तो यह मिसरा पढ़कर चुप हो जाता हूँ -

ऐ मर्गेनागहाँ ! तुझे क्या इंतजार है ?

यह कोई न समझे कि मैं अपनी बेरौनकी और तबाही के ग़म में मरता हूँ। जो दुःख मुझको है उसका बयान तो मालूम, मगर उस बयान की तरफ़ इशारा करता हूँ। अंग्रेज़ की कौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से कत्ल हुए, उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शागिर्द। हिंदुस्तानिओं में कुछ अज़ीज़, कुछ दोस्त, कुछ शागिर्द, कुछ माशूक, सो वे सबके सब ख़ाक में मिल गए। एक अज़ीज़ का मातम कितना सख्त होता है ! जो इतने अज़ीज़ों का मातमदार हो, उसको ज़ीस्त क्योंकर न दुश्वार हो। हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।

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  • ग़ज़ल

ज़ुल्मतकदे में मेरे, शबे गम का जोश है
इक शमा है दलीले सहर, सो खमोश है

ने मुश्दयेविसाल, ना नज़ाराये जमाल
मुद्दत हुई कि आश्तिए चश्मओ गोश है

दागे फिराके सोह्बते शब की जली हुई
इक शमा रह गई है, सो वो भी खामोश है

आते हैं गैब से ये मजामी ख्याल में
ग़ालिब सरीरे खामा, नवाये सरोश है

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( शब्दार्थ : ज़ुल्मतकदे = अँधेरा घर, दलीले सहर = सुबह का प्रमाण, ने मुश्दयेविसाल = प्रिय मिलन का शुभ संदेश, आश्तिए चश्मओ गोश = आंखों और कानों के बीच की संधि, दागे फिराके सोह्बते शब = रात की महफ़िल के विरह का दाग, गैब = आकाश, सरीरे खामा = कलम की आवाज़ )

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( १८५८ में अपने शागिर्द मुंशी हरगोपाल तफ्ता के नाम लिखी चिट्ठी में ग़ालिब ने ग़दर का हाल बयान किया है। दी गई ग़ज़ल में भी उस वक्त ग़ालिब की निराश मनःस्थिति का ही वर्णन है। कहना व्यर्थ है कि ग़ालिब ने शायरी में क्या मुकाम हासिल किया और इतने बरस बीत जाने के बाद भी वे हमारे कितने करीब हैं। हाँ, उनके नस्र यानी गद्य, जो खतों और डायरी के रूप में ही सामने है, हमारी दोआबा भाषा में अपनी ठाट का पहला और इंतजार हुसैन के शब्दों में कहें तो गहन औपन्यासिक है। ख़त अर्श मलसियानी के अनुवाद में और ग़ज़ल गुलज़ार की मिर्ज़ा ग़ालिब नामक पुस्तक से। इससे पहले इस स्तम्भ में आप फिराक गोरखपुरी और सफिया अख्तर को पढ़ चुके हैं। कई जगह टाइपिंग के अज्ञान- के कारण नुक्ता नहीं लगा सका, विज्ञ बन्धु क्षमा करेंगे। )

3 comments:

कुमार आशीष said...

वाकई काबिलेतारीफ काम कर रहे हैं। ग़ालिब का ख़त पढ़ा अभी। अच्‍छा लगा।

Reality Bytes said...

रखियो ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई में मुआफ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है

सुशील कुमार छौक्कर said...

मिर्जा गालिब की जिंदगी को देखूँ तो आह निकलती है और उनके दिवान ए गालिब को पढूँ तो वाह निकलती है।