Saturday, February 07, 2009

व्योमेश शुक्ल की नई कविता


तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो


तुम शब्बर चाचा के घर की बग़ल में भी रह सकती थी
तुम गुलिस्ताँ प्राइमरी स्कूल में पढ़ भी सकती थी
तुम्हारे अब्बू शहनाई भी बजा सकते थे

लेकिन बासठ की उमर में तुम उठती हो और वर्सोवा पुलिस थाने जाकर अपने इकहत्तर
साल के पति नेताजी सालंके के खिलाफ उत्पीड़न का मुकद्दमा लिखा देती हो

तुम्हारे साथ बदसलूकी हुई है
तुम्हें थोड़ा आराम कर लेना चाहिए
तुम जो कर सकती थी कर आई हो
और ये दुबली-पतली खबर देश में फैल भी गई है
फ्लैट का दरवाजा भीतर से बंद कर लो

थोड़ी देर में आएगा दिनेश ठाकुर हाथ में रजनीगंधा के फूल लिए
या अमोल पालेकर भी आ सकता है या मैं भी आ सकता हूँ
कोई न कोई आएगा
उसके दरवाजा खटखटाते ही फिल्म शुरू होती है
साठ के अंत की फिल्म सत्तर के शुरू की फिल्म
शहर आने की फिल्म
जेल जाने की फिल्म
बहुत ज्यादा लोगों से कम लोगों की फिल्म
पब्लिक ट्रांसपोर्ट की फिल्म
या पब्लिक सेक्टर की फिल्म शुरू होती है एक फ्लैट का दरवाजा खटखटाने से

लेकिन मेरे और तुम्हारे बीच
सिर्फ दरवाजे भर की दूरी नहीं है

बहुत से जमाने हैं बहुत से लोग
विद्याचरण शुक्ल हैं और बी आर चोपड़ा हैं और प्रकाश मेहरा हैं और मनमोहन देसाई हैं
और आनंद बख्शी हैं और ठाँय-ठाँय और ढिशुम-ढिशुम और ढाँ... है और घटिया फिल्में हैं
और अत्यन्त घटिया राजनीति है और आपातकाल है
दरअसल गिरावट के अन्तहीन मुकाबले चल रहे हैं मेरे और तुम्हारे बीच
और तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो

मैं जानना चाहता हूँ कि इस समय तुम क्या कर रही होगी क्या हो रही होगी तुम कुछेक
हिन्दी फिल्मों की एक गुमनाम और मीडियाकर अभिनेत्री तुम परवीन बाबी या जीनत अमान
भी तो हो सकती थी तुम मणि कॉल की सिद्धेश्‍वरी में विद्याधरी भी बन सकती थी
तुम मेरी नानी भी हो सकती थी बेटी हो सकती थी तुम वह बहन हो सकती थी जिसकी शादी
तुम्हारे अस्तित्व की तरह ढहा दी गई थी एक दिन मेरी बीबी हो सकती थी तुम

मेरी माँ साठ साल की हैं और तुम बासठ की
मेरी माँ हो सकती थी तुम
मेरी माँ हो सकती हो तुम
अम्मा...............।

यहीं बनता है एक मानवीय सम्बन्ध
मैं इसे दर्ज करता हूँ
और अपने पिता से तुम्हारी बात पक्की करता हूँ
अगर तुम्हें पसंद हो यह सब तभी

लेकिन तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो

****


( व्योमेश शुक्ल अभी हिन्दी में समर्थ गद्य और कविताएं लिखनेवाले चंद युवाओं में से न सिर्फ़ अलग से लक्षित करने योग्य हैं, बल्कि आनेवाले वक्त में हम उनके लेखन से वैसी उम्मीद भी लगा सकते हैं जो मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय के लेखन से कुछ हद तक पूरी होती है। जिन्हें यह कथन अतियुक्ति जान पड़ता हो वे व्योमेश के लेखन से कुछ नजदीकियां बढ़ा लें। सबद उनकी रचनाओं को पहले भी पहलेपहल छाप चुका है। अब उनकी यह नई कविता भी यहीं। )

6 comments:

अनिल कान्त : said...

इस कवि की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है ...क्या पिरोया है भावों को ....मान गये

Geet Chaturvedi said...

अच्‍छी कविता है व्‍योमेश की.

Ratnesh said...

कविता बहुत अच्छी है. मै कोई मुकद्दमा नहीं कर रहा हूँ.
Thank U Ratnesh

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

अच्छी कहन...उम्दा शिल्प!

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग !

आपने व्योमेश की एक अच्छी, समर्थ और महत्वपूर्ण कविता छापी। आपकी मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय वाली टिप्पणी के बारे में यह जरूर कहना चाहूंगा कि अब मैं व्योमेश के लेखन से नजदीकियां बढ़ाने पर ध्यान दूंगा।

ताहम... said...

व्योमेश को पहली बार ज्ञानरंजन जी की "पहल" में पढ़ा था। जिसमें विष्णु खरे तथा असद जैदी की नई पुस्तक प्रकाशन पर व्योमेश ने उन पुस्तकों की समीक्षा की थी। व्योमेश जितने गहरे कविता में हैं उतने ही अधिक गहरे लेख तथा समीक्षा में भी हैं, विष्णु खरे की पुस्तक पाठांतर तथा असद जैदी पर की पुस्तकों पर की गई लगभग २० पन्नों की समीक्षा एक दस्तावेज है, व्योमेश के मुताल्लिक़ में ने ज्ञानरंजन जी से एक बार पूछा था, उनका जवाब था कि व्योमेश विशिष्ट प्रतिभा का स्वामी है और लेखन,तथा अच्छा वक्ता होने के साथ साथ ये एक अच्छा इंसान भी है। व्योमेश की ये मेरी सबसे पसंदीदा कविता है, पोस्ट करने पर आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

Nishant kaushik