सबद
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क्या वे उन्हें भूल सकती हैं ?


मुझे सहसा लगा, यह लड़का अपनी अनिश्चितता में, अपनी नर्वसनेस में -- इस लड़की को खो रहा है। मुझे तब अपने बहुत-से मित्र याद हो आए जो महज़ अपनी ज़िद, अपनी अकड़, अपनी हिंस्र आक्रामकता में, अपने उन्मत्त पैशन में कितनी आसानी से लड़कियों को पा लेते हैं और उन्हें एक क्षण भी संकोच नहीं होता कि वे उन लड़कियों को अपने उन मित्रों से छीन ले रहे हैं, जो पराजित हो जाते हैं, पीछे हट जाते हैं, इसलिए नहीं कि वे कम 'पोटेंट' हैं, कम मर्द हैं, कम प्रेम करना जानते हैं, बल्कि इसलिए कि वे 'नर्वस' हैं, अनिश्चित हैं, शंकाकुल हैं, इस बात में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, कि उनमें इतना सामर्थ्य है कि किसी लड़की को सुखी बना सकें ( 'मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, लेकिन सुनो, मैं तुम्हारे संग सेक्योर महसूस नहीं करती )

इसलिए जब दूसरे आदमी आते हैं, मज़बूत और मुखर, और अपनी धुन के पक्के -- तो अनायास वे लड़कियां उनके साथ चली जाती हैं, उनसे विवाह करके अपनी गृहस्थी बसा लेती हैं, बच्चे जनती हैं, सबकुछ पा लेती हैं, जो कभी चाहती थीं...

लेकिन कभी-कभी मैं सोचता हूँ, कि किसी सूनी दुपहर में जब उनका पति अपने कोर्ट, फ़र्म या दफ्तर में होता है और बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं -- ये लड़कियां अवश्य खिड़की से बाहर झांकते हुए, या पलंग पर ऊंघते हुए या कोई पुराना गुरुदत्त की फ़िल्म का गाना सुनते हुए ( जो कहीं दूर ढाबे के रेडियो से उनके कमरे में चला आता है ) सोचती होंगी उन लड़कों के बारे में जो काफी कच्चे थे, काफी अनिश्चित और चुप्पे-से, दुर्भाग्यवश आत्मग्रस्त, जिन्हें कभी शादी से पहले उन्होंने किसी शाम के झिलमिले में चूमा था -- जल्दी, घबराए-से होंठ चेहरे पर आए नए उदास रोयों पर, और आँखें और साँसें और आँखें...

वे सो जाती हैं। खिड़की बंद करके लौट आती हैं।

क्या वे उन्हें भूल सकती हैं ?

( निर्मल वर्मा की डायरी धुंध से उठती धुन से साभार। चित्र कृति हेनरी मातीस की। )
****

12 comments:

निर्मल वर्मा की डायरी ’धुंध से उठती धुन’ का अंश पढ़वाने का आभार.


जख्मों का रंग भी हरा होता है। सब हरा कर दिया आपने। बहुत पहले दैनिक भास्कर की एक साप्ताहिक पत्रिका भास्कर टुडे का संपादन करते हुए मैंने साहित्य के पन्ने पर निर्मलजी की डायरी का यह अंश लगाया था। आज यहां यह अंश दोबारा पढ़कर फिर हरा हो गया हूं...


ज़िद, अकड़, हिंस्र आक्रामकता वाले प्रेमी भी चूकते हैं और वे भी ऐसे ही किसी गुनगुनी, अलसाई, नोस्टालजिक दोपहर में ऐसे ही कभी याद कर लिए जाते होंगे.


nirmalji ki diary ke is ansh pr na jane kitni bar thithka hun.


great! its simply great....I hav no words to explain how beautifull it is....


Great Insight..... But I cant advice to read this to my girl friend.... It may lead anyone to her PAST (If any).


shukriya..is behad khoobsurat abhivyakti ko padhvane ke liye. kintu bahut si ladkiyan aisi bhi hoti hai jo nervous, anischit aur shankakul premi chahti hai..kyonki unhe pata hai ki so called majboot aur mukhar ki vanisvat nervous ladke kahin jyada sachhe hote hai.


निर्मल वर्मा जी की लेखनी तो ऐसी है कि जिसका मुकाबला कोई आसानी से नहीं कर सकता...मन करता है बस पढ़ते ही जाओ


बहुत खुब !

निर्मल जी को पढनी की भूख मेरे अन्तरमे सदा पल्लवित होता है । इस भूख को आपने तनिक मिटाया है ।
चुना हुआ अंश सटीक है ।

वे/वह सायद ही भूल पाएगी / (पाएगा) ।


निर्मल जी के शब्दों का जादू इस कदर चढ़ता है कि आप उसे बार-बार पढ़ते है और एक किताब को पढने के बाद दूसरी किताब पढने के लिए बैचेन हो जाते है।


Whoever said, 'Silence is gold' gave to much importance to the act of being silent. A person like me who has just 24hrs but has things to say that can consume close to 30hrs, talks fast to finish whatever she has to say, can hardly find any comfort in someone's company who doesn't talk much, is unsure of himself and doesnt know how to go about getting something that he wants and longs for...


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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